अगर आपको लगता है कि एनवायरनमेंट की फिक्र करना सिर्फ एक्टिविस्ट्स का काम है तो मुबारक हो आप अपनी कंपनी को डुबाने की तैयारी कर रहे हैं। जबकि स्मार्ट बिजनेस ग्रीन होकर करोड़ों छाप रहे हैं आप पुरानी सोच पकड़कर बैठे हैं। क्या सच में आपको अपने प्रॉफिट से नफरत है?
आज के दौर में जो बिजनेस सस्टेनेबिलिटी को मजाक समझता है मार्केट उसे कचरे के डब्बे में डाल देता है। डेनियल एस्टी की बुक ग्रीन टू गोल्ड हमें सिखाती है कि कैसे नेचर और प्रॉफिट साथ चल सकते हैं। आइये जानते हैं वो ३ लेसन जो आपकी सोच बदल देंगे।
लेसन १ : द ई वेव का सही इस्तेमाल
आजकल के जमाने में अगर आप सोचते हैं कि बिजनेस का मतलब सिर्फ सामान बेचना और पैसे बटोरना है तो भाई आप अभी भी दादा आदम के जमाने में जी रहे हैं। मार्केट में एक बहुत बड़ी लहर चल रही है जिसे डेनियल एस्टी ई वेव कहते हैं। यहाँ ई का मतलब सिर्फ एनवायरनमेंट नहीं है बल्कि यह आपकी ईगो और अर्निंग्स दोनों से जुड़ा है। अक्सर इंडिया में छोटे से लेकर बड़े दुकानदार तक यही सोचते हैं कि अरे भाई यह प्रदूषण और कचरे वाली बातें तो बड़े देशों के चोंचले हैं। हमें तो बस सेल से मतलब है। लेकिन सच तो यह है कि यह लहर अब सुनामी बन चुकी है। जो बिजनेस इस लहर पर सवारी करना सीख गया वो तो पार निकल गया लेकिन जो इसे नजरअंदाज कर रहा है वो बस डूबने का इंतज़ार करे।
सोचिये आप एक ऐसी कंपनी चला रहे हैं जो प्लास्टिक के खिलौने बनाती है। अचानक सरकार नया कानून लाती है या आपके कस्टमर्स को लगने लगता है कि भाई यह तो धरती को गंदा कर रहे हैं। अब आप बैठकर रोना रो सकते हैं कि हाय मेरा धंधा चौपट हो गया। या फिर आप स्मार्ट बन सकते हैं और इसे एक मौके की तरह देख सकते हैं। ई वेव का मतलब यही है कि आप एनवायरनमेंट से जुड़े दबावों को अपनी ताकत बना लें। जब आप कुछ ऐसा करते हैं जो दुनिया के लिए अच्छा है तो लोग आपको सिर्फ एक कंपनी नहीं बल्कि एक मसीहा की तरह देखते हैं। और यकीन मानिये आज का कस्टमर मसीहाओं को दिल खोलकर पैसे देता है।
मान लो शर्मा जी का एक रेस्टोरेंट है। वो पहले खूब सारा प्लास्टिक इस्तेमाल करते थे। अब लोग उनके पास आना कम कर रहे हैं क्योंकि सबको पता है कि प्लास्टिक सेहत के लिए जहर है। अब शर्मा जी ने क्या किया? उन्होंने सारा प्लास्टिक हटाकर मिट्टी के कुल्हड़ और पत्तों वाली प्लेट्स शुरू कर दीं। अब लोग वहाँ सिर्फ खाना खाने नहीं जाते बल्कि इस फीलिंग के लिए जाते हैं कि वो कुछ अच्छा कर रहे हैं। शर्मा जी ने क्या किया? उन्होंने एनवायरनमेंट की लहर को पकड़ा और अपने कॉम्पिटिटर्स को पीछे छोड़ दिया। जो कॉम्पिटिटर्स अभी भी प्लास्टिक की चम्मचें धो रहे हैं वो बस देखते रह गए।
यह सब सुनने में बहुत आसान लगता है पर इसके लिए जिगरा चाहिए। आपको अपने पुराने तरीकों को आग लगानी पड़ती है। ई वेव का फायदा उठाने का मतलब है कि आप आने वाले कल को आज ही देख लें। अगर आप आज नहीं बदले तो कल कानून आपको बदल देगा और तब आपके पास सिर्फ पछतावा बचेगा। मार्केट बहुत जालिम है बॉस। यहाँ वही टिकता है जो वक्त से पहले अपनी चाल चल देता है। एनवायरनमेंट को एक समस्या समझना बंद करिये और इसे प्रॉफिट बनाने का सबसे बड़ा हथियार बनाइये। जब आप नेचर का ख्याल रखते हैं तो ऊपर वाला और नीचे वाले कस्टमर्स दोनों आपका ख्याल रखते हैं।
