Full Engagement! (Hindi)


क्या आप भी अपनी टीम से काम करवाने के नाम पर सिर्फ गधे की तरह मेहनत कर रहे हैं और रिजल्ट के नाम पर आपको बाबा जी का ठुल्लू मिल रहा है। अगर आप अब भी वही पुराने घिसे पिटे तरीके अपना रहे हैं तो मुबारक हो आप अपनी कंपनी को डुबोने की रेस में सबसे आगे हैं।

ब्रायन ट्रेसी की बुक फुल इंगेजमेंट हमें सिखाती है कि असली लीडर डंडे से नहीं बल्कि दिमाग से काम लेते हैं। चलिए जानते हैं वो ३ लेसन जो आपकी टीम की परफॉरमेंस को रॉकेट बना देंगे।


लेसन १ : फीलिंग ऑफ इम्पोर्टेंस

अगर आपको लगता है कि आपकी टीम सिर्फ सैलरी के लिए काम करती है तो आप दुनिया के सबसे बड़े मुगालते में जी रहे हैं। सच तो यह है कि इंसान रोटी से ज्यादा इज्जत का भूखा होता है। ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि एक एम्प्लॉई की परफॉरमेंस तब आसमान छूने लगती है जब उसे महसूस होता है कि वह कंपनी का एक जरूरी हिस्सा है न कि सिर्फ मशीन का कोई छोटा सा नट बोल्ट।

मान लीजिए आपकी टीम में एक शर्मा जी हैं जो पिछले दस साल से एक्सेल शीट भर रहे हैं। अब अगर आप उनके पास जाकर कहेंगे कि शर्मा जी यह डेटा तो कोई बंदर भी भर लेगा तो यकीन मानिए अगले दिन से शर्मा जी काम कम और बीमार होने के बहाने ज्यादा ढूंढेंगे। लेकिन अगर आप उन्हें यह समझा दें कि उनकी एक एक एंट्री कंपनी के करोड़ों के फैसले तय करती है तो वही शर्मा जी अपनी कुर्सी से ऐसे चिपक जाएंगे जैसे फेविकोल का जोड़ हो।

असली दिक्कत यह है कि आज के बॉस खुद को भगवान और टीम को कीड़ा मकोड़ा समझने की गलती कर बैठते हैं। जब आप किसी को यह अहसास दिलाते हैं कि उसका काम दुनिया बदल रहा है तो वह अपनी आत्मा तक झोंक देता है। लोग अपनी वैल्यू साबित करने के लिए पहाड़ तोड़ सकते हैं बस शर्त यह है कि उन्हें लगे कि कोई वह पहाड़ देख रहा है। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम संडे को भी खुशी खुशी काम करे तो उन्हें डर दिखाना बंद करें और उन्हें यह अहसास दिलाना शुरू करें कि उनके बिना आपकी दुकान एक दिन भी नहीं चल सकती।

जब एक इंसान को लगता है कि वह महत्वपूर्ण है तो उसका कॉन्फिडेंस लेवल सातवें आसमान पर होता है। वह गलतियां कम करता है और नए आइडियाज ज्यादा लाता है। अगर आप सिर्फ हुक्म चलाएंगे तो आपको सिर्फ नौकर मिलेंगे लेकिन अगर आप इज्जत देंगे तो आपको ऐसे वारियर्स मिलेंगे जो आपकी कंपनी के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। इसलिए डंडा छोड़िए और तारीफ का सहारा लीजिए क्योंकि असली मोटिवेशन बैंक अकाउंट से नहीं बल्कि दिमाग के उस कोने से आता है जहाँ हम खुद को स्पेशल महसूस करना चाहते हैं।


लेसन २ : क्लियर एक्सपेक्टेशन्स

जरा सोचिए आप एक टैक्सी में बैठते हैं और ड्राइवर पूछता है कि साहब कहाँ जाना है। आप उसे जवाब देते हैं कि बस कहीं भी ले चलो जहाँ मन करे। अब वो ड्राइवर आपको सीधा पागलखाने छोड़कर आएगा क्योंकि उसे पता ही नहीं कि मंजिल कहाँ है। ठीक यही हाल ऑफिस में होता है जब बॉस को खुद नहीं पता होता कि उसे टीम से चाहिए क्या। ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि बिना साफ गोल के काम करना वैसा ही है जैसे आप अंधेरे कमरे में काली बिल्ली ढूंढ रहे हों जो वहां है ही नहीं।

ज्यादातर कंपनियों में एम्प्लॉई बेचारे कन्फ्यूज रहते हैं कि आखिर उनका रोल क्या है। सुबह बॉस आता है और कहता है कि सेल्स बढ़ाओ और शाम को कहता है कि खर्चा कम करो। अब एम्प्लॉई बेचारा अपनी किडनी बेचकर सेल्स लाए या पेपर बचाकर पैसे बचाए। जब आपकी एक्सपेक्टेशन्स साफ नहीं होतीं तो टीम के अंदर सिर्फ टेंशन और फ्रस्ट्रेशन पैदा होती है। एक अच्छा लीडर वह है जो काम शुरू होने से पहले ही बाउंड्री लाइन खींच देता है।

