क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो पिछले पांच साल से सिर्फ अपना परफेक्ट आईडिया ही पॉलिश कर रहे हैं। मुबारक हो क्योंकि आपकी इसी सुस्ती की वजह से पड़ोस का शर्मा जी का लड़का आपसे पहले अपना स्टार्टअप खड़ा कर चुका है। जब आप अपनी परफेक्ट प्लानिंग की आरती उतार रहे थे तब दुनिया के सबसे बड़े विनर्स फेल होकर जीतना सीख रहे थे। क्या आप भी अपनी लाइफ और करियर के साथ यही खिलवाड़ जारी रखना चाहते हैं।
आज हम बर्नहार्ड श्रोएडर की कमाल की बुक फेल फास्ट और विन बिग के जरिए वो कड़वा सच जानेंगे जो आपको किसी कॉलेज में नहीं सिखाया गया। चलिए इस बुक के ३ पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं ताकि आप भी भीड़ का हिस्सा बनने के बजाय अपना खुद का एम्पायर खड़ा कर सकें।
लेसन १ : अपने आईडिया से प्यार करना बंद करें और मार्केट की सुनें
सुनिए दोस्त अगर आपको लगता है कि आपका वो यूनिक और महान स्टार्टअप आईडिया दुनिया बदल देगा तो थोड़ा संभल जाइए। असलियत तो यह है कि आपके उस आईडिया की कीमत एक कप चाय से भी कम है अगर उसे कोई खरीदने वाला ही न हो। हमारे देश में आधे से ज्यादा युवा सिर्फ इसलिए फेल हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि उनका आईडिया भगवान का दिया हुआ कोई वरदान है। बर्नहार्ड श्रोएडर अपनी बुक फेल फास्ट और विन बिग में सबसे पहले यही तमाचा मारते हैं। वह कहते हैं कि आईडिया के पीछे पागल मत बनो बल्कि मार्केट और कस्टमर की प्रॉब्लम को समझो।
मान लीजिए आपको लगता है कि मार्केट में एक ऐसी छतरी की जरूरत है जो गाना गाती हो। अब आप अपनी पूरी जमा पूंजी उस सिंगिंग अंब्रेला को बनाने में लगा देते हैं। आप रात भर जागकर उसके फीचर्स डिजाइन करते हैं। लेकिन जब आप उसे मार्केट में लेकर जाते हैं तो पता चलता है कि लोगों को सिर्फ एक ऐसी छतरी चाहिए थी जो उन्हें भीगने से बचाए और जिसे ले जाना आसान हो। गाना तो लोग अपने फोन पर सुन ही रहे हैं। अब आप अपने उस महान आईडिया के साथ घर पर बैठे हैं और बारिश में भीग रहे हैं क्योंकि किसी ने उसे खरीदा ही नहीं। यह हाल तब होता है जब आप कस्टमर की जरूरत को इग्नोर करते हैं।
ज्यादातर लोग क्या करते हैं। वो पहले प्रोडक्ट बनाते हैं और फिर कस्टमर ढूंढते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप पहले शादी का मंडप सजा लें और फिर लड़की ढूंढने निकलें। हो सकता है आपको कोई मिल जाए पर चांस बहुत कम हैं। बर्नहार्ड कहते हैं कि लीन स्टार्टअप का असली मतलब है कि पहले यह जानो कि मार्केट को चाहिए क्या। क्या लोगों की कोई ऐसी समस्या है जिसका समाधान आप दे सकते हैं। अगर हाँ तो ही आगे बढ़िए। वरना अपने उस आईडिया को कूड़ेदान में डाल दीजिए और कोई नई समस्या पकड़िए।
हकीकत तो यह है कि कस्टमर को आपके आईडिया में रत्ती भर भी दिलचस्पी नहीं है। उसे बस इस बात से मतलब है कि क्या आपका प्रोडक्ट उसकी लाइफ आसान बना रहा है। अगर आप एक ऐप बना रहे हैं जो लोगों को यह बताएगा कि उनके पड़ोस में कौन सी गाय सबसे ज्यादा दूध देती है तो शायद आप बहुत बड़े विजनरी हो सकते हैं पर बिजनेस के मामले में आप जीरो हैं। क्योंकि भाई साहब लोगों को दूध चाहिए गाय की कुंडली नहीं।
