Fast Second (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो 'फर्स्ट आने' के चक्कर में अपनी पूरी कंपनी और करियर की बलि चढ़ाने को तैयार बैठे हैं। बहुत शौक है न सबसे पहले कुछ नया करने का। बधाई हो क्योंकि आप फेल होने की रेस में सबसे आगे खड़े हैं। दुनिया आपको याद नहीं रखेगी क्योंकि असली मजे तो वो 'फास्ट सेकंड' वाले ले जाएंगे जो आपकी मेहनत पर अपनी दुकान सजाएंगे।

अगर आप भी मार्केट का असली राजा बनना चाहते हैं तो यह आर्टिकल आपके लिए है। आज हम फास्ट सेकंड बुक के जरिए समझेंगे कि कैसे स्मार्ट कंपनियां इनोवेशन के फालतू ड्रामे में नहीं फंसतीं। चलिए जानते हैं वो 3 लेसन जो आपकी सोच बदल देंगे।


लेसन १ : फर्स्ट मूवर होने की गलती मत करो

मार्केट में सबसे पहले आने का बड़ा क्रेज है। लोग ऐसे भागते हैं जैसे पहले पहुंचने वाले को जन्नत का रास्ता मिल जाएगा। लेकिन सच तो यह है कि 'फर्स्ट मूवर' अक्सर वो बेचारा इंसान होता है जो अंधेरे कमरे में सबसे पहले घुसता है और दीवार से टकराकर अपना सिर फोड़ लेता है। 'फास्ट सेकंड' बुक हमें बताती है कि सबसे पहले इनोवेशन करना कोई बहादुरी का काम नहीं है बल्कि यह एक सुसाइड मिशन है। आप मार्केट में आग लगाते हैं और दुनिया उस आग पर अपने हाथ सेकती है।

सोचिए एक ऐसे स्टार्टअप फाउंडर के बारे में जो दुनिया की पहली उड़ने वाली कार बनाना चाहता है। वह अपनी पूरी जायदाद और जवानी इस टेक्नोलॉजी को बनाने में लगा देता है। वह दिन रात एक करता है ताकि वह 'पहला' बन सके। फिर क्या होता है। उसकी कार उड़ती तो है पर सिर्फ दो मिनट के लिए और सीधे पड़ोसी के गार्डन में जाकर गिरती है। लोग तालियां बजाते हैं और वह बैंक करप्ट हो जाता है। तभी आती है एक स्मार्ट कंपनी। वह देखती है कि पहले वाले ने क्या गलतियां कीं। वह देखती है कि पब्लिक को क्या चाहिए। वह उस टेक्नोलॉजी को थोड़ा सुधारती है और एक सस्ता और टिकाऊ मॉडल मार्केट में उतार देती है। नतीजा क्या हुआ। पहले वाले को मिला 'इनोवेटर' का ठप्पा और दूसरे वाले को मिला सारा पैसा और मार्केट शेयर।

यह सुनकर थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि हमें बचपन से सिखाया गया है कि 'जो जीता वही सिकंदर' और जो पहले आया वही विनर है। लेकिन बिजनेस की दुनिया में 'जो बाद में आया और टिका रहा वही सिकंदर' होता है। जब आप कुछ बिल्कुल नया मार्केट में लाते हैं तो आपको कंज्यूमर को एजुकेट करना पड़ता है। आपको उन्हें समझाना पड़ता है कि भाई यह चीज तुम्हारे काम की है। इसमें करोड़ों रूपये पानी की तरह बह जाते हैं। जब तक लोग उस चीज को अपनाते हैं तब तक आपकी जेब खाली हो चुकी होती है। तभी पीछे से एक होशियार कंपनी आती है जो आपकी मेहनत का फायदा उठाती है।

आपने शादियों में वो लोग तो देखे ही होंगे जो सबसे पहले डांस फ्लोर पर जाते हैं। वो बेचारे अकेले नाच रहे होते हैं और बाकी सब उन्हें ऐसे देखते हैं जैसे वो कोई एलियन हों। वो माहौल बनाते हैं और पसीना बहाते हैं। फिर जब गाना अपनी पीक पर होता है और माहौल सेट हो जाता है तब असली खिलाडी एंट्री मारते हैं। वो आते हैं और सारा लाइमलाइट ले जाते हैं। पहले वाले भाई साहब तो तब तक थक कर कोल्ड ड्रिंक पी रहे होते हैं। मार्केट का भी यही हाल है। फर्स्ट मूवर मार्केट को 'वार्म अप' करता है और फास्ट सेकंड कंपनी आकर गोल मार देती है। इसलिए अगर आप अपनी मेहनत की कमाई को एक्सपेरिमेंट में नहीं फूंकना चाहते तो पहले आने की जिद छोड़िए। मार्केट को सेटल होने दीजिए। लोगों की डिमांड को समझिए। और फिर अपनी एंट्री मारिए।


