क्या आप अभी भी वही पुराने घिसे-पिटे लॉजिक और बहस से लोगों को मनाने की कोशिश कर रहे हैं? बधाई हो, आप अपनी लाइफ की हर अच्छी डील और कीमती रिश्ते को खुद अपने हाथों से बर्बाद कर रहे हैं। सच तो यह है कि बिना सही नेगोशिएशन स्किल्स के आप दुनिया के लिए सिर्फ एक आसान शिकार हैं जिसे हर कोई बेवकूफ बना रहा है।
स्टुअर्ट डायमंड की बुक गेटिंग मोर हमें सिखाती है कि असल दुनिया में जीत बहस से नहीं बल्कि इमोशन्स और सही स्ट्रेटेजी से मिलती है। चलिए इस आर्टिकल में उन ३ पावरफुल लेसन को समझते हैं जो आपकी पूरी लाइफ को ट्रांसफॉर्म कर देंगे।
लेसन १ : इमोशन्स ही असली पावर हैं
अगर आप सोचते हैं कि नेगोशिएशन का मतलब सिर्फ डेटा, फैक्ट्स और लॉजिक की लड़ाई है, तो यकीन मानिए आप किसी दूसरी ही दुनिया में जी रहे हैं। स्टुअर्ट डायमंड कहते हैं कि इंसान कोई कैलकुलेटर नहीं है जो सिर्फ नंबर्स देखकर मान जाए। असल में इंसान एक इमोशनल गुब्बारा है जिसे बस एक सही पिन की जरूरत होती है। जब आप किसी दुकान पर डिस्काउंट मांगते हैं या ऑफिस में सैलरी बढ़ाने की बात करते हैं, तो वहां आपका गणित नहीं बल्कि आपका व्यवहार काम आता है। अगर आप सामने वाले को गुस्सा दिला रहे हैं या खुद चिढ़ रहे हैं, तो समझ लीजिए कि आपने डील होने से पहले ही खो दी है।
मान लीजिए आप एक फ्लाइट पकड़ने के लिए एयरपोर्ट पहुंचे हैं और पता चलता है कि काउंटर बंद हो चुका है। अब आपके पास दो रास्ते हैं। पहला यह कि आप वहां खड़े स्टाफ पर चिल्लाना शुरू कर दें, उन्हें उनकी कंपनी की पॉलिसी समझाएं और खुद को बहुत बड़ा आदमी दिखाएं। नतीजा? वो स्टाफ आपको सिक्योरिटी से बाहर फिंकवा देगा और आप एयरपोर्ट की बेंच पर सोएंगे। दूसरा रास्ता है गेटिंग मोर वाला तरीका। आप उस स्टाफ की परेशानी को समझते हैं। आप देखते हैं कि वो इंसान सुबह से खड़ा है और सैकड़ों चिढ़े हुए यात्रियों को झेल चुका है। आप शांति से उसके पास जाते हैं और कहते हैं कि मुझे पता है कि आज का दिन आपके लिए बहुत थका देने वाला रहा होगा और आप बस अपना काम ईमानदारी से कर रहे हैं। जब आप उसके प्रति सहानुभूति दिखाते हैं, तो आप उसके दिमाग के तार्किक हिस्से को नहीं बल्कि उसके दिल को छूते हैं। अक्सर ऐसे मामलों में लोग नियम तोड़कर भी आपकी मदद कर देते हैं क्योंकि आपने उन्हें एक मशीन नहीं बल्कि एक इंसान की तरह ट्रीट किया।
कुछ लोग नेगोशिएशन की टेबल पर ऐसे बैठते हैं जैसे वो कोई वर्ल्ड वॉर लड़ने आए हों। अरे भाई, आप वहां डील क्लोज करने गए हैं, सामने वाले का कत्ल करने नहीं। अगर आप अपनी ईगो को घर पर छोड़कर नहीं जा सकते, तो बेहतर है कि आप घर पर ही बैठें और अकेले ही बहस करें। जब आप इमोशन्स को कंट्रोल करना सीख जाते हैं, तो आप सामने वाले के गुस्से को भी शांत कर सकते हैं। स्टुअर्ट डायमंड के अनुसार, सामने वाला क्या कह रहा है उससे ज्यादा जरूरी यह है कि वो क्या महसूस कर रहा है। अगर आप उसके डर या उसकी जरूरत को पहचान लेते हैं, तो चाबियां आपके हाथ में होती हैं। नेगोशिएशन कोई जंग नहीं है जिसे जीतना है, यह एक डांस है जिसमें आपको सामने वाले के स्टेप्स के साथ तालमेल बिठाना होता है।