इंडियन स्टार्टअप कल्चर में हम अक्सर इमोशनल होकर डिसीजन लेते हैं। हम सोचते हैं कि यार मेरा आईडिया तो बहुत कूल है। लेकिन कूल होने से घर का चूल्हा नहीं जलता। बर्नहार्ड श्रोएडर समझाते हैं कि आपको एक डिटेक्टिव की तरह सोचना होगा। मार्केट में जाओ लोगों से बात करो और देखो कि वो किस चीज के लिए पैसे देने को तैयार हैं। अगर आप सिर्फ अपने कमरे में बैठकर ख्याली पुलाव पकाएंगे तो याद रखिए कि पुलाव सिर्फ ख्यालों में ही रहेगा पेट में नहीं जाएगा।
इसलिए पहली फुर्सत में अपने आईडिया वाले ईगो को साइड में रखिए। कस्टमर से फीडबैक लीजिए। अगर वो कहता है कि आपका आईडिया बकवास है तो उसे पर्सनली मत लीजिए। बल्कि शुक्र मनाइए कि आपको यह बात करोड़ों रुपये डूबने से पहले ही पता चल गई। यही फेल फास्ट होने का असली मंत्र है। जितनी जल्दी आप यह समझ जाएंगे कि क्या काम नहीं कर रहा उतनी ही जल्दी आप उस रास्ते पर बढ़ पाएंगे जो आपको जीत की तरफ ले जाएगा। अपनी जिद्द को छोड़कर मार्केट के फ्लो के साथ चलना ही एक स्मार्ट एंटरप्रेन्योर की पहचान है।
लेसन २ : मोटे बिजनेस प्लान को आग लगाओ और मॉडल पर काम करो
अक्सर जब कोई नया बिजनेस शुरू करने की बात करता है तो उसे सलाह दी जाती है कि बेटा पहले एक सौ पन्नों का बिजनेस प्लान लिखो। लोग महीनों तक कंप्यूटर के सामने बैठकर ग्राफ बनाते हैं और झूठे प्रोजेक्शन दिखाते हैं कि अगले पांच साल में वो दुनिया के सबसे अमीर इंसान बन जाएंगे। बर्नहार्ड श्रोएडर कहते हैं कि यह सब टाइम की बर्बादी है। जब तक आप अपना वो मोटा सा बिजनेस प्लान खत्म करेंगे तब तक मार्केट बदल चुका होगा और कोई दूसरा आपका पत्ता साफ कर चुका होगा। असल जिंदगी में बिजनेस प्लान नहीं बल्कि बिजनेस मॉडल काम आता है।
मान लीजिए आप एक ढाबा खोलना चाहते हैं। अब एक तरीका तो यह है कि आप पहले छह महीने इस बात पर रिसर्च करें कि ढाबे की दीवार का रंग कैसा होगा और वहां कौन सा म्यूजिक बजेगा। आप अपनी डायरी में लिखेंगे कि पहले दिन १०० लोग आएंगे और दूसरे दिन १०००। लेकिन हकीकत यह है कि जब आप ढाबा खोलेंगे तो हो सकता है पहले दिन सिर्फ एक कुत्ता आए और वो भी कुछ खाए बिना चला जाए। बिजनेस प्लान अक्सर आपकी कल्पनाओं का एक महल होता है जो हकीकत की पहली बारिश में ही ढह जाता है।
बर्नहार्ड का कहना है कि आपको बिजनेस मॉडल कैनवास का इस्तेमाल करना चाहिए। यह एक पेज का नक्शा होता है जो आपको साफ बताता है कि आपका असली पार्टनर कौन है आप पैसा कैसे कमाएंगे और आपके खर्चे क्या होंगे। यह फ्लैक्सिबल होता है। अगर मार्केट में आपकी दाल नहीं गल रही तो आप तुरंत अपना मेन्यू बदल सकते हैं। बिजनेस प्लान एक पुरानी और भारी भरकम बैलगाड़ी जैसा है जिसे मोड़ना मुश्किल है जबकि बिजनेस मॉडल एक स्पोर्ट्स बाइक है जिसे आप कहीं भी घुमा सकते हैं।
