क्या आप भी अपनी कमजोरियों को सुधारने के चक्कर में अपनी लाइफ झंड कर रहे हैं? बधाई हो, आप उस भीड़ का हिस्सा हैं जो गधे की तरह मेहनत तो करती है पर हाथ कुछ नहीं आता। अपनी स्ट्रेंथ को धूल खाने के लिए छोड़कर आप अपनी बर्बादी की स्क्रिप्ट खुद लिख रहे हैं।
पर टेंशन मत लीजिए। आज हम मार्कस बकिंघम की इस किताब से वो तरीके सीखेंगे जो आपको एवरेज से लीजेंड बनाएंगे। चलिए जानते हैं वो 3 लेसन जो आपकी परफॉरमेंस में चार चाँद लगा देंगे और आपको करियर का किंग बनाएंगे।
लेसन १ : अपनी स्ट्रेंथ को सही से डिफाइन करना
दोस्तो, हम में से ज्यादातर लोग एक बहुत बड़ी गलतफहमी में जीते हैं। हमें लगता है कि जिस काम में हम अच्छे हैं, वही हमारी ताकत या स्ट्रेंथ है। अगर आप एक्सेल शीट बनाने में माहिर हैं पर उसे देखते ही आपका जी घबराने लगता है, तो यकीन मानिए वो आपकी स्ट्रेंथ नहीं बल्कि एक सजा है। मार्कस बकिंघम कहते हैं कि स्ट्रेंथ का मतलब सिर्फ काबिलियत नहीं होता। असली स्ट्रेंथ वो काम है जिसे करने से पहले आप एक्साइटेड होते हैं, जिसे करते समय आप टाइम भूल जाते हैं और जिसे खत्म करने के बाद आप खुद को रिचार्ज महसूस करते हैं।
जरा सोचिए, उस शर्मा जी के लड़के के बारे में जो कोडिंग में तो उस्ताद है पर हर सोमवार को ऑफिस जाने के नाम पर ऐसा चेहरा बनाता है जैसे उसे फांसी की सजा सुना दी गई हो। उसे लगता है कि कोडिंग उसकी स्ट्रेंथ है क्योंकि उसके बॉस उसकी तारीफ करते हैं। पर सच तो ये है कि वो काम उसकी आत्मा को धीरे धीरे मार रहा है। वो बस एक स्किल्ड मजदूर बनकर रह गया है। अगर आप किसी काम में बहुत अच्छे हैं पर वो काम आपकी सारी एनर्जी चूस लेता है, तो भाई साहब, आप गलत रास्ते पर दौड़ रहे हैं। आप बस अपनी लाइफ के कीमती साल उस काम को दे रहे हैं जो आपको अंदर से खोखला कर रहा है।
मार्केट में ये झूठ फैलाया गया है कि अपनी कमजोरियों पर काम करो और उन्हें अपनी ताकत बनाओ। ये सुनकर ऐसा लगता है जैसे कोई मछली को पेड़ पर चढ़ना सिखा रहा हो। मछली चाहे कितनी भी मोटिवेशनल वीडियो देख ले या संडे को एक्स्ट्रा क्लास ले ले, वो बंदर को पेड़ पर चढ़ने में कभी नहीं हरा पाएगी। अपनी स्ट्रेंथ को पहचानने का मतलब है अपनी उस इनर कॉलिंग को समझना जो आपको थकाती नहीं बल्कि दौड़ाती है। जब आप अपनी स्ट्रेंथ को पहचान लेते हैं, तो आपका कॉन्फिडेंस सातवें आसमान पर होता है। आप काम नहीं कर रहे होते बल्कि आप खेल रहे होते हैं।