लेसन २ : मार्केट का सेटल होने का इंतज़ार करो

मार्केट में जब कोई नई टेक्नोलॉजी आती है तो वह एक छोटे बच्चे की तरह होती है। वह बहुत शोर मचाती है पर किसी को पता नहीं होता कि वह बड़ी होकर क्या बनेगी। शुरुआती दौर में हर कोई अपना अपना वर्जन लेकर आता है। कोई कहता है कि भविष्य ऐसा होगा और कोई कहता है वैसा। इस भागदौड़ को हम 'रेडिकल इनोवेशन' का दौर कहते हैं। यहाँ हर कंपनी एक दूसरे का गला काटने को तैयार रहती है। लेकिन 'फास्ट सेकंड' बुक का दूसरा बड़ा लेसन यह है कि असली पैसा तब बनता है जब यह शोर थम जाता है। जब तक मार्केट यह तय नहीं कर लेता कि स्टैंडर्ड क्या होगा तब तक एंट्री मारना जुआ खेलने जैसा है।

एक ऐसे इंसान के बारे में सोचिए जो सबसे पहले नया आईफोन खरीदने के लिए रात भर दुकान के बाहर लाइन में खड़ा रहता है। वह दुनिया को दिखाना चाहता है कि वह सबसे एडवांस है। लेकिन एक हफ्ते बाद पता चलता है कि उस फोन की बैटरी फट रही है और सॉफ्टवेयर में इतने बग्स हैं कि वह कैलकुलेटर भी ठीक से नहीं चला पा रहा। अब वह इंसान अपना सिर पकड़कर बैठा है। वहीं उसका एक दोस्त है जो थोड़ा 'स्लो' है। वह दो महीने इंतज़ार करता है। वह रिव्यूज पढ़ता है और सारी खामियों को देख लेता है। जब कंपनी उन गलतियों को सुधार कर नया अपडेट निकालती है तब वह फोन खरीदता है। अब उसके पास एक परफेक्ट प्रोडक्ट है और वह भी कम सिरदर्द के साथ। बिजनेस में भी यही लॉजिक काम करता है।

ज्यादातर कंपनियां इस डर में रहती हैं कि अगर उन्होंने अभी कदम नहीं बढ़ाया तो वो पीछे रह जाएंगी। इसे हम 'फोमो' यानी फियर ऑफ मिसिंग आउट कहते हैं। लेकिन मार्केट को डोमिनेट करने वाली कंपनियां इस डर को अपनी जेब में रखकर बैठती हैं। वो देखती हैं कि लोग किस चीज के लिए पैसे देने को तैयार हैं। वो तब तक इंतज़ार करती हैं जब तक कि मार्केट में एक 'डोमिनेंट डिजाइन' नहीं बन जाता। जब सबको पता चल जाता है कि जनता को क्या चाहिए तब यह कंपनियां अपनी पूरी ताकत के साथ मैदान में उतरती हैं। इनका मकसद मार्केट बनाना नहीं बल्कि बने बनाए मार्केट पर कब्जा करना होता है।

मान लीजिए आप एक ऐसे रेस्टोरेंट में गए हैं जहाँ बिल्कुल नया मेन्यू आया है। अब आप पहले ऐसे ग्राहक हैं जो 'चॉकलेट वाले समोसे' ऑर्डर करते हैं। शेफ भी एक्सपेरिमेंट कर रहा है और आप भी। नतीजा क्या होता है। आपका पेट खराब हो जाता है और पैसे भी बर्बाद जाते हैं। वहीं आपका दोस्त चुपचाप बैठा आपको देख रहा है। जब वह देखता है कि चॉकलेट समोसा तो फ्लॉप है पर 'पनीर टिक्का' सबको पसंद आ रहा है तो वह बड़े आराम से पनीर टिक्का आर्डर करता है और मजे से खाता है। फास्ट सेकंड कंपनियां वही दोस्त हैं जो दूसरों के पेट खराब होने का इंतज़ार करती हैं। वो मार्केट के 'सेटल' होने का फायदा उठाती हैं। वो तब एंट्री मारती हैं जब रिस्क कम और प्रॉफिट की गारंटी ज्यादा होती है। इसलिए हीरो बनने की जल्दी में विलेन मत बन जाइए। सही समय का इंतज़ार करना ही असली समझदारी है।


लेसन ३ : इनोवेशन से ज्यादा स्केलिंग पर फोकस करो

दुनिया में आईडिया की कमी नहीं है। आप सुबह उठकर चाय की दुकान पर बैठ जाइए आपको वहां कम से कम दस ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनके पास 'दुनिया बदलने वाला' आईडिया होगा। लेकिन क्या वो सब करोड़पति हैं। बिल्कुल नहीं। 'फास्ट सेकंड' बुक का तीसरा सबसे कड़वा सच यह है कि मार्केट को वो नहीं जीतता जिसके पास सबसे बढ़िया आईडिया होता है बल्कि वो जीतता है जो उस आईडिया को गली गली तक पहुंचाना जानता है। स्मार्ट कंपनियां खुद को लैब में बंद करके नया आविष्कार करने में समय बर्बाद नहीं करतीं। उनका पूरा ध्यान इस बात पर होता है कि जो चीज बन चुकी है उसे मास लेवल पर 'स्केल' कैसे किया जाए।

