अगर आपको लगता है कि सिर्फ ऑफिस में बैठकर चाय पीने और पुराने घिसे पिटे आइडियाज से आपकी कंपनी गूगल बन जाएगी तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी का इंतजार कर रहे हैं। बिना इनोवेशन के आपकी ग्रोथ वैसे ही रुक जाएगी जैसे पुराने फोन में हैंग होने की बीमारी होती है।
आज के इस दौर में अगर आप खुद को ट्रांसफॉर्म नहीं कर रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप अपनी सक्सेस को खुद ही तलाक दे रहे हैं। रॉबर्ट टकर की यह बुक हमें बताएगी कि कैसे लीडिंग फर्म्स इनोवेशन से अपना फ्यूचर बदल रही हैं।
लेसन १ : आइडियाज का सेल सर्विस मॉडल - इनोवेशन कोई जादुई चिराग नहीं बल्कि एक सिस्टम है।
ज्यादातर कंपनियों में इनोवेशन का मतलब होता है कि बॉस साल में एक बार मीटिंग बुलाएगा और कहेगा कि दोस्तों हमें कुछ तूफानी करना है। सब लोग दो मिनट के लिए एक्साइटेड होते हैं और फिर वापस अपनी बोरियत भरी डेस्क पर जाकर वही पुराने काम करने लगते हैं। रॉबर्ट टकर कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी की ग्रोथ चाहते हैं तो आपको इस लॉटरी वाले माइंडसेट को कचरे के डिब्बे में डालना होगा। इनोवेशन कोई ऐसी चीज नहीं है जो आसमान से अचानक बिजली की तरह गिरेगी और आपकी कंपनी रातों रात ऐपल बन जाएगी। असलियत में यह एक सेल सर्विस मॉडल की तरह होना चाहिए जहाँ हर इंसान अपना आइडिया खुद जनरेट करे और उसे आगे बढ़ाए।
सोचिए आप एक ऐसे रेस्टोरेंट में गए हैं जहाँ वेटर तभी आता है जब उसका मन करता है। आप भूखे बैठे हैं और वो अपनी ही धुन में मस्त है। क्या आप वहाँ दोबारा जाएंगे। बिल्कुल नहीं। बिजनेस में भी यही होता है। अगर आप सिर्फ एक खास टीम या सिर्फ मैनेजमेंट के भरोसे बैठे हैं कि वही कुछ नया सोचेंगे तो आप समझ लीजिए कि आपने अपनी ग्रोथ का गला खुद ही घोंट दिया है। रॉबर्ट टकर के हिसाब से इनोवेशन एक डिसिप्लिन है। जैसे आप रोज सुबह ब्रश करते हैं वैसे ही कंपनी में नए आइडियाज पर काम होना चाहिए। इसे लेखक ने आइडिया मैनेजमेंट सिस्टम कहा है।
मान लीजिए एक ऐसी कंपनी है जो जूते बनाती है। अब उनके पास एक डिजाइनर है जो एसी रूम में बैठकर सोच रहा है कि पिंक कलर के जूते ट्रेंड में आएंगे। लेकिन जो सेल्समैन दुकान पर खड़ा है उसे पता है कि लोग ऐसे जूते मांग रहे हैं जो कीचड़ में खराब न हों। अगर कंपनी के पास ऐसा सिस्टम नहीं है जहाँ वो सेल्समैन अपना आइडिया आसानी से ऊपर तक पहुँचा सके तो वो डिजाइनर चाहे कितनी भी डिग्री ले ले वो कंपनी डूबेगी ही।
यहाँ सार्केज्म यह है कि हम लोग अक्सर उन लोगों की बात नहीं सुनते जो असल में कस्टमर से बात कर रहे हैं। हम उन सो कॉल्ड एक्सपर्ट्स पर भरोसा करते हैं जिनके पास बड़ी डिग्रियां तो हैं पर ग्राउंड रियलिटी का जीरो नॉलेज है। अगर आपके ऑफिस में चपरासी को भी पता है कि फाइल को मैनेज करने का कोई बेहतर तरीका है और वो आपको बताने से डर रहा है तो आपका कल्चर बीमार है।
इनोवेशन का असली मतलब है कि हर एम्प्लॉई को यह लगना चाहिए कि उसका एक छोटा सा आइडिया भी कंपनी का फ्यूचर बदल सकता है। यह कोई इवेंट नहीं है जो साल में एक बार मनाया जाए। यह तो वो सांस है जो कंपनी को जिंदा रखती है। अगर आप आज यह सिस्टम नहीं बना रहे हैं तो आप सिर्फ वक्त गुजार रहे हैं ग्रोथ नहीं कर रहे हैं। जब आप हर किसी को इनोवेटर बना देते हैं तब जाकर एक ऐसी मशीन तैयार होती है जिसे कोई कॉम्पिटिटर नहीं तोड़ सकता।