असली सक्सेस पाने के लिए आपको ये समझना होगा कि आपकी स्ट्रेंथ क्या है और क्या नहीं। जो काम आपको बोर करता है या जिसे टालने के लिए आप सौ बहाने ढूंढते हैं, वो आपकी कमजोरी है, भले ही आप उसमें कितने भी परफेक्ट क्यों न हों। अपनी इस एनर्जी को पहचानिए क्योंकि यही वो सीक्रेट सॉस है जो आपको भीड़ से अलग खड़ा करेगा। वरना एवरेज बने रहकर पूरी जिंदगी दूसरों की तरक्की पर तालियां बजाना तो बहुत आसान है। अपनी स्ट्रेंथ को गले लगाइए और देखिए कैसे आपकी परफॉरमेंस रॉकेट की तरह ऊपर जाती है।
लेसन २ : अपनी कमजोरियों को मैनेज करना
अक्सर हमारे बड़े बुजुर्ग और वो सो कॉल्ड मोटिवेशनल गुरु हमें यह पट्टी पढ़ाते हैं कि बेटा अपनी कमजोरियों को अपनी ताकत बनाओ। सुनने में यह बात बहुत फिल्मी और अच्छी लगती है पर प्रैक्टिकल लाइफ में यह सबसे बड़ा झूठ है। मार्कस बकिंघम कहते हैं कि अपनी कमजोरियों को सुधारने में अपनी पूरी जवानी झोंक देना वैसे ही है जैसे किसी फटे हुए टायर में हवा भरने की कोशिश करना। आप चाहे कितनी भी हवा भर लें, गाड़ी कभी तेज नहीं दौड़ेगी। आपको अपनी कमजोरियों को सुधारना नहीं है बल्कि उन्हें सिर्फ मैनेज करना है ताकि वो आपकी तरक्की के बीच में स्पीड ब्रेकर न बनें।
मान लीजिए आपको पब्लिक स्पीकिंग से डर लगता है और आपका पसीना छूटने लगता है। अब आप दिन रात शीशे के सामने खड़े होकर चिल्ला रहे हैं और खुद को कोस रहे हैं। इससे होगा ये कि आप एक एवरेज स्पीकर तो शायद बन जाएं पर तब तक आप अपनी उन असली खूबियों को खो चुके होंगे जो आपको यूनिक बनाती हैं। असली स्मार्टनेस इसमें है कि आप अपनी कमजोरी को पहचानें और उसका कोई जुगाड़ निकालें। अगर आपको डेटा एंट्री से नफरत है और वो आपका सिर दर्द कर देती है, तो उसे अपनी ताकत बनाने की कोशिश में खुद को टॉर्चर मत कीजिए। या तो उस काम को किसी ऐसे इंसान को दे दीजिए जिसे वो पसंद हो, या फिर किसी टूल का सहारा लीजिए जो आपका काम आसान कर दे।
लोग अक्सर अपनी कमियों को छुपाने या उन्हें ठीक करने में इतने बिजी हो जाते हैं कि वो अपनी स्ट्रेंथ को पॉलिश करना ही भूल जाते हैं। यह वैसा ही है जैसे कोई क्रिकेटर अपनी बैटिंग छोड़कर बस अपनी खराब बॉलिंग सुधारने में लगा रहे। अंत में वो न अच्छा बैट्समैन रह जाता है और न ही बॉलर। आपको अपनी कमजोरी को बस उस लेवल तक संभालना है जहां वो आपको डूबा न दे। बाकी सारा टाइम और एनर्जी अपनी स्ट्रेंथ पर लगाइए। जब आप अपनी कमजोरियों को मैनेज करना सीख जाते हैं, तो आपके कंधे से एक बहुत बड़ा बोझ उतर जाता है। आप खुद को फ्री महसूस करते हैं।
याद रखिए, दुनिया आपके परफेक्ट होने का इंतजार नहीं कर रही है। दुनिया आपकी उस एक खूबी की दीवानी है जो आपको सबसे अलग बनाती है। अपनी कमियों को लेकर रोना बंद कीजिए और उन्हें साइड में रखकर अपनी असली ताकत पर फोकस कीजिए। जब आप अपनी कमजोरियों के गुलाम नहीं रहते, तभी आप अपने काम के असली लीडर बन पाते हैं। यह माइंडसेट शिफ्ट ही आपको उस लेवल पर ले जाएगा जहां लोग आपकी कमियों को नजरअंदाज कर के सिर्फ आपकी सफलता के चर्चे करेंगे।
