सच कहूँ तो आप अपनी लाइफ के सबसे बड़े विलेन खुद ही हैं। दुनिया तो बाद में टांग खींचती है। पहले आप खुद अपनी प्रोग्रेस का गला घोंट देते हैं। क्या आपको लगता है कि सिर्फ मेहनत से आप जीत जाएंगे। यह आपकी सबसे बड़ी गलतफहमी है जो आपको एवरेज बना रही है।
आज के इस खास आर्टिकल में हम रॉबर्ट कूपर की किताब गेट आउट ऑफ योर ओन वे से वो सीक्रेट्स समझेंगे जो आपकी सोई हुई किस्मत को जगा देंगे। हम उन ३ बड़े लेसन्स पर बात करेंगे जो आपको भीड़ से अलग खड़ा कर देंगे।
लेसन १ : अपनी इनर लिमिट्स को पहचानना और उन्हें कुचलना
मान लीजिये आप एक बहुत ही शानदार स्पोर्ट्स कार चला रहे हैं। इंजन एकदम नया है। पेट्रोल फुल है। लेकिन कार आगे नहीं बढ़ रही। आप एक्सीलरेटर दबा रहे हैं पर कार बस शोर मचा रही है। जानते हैं क्यों। क्योंकि आपने हैंडब्रेक लगा रखा है। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि हमारी लाइफ की रेस में भी हम यही करते हैं। हम पूरी दुनिया से लड़ने निकल जाते हैं। हमें लगता है कि बॉस खराब है। घर वाले नहीं समझते। किस्मत साथ नहीं दे रही। लेकिन असली हैंडब्रेक तो हमारे दिमाग के अंदर लगा है। हमारी खुद की बनाई हुई वो लिमिट्स जो हमें यह यकीन दिलाती हैं कि हम इसके आगे नहीं जा सकते।
अक्सर हम अपने कम्फर्ट जोन को एक सुरक्षा कवच समझ लेते हैं। पर असल में वह एक जेल है। और मजे की बात यह है कि इस जेल के जेलर भी आप खुद ही हैं। लोग अक्सर कहते हैं कि मुझे सक्सेस नहीं मिल रही क्योंकि मेरे पास रिसोर्सेज नहीं हैं। भाई सच तो यह है कि आपके पास रिसोर्सेज की नहीं बल्कि अपनी लिमिट्स को तोड़ने की हिम्मत की कमी है। आप अपनी उन पुरानी आदतों और डर से इतने चिपके हुए हैं जैसे कि वो आपकी पुश्तैनी जायदाद हो। कूपर यहाँ बहुत ही शार्प तरीके से बताते हैं कि जब तक आप अपनी इनर लिमिट्स को नहीं पहचानेंगे तब तक आप दुनिया के लिए एक एवरेज इंसान ही बने रहेंगे।
राहुल नाम का एक लड़का है जो कॉर्पोरेट में काम करता है। वह हमेशा कहता है कि उसे एक बड़ा लीडर बनना है। लेकिन जब भी मीटिंग में कुछ बोलने की बारी आती है तो उसके पेट में गुदगुदी होने लगती है। वह सोचता है कि अगर मैंने कुछ गलत बोल दिया तो लोग हसेंगे। यहाँ राहुल का बॉस उसे नहीं रोक रहा। उसकी कंपनी उसे नहीं रोक रही। उसे रोक रही है उसकी अपनी बनाई हुई यह लिमिट कि लोग क्या कहेंगे। वह खुद अपनी प्रोग्रेस का रास्ता रोक कर खड़ा है और उम्मीद कर रहा है कि कोई फरिश्ता आएगा और उसे धक्का देकर आगे बढ़ाएगा। भाई कोई नहीं आने वाला। आपको खुद अपनी सीट से उठकर उस डर का गला घोंटना पड़ेगा।