लेसन २ : कस्टमर की अनकही जरूरतों को समझना - जासूस बनिए ज्योतिषी नहीं।
ज्यादातर बिजनेसमैन को लगता है कि उन्हें पता है कि उनके कस्टमर को क्या चाहिए। वो अपने ऑफिस के बंद कमरे में बैठकर ऐसी ऐसी थ्योरीज बनाते हैं जैसे वो सीधा कस्टमर के दिमाग में जीपीएस लगाकर बैठे हों। रॉबर्ट टकर कहते हैं कि अगर आप सिर्फ वही बना रहे हैं जो कस्टमर मांग रहा है तो आप कभी मार्केट लीडर नहीं बन पाएंगे। असली खिलाड़ी वो होता है जो वो चीज बना दे जिसकी जरूरत कस्टमर को है पर उसे खुद भी इसका अंदाजा नहीं है। इसे कहते हैं कस्टमर की अनकही या छिपी हुई जरूरतों को पकड़ना।
सोचिए अगर नोकिया ने २००७ में लोगों से पूछा होता कि उन्हें कैसा फोन चाहिए। लोग शायद कहते कि बैटरी थोड़ी और चला दो या बटन थोड़े और सॉफ्ट कर दो। किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उन्हें एक ऐसा कांच का टुकड़ा चाहिए जिस पर वो सारा दिन अपनी उंगलियां घिसेंगे और दुनिया भर की रील्स देखेंगे। स्टीव जॉब्स ने वो अनकही जरूरत समझी और आईफोन ले आए। बाकी सब इतिहास है। अगर आप सिर्फ फीडबैक फॉर्म के भरोसे बैठे हैं तो आप सिर्फ एवरेज बनकर रह जाएंगे।
हकीकत तो यह है कि कस्टमर खुद बहुत कन्फ्यूज्ड है। उसे खुद नहीं पता कि उसे क्या चाहिए जब तक वो चीज उसके सामने न आ जाए। सार्केज्म की बात तो देखिए कि हम घंटों मार्केट रिसर्च की रिपोर्ट्स पढ़ने में बिता देते हैं जो उन लोगों ने भरी होती हैं जिन्हें बस फ्री का गिफ्ट वाउचर चाहिए था। वो फॉर्म में कुछ भी लिख देते हैं और हम उसे पत्थर की लकीर मानकर करोड़ों रुपये बहा देते हैं। रॉबर्ट टकर सलाह देते हैं कि रिपोर्ट पढ़ने के बजाय अपने कस्टमर को ऑब्जर्व करना शुरू कीजिए। देखिए कि वो आपके प्रोडक्ट को यूज करते समय कहाँ झुंझला रहा है या उसे कहाँ परेशानी हो रही है।
मान लीजिए आप एक डिटर्जेंट पाउडर बेचते हैं। आपकी रिसर्च कहती है कि लोगों को खुशबू पसंद है। लेकिन अगर आप ध्यान से देखें तो असल परेशानी यह है कि पाउडर के पैकेट को खोलने में नाखून टूट जाते हैं। अगर आपने एक इजी टू ओपन कैप बना दी तो आपने वो जरूरत पूरी कर दी जो किसी ने आपसे मांगी ही नहीं थी। यही वो छोटा सा इनोवेशन है जो आपको बाकी ब्रांड्स से कोसों आगे ले जाता है।
याद रखिए कि ग्रोथ उन लोगों को नहीं मिलती जो सिर्फ जवाब देते हैं। ग्रोथ उनको मिलती है जो सही सवाल पूछते हैं। आपको अपने कस्टमर की लाइफ में एक जासूस की तरह घुसना होगा ताकि आप उसकी उन दिक्कतों को देख सकें जिन्हें उसने अपनी किस्मत मानकर स्वीकार कर लिया है। जब आप किसी की ऐसी प्रॉब्लम सॉल्व करते हैं जिसके बारे में उसे खुद भी नहीं पता था तब आप सिर्फ एक सेलर नहीं बल्कि एक मसीहा बन जाते हैं। और मसीहाओं की ग्रोथ कभी नहीं रुकती।
लेसन ३ : रिस्क लेने का कल्चर बनाना - सेफ खेलने वाले सिर्फ तालियां बजाते हैं।