लेसन ३ : हर हफ्ते स्ट्रेंथ पर फोकस करना
दोस्तो, अब तक आपने अपनी स्ट्रेंथ पहचान ली और कमजोरियों को ठिकाने लगाना भी सीख लिया। पर क्या इतना काफी है? बिल्कुल नहीं। असली खेल तो कंसिस्टेंसी का है। मार्कस बकिंघम कहते हैं कि अपनी स्ट्रेंथ को काम में लाना कोई एक दिन का इवेंट नहीं है बल्कि यह एक वीकली प्रैक्टिस है। अगर आप सोच रहे हैं कि एक बार यह बुक पढ़ ली और अब लाइफ सेट है, तो आप उसी भ्रम में जी रहे हैं जिसमें वो लोग जीते हैं जो नए साल पर जिम की मेंबरशिप लेते हैं और दस जनवरी तक रजाई में सोए मिलते हैं। आपको हर हफ्ते अपनी स्ट्रेंथ को पॉलिश करना होगा।
जरा अपनी डेली लाइफ की भागदौड़ को देखिए। मंडे को ऑफिस पहुंचते ही ईमेल का पहाड़ और मीटिंग्स का शोर आपको अपनी स्ट्रेंथ से दूर खींचने लगता है। आप बस आग बुझाने में लग जाते हैं और दिन खत्म होते होते खुद को मरा हुआ महसूस करते हैं। यह इसलिए होता है क्योंकि आपने अपने हफ्ते को अपनी शर्तों पर डिजाइन नहीं किया। स्मार्ट लोग हर हफ्ते की शुरुआत में यह तय करते हैं कि वो अपनी स्ट्रेंथ से जुड़ा कम से कम एक या दो काम जरूर करेंगे। अगर आपकी स्ट्रेंथ राइटिंग है, तो चाहे दुनिया इधर की उधर हो जाए, आप हफ्ते में कुछ घंटे सिर्फ लिखने के लिए निकालेंगे।
यह सुनने में शायद बहुत छोटा लगे, पर यही वो छोटी जीत है जो आपको बड़े रिजल्ट देती है। जब आप हर हफ्ते अपनी पसंद का और अपनी स्ट्रेंथ वाला काम करते हैं, तो आपका मोमेंटम बना रहता है। आप उस एम्प्लॉई की तरह नहीं होते जो बस घड़ी की सुइयां देखता है कि कब पांच बजेंगे और कब वो इस जेल से भागेगा। बल्कि आप उस खिलाड़ी की तरह होते हैं जो हर हफ्ते अपने खेल को बेहतर बनाने के लिए मैदान में उतरता है। अगर आप अपनी स्ट्रेंथ को इग्नोर करेंगे, तो आपकी स्किल्स में जंग लग जाएगा और आप फिर से उसी एवरेज भीड़ का हिस्सा बन जाएंगे जिससे आप भागना चाहते थे।
अपनी स्ट्रेंथ को काम में लाना एक चॉइस है जो आपको हर हफ्ते लेनी पड़ती है। यह वैसा ही है जैसे अपनी पसंदीदा डिश बनाना, जिसमें मेहनत तो लगती है पर स्वाद लाजवाब आता है। अपनी लाइफ की स्टियरिंग खुद संभालिए और हर हफ्ते अपनी काबिलियत का लोहा मनवाइए। जब आप लगातार अपनी स्ट्रेंथ पर फोकस करते हैं, तो आप सिर्फ काम नहीं करते बल्कि आप एक लीगेसी बना रहे होते हैं। तो देर किस बात की? अपनी स्ट्रेंथ को काम पर लगाइए और दुनिया को दिखा दीजिए कि आप किस मिट्टी के बने हैं। अब समय है खुद को बदलने का और एक ऐसी लाइफ जीने का जहां आप हर दिन जीतते हैं।
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