Equity (Hindi)


क्या आप भी अपनी कंपनी को एक सरकारी ऑफिस की तरह चला रहे हैं जहाँ एम्प्लॉई सिर्फ घड़ी की सुइयां देखते हैं। मुबारक हो आप अपनी टीम को रोबोट बनाकर खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मार रहे हैं और करोड़ों का प्रॉफिट अपनी ईगो के चक्कर में गवां रहे हैं।

लेकिन चिंता मत कीजिए क्योंकि कोरी रोसेन और जॉन केस की यह किताब आपको सिखाएगी कि कैसे एम्प्लॉई ओनरशिप का इस्तेमाल करके आप अपनी डूबती नैया को एक रॉकेट बना सकते हैं। चलिए जानते हैं इसके ३ पावरफुल लेसन।


लेसन १ : ओनरशिप माइंडसेट का असली जादू

जरा सोचिए आप किसी रेंट वाली कार को कितना साफ रखते हैं। शायद बिल्कुल नहीं। अगर सीट पर चिप्स गिर जाएं या टायर थोड़ा घिस जाए तो आप यही कहते हैं कि छोड़ो यार अपनी थोड़े ही है। लेकिन वही कार अगर आपकी खुद की हो और आपने अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी हो तो आप उसे रोज सुबह कपड़े से चमकाते हैं। बस यही फर्क है एक नौकरी करने वाले एम्प्लॉई में और उस एम्प्लॉई में जिसके पास कंपनी की इक्विटी यानी ओनरशिप है।

ज्यादातर कंपनियों में बॉस को लगता है कि मोटा पैकेट देकर वे दुनिया की बेस्ट टीम बना लेंगे। पर सच तो यह है कि बिना ओनरशिप के आपका बेस्ट टैलेंट भी बस महीने की ३० तारीख का इन्तजार करता है। वे ऑफिस आते हैं अपना सिर झुकाकर काम करते हैं और शाम को ५ बजते ही ऐसे गायब होते हैं जैसे गधे के सिर से सींग। कोरी रोसेन कहते हैं कि अगर आप चाहते हैं कि आपका एम्प्लॉई कंपनी की ग्रोथ के लिए रात को २ बजे भी सोचना शुरू करे तो उसे सिर्फ सैलरी का लालच मत दीजिए बल्कि उसे कंपनी का एक छोटा सा टुकड़ा दे दीजिए।

मान लीजिए रमेश की एक समोसे की दुकान है। रमेश ने सुरेश को नौकरी पर रखा और कहा कि तुम्हें रोज १०० समोसे तलने हैं। अब सुरेश का ध्यान सिर्फ इस बात पर होगा कि कब १०० समोसे पूरे हों और वह घर जाए। उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि समोसा कच्चा है या तेल काला हो चुका है। लेकिन अगर रमेश कहे कि सुरेश इस दुकान का ५ परसेंट तुम्हारा है और जितना ज्यादा मुनाफा होगा उतना तुम्हारा हिस्सा बढ़ेगा। अब देखिए कमाल। सुरेश खुद जाकर चेक करेगा कि मसाला फ्रेश है या नहीं क्योंकि अब वह नौकर नहीं मालिक है।

भारत के स्टार्टअप कल्चर में भी हम यही देखते हैं। लोग बड़ी मल्टीनेशनल कंपनियों की मलाई वाली नौकरी छोड़कर छोटे स्टार्टअप में इसलिए जाते हैं क्योंकि वहां उन्हें ईसॉप्स यानी स्टॉक ऑप्शंस मिलते हैं। यह सिर्फ कागज का टुकड़ा नहीं है बल्कि यह एक भरोसा है कि जब कंपनी बड़ी होगी तो उनका घर भी बड़ा होगा। लेकिन हमारे देश में आज भी कई लाला टाइप के बॉस बैठे हैं जो सोचते हैं कि अगर मैंने टीम को हिस्सेदारी दे दी तो मेरा कंट्रोल कम हो जाएगा। भाई साहब कंट्रोल का क्या करेंगे जब आपकी कंपनी की ग्रोथ ही रुक जाएगी।

बिना ओनरशिप माइंडसेट के आपकी टीम बस उतनी ही मेहनत करेगी जितनी में उनकी नौकरी न जाए। यह एक कड़वा सच है। सार्काज्म की बात तो यह है कि आप मीटिंग्स में चिल्लाते रहते हैं कि कंपनी को अपना परिवार समझो लेकिन जब प्रॉफिट बांटने की बारी आती है तो आप उन्हें दूर का रिश्तेदार भी नहीं मानते। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम आपके विजन को अपना विजन माने तो आपको अपनी तिजोरी का ताला थोड़ा ढीला करना ही पड़ेगा। जब एम्प्लॉई को पता होता है कि कंपनी का हर एक रुपया उसकी जेब से भी जुड़ा है तो वह ऑफिस की लाइट बंद करना भी नहीं भूलता। यही वह जादू है जो एक साधारण बिजनेस को लेजेंडरी बना देता है।


