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क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सोचते हैं कि बस एक कूल नाम और वेबसाइट बनाकर आप अगले करोड़पति बन जाएंगे। मुबारक हो, आप अपनी मेहनत की कमाई और कीमती वक्त को नाली में बहाने की तैयारी कर रहे हैं। बिना सॉलिड प्लान के डॉट कॉम शुरू करना मतलब बिना लाइफ जैकेट के समंदर में कूदना है।

अगर आप फेल होने का शौक नहीं रखते तो टिम बर्न्स की यह गाइड आपके लिए गोल्ड माइन है। चलिए समझते हैं उन 3 बड़े लेसन्स को जो आपके स्टार्टअप को डूबने से बचाकर असली प्रॉफिट की रेस में ले जाएंगे।


Lesson : मार्केट की असली नस को पहचानना

अक्सर हमारे देश के युवाओं के साथ एक बड़ी प्रॉब्लम होती है। जैसे ही उनके दिमाग में कोई 'महान' आइडिया आता है, वे सीधे डोमेन खरीदने और लोगो बनवाने निकल पड़ते हैं। उन्हें लगता है कि बस वेबसाइट लाइव हुई नहीं कि मार्क जुकरबर्ग खुद उन्हें गले लगाने आ जाएगा। लेकिन टिम बर्न्स कहते हैं कि यह आपके स्टार्टअप की कब्र खोदने का सबसे पहला कदम है। मार्केट की असली नस को पहचाने बिना बिजनेस शुरू करना वैसा ही है जैसे आप किसी ऐसे इंसान को गंजेपन की दवा बेच रहे हों जिसके सिर पर घने बाल हैं। वह आपकी दवा खरीदेगा नहीं, बल्कि आपको पागल समझेगा और शायद दो बातें सुना भी देगा।

मान लीजिए राहुल नाम का एक लड़का है जो बेंगलुरु में रहता है। उसे लगा कि लोग बहुत बिजी हैं, तो उसने एक 'ऑनलाइन स्पून फीडिंग' सर्विस शुरू की। ऐप बनाया, मार्केटिंग पर पैसे फूंके और सोचा कि लोग उसे पैसे देंगे ताकि कोई उनके घर आकर उन्हें खाना खिला सके। अब आप ही बताइए, कौन इतना आलसी होगा जो खुद चम्मच से खाना नहीं खा सकता। राहुल को लगा उसका आइडिया 'यूनिक' है, जबकि असलियत में वह 'यूजलेस' था। टिम बर्न्स समझाते हैं कि डॉट कॉम की दुनिया में सिर्फ वही चलता है जो किसी की रियल लाइफ प्रॉब्लम को सॉल्व करे। अगर आपकी सर्विस लोगों का सिरदर्द कम नहीं कर रही, तो यकीन मानिए, आप खुद के लिए एक नया सिरदर्द पाल रहे हैं।

आपको यह समझना होगा कि इंटरनेट पर लोग अपना क्रेडिट कार्ड तभी निकालते हैं जब उन्हें कोई बड़ा फायदा दिख रहा हो। क्या आप उनका पैसा बचा रहे हैं। क्या आप उनका समय बचा रहे हैं। या क्या आप उनकी जिंदगी आसान बना रहे हैं। अगर इन सवालों का जवाब 'ना' है, तो आपका बिजनेस प्लान सिर्फ कागज का एक टुकड़ा है। मार्केट रिसर्च का मतलब गूगल पर दो मिनट सर्च करना नहीं होता। इसका मतलब है उन लोगों से बात करना जो आपके कस्टमर बन सकते हैं। उनसे पूछिए कि उन्हें क्या दिक्कत आ रही है। अगर दस में से आठ लोग कहें कि 'भाई, ये सर्विस मिल जाए तो मजा आ जाए', तब समझिये कि आपने सोने की खान ढूंढ ली है।

डॉट कॉम बिजनेस में इमोशन्स की कोई जगह नहीं होती। आपको डेटा के साथ प्यार करना पड़ेगा। अगर डेटा कह रहा है कि लोग आपकी वेबसाइट पर आ तो रहे हैं पर कुछ खरीद नहीं रहे, तो इसका मतलब है कि आपकी दुकान सजी तो अच्छी है पर माल में दम नहीं है। सार्काज्म की भाषा में कहें तो, बिना मार्केट समझे बिजनेस शुरू करना मतलब अंधेरे कमरे में काली बिल्ली ढूंढना है, जो वहां है ही नहीं। इसलिए, अपनी 'ईगो' को साइड में रखिये और पहले यह देखिये कि मार्केट को क्या चाहिए, न कि आपको क्या बेचना है। जब आप मार्केट की नस पकड़ लेते हैं, तो सफलता आपके पीछे भागती है, आपको उसके पीछे नहीं भागना पड़ता।


