क्या आप भी अपनी घिसी पिटी एवरेज लाइफ से खुश हैं और चाहते हैं कि आपकी कंपनी भी बस दाल रोटी जितनी चलती रहे? अगर हां तो जिम कॉलिन्स की यह बुक आपके लिए बिल्कुल नहीं है क्योंकि शायद आपको महान बनने से ज्यादा डर लगता है।
गुड टू ग्रेट बुक के यह सीक्रेट्स आपको बताएंगे कि कैसे कुछ कंपनियां फर्श से अर्श पर पहुंच गईं और बाकी सब बस देखते रह गए। चलिए जानते हैं वह ३ पावरफुल लेसन जो आपकी सोच और बिजनेस दोनों को पूरी तरह बदल देंगे।
Lesson : लेवल ५ लीडरशिप - ईगो का विसर्जन और कंपनी का प्रदर्शन
अक्सर जब हम किसी बड़े लीडर के बारे में सोचते हैं, तो हमारे दिमाग में एक ऐसा इंसान आता है जो स्टेज पर खड़े होकर चिल्लाता है, महंगे सूट पहनता है और जिसकी ईगो कुतुब मीनार से भी ऊँची होती है। जिम कॉलिन्स कहते हैं कि अगर आप अपनी कंपनी को गुड से ग्रेट बनाना चाहते हैं, तो आपको इस दिखावे वाली लीडरशिप को कचरे के डिब्बे में डालना होगा। उन्होंने इसे लेवल ५ लीडरशिप का नाम दिया है। यह वो लोग होते हैं जो चुपचाप काम करते हैं, क्रेडिट दूसरों को देते हैं और गलती होने पर आईने में खुद को देखते हैं।
मान लीजिए आपके मोहल्ले में दो किराने की दुकानें हैं। एक दुकान का मालिक है शर्मा जी, जो हमेशा अपनी सफेद चमचमाती शर्ट और सोने की चेन दिखाकर सबको बताते रहते हैं कि उन्होंने यह एम्पायर कैसे खड़ा किया। वह हर वक्त स्टाफ पर चिल्लाते हैं ताकि सबको पता चले कि बॉस कौन है। दूसरी तरफ हैं गुप्ता जी, जो एकदम सादे कपड़ों में बैठते हैं। अगर कोई ग्राहक तारीफ करे तो वह कहते हैं कि यह सब उनके लड़कों की मेहनत है, और अगर कभी स्टॉक खत्म हो जाए तो वह चुपचाप अपनी गलती मानकर उसे ठीक करते हैं।
जिम कॉलिन्स की रिसर्च कहती है कि लॉन्ग टर्म में गुप्ता जी जैसे लोग ही अपनी दुकान को सुपरमार्केट की चेन बना पाते हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें अपनी फोटो अखबार में छपवाने से ज्यादा अपनी दुकान की क्वालिटी की फिक्र है। लेवल ५ लीडरशिप का मतलब यह नहीं कि आप दबे कुचले रहें, बल्कि इसका मतलब है कि आपके अंदर काम को लेकर एक ऐसी जिद्द हो जिसे पूरा करने के लिए आप अपने ईगो की बलि चढ़ा सकें।
भारत में भी हमने देखा है कि कई स्टार्टअप्स सिर्फ इसलिए डूब गए क्योंकि उनके फाउंडर्स को काम से ज्यादा अपनी पर्सनल ब्रांडिंग और पार्टीज की पड़ी थी। वह खुद को रॉकस्टार समझने लगे थे, जबकि कंपनी अंदर से खोखली हो रही थी। लेवल ५ लीडरशिप में मिरर और विंडो का एक कांसेप्ट है। जब सफलता मिलती है, तो महान लीडर खिड़की (विंडो) से बाहर देखता है और अपनी टीम को क्रेडिट देता है। लेकिन जब असफलता हाथ लगती है, तो वह आईने (मिरर) में देखता है और खुद को जिम्मेदार मानता है।
अगर आप भी अपनी लाइफ में या करियर में कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो सबसे पहले उस ईगो को टाटा बाय-बाय कहिए जो आपको लगता है कि आप अकेले ही सब कुछ संभाल लेंगे। महानता का रास्ता दिखावे से नहीं, बल्कि अनुशासन और विनम्रता से होकर गुजरता है। याद रखिए, अगर आप खुद को सबसे बड़ा दिखाने की कोशिश करेंगे, तो आपकी कंपनी कभी बड़ी नहीं हो पाएगी।