ज्यादातर लोग अपनी पूरी जिंदगी उस बाउंड्री के अंदर बिता देते हैं जो उन्होंने खुद ही खींची होती है। वे अपनी काबिलियत पर शक करते हैं पर अपनी नाकामयाबी पर उन्हें पूरा भरोसा होता है। क्या यह मजाक नहीं है। आप खुद को यह बताने में एक्सपर्ट हैं कि आप कोई काम क्यों नहीं कर सकते। काश इतनी एनर्जी आपने यह सोचने में लगाई होती कि आप वह काम कैसे कर सकते हैं। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि अपनी लिमिट्स को पहचानना ही उसे तोड़ने का पहला कदम है। जब आप यह मान लेते हैं कि आप खुद ही अपनी रुकावट हैं तब आप उस रुकावट को हटाने की ताकत भी पा लेते हैं।
तो क्या आप तैयार हैं अपने उस हैंडब्रेक को रिलीज करने के लिए। क्या आप तैयार हैं अपनी उन पुरानी कहानियों को आग लगाने के लिए जो आपको पीछे खींच रही हैं। याद रखिये अगर आप खुद अपने रास्ते से नहीं हटेंगे तो खुदा भी आपकी मदद नहीं कर पाएगा। यह लेसन आपको आईना दिखाता है और पूछता है कि क्या आप अपनी ही बनाई हुई जेल में सड़ना चाहते हैं या फिर उन दीवारों को तोड़कर बाहर निकलना चाहते हैं। अपनी लिमिट्स को पहचानना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। बस अपनी उन बातों को पकड़ना शुरू कीजिये जो आप खुद से झूठ बोलते हैं। अगली बार जब आप कहें कि मैं यह नहीं कर सकता तो रुकिए और खुद से पूछिए कि क्या यह सच है या बस एक बहाना है।
लेसन २ : इंटेंशनल एक्शन की पावर
क्या आपने कभी उस मक्खी को देखा है जो बंद खिड़की के कांच से बार-बार टकराती रहती है। वह पूरी जान लगा देती है। वह बहुत मेहनत कर रही है। पसीने से तर-बतर है। लेकिन वह बाहर नहीं निकल पाती क्योंकि वह बस मेहनत कर रही है पर सही दिशा में नहीं देख रही। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि हम इंसानों का भी यही हाल है। हम सुबह से शाम तक गधों की तरह काम करते हैं। हम खुद को बिजी रखते हैं ताकि हमें यह तसल्ली रहे कि हम कुछ कर रहे हैं। पर क्या हम सच में प्रोग्रेस कर रहे हैं। या हम बस उस कांच से अपना सिर फोड़ रहे हैं जो कभी खुलने वाला ही नहीं है।
इंटेंशनल एक्शन का मतलब है पूरे होश में रहकर कदम उठाना। बिना किसी होश के मेहनत करना वैसी ही बात है जैसे आप एक खड़ी हुई कार में बैठकर रेस दे रहे हों। शोर बहुत होगा पर पहुँचेंगे कहीं नहीं। दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो बस रिएक्ट करते हैं। सुबह उठे। फोन देखा। ऑफिस गए। बॉस की सुनी। वापस आए और सो गए। ये लोग अपनी लाइफ के पैसेंजर हैं। दूसरे वो होते हैं जो ड्राइवर की सीट पर बैठते हैं। उन्हें पता होता है कि आज का हर एक घंटा उन्हें उनके गोल की तरफ ले जा रहा है या नहीं। कूपर के अनुसार अगर आप अपनी लाइफ में कुछ बड़ा करना चाहते हैं तो आपको अपनी आंखों से पट्टी हटानी होगी।
मान लीजिये मिस्टर शर्मा हैं जिन्हें अपना वजन कम करना है। शर्मा जी ने बहुत महंगी जिम की मेंबरशिप ली है। वे रोज सुबह ५ बजे उठते हैं। लेकिन जिम जाकर वे आधे घंटे तो सेल्फी लेते हैं और बाकी टाइम लोगों से गप्पें मारते हैं। घर आकर वे सोचते हैं कि भाई मैंने तो २ घंटे जिम में बिताए हैं तो अब ४ पराठे खाने का तो हक बनता है। शर्मा जी यहाँ मेहनत तो कर रहे हैं पर उनका एक्शन इंटेंशनल नहीं है। वे बस एक प्रोसेस को फॉलो कर रहे हैं बिना यह सोचे कि क्या यह उनके गोल में मदद कर रहा है। ऐसे लोग अक्सर बाद में भगवान को दोष देते हैं कि मैंने तो बहुत कोशिश की थी पर मेरी तो किस्मत ही खराब है।