Lesson : रेवेन्यू मॉडल का क्लियर होना

आजकल के स्टार्टअप कल्चर में एक बहुत ही अजीब बीमारी फैली है और उसका नाम है 'बर्निंग कैश'। लोग सोचते हैं कि बस इन्वेस्टर से पैसा उठाओ, उसे डिस्काउंट देने में फूंक दो और फिर उम्मीद करो कि एक दिन चमत्कार होगा और पैसा अपने आप बरसने लगेगा। टिम बर्न्स बड़े प्यार से समझाते हैं कि भाई, अगर आपकी दुकान में गल्ले के अंदर पैसा आने का रास्ता साफ नहीं है, तो आप बिजनेस नहीं कर रहे, आप चैरिटी कर रहे हैं। और यकीन मानिए, चैरिटी करने के लिए भी पहले पैसा कमाना पड़ता है। बिना रेवेन्यू मॉडल के डॉट कॉम चलाना वैसा ही है जैसे आप एक ऐसी गाड़ी चला रहे हैं जिसमें पेट्रोल टैंक ही नहीं है। धक्का देकर कितनी दूर ले जाओगे।

इसे एक मजेदार मिसाल से समझते हैं। सोचिए एक साहब हैं मिस्टर वर्मा। उन्होंने एक वेबसाइट बनाई 'चाय-पानी डॉट कॉम'। उनका आइडिया था कि वह लोगों के घर जाकर फ्री में यह बताएंगे कि उनके पड़ोस में कौन सी चाय की दुकान सबसे अच्छी है। लाखों लोग उनकी साइट पर आने लगे क्योंकि फ्री की सलाह किसे पसंद नहीं। वर्मा जी खुश कि ट्रैफिक बढ़ रहा है। पर जब महीने के आखिर में ऑफिस का किराया और बिजली का बिल देने की बारी आई, तो उनके पास सिर्फ 'थैंक यू' वाले ईमेल्स थे। उनसे किराया नहीं भरा जाता। वर्मा जी को लगा था कि जब भीड़ आएगी तो पैसा भी आएगा, पर पैसा तो तब आता है जब आप मांगते हैं।

आपका बिजनेस प्लान चिल्ला-चिल्ला कर यह बताना चाहिए कि 'पैसा कहाँ से आएगा'। क्या आप सब्सक्रिप्शन मॉडल पर काम करेंगे। क्या आप विज्ञापन से कमाएंगे। या फिर आप हर ट्रांजैक्शन पर अपना कट रखेंगे। अगर आपका जवाब है 'हम बाद में देख लेंगे', तो समझ लीजिए कि वह 'बाद' कभी नहीं आता। इंटरनेट की दुनिया में कंपटीशन इतना ज्यादा है कि अगर आप अपने कस्टमर से एक रुपया भी वसूलने की हिम्मत नहीं रखते, तो कोई और आकर उन्हें मुफ्त का लालच देकर उड़ा ले जाएगा। सार्काज्म की बात तो यह है कि लोग अपनी पूरी जवानी 'यूनिक विजिटर्स' गिनने में निकाल देते हैं, जबकि असलियत में उन्हें 'यूनिक प्रॉफिट' पर ध्यान देना चाहिए था।

एक सॉलिड रेवेन्यू मॉडल का मतलब है कि आपको पता हो कि एक कस्टमर को अपनी साइट पर लाने में कितना खर्चा हो रहा है और वह कस्टमर आपको बदले में कितना कमा कर दे रहा है। अगर आप दस रुपये खर्च करके पांच रुपये कमा रहे हैं, तो आप मैथ के हिसाब से भी और अक्ल के हिसाब से भी फेल हैं। टिम बर्न्स कहते हैं कि प्रॉफिटेबल होना कोई गुनाह नहीं है, बल्कि बिजनेस का असली मकसद है। अपनी वैल्यू को पहचानिए और शुरू से ही ऐसी स्ट्रेटजी बनाइये कि आपका बिजनेस खुद का खर्चा निकाल सके। जब तक आपकी जेब में पैसा नहीं आएगा, आप अपने बड़े विजन को कभी हकीकत नहीं बना पाएंगे।


