Free (Hindi)


आप अभी भी हर चीज के लिए पूरे पैसे चुका रहे हैं। कितने भोले हैं आप। दुनिया फ्री में मजे ले रही है और आप अपनी मेहनत की कमाई लुटा रहे हैं। शायद आपको अमीर बनने का शौक ही नहीं है। अगर यही हाल रहा तो आप सिर्फ दूसरों के बिल भरते रह जाएंगे और खुद खाली हाथ रहेंगे।

इस आर्टिकल में हम क्रिस एंडरसन की किताब फ्री की मदद से समझेंगे कि कैसे जीरो कोस्ट मार्केटिंग और फ्रीमियम मॉडल्स आज की दुनिया पर राज कर रहे हैं। यहाँ दिए गए 3 लेसन आपकी बिजनेस सोच को पूरी तरह बदल देंगे।


लेसन १ : जीरो प्राइस की साइकोलॉजी और फ्री का जादू

क्या आपने कभी सोचा है कि जब मॉल में एक टी शर्ट के साथ दूसरी फ्री मिलती है तो आपकी धड़कनें अचानक क्यों तेज हो जाती हैं। आपको उस दूसरी टी शर्ट की जरूरत भी नहीं होती पर आपका दिमाग चिल्लाने लगता है कि भाई ले ले। यही है फ्री का असली जादू। क्रिस एंडरसन कहते हैं कि फ्री सिर्फ एक कीमत नहीं है बल्कि यह एक इमोशनल ट्रिगर है। जब कोई चीज पांच रुपए की होती है तो आप सोचते हैं कि क्या यह पैसे वसूल है। लेकिन जैसे ही कीमत जीरो होती है आपकी सोचने समझने की शक्ति छुट्टी पर चली जाती है।

मान लीजिए आपका कोई दोस्त आपको पार्टी में बुलाता है। वह कहता है कि पनीर टिक्का सिर्फ दस रुपए का है। आप शायद अपनी डाइट के बारे में सोचेंगे। आप सोचेंगे कि क्या आज जंक फूड खाना ठीक है। लेकिन अगर वही दोस्त कहे कि भाई आज पनीर टिक्का बिल्कुल फ्री है तो आप अपनी डाइट को डस्टबिन में डाल देंगे। आप तब तक खाएंगे जब तक कि पनीर टिक्का आपके कान से बाहर न आने लगे। यह इंसानी फितरत है। हमें लगता है कि फ्री में कुछ लेने से हमारा कोई नुकसान नहीं हो सकता।

बिजनेस की दुनिया में इस साइकोलॉजी का इस्तेमाल बहुत ही चालाकी से किया जाता है। बड़ी कंपनियां जानती हैं कि अगर उन्होंने आपसे एक बार जीरो रुपए ले लिए तो उनका आधा काम हो गया। आपने कभी नोटिस किया है कि कैसे सिम कार्ड कंपनियां पहले आपको फ्री में सिम और डेटा देती हैं। आप खुशी खुशी उसे ले लेते हैं जैसे कि आपको लॉटरी लग गई हो। आप सोचते हैं कि कंपनी कितनी दयालु है। लेकिन असल में वे आपको अपने नेटवर्क का आदी बना रहे होते हैं। एक बार जब आपको वह फ्री का डेटा इस्तेमाल करने की लत लग जाती है तब वे धीरे धीरे आपसे पैसे वसूलना शुरू करते हैं।

यही बात ऑनलाइन एप्स पर भी लागू होती है। आप एक गेम डाउनलोड करते हैं जो बिल्कुल फ्री है। आप सोचते हैं कि वाह मजा आ गया। लेकिन दो दिन बाद आप उसी गेम में एक नई गन या ड्रेस खरीदने के लिए असल में पैसे खर्च कर रहे होते हैं। फ्री शब्द ने आपके दिमाग के उस हिस्से को बंद कर दिया था जो आपको रिस्क के प्रति सचेत करता है। आप खुद को बहुत स्मार्ट समझते हैं लेकिन असल में आप उस फ्री के जाल में फंस चुके होते हैं जिसे बहुत ही सोच समझकर बिछाया गया था।

अगर आप कोई बिजनेस कर रहे हैं या करने की सोच रहे हैं तो याद रखिए कि लोगों को अपनी तरफ खींचने के लिए फ्री से बड़ा कोई हथियार नहीं है। यह लोगों के मन से डर को निकाल देता है। जब पैसा ही नहीं लग रहा तो डर कैसा। लेकिन एक स्मार्ट बिजनेसमैन वही है जो जानता है कि फ्री की इस लहर पर सवार होकर प्रॉफिट के किनारे तक कैसे पहुंचना है। अगर आप फ्री की ताकत को नहीं समझेंगे तो आप हमेशा यही सोचते रह जाएंगे कि आपके पड़ोसी की दुकान पर इतनी भीड़ क्यों है जबकि वह आपसे ज्यादा महंगा सामान बेचता है।