असलियत यह है कि आपकी किस्मत नहीं बल्कि आपका फोकस खराब है। रॉबर्ट कूपर समझाते हैं कि सक्सेस उन लोगों को नहीं मिलती जो सबसे ज्यादा काम करते हैं। बल्कि उन लोगों को मिलती है जो सबसे सही काम करते हैं। आपको यह सीखना होगा कि कब हाँ कहना है और उससे भी ज्यादा जरूरी यह कि कब ना कहना है। जब आप अपनी हर चॉइस को पूरे होश के साथ चुनते हैं तो आपकी लाइफ में एक लय आ जाती है। आप भीड़ का हिस्सा बनना बंद कर देते हैं। आप एक ऐसे इंसान बन जाते हैं जिसके हर शब्द और हर कदम के पीछे एक मतलब होता है।
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो शाम को थक कर चूर हो जाते हैं पर जब खुद से पूछते हैं कि आज क्या हासिल किया तो जवाब में सिर्फ सन्नाटा मिलता है। अगर ऐसा है तो मुबारक हो आप एक रोबोट बन चुके हैं। रोबोट्स के पास इंटेंशन नहीं होता बस कमांड्स होती हैं। पर आप तो इंसान हैं। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि हर छोटे काम को शुरू करने से पहले खुद से पूछिए कि मैं यह क्यों कर रहा हूँ। क्या यह मुझे उस इंसान के करीब ले जा रहा है जो मैं बनना चाहता हूँ। अगर जवाब नहीं है तो उस काम को कचरे के डिब्बे में डाल दीजिये। इंटेंशनल एक्शन का जादू यही है कि यह आपको कम मेहनत में ज्यादा रिजल्ट्स देता है क्योंकि आपकी पूरी एनर्जी एक लेजर की तरह एक ही पॉइंट पर फोकस होती है।
लेसन ३ : एनर्जी मैनेजमेंट न कि टाइम मैनेजमेंट
क्या आपने कभी गौर किया है कि कुछ लोग दिन में १८ घंटे काम करके भी चिड़चिड़े और थके हुए रहते हैं। वहीं कुछ लोग सिर्फ ४-५ घंटे काम करते हैं और फिर भी वे दुनिया बदल देते हैं। क्या उनके पास कोई जादुई घड़ी है। बिल्कुल नहीं। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि टाइम मैनेजमेंट एक पुराना और बेकार कॉन्सेप्ट है। समय तो सबके लिए बराबर है। आप समय को मैनेज नहीं कर सकते। आप सिर्फ अपनी एनर्जी को मैनेज कर सकते हैं। अगर आपकी बैटरी ही लो है तो आप पूरे दिन कंप्यूटर के सामने बैठे रहें पर आपका दिमाग बस रील ही स्क्रॉल करेगा।
हम अक्सर खुद को एक मशीन की तरह ट्रीट करते हैं। हमें लगता है कि अगर हम अपनी नींद कम कर देंगे या खाना स्किप कर देंगे तो हम ज्यादा काम कर पाएंगे। पर सच तो यह है कि बिना एनर्जी के आपका काम क्वालिटी वाला नहीं बल्कि बस खानापूर्ति होता है। कूपर यहाँ समझाते हैं कि आपकी सफलता इस बात पर टिकी है कि आप अपनी मानसिक और शारीरिक ऊर्जा का इस्तेमाल कैसे करते हैं। जब आपकी एनर्जी हाई होती है तो आप एक घंटे में वह काम कर लेते हैं जो लो एनर्जी में शायद पांच घंटों में भी न हो पाए। असली रेस घंटों की नहीं बल्कि आपके फोकस की इंटेंसिटी की है।