अगर आप यह सोचकर बैठे हैं कि बिना कोई गलती किए या बिना कोई रिस्क लिए आप दुनिया जीत लेंगे तो शायद आप किसी और ग्रह की बात कर रहे हैं। रॉबर्ट टकर बहुत साफ शब्दों में कहते हैं कि इनोवेशन का सबसे बड़ा दुश्मन वो डर है जो हमें फेल होने से रोकता है। हमारी सोसाइटी और कॉर्पोरेट कल्चर में गलती करना एक पाप माना जाता है। अगर किसी एम्प्लॉई ने कुछ नया ट्राई किया और वो फेल हो गया तो उसे ऐसे देखा जाता है जैसे उसने ऑफिस की तिजोरी साफ कर दी हो। लेकिन सच तो यह है कि जो कंपनी रिस्क नहीं लेती उसका अंत बहुत ही बोरिंग और दर्दनाक होता है।
इसे एक मजेदार नजरिए से देखिए। मान लीजिए आप एक ऐसे इंसान हैं जो स्विमिंग सीखना चाहता है पर पानी में उतरने से डरता है क्योंकि कहीं कपड़े गीले न हो जाएं। अब आप किनारे पर बैठकर कितनी भी किताबें पढ़ लें आप कभी तैरना नहीं सीख पाएंगे। बिजनेस में भी लोग यही करते हैं। वो चाहते हैं कि उनकी कंपनी गूगल जैसी इनोवेटिव बन जाए पर वो एक रुपया भी ऐसे प्रोजेक्ट पर नहीं लगाना चाहते जिसका रिजल्ट पक्का न हो। सार्केज्म यह है कि हम चाहते हैं कि हमें आम के फल मिलें पर हम बीज बोने का रिस्क भी नहीं उठाना चाहते क्योंकि कहीं बीज खराब न निकल जाए।
रॉबर्ट टकर कहते हैं कि लीडिंग फर्म्स और साधारण कंपनियों में यही फर्क है। बड़ी कंपनियां फेलियर को एक लेसन की तरह देखती हैं। अगर आप फेल नहीं हो रहे हैं तो इसका मतलब है कि आप कुछ भी नया ट्राई नहीं कर रहे हैं। आप बस वही घिसा पिटा काम कर रहे हैं जो पिछले दस सालों से चल रहा है। और याद रखिए कि अगर आप वही करेंगे जो आप हमेशा से करते आए हैं तो आपको वही मिलेगा जो हमेशा से मिलता आया है। बल्कि आज के दौर में तो उतना भी नहीं मिलेगा क्योंकि कोई और आपसे ज्यादा रिस्क लेकर आपसे आगे निकल चुका होगा।
असली ग्रोथ के लिए आपको अपने ऑफिस में ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ लोग नए एक्सपेरिमेंट्स करने से डरे नहीं। अगर कोई आईडिया फेल होता है तो उस इंसान को जलील करने के बजाय यह पूछिए कि हमने इससे क्या सीखा। जब तक आप फेल होने की परमिशन नहीं देंगे तब तक कोई भी इंसान अपनी कंफर्ट जोन से बाहर नहीं निकलेगा। और कंफर्ट जोन वो जगह है जहाँ इनोवेशन की मौत होती है। ज्यादातर बॉस चाहते हैं कि उनके एम्प्लॉई रोबोट की तरह काम करें पर उम्मीद वो उनसे आइंस्टीन वाली रखते हैं। यह अपने आप में एक बहुत बड़ा जोक है।
तो बात बहुत सिंपल है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी कंपनी का फ्यूचर ब्राइट हो तो आपको थोड़े बहुत अंधेरे का रिस्क तो लेना ही पड़ेगा। बिना गिरे कोई चलना नहीं सीखता और बिना फेल हुए कोई बड़ा बिजनेस नहीं बनता। इनोवेशन की राह में फेलियर कोई स्टॉप नहीं है बल्कि वो एक मील का पत्थर है जो बताता है कि आप सही रास्ते पर हैं। अपनी टीम को भरोसा दिलाइए कि आप उनके साथ खड़े हैं चाहे नतीजा जो भी हो। जब डर खत्म होता है तभी क्रिएटिविटी का जन्म होता है।
तो दोस्तों, क्या आप भी अपनी ग्रोथ को पुराने ढर्रे पर छोड़ना चाहते हैं या आज से ही कुछ नया करने का रिस्क लेंगे। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे अपने उस दोस्त या कलीग के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने आइडियाज की दुकान खोलकर बैठा है। कमेंट्स में बताएं कि आप अपनी लाइफ या बिजनेस में कौन सा नया लेसन आज से लागू करने वाले हैं। चलिए मिलकर इनोवेशन की इस लहर को आगे बढ़ाते हैं।
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