हमारे यहाँ लोग स्टार्टअप को लेकर बहुत ज्यादा इमोशनल हो जाते हैं। वो सोचते हैं कि अगर मैंने इतना बड़ा प्लान बनाया है तो यह जरूर काम करेगा। भाई साहब मार्केट को आपके पन्नों से कोई लेना देना नहीं है। उसे बस इस बात से मतलब है कि आपकी सर्विस में दम है या नहीं। अगर आप सिर्फ कागजों पर शेर बन रहे हैं तो असल दुनिया में आपको गीदड़ भी डरा देंगे। बर्नहार्ड जोर देते हैं कि छोटे छोटे प्रयोग कीजिए। बड़ी प्लानिंग करने के बजाय छोटे कदम उठाइए और देखिए कि क्या लोग आपके प्रोडक्ट में दिलचस्पी ले रहे हैं।
एक और बड़ी गलती जो इंडियन स्टार्टअप्स में देखी जाती है वो है जरूरत से ज्यादा सोचना। इसे पैरालिसिस बाई एनालिसिस कहते हैं। आप इतना ज्यादा सोचते हैं कि आप कभी एक्शन ही नहीं ले पाते। आप सोचते रह जाते हैं कि अगर बिजनेस फेल हो गया तो मोहल्ले वाले क्या कहेंगे। लेकिन सच तो यह है कि मोहल्ले वालों को खुद नहीं पता कि वो कल क्या करेंगे। इसलिए अपनी भारी भरकम फाइलों को साइड में रखिए और एक ऐसा मॉडल तैयार कीजिए जो जमीन पर उतर सके।
बिजनेस मॉडल का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह आपको अपनी गलतियां जल्दी सुधारने का मौका देता है। अगर आपको पता चला कि आपकी चाय लोगों को पसंद नहीं आ रही तो आप उसे तुरंत बदल सकते हैं। लेकिन अगर आपने बिजनेस प्लान में लिख दिया है कि आप दुनिया की सबसे महँगी चाय बेचेंगे तो आप अपनी ही बात में फंस जाएंगे। फ्लेक्सिबिलिटी ही आज के जमाने का असली हथियार है। याद रखिए कि जीत उसी की होती है जो हवा का रुख देखकर अपनी नाव का पाल बदल लेता है न कि उसकी जो पुराने नक्शे लेकर समुद्र में डूब जाता है।
लेसन ३ : जल्दी फेल होना सीखिए ताकि आप जल्दी जीत सकें
सुनने में यह बात थोड़ी अजीब लग सकती है कि भला कोई फेल होने के लिए बिजनेस क्यों शुरू करेगा। लेकिन बर्नहार्ड श्रोएडर का यही सबसे बड़ा सीक्रेट है। वो कहते हैं कि अगर आपको हारना ही है तो उसे जल्दी हार लो। हमारे समाज में फेलियर को एक गाली की तरह देखा जाता है। अगर किसी का स्टार्टअप बंद हो गया तो रिश्तेदार ऐसे देखते हैं जैसे उसने कोई जुर्म कर दिया हो। लेकिन असल में फेल होना कोई अंत नहीं बल्कि एक बहुत बड़ी सीख है। बर्नहार्ड के अनुसार जो इंसान जल्दी फेल होता है वही असल में जीतने की तैयारी कर रहा होता है।
मान लीजिए आप एक नई डिश बनाना सीख रहे हैं। अब आप पहले ही दिन पूरे मोहल्ले को दावत पर नहीं बुला लेते। आप पहले खुद चखते हैं। अगर उसमें नमक ज्यादा है तो आप उसे फेंक देते हैं और दोबारा कोशिश करते हैं। अब सोचिए अगर आप अपनी पूरी जायदाद बेचकर एक रेस्टोरेंट खोल लें और उद्घाटन वाले दिन पता चले कि आपको नमक का अंदाजा ही नहीं है। तब तक तो बहुत देर हो चुकी होगी। बर्नहार्ड कहते हैं कि बिजनेस में भी यही फॉर्मूला लगाओ। छोटे छोटे रिस्क लो और अगर वो काम नहीं कर रहे तो तुरंत पीछे हट जाओ।