विकास नाम का एक फ्रीलांसर है। विकास को लगता है कि रात भर जागकर काम करना ही असली स्ट्रगल है। वह रात के २ बजे तक काम करता है। सुबह १० बजे वह एक सोम्बी की तरह उठता है। उसका सिर भारी है और वह पूरे दिन कॉफी पीकर खुद को धक्का देता रहता है। उसे लगता है कि वह बहुत मेहनती है। पर हकीकत में उसका दिमाग आधे से ज्यादा समय धुंध में रहता है। वह छोटी सी ईमेल लिखने में भी एक घंटा लगा देता है। वहीं उसकी दोस्त नेहा है जो रात को १० बजे सोती है और सुबह जल्दी उठकर अपनी हाई एनर्जी का इस्तेमाल सबसे मुश्किल काम के लिए करती है। नेहा दोपहर तक अपना सारा काम खत्म करके मजे़ से जिम जाती है। विकास को लगता है नेहा किस्मत वाली है पर असल में नेहा एनर्जी मैनेजमेंट की मास्टर है।
ज्यादातर लोग अपनी एनर्जी उन चीजों में बर्बाद कर देते हैं जो उनके कंट्रोल में ही नहीं हैं। जैसे ऑफिस की पॉलिटिक्स या किसी दोस्त ने मैसेज का रिप्लाई क्यों नहीं किया। यह सब आपकी मेंटल बैटरी ड्रेन करने वाले ऐप्स हैं। रॉबर्ट कूपर कहते हैं कि अपनी एनर्जी को बचाना और उसे सही जगह निवेश करना ही एक लीडर की पहचान है। आपको यह पहचानना होगा कि दिन के किस समय आप सबसे ज्यादा एक्टिव महसूस करते हैं। उस कीमती समय को किसी फालतू काम या मीटिंग में बर्बाद मत कीजिये। उसे अपने सबसे बड़े ड्रीम के लिए बचा कर रखिये।
क्या आप भी अपनी बैटरी को फालतू के तमाशे और नेगेटिविटी में खर्च कर रहे हैं। अगर आपकी एनर्जी जीरो है तो आपका टैलेंट भी जीरो ही माना जाएगा। कूपर की यह सलाह मानिये और अपनी एनर्जी को एक बैंक बैलेंस की तरह समझिये। इसे सोच-समझकर खर्च कीजिये। जब आप अपनी ऊर्जा को संभालना सीख जाते हैं तब आप सिर्फ काम नहीं करते बल्कि आप कमाल करते हैं। यह लेसन हमें याद दिलाता है कि लाइफ कोई लंबी दूरी की पैदल यात्रा नहीं है बल्कि यह छोटे-छोटे हाई-एनर्जी स्प्रिंट्स का एक कॉम्बिनेशन है। अपनी बैटरी चार्ज रखिये और देखिये कैसे आप दूसरों से मीलों आगे निकल जाते हैं।
गेट आउट ऑफ योर ओन वे सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि एक चेतावनी है। रॉबर्ट कूपर हमें साफ शब्दों में कह रहे हैं कि अगर आप अपनी लाइफ में फेल होते हैं तो उसके जिम्मेदार आप खुद होंगे। हमने सीखा कि कैसे अपनी इनर लिमिट्स को तोड़ना है। कैसे इंटेंशनल होना है और कैसे अपनी एनर्जी को बचाना है। अब गेंद आपके पाले में है। क्या आप आज भी वही पुराने बहाने बनाएंगे या फिर अपने रास्ते से हटकर अपनी सक्सेस को रास्ता देंगे। फैसला आपका है। उठिये और आज ही अपनी उस एक लिमिट को तोड़िये जिसने आपको सालों से जकड़ रखा है। आपकी असली उड़ान अभी बाकी है।
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