लेसन २ : पार्टनरशिप और कोलैबोरेशन ही असली जीत है
दुनिया में ज्यादातर लोगों को लगता है कि नेगोशिएशन एक जीरो-सम गेम है यानी अगर मैं जीतूंगा तो सामने वाले को हारना ही पड़ेगा। लोग ऐसे सौदेबाजी करते हैं जैसे वो किसी पुरानी फिल्म के विलेन हों जो हर चीज अपने कब्जे में लेना चाहते हैं। स्टुअर्ट डायमंड कहते हैं कि यह एप्रोच आपको एक बार तो फायदा दिला सकती है, लेकिन लंबे समय में आप अकेले और कंगाल रह जाएंगे। असली नेगोशिएशन का मतलब यह नहीं है कि आप सामने वाले की जेब से आखिरी सिक्का भी छीन लें, बल्कि इसका मतलब एक ऐसी पार्टनरशिप बनाना है जहां दोनों लोग मुस्कुराते हुए टेबल से उठें। जब आप किसी को हराने की कोशिश करते हैं, तो आप एक दुश्मन बनाते हैं, और बिजनेस की दुनिया में एक दुश्मन आपकी दस जीतों पर भारी पड़ सकता है।
सोचिए आप एक फ्रीलांस ग्राफिक डिजाइनर हैं और एक क्लाइंट आपके पास आता है। वो आपसे बहुत कम पैसों में काम कराना चाहता है। अब एक तरीका तो यह है कि आप उस पर चिल्लाएं और उसे बताएं कि आपकी कला की क्या कीमत है। आप शायद बहस जीत जाएं, पर क्लाइंट हाथ से निकल जाएगा। दूसरा तरीका है कोलैबोरेशन का। आप उससे पूछते हैं कि उसका बजट कम क्यों है? शायद उसे सिर्फ एक बेसिक लोगो चाहिए, हाई-एंड ब्रांडिंग नहीं। आप उसे एक ऐसा ऑप्शन देते हैं जो उसके बजट में भी हो और आपकी मेहनत का भी उसे पूरा फल मिले। अब आप उसके लिए एक वेंडर नहीं बल्कि एक पार्टनर बन गए हैं। अगली बार जब उसके पास बड़ा बजट होगा, तो वो सबसे पहले आपके पास ही आएगा। कुछ लोग इतने महान होते हैं कि वो पांच रुपये बचाने के चक्कर में पांच साल पुराना रिश्ता दांव पर लगा देते हैं। ऐसे लोगों को देखकर लगता है कि शायद इन्होंने अपनी अकल किसी सेल में आधी कीमत पर बेच दी है।
सच्चाई तो यह है कि जब आप सामने वाले के गोल को अपना गोल बना लेते हैं, तो नेगोशिएशन खत्म हो जाता है और कोलैबोरेशन शुरू होता है। अगर आप सिर्फ अपने फायदे के बारे में सोच रहे हैं, तो आप नेगोशिएटर नहीं बल्कि एक लुटेरे हैं। स्टुअर्ट डायमंड हमें सिखाते हैं कि हमें हमेशा यह पूछना चाहिए कि हम साथ मिलकर और क्या बड़ा कर सकते हैं। जब आप अपनी जीत में दूसरे का हिस्सा भी ढूंढ लेते हैं, तो लोग आपके साथ काम करने के लिए लाइनों में खड़े होते हैं। याद रखिए, टेबल के दूसरी तरफ बैठा व्यक्ति आपका विरोधी नहीं है, वो एक समस्या को सुलझाने में आपका पार्टनर है। अगर आप उसे नीचा दिखाकर खुश हो रहे हैं, तो यकीन मानिए आपकी जीत बहुत छोटी और आपकी सोच बहुत संकरी है। एक अच्छा पार्टनर हमेशा लंबी रेस का घोड़ा होता है।
लेसन ३ : छोटे कदम और कंसिस्टेंसी ही असली मैजिक है
ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को किसी बड़े ड्रामेटिक सीन की तरह देखते हैं, जैसे किसी फिल्म में हीरो आखिरी सेकंड में कोई बड़ी डील साइन कर लेता है। लेकिन स्टुअर्ट डायमंड कहते हैं कि असल जिंदगी फिल्मों की तरह नहीं चलती। असल दुनिया में सफलता रातों-रात नहीं बल्कि छोटे-छोटे कदमों से मिलती है। इसे इंक्रीमेंटल प्रोग्रेस कहते हैं। अगर आप सीधे ही पहाड़ चढ़ने की कोशिश करेंगे, तो आपके पैर ही टूटेंगे। लेकिन अगर आप एक-एक कदम सावधानी से रखेंगे, तो आप एवरेस्ट भी फतह कर सकते हैं। लाइफ में जब आप किसी बड़े गोल के पीछे भागते हैं, तो अक्सर आप डर जाते हैं या हार मान लेते हैं। गेटिंग मोर का सीक्रेट यह है कि आप बड़ी चीज को छोटे-छोटे टुकड़ों में बांट दें।
मान लीजिए आप अपने ऑफिस में एक बहुत बड़ा प्रमोशन और ४०% की सैलरी हाइक चाहते हैं। अगर आप सीधे बॉस के केबिन में घुसकर कहेंगे कि आज ही मेरी सैलरी बढ़ाओ वरना मैं नौकरी छोड़ रहा हूं, तो बॉस आपको दरवाजा दिखाने में एक मिनट भी नहीं लगाएगा। यह नेगोशिएशन नहीं, सुसाइड है। समझदार इंसान क्या करेगा? वो छोटे कदम उठाएगा। पहले महीने वो अपने काम की क्वालिटी बढ़ाएगा। दूसरे महीने वो किसी ऐसे प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी लेगा जिसे कोई नहीं छूना चाहता। तीसरे महीने वो बॉस से फीडबैक मांगेगा। जब आप धीरे-धीरे अपनी वैल्यू बढ़ाते हैं, तो सैलरी बढ़ाना बॉस की मजबूरी बन जाती है, चॉइस नहीं। कुछ लोगों को लगता है कि वो एक ही दिन में दुनिया जीत लेंगे। भाई, रोम एक दिन में नहीं बना था, तो आपकी किस्मत एक ही झटके में कैसे चमक जाएगी? अगर आप बिना मेहनत के सब कुछ अभी के अभी चाहते हैं, तो शायद आपको किसी जादुई चिराग की जरूरत है, किताब की नहीं।
कुछ लोग इतने अधीर होते हैं कि उन्हें बीज बोते ही फल चाहिए होता है। अगर आप नेगोशिएशन के दौरान भी यही जल्दबाजी दिखाते हैं, तो आप अपनी पोजीशन को कमजोर कर देते हैं। स्टुअर्ट डायमंड कहते हैं कि हमेशा अपने गोल पर नजर रखें, लेकिन वहां तक पहुंचने के लिए छोटे समझौतों से पीछे न हटें। आज अगर आप थोड़ा पीछे हटते हैं ताकि कल आप दस कदम आगे बढ़ सकें, तो यह हार नहीं बल्कि एक सोची-समझी स्ट्रेटेजी है। जब आप लगातार छोटे-छोटे सही फैसले लेते हैं, तो उनका असर मिलकर एक बड़े बदलाव का रूप ले लेता है। कंसिस्टेंसी का मतलब यह नहीं है कि आप हर बार जीतें, बल्कि इसका मतलब है कि आप हर बार टेबल पर टिके रहें। जो अंत तक टिका रहता है, वही सबसे बड़ा इनाम घर ले जाता है।
तो दोस्तों, गेटिंग मोर सिर्फ एक किताब नहीं है, यह जिंदगी को एक नए नजरिए से देखने का तरीका है। चाहे वो आपके इमोशन्स हों, आपकी पार्टनरशिप हो या आपके छोटे-छोटे कदम, हर चीज मायने रखती है। अब समय है कि आप अपनी ईगो को साइड में रखें और दूसरों के साथ जुड़ना शुरू करें। आज ही अपनी लाइफ के किसी एक छोटे से मामले में इन टेक्निक्स को आजमाएं और देखें कि दुनिया आपके लिए कैसे बदलती है। क्या आप आज से ही एक बेहतर नेगोशिएटर बनने के लिए तैयार हैं? नीचे कमेंट्स में बताएं कि आप कौन सा लेसन सबसे पहले अपनी लाइफ में लागू करेंगे। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो हमेशा बहस में तो जीत जाते हैं पर रिश्ते हार जाते हैं।
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