लोग अक्सर अपने डूबते हुए बिजनेस में सिर्फ इसलिए पैसा लगाते रहते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि यार अब तक इतना पैसा और समय लगा दिया है तो अब पीछे कैसे हटें। इसे संक कॉस्ट फैलेसी कहते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक खराब फिल्म देख रहे हों और बोर हो रहे हों लेकिन सिर्फ इसलिए बैठे रहें क्योंकि आपने टिकट के पैसे दिए हैं। भाई साहब पैसे तो गए पर अपना कीमती समय क्यों बर्बाद कर रहे हो। फेल फास्ट का मतलब है कि अपनी हार को स्वीकार करो उससे लेसन लो और अगले बड़े आईडिया पर काम शुरू करो।
भारतीय स्टार्टअप्स में अक्सर लोग डर के मारे कुछ नया ट्राई नहीं करते। उन्हें लगता है कि सब कुछ परफेक्ट होना चाहिए। लेकिन परफेक्शन एक भ्रम है। आप कभी भी पहली बार में परफेक्ट नहीं हो सकते। दुनिया की बड़ी बड़ी कंपनियां जैसे गूगल और फेसबुक रोज हजारों छोटे प्रयोग करती हैं और उनमें से ज्यादातर फेल हो जाते हैं। लेकिन जो एक प्रयोग सफल होता है वो उन्हें अरबों रुपये कमा कर देता है। आपको भी एक साइंटिस्ट की तरह सोचना होगा जो अपनी लैब में बार बार फेल होता है ताकि एक दिन वो फार्मूला ढूंढ सके जो दुनिया बदल दे।
बर्नहार्ड श्रोएडर समझाते हैं कि असली जीत उस इंसान की नहीं होती जो कभी नहीं गिरा बल्कि उसकी होती है जो हर बार गिरकर पहले से ज्यादा तेजी से खड़ा हुआ। अगर आप अपने करियर के शुरुआती सालों में ही तीन चार बार फेल हो चुके हैं तो यकीन मानिए आप उस इंसान से हजार गुना बेहतर हैं जो डर के मारे कभी घर से बाहर ही नहीं निकला। फेलियर आपको वो बातें सिखाता है जो हार्वर्ड या आई आई एम की कोई डिग्री नहीं सिखा सकती।
तो दोस्तों, इस डर को निकाल दीजिए कि लोग क्या कहेंगे। अगर आपका आईडिया नहीं चल रहा तो उसे ढोने की जरूरत नहीं है। उसे प्यार से अलविदा कहिए और अपनी एनर्जी किसी ऐसी चीज में लगाइए जिसमें दम हो। यही फेल फास्ट और विन बिग का असली फलसफा है। याद रखिए कि हर बड़ा विनर कभी न कभी एक बहुत बड़ा लूजर था बस उसने हार नहीं मानी और अपनी गलतियों से सीखता रहा।
तो दोस्तों, आज हमने जाना कि कैसे बर्नहार्ड श्रोएडर की यह बुक हमारे पुराने बिजनेस के तौर तरीकों को पूरी तरह बदल देती है। चाहे वो अपने आईडिया से ज्यादा कस्टमर को अहमियत देना हो या फिर भारी भरकम प्लान्स के बजाय एक लचीला मॉडल बनाना। सबसे बड़ी बात यह कि फेलियर से डरना नहीं बल्कि उसे गले लगाना सीखना है। आपकी लाइफ की डोर आपके हाथ में है। क्या आप भी पुराने डर के साथ जीना चाहते हैं या आज ही अपने सपनों के लिए एक छोटा सा रिस्क लेने को तैयार हैं।
नीचे कमेंट्स में हमें जरूर बताएं कि आपका वो कौन सा आईडिया था जिसे आपने फेल होने के डर से कभी शुरू ही नहीं किया। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो सालों से सिर्फ प्लानिंग ही कर रहा है। याद रखिए कि शुरुआत करने के लिए आपका महान होना जरूरी नहीं है लेकिन महान होने के लिए शुरुआत करना बहुत जरूरी है।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#StartupIndia #EntrepreneurLife #BookSummary #FailFastWinBig #DYBooks
_