Lesson : हौजहॉग कांसेप्ट - फॉक्स की चालाकी नहीं, हौजहॉग की समझदारी
जिम कॉलिन्स ने एक बहुत ही मजेदार कहानी सुनाई है एक लोमड़ी और एक हौजहॉग की। लोमड़ी बहुत चालाक है, उसके पास हजार प्लान हैं, वह हर रोज नए तरीके से हौजहॉग पर हमला करती है। लेकिन हौजहॉग के पास सिर्फ एक ही सिंपल स्ट्रेटेजी है। जैसे ही लोमड़ी आती है, वह खुद को एक कांटेदार गेंद में बदल लेता है। लोमड़ी हार मान लेती है। लेसन यह है कि महान बनने के लिए आपको हजार चीजें करने की जरूरत नहीं है, बस एक चीज ऐसी ढूंढनी है जिसमें आप मास्टर बन सकें।
इस हौजहॉग कांसेप्ट के ३ सर्कल हैं। पहला, आप किस चीज के लिए बहुत ज्यादा पैशनेट हैं? दूसरा, आप दुनिया में किस काम में नंबर वन बन सकते हैं? और तीसरा, आपका पैसा कहाँ से आएगा यानी आपका इकोनॉमिक इंजन क्या है? जिस दिन आपने इन तीनों का तालमेल बैठा लिया, समझो आपकी चांदी ही चांदी है।
मान लीजिए आपका दोस्त राहुल एक नया ढाबा खोलता है। अब राहुल को लगता है कि उसे चालाक लोमड़ी बनना चाहिए। वह अपने मेन्यू में चाइनीज, इटालियन, साउथ इंडियन और यहां तक कि सुशी भी डाल देता है। उसे लगता है कि सब कुछ बेचूंगा तो अमीर बन जाऊंगा। नतीजा? उसके पास न तो अच्छी सांभर है और न ही बढ़िया पास्ता। लोग कंफ्यूज हैं और खाना एवरेज है।
वहीं दूसरी तरफ है 'पंडित जी की कचौड़ी'। पंडित जी को पता है कि वह दुनिया की बेस्ट कचौड़ी बना सकते हैं। उन्हें इस काम से प्यार है और कचौड़ी बेचकर अच्छा पैसा भी बन रहा है। वह सिर्फ कचौड़ी पर फोकस करते हैं। १० साल बाद राहुल का ढाबा बंद हो जाता है, लेकिन पंडित जी के शहर में ५ बड़े आउटलेट्स खुल चुके होते हैं। यह है हौजहॉग कांसेप्ट की पावर।
सफलता का मतलब हर चमकती हुई चीज के पीछे भागना नहीं है। आज के जमाने में लोग दो दिन कोडिंग करते हैं, फिर सोचते हैं कि यूट्यूब चैनल बना लूं, फिर लगता है कि शेयर मार्केट में पैसा लगा देता हूं। जिम कॉलिन्स कहते हैं कि यह लोमड़ी वाली सोच आपको गुड (एवरेज) तो रख सकती है, लेकिन ग्रेट कभी नहीं बनाएगी।
अगर आप किसी बिजनेस में हैं या करियर बना रहे हैं, तो रुकिए और सोचिए। क्या आप वह काम कर रहे हैं जिसमें आप दुनिया को टक्कर दे सकते हैं? या बस इसलिए कर रहे हैं क्योंकि बगल वाला शर्मा जी का लड़का भी वही कर रहा है? महान कंपनियां अपनी 'कोर स्ट्रेंथ' को पहचानती हैं और फिर दुनिया चाहे इधर की उधर हो जाए, वह अपने रास्ते से नहीं भटकतीं।
जब आप अपनी ताकत पर टिके रहते हैं, तो मुश्किल समय में भी आपका आत्मविश्वास नहीं डगमगाता। जिस तरह हौजहॉग को पता है कि उसके कांटे उसे हर हाल में बचा लेंगे, वैसे ही आपकी एक्सपर्टीज आपको मार्केट के हर कॉम्पिटिशन से बचा लेगी। इसलिए चालाकी छोड़िए और अपनी उस एक महान काबिलियत को ढूंढिए।
Lesson : पहले कौन फिर क्या - सही लोगों को बस में बिठाना
ज्यादातर लीडर्स और बिजनेस ओनर सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं? वह पहले एक बहुत बड़ा और चमकता हुआ विजन (मैप) तैयार करते हैं और फिर लोगों को अपनी बस में चढ़ाते हैं। जिम कॉलिन्स कहते हैं कि यह तरीका बिल्कुल गलत है। अगर आप गुड से ग्रेट जाना चाहते हैं, तो आपको पहले यह देखना होगा कि आपकी बस में कौन बैठा है।