लेसन २ : पारदर्शिता और ट्रस्ट की असली ताकत

कई बार बॉस को लगता है कि उन्होंने एम्प्लॉई को इक्विटी या शेयर के नाम पर एक गाजर दिखा दी है और अब उनका काम खत्म हो गया। लेकिन कोरी रोसेन और जॉन केस इस किताब में बहुत साफ कहते हैं कि बिना पारदर्शिता यानी ट्रांसपेरेंसी के ओनरशिप सिर्फ एक मजाक है। अगर आप अपने एम्प्लॉई को यह नहीं बता रहे कि कंपनी पैसा कैसे कमा रही है और वह पैसा कहाँ खर्च हो रहा है, तो उन्हें कभी महसूस ही नहीं होगा कि वे मालिक हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी को अपनी कार की चाबी तो दे दें लेकिन विंडस्क्रीन पर काला पेंट कर दें। अब वह बेचारा स्टियरिंग तो घुमा रहा है पर उसे पता ही नहीं कि गाड़ी खड्डे में जा रही है या हाईवे पर।

हमारे यहाँ के कॉर्पोरेट ऑफिस में एक बड़ी अजीब बीमारी है जिसे हम कहते हैं कॉन्फिडेंशियल डेटा। सैलरी कितनी है यह छुपाओ, मुनाफा कितना हुआ यह मत बताओ, और घाटा हुआ तो रोना शुरू कर दो। जब आप अपनी टीम से नंबर्स छुपाते हैं, तो उनके अंदर एक शक पैदा होता है। उन्हें लगता है कि बॉस मजे कर रहा है और हमें सिर्फ काम की चक्की में पीसा जा रहा है। सार्काज्म की हद तो तब होती है जब कंपनी का मालिक नई लग्जरी कार लेकर ऑफिस आता है और फिर मीटिंग में कहता है कि दोस्तों इस साल बजट बहुत कम है इसलिए बोनस नहीं मिल पाएगा। ऐसे माहौल में ट्रस्ट का गला घोंट दिया जाता है।

मान लीजिए एक सॉफ्टवेयर कंपनी है जहाँ प्रोजेक्ट मैनेजर को पता ही नहीं कि क्लाइंट कितना पैसा दे रहा है। उसे बस यह पता है कि उसे डेडलाइन पर काम खत्म करना है। अब अगर वह मैनेजर और उसकी टीम जानती हो कि यह प्रोजेक्ट कंपनी के लिए कितना बड़ा टर्निंग पॉइंट है और इससे मिलने वाले प्रॉफिट का एक हिस्सा सीधे उनके खाते में आएगा, तो उनकी मेहनत का लेवल ही बदल जाएगा। जब आप नंबर्स शेयर करते हैं, तो एम्प्लॉई को समझ आता है कि उनकी एक छोटी सी गलती कंपनी का कितना बड़ा नुकसान कर सकती है। वे फिर सिर्फ कोड नहीं लिखते, वे बिजनेस बनाते हैं।

ट्रस्ट का मतलब यह नहीं है कि आप बस साल में एक बार अपनी बैलेंस शीट दिखा दें। इसका मतलब है अपनी टीम को बिजनेस की बारीकियां सिखाना। उन्हें यह समझाना कि ग्रॉस मार्जिन क्या होता है और कैश फ्लो की अहमियत क्या है। जब एक आम एम्प्लॉई को ये बातें समझ आने लगती हैं, तो वह फिजूलखर्ची रोकने के उपाय खुद ढूंढने लगता है। वह ऑफिस की स्टेशनरी से लेकर क्लाइंट मीटिंग के खर्चों तक हर चीज पर ध्यान देता है क्योंकि अब उसे पता है कि बचाया गया हर एक रुपया कंपनी की वैल्यू बढ़ाएगा और अंत में उसकी अपनी इक्विटी की कीमत भी बढ़ेगी।

लेकिन हमारे यहाँ लोग डरते हैं। उन्हें लगता है कि अगर एम्प्लॉई को पता चल गया कि कंपनी बहुत कमा रही है, तो वे सैलरी बढ़ाने की मांग करेंगे। भाई साहब, अगर वे आपके साथ बिजनेस के पार्टनर हैं, तो वे सैलरी से ज्यादा कंपनी की ग्रोथ पर ध्यान देंगे। यह एक माइंडसेट की शिफ्ट है। आपको अपनी टीम को नौकरों की तरह मैनेज करना छोड़कर उन्हें पार्टनर्स की तरह लीड करना होगा। बिना सच बताए और बिना भरोसा जताए आप कभी भी वह ओनरशिप कल्चर नहीं बना सकते जिसके बारे में यह किताब बात करती है। जब आप अपनी टीम को सच बताते हैं, तो वे भी आपको अपना सच देते हैं यानी उनकी पूरी लगन और ईमानदारी।