यह सिर्फ मार्केटिंग नहीं है बल्कि यह इंसानी दिमाग की एक प्रोग्रामिंग है। फ्री देखते ही हमारा डोपामाइन लेवल बढ़ जाता है। हमें लगता है कि हमने सिस्टम को हरा दिया है। लेकिन सच तो यह है कि उस फ्री चीज की कीमत कोई न कोई तो चुका ही रहा होता है। या तो आप अपने डेटा से चुका रहे हैं या फिर अपने भविष्य के खर्चों से। इसलिए अगली बार जब आप कहीं फ्री लिखा देखें तो अपनी पॉकेट पर हाथ रख लें क्योंकि जादू शुरू होने वाला है।


लेसन २ : डिजिटल इकोनॉमी का सच और जीरो कोस्ट का खेल

पुराने जमाने में अगर आपको कोई किताब छापनी होती थी तो कागज का खर्चा आता था। स्याही का खर्चा आता था और उसे दुकान तक पहुँचाने का ट्रक का भाड़ा भी लगता था। लेकिन आज के डिजिटल युग में मामला बिल्कुल उल्टा है। क्रिस एंडरसन समझाते हैं कि कंप्यूटर और इंटरनेट की ताकत हर साल बढ़ रही है जबकि उसकी कीमत घट रही है। इसे आसान भाषा में समझें तो आज एक फोटो को दुनिया के कोने कोने तक भेजने की कीमत लगभग जीरो हो चुकी है। और जब किसी चीज को बनाने या भेजने की कीमत जीरो हो जाती है तो उसे फ्री में देना ही सबसे समझदारी भरा काम होता है।

मान लीजिए आप एक हलवाई हैं। अगर आप सबको फ्री में जलेबियाँ बांटना शुरू कर दें तो आप एक हफ्ते में सड़क पर आ जाएंगे। क्यों। क्योंकि मैदा और चीनी फ्री में नहीं मिलते। लेकिन अगर आप एक डिजिटल आर्टिस्ट हैं और आपने एक शानदार पेंटिंग बनाई है। अब आप उसकी फोटो एक करोड़ लोगों को व्हाट्सएप पर भेजें या एक भी इंसान को न भेजें आपकी जेब से एक रुपया भी एक्स्ट्रा नहीं लगेगा। इंटरनेट की दुनिया में इसी को मार्जिनल कोस्ट का जीरो होना कहते हैं। इसीलिए गूगल आपको फ्री में सर्च करने देता है और फेसबुक आपको फ्री में फोटो डालने देता है। वे कोई समाजसेवी संस्था नहीं चला रहे हैं। वे बस इस गिरती हुई कोस्ट का फायदा उठा रहे हैं।

आजकल के बच्चे सोचते हैं कि इंटरनेट पर सब कुछ फ्री मिलना उनका जन्मसिद्ध अधिकार है। उन्हें लगता है कि यूट्यूब पर वीडियो देखने के लिए पैसे मांगना पाप है। लेकिन असलियत यह है कि जब कोस्ट जीरो की तरफ बढ़ती है तो मार्केट की मजबूरी हो जाती है कि वह आपको फ्री में चीजें दे। अगर कोई कंपनी आज आपसे ईमेल भेजने के पैसे मांगे तो आप उसे ऐसे देखेंगे जैसे उसने आपकी किडनी मांग ली हो। आप तुरंत उसे छोड़कर किसी फ्री सर्विस पर चले जाएंगे। यही वजह है कि आज बड़े बड़े सॉफ्टवेयर जो पहले हजारों में मिलते थे अब आपको फ्री में मिल जाते हैं।

लेकिन यहाँ एक बहुत बड़ा ट्विस्ट है। अगर आप किसी चीज के लिए पैसे नहीं दे रहे हैं तो समझ लीजिए कि आप खुद एक प्रोडक्ट हैं। जब आप फ्री का जीमेल इस्तेमाल करते हैं तो गूगल आपकी पसंद और नापसंद को पढ़ रहा होता है। वह जान लेता है कि आपको कौन से जूते पसंद हैं या आप अगली छुट्टी पर कहाँ जाना चाहते हैं। फिर वह यह जानकारी उन कंपनियों को बेचता है जो आपको विज्ञापन दिखाना चाहती हैं। यानी कोस्ट कहीं गायब नहीं हुई है बस उसका रास्ता बदल गया है। इसे हम थर्ड पार्टी सब्सिडी कहते हैं। एक तरफ से फ्री दो और दूसरी तरफ से जेब काटो।

यह डिजिटल इकोनॉमी का सबसे बड़ा सच है। जो बिजनेसमैन यह सोचकर बैठा है कि वह हर छोटी चीज के लिए पैसे वसूल लेगा वह बहुत जल्द इतिहास बन जाएगा। आपको यह समझना होगा कि फ्री देना अब आपकी चॉइस नहीं बल्कि जिंदा रहने की शर्त है। अगर आप अपने कस्टमर को कुछ फ्री में नहीं दे सकते तो वह आपकी तरफ देखेगा भी नहीं। दुनिया बदल चुकी है और जो इस जीरो कोस्ट के खेल को समझ गया वही आने वाले समय का असली खिलाड़ी बनेगा। बाकी सब तो बस इंटरनेट का बिल भरते रह जाएंगे।


