क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो प्लानिंग तो नासा लेवल की करते हैं पर काम चिंटू के होमवर्क जैसा भी नहीं हो पाता। अगर आप सिर्फ खयाली पुलाव पका रहे हैं और हकीकत में कुछ नहीं बदल रहा तो यकीन मानिए आप अपनी लाइफ की सबसे बड़ी अपॉर्चुनिटी खो रहे हैं और दुनिया आपका मजाक उड़ा रही है।
लेकिन फिक्र मत कीजिये। आज हम लैरी बॉसिडी और राम चरण की मास्टरपीस एक्जीक्यूशन से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपको सोचने वाले से करने वाला बना देंगे। आइये जानते हैं वो 3 कीमती लेसन जो आपकी वर्क लाइफ बदल देंगे।
लेसन १ : एक्जीक्यूशन कोई एक्स्ट्रा काम नहीं बल्कि एक सिस्टम है
हम सब की एक ही कहानी है। नए साल पर हम ऐसी कसम खाते हैं जैसे कल ही दुनिया बदल देंगे। जिम जाने से लेकर नया स्टार्टअप शुरू करने तक के प्लान हमारे दिमाग में ऐसे नाचते हैं जैसे बॉलीवुड फिल्म का हीरो। लेकिन दो दिन बाद क्या होता है। वही पुरानी लाइफ और वही आलस। हम सोचते हैं कि एक्जीक्यूशन या काम को पूरा करना कुछ ऐसा है जो बस हो जाएगा। लेकिन लैरी बॉसिडी कहते हैं कि यह आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है।
एक्जीक्यूशन कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप तब करें जब आपके पास टाइम हो। यह तो एक डिसिप्लिन है। एक सिस्टम है। जैसे सुबह उठकर ब्रश करना एक सिस्टम है वैसे ही अपने आइडिया को जमीन पर उतारना एक प्रोसेस होना चाहिए। लोग सोचते हैं कि बड़े लीडर्स बस विजन देखते हैं और बाकी काम अपने आप हो जाता है। भाई साहब यह कोई जादुई चिराग नहीं है जिसे रगड़ा और काम हो गया। असल में एक्जीक्यूशन का मतलब है उन छोटे और उबाऊ कामों को बार-बार करना जो आपको आपके गोल तक ले जाते हैं।
मान लीजिये आप अपने मोहल्ले के सबसे बड़े फिटनेस इन्फ्लुएंसर बनना चाहते हैं। आपने बढ़िया जूते खरीदे और इंस्टाग्राम पर प्रोफाइल भी बना ली। अब असली काम है रोज सुबह उठकर पसीना बहाना। लेकिन आप क्या करते हैं। आप अलार्म बजते ही उसे ऐसे दबाते हैं जैसे वो आपका सबसे बड़ा दुश्मन हो। यहाँ आप एक्जीक्यूशन में फेल हो गए। आप प्लानिंग में तो किंग थे पर काम करने में बिल्कुल जीरो।
यह किताब हमें सिखाती है कि अगर आप अपने बिजनेस या लाइफ में सफल होना चाहते हैं तो आपको इसे अपनी रगों में उतारना होगा। आपको यह समझना होगा कि सिर्फ सोचना काफी नहीं है। आपको उस काम के पीछे पड़ना होगा। जैसे कोई जिद्दी बच्चा खिलौने के लिए पीछे पड़ जाता है। एक्जीक्यूशन का मतलब है कि आप अपनी स्ट्रेटेजी और अपनी हकीकत के बीच के गैप को खत्म कर दें।
ज्यादातर लोग सिर्फ मीटिंग्स करते हैं और बड़ी-बड़ी बातें करते हैं। उन्हें लगता है कि पीपीटी बना लेने से कंपनी चल जाएगी। अरे भाई पीपीटी से सिर्फ प्रेजेंटेशन अच्छी लगती है बैंक बैलेंस नहीं बढ़ता। जब तक आप खुद मैदान में उतरकर यह नहीं देखेंगे कि काम कैसे हो रहा है तब तक सब बेकार है। आपको अपने काम का हर छोटा हिस्सा पता होना चाहिए।
इसलिए अगली बार जब आप कोई नया प्लान बनायें तो यह मत पूछिए कि क्या करना है। बल्कि यह पूछिए कि इसे कैसे करना है और कौन इसे पूरा करेगा। अगर आपके पास 'कैसे' का जवाब नहीं है तो आपका विजन सिर्फ एक खूबसूरत सपना है जो टूटते ही आपको दर्द देगा। एक्जीक्यूशन को अपना धर्म बना लीजिये फिर देखिये कि दुनिया आपके पीछे कैसे भागती है।