लेसन २ : इको एफिशिएंसी यानी कचरे से कंचन बनाना
ई वेव को समझने के बाद अब बारी आती है अपने घर की सफाई करने की। देखिए इंडिया में हम सबको लगता है कि हम बड़े कंजूस हैं। हम टूथपेस्ट को तब तक बेलन से पेलते हैं जब तक वो दम न तोड़ दे। लेकिन जब बात बिजनेस की आती है तो हम बहुत सारी चीजें बर्बाद कर देते हैं। डेनियल एस्टी इसे इको एफिशिएंसी कहते हैं। सीधे शब्दों में कहें तो कम खर्च में ज्यादा माल बनाना। अगर आपकी फैक्ट्री से बहुत सारा धुआं या गंदा पानी निकल रहा है तो समझ जाइये कि वो सिर्फ पोल्यूशन नहीं है बल्कि वो आपका उड़ता हुआ पैसा है। आप हवा में नोट उड़ा रहे हैं और आपको लग रहा है कि आप काम कर रहे हैं।
सोचिये आप एक कपड़ा बनाने वाली मिल के मालिक हैं। आप हर महीने लाखों का पानी और बिजली फूक देते हैं। आपको लगता है कि यह तो बिजनेस का हिस्सा है। लेकिन असल में आप उन रिसोर्सेज को वेस्ट कर रहे हैं जो आपके प्रॉफिट को बढ़ा सकते थे। इको एफिशिएंसी का मतलब है अपने काम करने के तरीके को इतना स्मार्ट बनाना कि वेस्ट नाम की चीज ही न बचे। जब आप कम बिजली इस्तेमाल करते हैं या पानी को रिसाइकिल करते हैं तो आप सिर्फ धरती नहीं बचा रहे होते बल्कि आप अपना बैंक बैलेंस बढ़ा रहे होते हैं। यह तो वही बात हुई कि आम के आम और गुठलियों के भी दाम।
मान लो गुप्ता जी की एक मिठाई की दुकान है। वो हर दिन सैकड़ों किलो दूध उबलते हैं और उसकी गर्मी हवा में बेकार जाती है। अब गुप्ता जी ने एक स्मार्ट दिमाग लगाया और उस गर्मी को वापस पानी गरम करने के लिए इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। अब उन्हें बर्तन धोने के लिए अलग से गैस नहीं जलानी पड़ती। गुप्ता जी ने क्या किया? उन्होंने वेस्ट को अपनी जेब में डाल लिया। उनके पड़ोसी अभी भी गैस का बिल देखकर अपना सिर पीट रहे हैं। और गुप्ता जी अपनी बचत से नई गाड़ी की प्लानिंग कर रहे हैं। इसे कहते हैं दिमाग वाला बिजनेस।
अक्सर लोग कहते हैं कि भाई सस्टेनेबिलिटी बहुत महंगी होती है। अरे भाई महंगा तो आपका पुराना ढर्रा है। आप पुराने बल्ब जलाकर बिजली विभाग को अमीर बना रहे हैं और कहते हैं कि नया सिस्टम महंगा है। जो पैसा आप वेस्ट मैनेजमेंट या अच्छी टेक्नोलॉजी में लगाते हैं वो खर्चा नहीं बल्कि एक इन्वेस्टमेंट है जो आपको कई सालों तक फायदा देगा। अगर आप आज अपने वेस्ट को कम नहीं करेंगे तो एक दिन आपका बिजनेस ही वेस्ट बन जाएगा। इसलिए जाग जाइये और अपनी कंपनी के हर कोने को चेक करिये कि कहाँ आप फालतू पैसे बहा रहे हैं। एफिशिएंसी का मतलब सिर्फ मेहनत करना नहीं बल्कि अक्लमंदी से रिसोर्सेज को निचोड़ना है।
लेसन ३ : ग्रीन मार्केटिंग और इनोवेशन का असली खेल