लेसन ३ : फ्रीमियम मॉडल और प्रॉफिट का असली सीक्रेट

क्या आपने कभी नोटिस किया है कि क्लाउड स्टोरेज वाली कंपनियां पहले आपको 15 जीबी फ्री स्पेस देती हैं। आप बड़े चाव से अपनी सारी यादें और फालतू की फोटो वहां जमा करने लगते हैं। फिर एक दिन अचानक मैसेज आता है कि भाई आपकी जगह भर चुकी है। अब अगर और फोटो डालनी है तो पैसे निकालो। बस यही है फ्रीमियम मॉडल का असली मास्टरस्ट्रोक। यहाँ फ्री का मतलब यह नहीं है कि सब कुछ हमेशा के लिए मुफ्त है। यहाँ फ्री सिर्फ एक एंट्री गेट है जहाँ से भीड़ अंदर आती है और फिर उनमें से कुछ खास लोग कंपनी का घर चलाते हैं।

क्रिस एंडरसन का कहना है कि फ्रीमियम मॉडल में पांच परसेंट लोग उन बाकी पचानवे परसेंट लोगों का खर्चा उठाते हैं जो फ्री में मजे ले रहे हैं। इसे एक जिम के उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक जिम है जहाँ कोई भी आकर फ्री में ट्रेडमिल पर दौड़ सकता है। अब भीड़ तो उमड़ पड़ेगी। लेकिन अगर किसी को पर्सनल ट्रेनर चाहिए या एसी वाले रूम में कसरत करनी है तो उसे तगड़ी फीस देनी होगी। अब वह फ्री में दौड़ने वाली जनता जिम के लिए एक तरह की फ्री मार्केटिंग बन जाती है। जिम हमेशा भरा हुआ दिखता है जिससे उसकी वैल्यू बढ़ जाती है। और जो रईस लोग प्रीमियम सर्विस लेते हैं उनके पैसों से जिम का सारा खर्चा निकल आता है।

मान लीजिए आप एक डेटिंग एप पर हैं। अकाउंट बनाना फ्री है और लोगों की प्रोफाइल देखना भी फ्री है। आप दिन भर स्वाइप करते रहते हैं लेकिन कोई मैच नहीं मिलता। तभी एप आपको एक ऑफर देता है कि अगर आप प्रीमियम मेम्बरशिप लेंगे तो हम आपकी प्रोफाइल को सीधे उन लोगों को दिखाएंगे जो आपको पसंद आ सकते हैं। अब आपकी बेताबी का फायदा उठाते हुए वे आपसे पैसे वसूल लेते हैं। जो लोग फ्री में बैठे हैं वे सिर्फ एप की भीड़ बढ़ा रहे हैं ताकि प्रीमियम यूजर्स को लगे कि यहाँ बहुत सारे लोग मौजूद हैं।

यह स्ट्रेटेजी बहुत ही शार्प है। अगर आप आज के दौर में अपना कोई डिजिटल कोर्स या सर्विस बेचना चाहते हैं और आप पहले दिन से ही कहेंगे कि मुझे पैसे दो तो लोग आपको ऐसे इग्नोर करेंगे जैसे आप कोई टेलीमार्केटिंग वाले कॉल हों। लेकिन अगर आप अपनी वैल्यू का एक छोटा सा हिस्सा फ्री में दे देते हैं तो लोग आप पर भरोसा करने लगते हैं। फ्री एक तरह का ट्रस्ट बिल्डर है। एक बार जब यूजर को आपकी क्वालिटी का चस्का लग जाता है तब वह खुद अपनी जेब ढीली करने के लिए तैयार हो जाता है।

तो लेसन बड़ा सीधा है। अगर आप चाहते हैं कि लोग आपके प्रीमियम प्रोडक्ट के लिए लाइन लगाएं तो पहले उन्हें फ्री का स्वाद चखाएं। लेकिन याद रहे कि आपके फ्री और पेड वर्जन में जमीन आसमान का फर्क होना चाहिए। अगर आपने फ्री में ही सब कुछ दे दिया तो फिर कोई आपको पैसे क्यों देगा। आपको एक ऐसी भूख पैदा करनी होगी जिसे केवल आपका प्रीमियम वर्जन ही शांत कर सके। जो लोग इस बैलेंस को समझ गए वे आज अरबों की कंपनियां चला रहे हैं और जो नहीं समझे वे आज भी घर घर जाकर अपना सामान बेचने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं।


तो दोस्तों, क्या आप अब भी फ्री चीजों को सिर्फ किस्मत का खेल समझते हैं या आपको समझ आ गया है कि आपकी जेब काटने की तैयारी कितनी एडवांस हो चुकी है। बिजनेस की इस नई दुनिया में फ्री होना मजबूरी है पर स्मार्ट होना आपकी चॉइस है। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो हर चीज फ्री में ढूंढते हैं ताकि उन्हें पता चले कि असली प्रोडक्ट कौन है। नीचे कमेंट में बताएं कि आपने आखिरी बार कौन सी फ्री चीज के चक्कर में पैसे खर्च किए थे।

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