लेसन २ : पीपल प्रोसेस ही असली गेम चेंजर है
अब बात करते हैं उस चीज की जिसके बिना बड़े से बड़ा विजन भी कूड़े के ढेर जैसा है और वो है सही लोग। अक्सर हमें लगता है कि अगर हमारे पास पैसा है और एक बढ़िया ऑफिस है तो काम तो अपने आप हो जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि बिजनेस मशीनों से नहीं बल्कि हाड़ मांस के इंसानों से चलता है। लैरी बॉसिडी कहते हैं कि एक लीडर का सबसे बड़ा काम यह नहीं है कि वह हर काम खुद करे बल्कि यह है कि वह सही काम के लिए सही इंसान को चुने।
आप खुद सोचिये। अगर आप एक क्रिकेट टीम बना रहे हैं और आपने ओपनिंग बैटिंग के लिए किसी ऐसे बंदे को भेज दिया जो बल्ला पकड़ने से ज्यादा इंस्टाग्राम रील बनाने में बिजी रहता है तो क्या आप मैच जीतेंगे। बिल्कुल नहीं। भले ही वो दिखने में कितना भी कूल लगे पर अगर उसमें रन बनाने का दम नहीं है तो वो टीम के लिए बोझ है। यही हाल हमारे ऑफिस और लाइफ का भी है। हम अक्सर उन लोगों को काम सौंप देते हैं जो हमारी चापलूसी करते हैं या जिनसे हमारी दोस्ती अच्छी है।
लेकिन असली लीडर वो है जो इंसान की शक्ल नहीं बल्कि उसके काम करने की भूख देखता है। पीपल प्रोसेस का मतलब सिर्फ भर्ती करना नहीं है। इसका मतलब है यह पक्का करना कि जो इंसान जहाँ बैठा है क्या वो उस जगह के काबिल है। क्या उसमें वो आग है कि जब मुश्किल समय आये तो वो बहाने बनाने के बजाय रास्ता निकाले।
आजकल के दौर में लोग बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर घूमते हैं पर जब बात काम को खत्म करने की आती है तो उनके हाथ-पांव फूल जाते हैं। वो आपको हजार कारण गिना देंगे कि काम क्यों नहीं हो पाया पर एक भी ऐसा तरीका नहीं बताएंगे जिससे काम हो जाए। ऐसे लोग आपके एक्जीक्यूशन के दुश्मन हैं। आपको ऐसे लोग चाहिए जो जिम्मेदारी लेना जानते हों। जो यह न कहें कि सर कोशिश करेंगे बल्कि यह कहें कि सर यह काम आज शाम तक हो जाएगा।
कई कंपनियों में बॉस को पता ही नहीं होता कि उनके नीचे कौन क्या कर रहा है। वो बस महीने के अंत में रिपोर्ट मांगते हैं। भाई साहब अगर आप अपने लोगों को नहीं जानते तो आप अपनी गाड़ी के स्टेयरिंग को छोड़कर पिछली सीट पर सो रहे हैं। एक्सीडेंट तो होना ही है। आपको अपने टीम मेंबर्स के साथ बैठना होगा। उनके साथ बहस करनी होगी। उन्हें चैलेंज करना होगा।
आपको यह समझना होगा कि हर इंसान हर काम के लिए नहीं बना होता। किसी की स्ट्रेंथ प्लानिंग में है तो किसी की फील्ड वर्क में। एक लीडर के तौर पर आपकी पारखी नजर होनी चाहिए। जैसे वो पुरानी फिल्मों में जौहरी होता था ना जो पत्थर में भी हीरा पहचान लेता था। आपको भी वैसे ही अपने लोगों को तराशना होगा। अगर आपकी टीम सही है तो आधा युद्ध तो आपने वहीं जीत लिया।
बिना सही लोगों के आपकी स्ट्रेटेजी सिर्फ कागज पर लिखी एक कविता है जो पढ़ने में अच्छी लगती है पर पेट नहीं भरती। इसलिए अपने आसपास ऐसे लोग रखिये जो आपसे सवाल पूछ सकें। जो आपको आईना दिखा सकें। जो काम को कल पर न टालें। जब आप सही लोगों के साथ सही डिसिप्लिन मिला देते हैं तो फिर सफलता आपके पास खुद चलकर आती है।
लेसन ३ : जमीन पर उतरना और हकीकत से सामना करना