कल्पना कीजिए कि आपकी कंपनी में एक नया लड़का आया है जिसका नाम है राहुल। अब अगर आप राहुल को सिर्फ इतना बोल देंगे कि बेटा मार्केटिंग देख लो तो राहुल पूरा दिन फेसबुक पर मीम्स देखेगा और उसे मार्केटिंग कहेगा। लेकिन अगर आप उसे कहेंगे कि राहुल मुझे अगले तीस दिन में दस हजार नए कस्टमर्स चाहिए तो राहुल को अपनी मंजिल दिख जाएगी। उसे पता होगा कि उसे किस दिशा में भागना है। जब गोल साफ होते हैं तो बहाने अपने आप खत्म हो जाते हैं।

इंसानी दिमाग एक जीपीएस की तरह काम करता है। उसे जब तक सही लोकेशन नहीं मिलेगी वो सिर्फ गोल गोल घूमता रहेगा। अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम रिजल्ट दे तो उन्हें पहेलियां बुझाना बंद कीजिए। उन्हें साफ साफ शब्दों में बताइए कि जीत की परिभाषा क्या है। क्या वो नंबर है या फिर कस्टमर की खुशी। जब हर किसी को अपना रोल क्रिस्टल क्लियर होता है तो काम बोझ नहीं बल्कि एक मिशन बन जाता है। याद रखिए कन्फ्यूजन हमेशा आलस को जन्म देता है और क्लेरिटी हमेशा एक्शन को।


लेसन ३ : द पावर ऑफ अप्प्रिसिएशन

क्या आपने कभी सोचा है कि एक नन्हा सा बच्चा जब पहली बार खड़ा होता है तो पूरी फैमिली तालियां क्यों बजाती है। वह इसलिए ताकि उसे अहसास हो कि उसने कुछ बड़ा किया है। लेकिन जैसे ही हम बड़े होते हैं और ऑफिस पहुँचते हैं तो ये तालियां गायब हो जाती हैं और उनकी जगह ले लेती है डेडलाइन्स की चिक चिक। ब्रायन ट्रेसी कहते हैं कि तारीफ एक ऐसा जादुई टूल है जो मुर्दे में भी जान फूंक सकता है। अगर आप कंजूसों की तरह तारीफ बचाकर रखते हैं तो यकीन मानिए आप अपनी टीम की एनर्जी को दीमक की तरह चाट रहे हैं।

मान लीजिए आपके ऑफिस में मिस पिंकी हैं जिन्होंने अपनी पूरी रात काली करके एक प्रेजेंटेशन तैयार की। अब सुबह आप उसे देखते हैं और बस इतना कहते हैं कि ठीक है अगली बार फोंट थोड़ा बड़ा रखना। बस इतना सुनते ही पिंकी जी का सारा मोटिवेशन नाले में बह जाएगा। अगली बार वो काम तो करेंगी लेकिन अपना दिल घर छोड़कर आएंगी। वहीं अगर आप सिर्फ दो शब्द कह देते कि क्या बात है पिंकी जी आपने तो कमाल ही कर दिया तो शायद वो अगली बार चांद तारे तोड़कर ले आतीं।

लोग पैसों के लिए काम शुरू करते हैं लेकिन वो टिकते सिर्फ इज्जत और तारीफ के लिए हैं। एक लीडर का काम सिर्फ कमियां निकालना नहीं बल्कि खूबियों को तराशना भी होता है। जब आप अपनी टीम के छोटे छोटे अचीवमेंट्स को सेलिब्रेट करते हैं तो उनके अंदर एक अलग ही लेवल का करंट दौड़ता है। उन्हें लगता है कि उनकी मेहनत बेकार नहीं जा रही है। आप किसी को दस हजार का बोनस दे दें वह उसे एक हफ्ते में भूल जाएगा लेकिन आपकी की हुई सच्ची तारीफ उसे सालों तक याद रहेगी।

सफलता का असली राज यही है कि आप अपनी टीम को यह महसूस कराएं कि वो विनर्स हैं। जब कोई इंसान खुद को विनर मानने लगता है तो उसकी बॉडी लैंग्वेज और काम करने का तरीका दोनों बदल जाते हैं। तारीफ करने में आपका एक पैसा भी खर्च नहीं होता लेकिन इसका रिटर्न किसी भी स्टॉक मार्केट से ज्यादा मिलता है। इसलिए अपने अंदर के हिटलर को बाहर निकालिए और एक ऐसा माहौल बनाइए जहाँ लोग काम करने के लिए नहीं बल्कि जीत का स्वाद चखने के लिए आएं। तारीफ वह खाद है जिससे टैलेंट का पौधा वटवृक्ष बनता है।


तो दोस्तों, क्या आप अब भी अपनी टीम को सिर्फ एक रिसोर्स की तरह देख रहे हैं या एक इंसान की तरह। ब्रायन ट्रेसी के ये ३ लेसन सिर्फ थ्योरी नहीं बल्कि एक सफल बिजनेस की नींव हैं। आज ही अपने ऑफिस जाइए और किसी एक एम्प्लॉई की दिल से तारीफ कीजिए और फिर देखिए जादू। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया तो इसे उन सभी बॉसेस के साथ शेयर करें जिन्हें अपनी टीम को मोटिवेट करना नहीं आता।

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