क्या आप भी पुराने जमाने के बिजनेस मॉडल को गले लगाकर बैठे हैं और सोच रहे हैं कि सेल क्यों नहीं बढ़ रही? बड़े मजे की बात है कि दुनिया रॉकेट की स्पीड से डिजिटल हो रही है और आप अभी भी वही घिसी पिटी टेक्निक इस्तेमाल कर रहे हैं। बिना डिजिटल विजन के आप बस अपनी बर्बादी का इंतजार कर रहे हैं।
अगर आप भी इस फेलियर के डर से बचना चाहते हैं, तो एड्रियन स्लीवोट्ज़की की इस किताब के ये ३ लेसन आपकी आंखें खोल देंगे और आपके बिजनेस को फ्यूचर के लिए रेडी कर देंगे।
Lesson : डिजिटल बिजनेस डिजाइन - क्या आपका बिजनेस सिर्फ दिखावा है?
दोस्तो, बहुत से लोग सोचते हैं कि उन्होंने दुकान पर एक कंप्यूटर रख लिया या व्हाट्सएप पर ऑर्डर लेना शुरू कर दिया, तो उनका बिजनेस डिजिटल हो गया। सच तो यह है कि यह सिर्फ एक डिजिटल मेकअप है, असली डिजिटल बिजनेस डिजाइन नहीं। एड्रियन स्लीवोट्जकी कहते हैं कि डिजिटल होने का मतलब यह नहीं है कि आप पुरानी और टूटी फूटी साइकिल पर बस एक नया हॉर्न लगा दें। इसका मतलब है कि आपको साइकिल छोड़कर एक सुपरफास्ट इलेक्ट्रिक कार बनानी होगी।
मान लीजिए आपके पास पड़ोस के शर्मा जी की किराना दुकान है। शर्मा जी ने एक बहुत महंगा सॉफ्टवेयर डलवाया है, लेकिन आज भी अगर आपको उधार का हिसाब करना हो, तो वो पुरानी लाल डायरी ही ढूँढते हैं। सॉफ्टवेयर बस कोने में धूल खा रहा है। यहाँ दिक्कत सॉफ्टवेयर की नहीं है, बल्कि उनके बिजनेस डिजाइन की है। उन्होंने अपनी प्रोसेस को नहीं बदला, बस ऊपर से एक डिजिटल लेयर लगा दी।
डिजिटल बिजनेस डिजाइन का असली मतलब है अपने काम करने के तरीके को जड़ से बदलना। क्या आपकी इन्वेंट्री अपने आप अपडेट होती है? क्या आपका डेटा आपको बताता है कि आपका कस्टमर अगले हफ्ते क्या खरीदने वाला है? अगर नहीं, तो आप अभी भी पत्थर के जमाने में जी रहे हैं।
जरा सोचिए, अगर नेटफ्लिक्स भी पुरानी वीडियो लाइब्रेरी की तरह काम करता और आपको सीडी कुरियर करता, तो क्या वो आज यहाँ होता? बिल्कुल नहीं। उन्होंने अपना पूरा डिजाइन ही डिजिटल रखा ताकि एक क्लिक पर फिल्म शुरू हो सके।
ज्यादातर इंडियन बिजनेस ओनर्स को लगता है कि आईटी डिपार्टमेंट पर पैसा खर्च करना एक बोझ है। लेकिन भाई साहब, अगर आप आज सही डिजाइन पर पैसा नहीं लगाएंगे, तो कल आपको कॉम्पिटिशन वाले मार्केट से बाहर निकालने के लिए किसी और को मेहनत नहीं करनी पड़ेगी, आप खुद ही गायब हो जाएंगे।
जब लोग कहते हैं कि हमारा बिजनेस तो सालों से ऐसे ही चल रहा है। भाई, डायनासोर भी सालों से मजे में जी रहे थे, फिर एक दिन मौसम बदला और गेम ओवर हो गया। आज का मौसम डिजिटल है। अगर आपकी जड़ें डिजिटल नहीं हैं, तो फल तो भूल ही जाइए, पेड़ भी नहीं बचेगा।
डिजिटल डिजाइन का मतलब है कि आपकी हर प्रोसेस, हर ट्रांजैक्शन और हर कस्टमर इंटरैक्शन डेटा से जुड़ा हो। जब डेटा बोलता है, तो प्रॉफिट अपने आप बढ़ता है। तो क्या आप अभी भी वही घिसी पिटी लाल डायरी लेकर बैठने वाले हैं या अपने बिजनेस का डीएनए बदलने के लिए तैयार हैं?
Lesson : कस्टमर सेंट्रिक अप्रोच - क्या आप कस्टमर की सुन रहे हैं या सिर्फ अपनी धुन में हैं?