क्या आपने कभी उन नेताओं को देखा है जो चुनाव के वक्त तो गलियों में घूमते हैं लेकिन जीतने के बाद सीधे बड़े बंगलों में गायब हो जाते हैं। उन्हें पता ही नहीं होता कि सड़कों पर कितने गड्ढे हैं या पानी आ रहा है या नहीं। बिजनेस और लाइफ में भी हमारे साथ यही होता है। हम अक्सर 'ऑपरेशनल रियलिटी' यानी जमीनी हकीकत से इतने दूर हो जाते हैं कि हमें लगता है कि सब कुछ बढ़िया चल रहा है। लैरी बॉसिडी और राम चरण कहते हैं कि एक असली लीडर वही है जिसका एक पैर हमेशा मैदान में हो।
ज्यादातर बॉस अपने केबिन में बैठकर एयर कंडीशनर की ठंडी हवा में बड़ी-बड़ी मीटिंग्स करते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने ईमेल भेज दिया है तो काम जादू से हो जाएगा। लेकिन भाई साहब हकीकत तो ये है कि जब तक आप खुद जाकर यह नहीं देखते कि आपका प्रोडक्ट कैसे बन रहा है या आपका कस्टमर क्या बोल रहा है तब तक आप सिर्फ अंधेरे में तीर चला रहे हैं। आपको अपने काम की हर छोटी बारीकी का पता होना चाहिए। इसे 'क्रेजी माइक्रो मैनेजमेंट' नहीं कहते बल्कि इसे 'इनवॉल्वमेंट' कहते हैं।
सोचिये आप एक रेस्टोरेंट के मालिक हैं। आपने मेनू में दुनिया की सबसे महँगी डिश डाल दी है। लेकिन आपने कभी किचन में जाकर ये नहीं देखा कि शेफ नमक डालना भूल रहा है या नहीं। अब आप बाहर बैठकर विजन बोर्ड बना रहे हैं कि अगले साल एक और ब्रांच खोलेंगे। लेकिन हकीकत में आपके कस्टमर खाना खाकर दोबारा कभी नहीं आने वाले। यहाँ आपका एक्जीक्यूशन फेल है क्योंकि आप हकीकत से कट चुके हैं।
हकीकत का सामना करने का मतलब है कि आप कड़वे सच सुनने की हिम्मत रखें। अपनी टीम से ये मत पूछिए कि सब ठीक है ना। बल्कि ये पूछिए कि सबसे बड़ी प्रॉब्लम क्या आ रही है। जब तक आप समस्याओं को गले नहीं लगाएंगे तब तक आप उनका समाधान नहीं निकाल पाएंगे। कई बार हम सच सुनने से डरते हैं क्योंकि वो हमारे ईगो को चोट पहुँचाता है। लेकिन याद रखिये कि एक गलत विजन पर तेजी से भागने से अच्छा है कि आप रुककर अपनी दिशा चेक कर लें।
अक्सर लोग कहते हैं कि वो बहुत बिजी हैं। लेकिन जब आप उनकी डायरी देखेंगे तो पता चलेगा कि वो सिर्फ उन कामों में बिजी हैं जिनका रिजल्ट से कोई लेना-देना नहीं है। असली एक्जीक्यूशन का मतलब है उन तीन-चार चीजों पर फोकस करना जो सच में फर्क पैदा करती हैं। बाकी सब तो सिर्फ शोर है। आपको अपने बिजनेस के हर प्रोसेस से खुद को जोड़ना होगा। जब आप खुद इन्वॉल्व होते हैं तो आपकी टीम को भी पता होता है कि वो आपको बेवकूफ नहीं बना सकते।
तो दोस्तों, बात सीधी सी है। अगर आप सिर्फ सपने देखेंगे तो आप एक राइटर बन सकते हैं। लेकिन अगर आप उन सपनों को सच करना चाहते हैं तो आपको एक एक्जीक्यूटर बनना होगा। मैदान में उतरिये पसीना बहाइये और अपनी आँखों से देखिये कि काम कैसे हो रहा है। तभी आप उस कामयाबी तक पहुँच पाएंगे जिसका आपने सपना देखा था।
एक्जीक्यूशन कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप एक दिन में सीख लेंगे। यह हर रोज खुद को बेहतर बनाने का एक तरीका है। आज से ही बहाने बनाना बंद कीजिये और अपने सबसे छोटे गोल को पूरा करने के लिए जी-जान लगा दीजिये। क्योंकि दुनिया सिर्फ आपके इरादों की नहीं बल्कि आपके नतीजों की इज्जत करती है।
कमेंट में बताइये कि आपका वो कौन सा काम है जिसे आप पिछले कई दिनों से टाल रहे हैं और आज आप उसे खत्म करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो सिर्फ बड़ी-बड़ी बातें करता है पर काम कुछ नहीं करता। आइये साथ मिलकर एक्जीक्यूटर बनते हैं।
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