Lesson : स्केलेबिलिटी और फ्लेक्सिबिलिटी

डॉट कॉम की दुनिया में चीजें इतनी तेजी से बदलती हैं कि जब तक आप अपना 'परफेक्ट' बिजनेस प्लान टाइप करके खत्म करते हैं, तब तक मार्केट की टेक्नोलॉजी बदल चुकी होती है। टिम बर्न्स का तीसरा सबसे बड़ा लेसन यही है कि आपका बिजनेस प्लान पत्थर की लकीर नहीं, बल्कि गीली मिट्टी जैसा होना चाहिए जिसे जरूरत पड़ने पर मोड़ा जा सके। अगर आपका बिजनेस ऐसा है जो सिर्फ दस लोगों के साथ ही चल सकता है और हजार लोग आते ही क्रैश हो जाता है, तो आपने बिजनेस नहीं, बल्कि एक छोटा सा खिलौना बनाया है। स्केलेबिलिटी का मतलब है कि आपके बिजनेस में वो दम होना चाहिए कि वह बिना आपकी जान निकाले बड़ा हो सके।

पिंटू ने एक ऑनलाइन 'होममेड अचार' की वेबसाइट खोली। उसने प्लान बनाया कि वह खुद ही आम काटेगा, खुद ही मसाला मिलाएगा और खुद ही साइकिल पर जाकर डिलीवरी देगा। बिजनेस हिट हो गया और पहले ही हफ्ते एक लाख ऑर्डर आ गए। अब पिंटू जी घर के कोने में बैठकर रो रहे हैं क्योंकि उनके पास इतनी उंगलियां ही नहीं हैं कि वो इतने अचार के डिब्बे पैक कर सकें। पिंटू के पास 'प्लान' तो था, पर 'स्केल' करने का विजन नहीं था। उसने यह नहीं सोचा कि अगर मांग बढ़ी तो वह अपनी प्रोसेस को ऑटोमेट कैसे करेगा।

फ्लेक्सिबिलिटी का मतलब है अपनी गलतियों को मानकर तुरंत रास्ता बदलना। मान लीजिए आपने सोचा था कि आप वेबसाइट पर सिर्फ महंगे जूते बेचेंगे, पर डेटा कह रहा है कि लोग आपकी साइट पर आकर बार-बार सस्ते मोजे ढूंढ रहे हैं। अब आप अपनी ईगो पकड़कर बैठे रहें कि 'मैं तो ब्रांडेड जूते ही बेचूंगा' तो आप बहुत जल्द अपनी दुकान बढ़ाकर घर बैठ जाएंगे। टिम बर्न्स कहते हैं कि इंटरनेट पर आपको मार्केट का गुलाम बनना पड़ता है। अगर मार्केट को मोजे चाहिए, तो मोजे बेचिये और उसमें नंबर वन बन जाइये। सार्काज्म की बात यह है कि कई लोग अपने डूबते हुए पुराने आइडिया को वैसे ही पकड़ कर बैठे रहते हैं जैसे कोई डूबता हुआ इंसान पत्थर को पकड़ ले, यह सोचकर कि शायद पत्थर उसे तैरा देगा।

अंत में, एक कामयाब डॉट कॉम बिजनेस वही है जो वक्त की रफ्तार को समझे। आज एआई का जमाना है, कल कुछ और होगा। आपका बिजनेस मॉडल ऐसा होना चाहिए जो नई टेक्नोलॉजी को गले लगा सके, न कि उससे डरकर छिप जाए। याद रखिये, डायनासोर बहुत ताकतवर थे पर बदल नहीं पाए इसलिए खत्म हो गए। आपको बिजनेस का डायनासोर नहीं, बल्कि वो चतुर खिलाड़ी बनना है जो हर नई लहर पर सर्फिंग करना जानता हो।


तो दोस्तों, क्या आपका बिजनेस प्लान वाकई तैयार है या आप भी पिंटू की तरह अचार के डिब्बों के नीचे दबने वाले हैं। याद रखिये, एक अच्छा बिजनेस प्लान आपको सिर्फ अमीर नहीं बनाता, बल्कि आपको बर्बाद होने से बचाता है। आज ही अपनी स्ट्रेटजी पर दोबारा गौर कीजिये। अगर यह आर्टिकल आपको काम का लगा, तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो रोज एक नया 'फ्लॉप' स्टार्टअप आइडिया लेकर आपके पास आता है। कमेंट में बताइये कि आपके बिजनेस का सबसे बड़ा चैलेंज क्या है।

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