सोचिए, आप एक बहुत लंबी रोड ट्रिप पर जा रहे हैं। आपने डिसाइड किया कि हम पहाड़ों में जाएंगे। आपने गाड़ी में पेट्रोल भरवाया और निकल पड़े। लेकिन आधे रास्ते में आपको पता चलता है कि आपके साथ जो लोग बैठे हैं, उन्हें पहाड़ों से नफरत है, उन्हें तो समंदर पसंद है। अब पूरी ट्रिप बहस और किचकिच में निकल जाएगी। लेकिन अगर आपके पास सही लोग हैं, जो सिर्फ आपके साथ सफर करना चाहते हैं, तो फिर आप पहाड़ जाएं या समंदर, सफर यादगार ही होगा।
इसे एक ऑफिस के उदाहरण से देखते हैं। मान लीजिए सतीश ने एक सॉफ्टवेयर कंपनी शुरू की। उसने बहुत सारे लोगों को नौकरी पर रख लिया क्योंकि उन्हें कम सैलरी में ज्यादा काम आता था। अब सतीश को हर छोटी बात पर उन्हें डंडा लेकर समझाना पड़ता है। वह काम तो कर रहे हैं, लेकिन बिना मन के। जैसे ही सतीश की नजर हटती है, सब रील्स देखने लगते हैं।
वहीं दूसरी तरफ अमित है। अमित ने अपनी टीम में सिर्फ उन लोगों को जगह दी जो सेल्फ मोटिवेटेड हैं और जिनका विजन अमित से मिलता है। उसे उन्हें यह नहीं बताना पड़ता कि सुबह ९ बजे आना है या काम कैसे करना है। वे लोग खुद नए आइडियाज लेकर आते हैं। अब अमित चाहे अपना बिजनेस मॉडल बदल दे, उसकी टीम उसे सफल बना ही देगी।
जिम कॉलिन्स का यह लेसन बहुत कड़वा लेकिन सच है: अगर बस में गलत लोग चढ़ गए हैं, तो आप चाहे कितनी भी अच्छी ड्राइविंग कर लें, आप कभी ग्रेट डेस्टिनेशन पर नहीं पहुंच पाएंगे। सही लोगों को मैनेज करने की जरूरत नहीं पड़ती, वे खुद अपने काम के प्रति ईमानदार होते हैं। और अगर आपको लग रहा है कि कोई इंसान आपकी टीम के लिए सही नहीं है, तो उसे तुरंत उतारने में ही भलाई है।
ग्रेट कंपनियां बनने का सफर कोई जादू नहीं है, बल्कि यह एक फ्लाईव्हील की तरह है। जब आप सही लीडर बनते हैं (लेसन १), अपनी ताकत पर फोकस करते हैं (लेसन २) और सही लोगों को साथ रखते हैं (लेसन ३), तो धीरे-धीरे आपकी सफलता का पहिया घूमने लगता है। शुरू में इसे घुमाना बहुत मुश्किल होता है, लेकिन एक बार जब यह रफ्तार पकड़ लेता है, तो इसे रोकना नामुमकिन हो जाता है।
तो क्या आप तैयार हैं अपनी बस के मुसाफिरों को चेक करने के लिए? याद रखिए, महानता रातों-रात नहीं आती, यह उन छोटे-छोटे सही फैसलों का नतीजा है जो आप हर रोज लेते हैं। अपनी लाइफ की बस के ड्राइवर बनिए, सही लोगों को साथ लीजिए और निकल पड़िए उस सफर पर जो आपको 'गुड' की भीड़ से निकाल कर 'ग्रेट' की पहचान देगा।
दोस्तों, गुड से ग्रेट बनना कोई चॉइस नहीं, बल्कि एक जिम्मेदारी है। आज ही अपने आप से पूछिए कि आपकी लाइफ का वह हौजहॉग कांसेप्ट क्या है? कमेंट्स में जरूर बताएं कि आपको इन ३ लेसन्स में से सबसे पावरफुल कौन सा लगा। अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया, तो इसे अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो अपनी लाइफ में कुछ बड़ा करना चाहता है। चलिए साथ मिलकर ग्रेट बनते हैं।
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