सोचिए एक हलवाई है जो दुनिया की सबसे स्वादिष्ट जलेबी बनाता है। उसकी जलेबी इतनी बढ़िया है कि जो एक बार खा ले वो दीवाना हो जाए। लेकिन वह बेचारा सारा दिन अपनी छोटी सी दुकान में खुद जलेबियां छानता रहता है। उसे लगता है कि उसकी 'क्वालिटी' ही उसकी जीत है। तभी पास में एक बड़ी कंपनी अपनी दुकान खोलती है। उनकी जलेबी शायद उतनी लाजवाब न हो पर उनके पास पूरे शहर में डिलीवरी का नेटवर्क है। उनके पास शानदार पैकेजिंग है और हर नुक्कड़ पर उनके आउटलेट्स हैं। कुछ ही महीनों में वो छोटा हलवाई गायब हो जाता है और वो बड़ी कंपनी पूरे मार्केट पर राज करती है। क्यों। क्योंकि बड़ी कंपनी ने 'इनोवेशन' यानी रेसिपी पर नहीं बल्कि 'स्केलिंग' यानी डिस्ट्रीब्यूशन पर फोकस किया।

ज्यादातर स्टार्टअप्स यहीं मात खा जाते हैं। वो सोचते हैं कि अगर उनका प्रोडक्ट बेस्ट है तो लोग अपने आप खिंचे चले आएंगे। भाई साहब यह सिर्फ फिल्मों में होता है। असल जिंदगी में लोग वो खरीदते हैं जो उनके सामने सबसे ज्यादा दिखता है और जो सबसे आसानी से मिल जाता है। एक फास्ट सेकंड कंपनी के पास वो 'मसल पावर' होती है जिससे वह मार्केट को अपनी तरफ मोड़ सकती है। जब एक बार मार्केट का स्टैंडर्ड तय हो जाता है तो खेल आईडिया से हटकर सप्लाई चेन और मार्केटिंग पर आ जाता है। अगर आप दुनिया की सबसे अच्छी चीज बना रहे हैं लेकिन उसे सही समय पर सही जगह पहुंचा नहीं पा रहे तो आपका वो महान इनोवेशन कचरे के डिब्बे में जाने के लायक ही है।

इसको एक उदाहरण से समझते हैं। वो पड़ोस वाले शर्मा जी याद हैं। जो हर नई गैजेट के आने पर उसकी कमियां गिनाते रहते हैं और कहते हैं कि 'इससे अच्छा तो मैं बना देता'। वो शायद बना भी देते पर वो आज भी उसी पुरानी कुर्सी पर बैठकर दूसरों की बुराई कर रहे हैं। क्यों। क्योंकि उन्होंने सिर्फ सोचने में पीएचडी की है उसे बड़े लेवल पर ले जाने की हिम्मत नहीं दिखाई। वहीं दूसरी तरफ वो कंपनियां हैं जो दूसरों का आधा अधूरा आईडिया उठाती हैं और उसे इतना बड़ा बना देती हैं कि दुनिया को लगता है कि आईडिया उन्हीं का था। आपको क्या लगता है कि बड़ी टेक कंपनियों ने सब कुछ खुद बनाया है। नहीं। उन्होंने बस दूसरों के बनाए रास्तों को हाईवे में बदल दिया। इसलिए अगर आप बिजनेस में लंबे समय तक टिकना चाहते हैं तो सिर्फ 'क्रिएटर' मत बनिए बल्कि 'स्केलर' बनिए। जब आप बड़े लेवल पर ऑपरेट करते हैं तो छोटे इनोवेटर्स खुद ही आपके सामने घुटने टेक देते हैं।


तो दोस्तों, आज हमने सीखा कि मार्केट का असली राजा वो नहीं है जो सबसे पहले भागता है बल्कि वो है जो सही समय पर सही दिशा में दौड़ता है। 'फास्ट सेकंड' बनना कोई चोरी नहीं है बल्कि एक बहुत ही गहरी और सोची समझी बिजनेस स्ट्रेटेजी है। अपनी एनर्जी फालतू के रिस्क में मत जलाइए। दूसरों की गलतियों से सीखिए और जब समय सही हो तब अपना पूरा जोर लगा दीजिए। याद रखिए इतिहास सिर्फ पहले आने वालों का नहीं बल्कि जीतने वालों का लिखा जाता है।

अगर आपको यह लेसन काम के लगे और आप नहीं चाहते कि आपका दोस्त भी शर्मा जी की तरह सिर्फ बातें करता रह जाए तो इस आर्टिकल को उसके साथ अभी शेयर करें। नीचे कमेंट में बताएं कि आपको क्या लगता है। 'फर्स्ट मूवर' बनना बेहतर है या 'फास्ट सेकंड'। चलिए चर्चा शुरू करते हैं।

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