जब आप ई वेव को समझ लेते हैं और अपनी कंपनी से कचरा साफ कर लेते हैं तो अब समय आता है पूरी दुनिया को चिल्लाकर बताने का। लेकिन रुकिए। इसका मतलब यह नहीं कि आप सिर्फ हरे रंग का डिब्बा बना दें और कहें कि हम इको फ्रेंडली हैं। लोग अब बहुत होशियार हो गए हैं। डेनियल एस्टी कहते हैं कि असली जादू तब होता है जब आप कुछ ऐसा नया बना देते हैं जो कस्टमर की प्रॉब्लम भी सॉल्व करे और धरती का भी भला करे। आज का जो २५ से ३४ साल वाला इंडियन है वो सिर्फ प्रोडक्ट नहीं खरीदता बल्कि वो एक कहानी और एक मकसद खरीदता है। अगर आपके प्रोडक्ट में वो दम नहीं है तो आप बस एक और आम दुकानदार बनकर रह जाएंगे।
इनोवेशन का मतलब यह नहीं है कि आप नासा वाले रॉकेट बनाएं। इसका मतलब है अपने प्रोडक्ट को ऐसे बदलना कि लोग कहें कि यार यह तो मुझे चाहिए ही चाहिए। जब आप कुछ हटकर करते हैं तो आप मार्केट की भीड़ से अलग हो जाते हैं। लोग आपको ज्यादा पैसे देने के लिए भी तैयार हो जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वो दुनिया सुधारने में अपना छोटा सा योगदान दे रहे हैं। और सच तो यह है कि इंडिया जैसे देश में जहाँ हर कोई जुगाड़ में लगा रहता है वहां अगर आप सही मायने में ग्रीन इनोवेशन ले आएं तो आप राजा बन सकते हैं। बस याद रखिये कि आपकी मार्केटिंग सच्ची होनी चाहिए वरना सोशल मीडिया पर लोग आपकी बैंड बजाने में देर नहीं लगाएंगे।
मान लो चड्ढा जी जूते बेचते हैं। मार्केट में हजारों जूतों की दुकानें हैं पर चड्ढा जी ने क्या किया? उन्होंने पुराने टायर और समुद्री प्लास्टिक से बने स्टाइलिश जूते बेचना शुरू किया। अब लोग सिर्फ जूता नहीं पहन रहे वो एक स्टेटमेंट दे रहे हैं। कॉलेज के लड़के चड्ढा जी के जूतों की फोटो इंस्टाग्राम पर डाल रहे हैं क्योंकि वो कूल है। चड्ढा जी के कॉम्पिटिटर अभी भी डिस्काउंट वाले बोर्ड लगा रहे हैं और चड्ढा जी बिना किसी सेल के अपना माल महंगे दामों पर बेच रहे हैं। चड्ढा जी ने जूते नहीं बेचे उन्होंने अपनी दूरदर्शी सोच बेची। इसे कहते हैं ग्रीन मार्केटिंग का असली जलवा।
अंत में बस इतना समझ लीजिये कि ग्रीन होना कोई मजबूरी नहीं बल्कि सबसे बड़ी लग्जरी और स्मार्टनेस है। अगर आप आज नहीं जागे तो कल आपका नाम उन कंपनियों की लिस्ट में होगा जो कभी बहुत बड़ी हुआ करती थीं पर अब इतिहास बन चुकी हैं। बिजनेस सिर्फ प्रॉफिट के लिए नहीं होता बल्कि एक छाप छोड़ने के लिए होता है। ग्रीन टू गोल्ड का रास्ता थोड़ा मुश्किल लग सकता है पर इसकी मंजिल सोने जैसी चमकती है। तो क्या आप तैयार हैं अपनी कंपनी को कल के भारत के लिए बदलने के लिए? याद रखिये वक्त किसी का इंतज़ार नहीं करता और नेचर भी नहीं।
दोस्तों, अगर आप भी अपने बिजनेस या करियर में वो बड़ा बदलाव देखना चाहते हैं तो आज ही अपनी सोच बदलिए। सिर्फ पैसे मत बचाइये बल्कि एक ऐसी दुनिया बनाइये जहाँ आने वाली पीढ़ियां भी आपको दुआ दें। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। कमेंट्स में बताएं कि आप अपने काम में कौन सा एक छोटा सा ग्रीन बदलाव आज ही शुरू करेंगे। जाइये और इस गोल्ड को हासिल कीजिये।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#BusinessGrowth #Sustainability #GreenToGold #Innovation #IndianBusiness
_