लेसन ३ : लॉन्ग टर्म वेल्थ और भविष्य की सुरक्षा

ज्यादातर लोग नौकरी इसलिए करते हैं ताकि महीने के अंत में बिल चुका सकें। बिजली का बिल, घर का किराया और बच्चों की स्कूल फीस। लेकिन कोरी रोसेन कहते हैं कि असली अमीरी तब आती है जब आप सोते समय भी पैसा कमाते हैं। एम्प्लॉई ओनरशिप का सबसे बड़ा फायदा यह नहीं है कि आपको हर महीने कुछ एक्स्ट्रा पैसे मिलते हैं, बल्कि इसका असली मजा तब आता है जब १० साल बाद आपकी कंपनी की वैल्यू १० गुना बढ़ जाती है। तब आपके पास जो शेयर्स होते हैं, वे आपकी लाइफ बदल देते हैं। यह सिर्फ एक जॉब नहीं है, यह आपकी रिटायरमेंट की प्लानिंग है।

हमारे समाज में हमें सिखाया जाता है कि बचाओ और एफडी कराओ। लेकिन एफडी की ब्याज दर और महंगाई की रेस में हम हमेशा पीछे रह जाते हैं। सार्काज्म की बात तो यह है कि लोग अपनी पूरी जवानी दूसरों के सपने पूरे करने में निकाल देते हैं और अंत में उनके हाथ में सिर्फ एक ग्रेच्युटी का चेक और एक विदाई की माला होती है। लेकिन अगर आप एक ऐसी कंपनी में हैं जो इक्विटी शेयर करती है, तो आप दूसरों का सपना नहीं, बल्कि अपना खुद का सपना सच कर रहे होते हैं। आप कंपनी के साथ ग्रो करते हैं।

मान लीजिए एक स्टार्टअप है जिसमें एक ड्राइवर पिछले १५ साल से काम कर रहा है। उसे कंपनी ने शुरू में कुछ शेयर्स दिए थे। आज वह कंपनी पब्लिक हो गई या किसी बड़ी कंपनी ने उसे खरीद लिया। अब उस ड्राइवर के पास जो शेयर्स हैं उनकी कीमत करोड़ों में है। यह कोई फिल्मी कहानी नहीं है, भारत में कई कंपनियों ने अपने ऑफिस बॉय और ड्राइवर्स को करोड़पति बनाया है। यह तब होता है जब कंपनी का मालिक यह समझता है कि कंपनी को खड़ा करने में सिर्फ उसके दिमाग का नहीं, बल्कि उस हर इंसान के पसीने का हाथ है जिसने वहां काम किया है।

लेकिन इसका एक दूसरा पहलू भी है। लॉन्ग टर्म वेल्थ बनाने के लिए आपको धैर्य यानी पेशेंस रखना पड़ता है। आजकल की जनरेशन को सब कुछ इंस्टेंट चाहिए। आज काम किया तो आज ही उसका फल चाहिए। लेकिन इक्विटी का पेड़ फल देने में समय लेता है। आपको अपनी कंपनी पर भरोसा करना होगा और उसे सींचना होगा। जब आप देखते हैं कि आपका काम सीधे आपकी नेट वर्थ बढ़ा रहा है, तो काम करने का जोश ही बदल जाता है। फिर आप सोमवार के आने से डरते नहीं हैं, बल्कि उसका इन्तजार करते हैं।

यह किताब हमें यह सिखाती है कि बिजनेस सिर्फ पैसा बनाने की मशीन नहीं है, बल्कि यह समाज में वेल्थ बांटने का एक जरिया है। जब एक कंपनी के सारे एम्प्लॉई अमीर बनते हैं, तो पूरा देश तरक्की करता है। यह एक ऐसा विन-विन सिचुएशन है जहाँ मालिक को वफादार टीम मिलती है और टीम को एक शानदार भविष्य। तो अगर आप एक लीडर हैं, तो अपनी टीम को सिर्फ सैलरी के पिंजरे में मत बांधिए, उन्हें अपनी कामयाबी के आसमान में हिस्सा दीजिए। याद रखिए, अकेले चलकर आप शायद तेज भाग सकें, लेकिन साथ मिलकर ही आप बहुत दूर तक जा सकते हैं।


क्या आप भी अपनी कंपनी में सिर्फ एक नंबर बनकर रह गए हैं या फिर आप उस बदलाव का हिस्सा बनना चाहते हैं जहाँ हर काम करने वाला मालिक हो। आज ही अपने विजन को बदलिए और अपनी टीम के साथ उस सुनहरे भविष्य की नींव रखिये। अगर आपको यह लेसन पसंद आए तो इसे अपने उस बॉस या दोस्त के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ढर्रे पर बिजनेस चला रहा है। कमेंट में बताएं कि क्या आपकी कंपनी आपको ओनरशिप का अहसास दिलाती है।

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