डिजिटल दुनिया का सबसे बड़ा सच यह है कि यहाँ राजा आप नहीं, आपका कस्टमर है। एड्रियन स्लीवोट्ज़की इस किताब में बहुत साफ कहते हैं कि अगर आपका डिजिटल सिस्टम कस्टमर की लाइफ आसान नहीं बना रहा, तो वो कचरा है। पुराने जमाने में लोग कहते थे कि हमने जो बनाया है, कस्टमर वही खरीदेगा। लेकिन आज अगर आपने कस्टमर को वो नहीं दिया जो उसे चाहिए, तो वो एक सेकंड में दूसरी ऐप पर शिफ्ट हो जाएगा।
मान लीजिए एक बैंक ने बहुत ही भारी भरकम मोबाइल ऐप बनाई है। उसमें इतने सारे फीचर्स हैं कि लॉगिन करते ही आपको चक्कर आने लगें। आपको बस अपना बैलेंस चेक करना है, लेकिन ऐप आपसे आपकी पूरी वंशावली पूछ रही है। यहाँ बैंक को लग रहा है कि उन्होंने बहुत डिजिटल काम किया है, लेकिन कस्टमर बेचारा परेशान होकर फोन पटकने वाला है। इसे कहते हैं ईगो वाला बिजनेस, न कि कस्टमर सेंट्रिक बिजनेस।
कस्टमर सेंट्रिक होने का मतलब है कि आप उसके जूते में अपना पैर रखकर देखें। उसे क्या परेशानी हो रही है? क्या उसे पेमेंट करने में दस मिनट लग रहे हैं? क्या उसे अपना ऑर्डर ट्रैक करने के लिए कस्टमर केयर को दस बार फोन करना पड़ता है? अगर हाँ, तो आपका डिजिटल होना सिर्फ एक मजाक है।
अमेजन को देखिए, उन्होंने वन क्लिक ऑर्डर जैसा फीचर निकाला। क्यों? क्योंकि उन्हें पता था कि कस्टमर आलसी है और उसे कम से कम मेहनत करनी है। उन्होंने अपनी पूरी डिजिटल ताकत इस बात पर लगा दी कि कस्टमर को जरा भी तकलीफ न हो। और हम? हम अभी भी अपनी वेबसाइट पर इतने फॉर्म भरवाते हैं जैसे कोई सरकारी नौकरी का फॉर्म हो।
कुछ बिजनेस ओनर्स को लगता है कि कस्टमर को डिस्काउंट दे दिया तो वो खुश रहेगा। भाई साहब, आज के दौर में टाइम ही असली पैसा है। अगर आपकी डिजिटल सर्विस कस्टमर का टाइम बचा रही है, तो वो आपको पैसे भी देगा और वफादारी भी।
अगर आप अभी भी यह सोच रहे हैं कि मार्केट में आपकी पुरानी साख काम आएगी, तो जरा संभल जाइए। डिजिटल मार्केट में आपकी साख आपके पिछले पांच मिनट के यूजर एक्सपीरियंस पर टिकी है। अगर ऐप हैंग हुई, तो साख भी गई और कस्टमर भी गया।
तो सवाल यह है कि क्या आपका डिजिटल सिस्टम कस्टमर के लिए बना है या आपके आईटी मैनेजर के शौक पूरा करने के लिए? कस्टमर की पसंद को अपना डिजिटल भगवान बनाइए, वरना विसर्जन के लिए तैयार रहिए।
Lesson : वैल्यू आउटपुट बढ़ाना - स्मार्ट बनिए, कोल्हू का बैल नहीं
तीसरा और सबसे जरूरी लेसन यह है कि डिजिटल टूल्स सिर्फ काम करने के लिए नहीं, बल्कि वैल्यू पैदा करने के लिए होते हैं। बहुत से बिजनेस ओनर्स को लगता है कि डिजिटल होने का मतलब है कि अब स्टाफ को ज्यादा ईमेल भेजने पड़ेंगे। अरे भाई, डिजिटल होने का असली मकसद तो यह था कि स्टाफ कम काम करे और आउटपुट दस गुना बढ़ जाए। एड्रियन स्लीवोट्ज़की समझाते हैं कि असली डिजिटल कंपनी वही है जो अपनी एफिशिएंसी को इस लेवल पर ले जाए कि उसका प्रॉफिट रॉकेट की तरह ऊपर भागे।
मान लीजिए एक सेल्स टीम है जो आज भी हाथ से एक्सेल शीट भर रही है और दिन भर फोन पर क्लाइंट्स को परेशान कर रही है। शाम तक सब थक कर चूर हैं, लेकिन रिजल्ट? ढाक के वही तीन पात। दूसरी तरफ एक स्मार्ट कंपनी है जिसने ऑटोमेशन टूल लगा रखा है। सिस्टम खुद पहचान लेता है कि कौन सा कस्टमर खरीदने वाला है और उसे सही समय पर मैसेज चला जाता है। अब यहाँ टीम को बस क्लोजिंग करनी है। पहली टीम कोल्हू के बैल की तरह मेहनत कर रही है, जबकि दूसरी टीम डिजिटल चश्मे से वैल्यू देख रही है।
हंसी तो तब आती है जब लोग कहते हैं कि हमने डिजिटल सिस्टम में लाखों रुपये लगा दिए पर कुछ बदला नहीं। भाई साहब, अगर आप एक गधे को फेरारी में बिठा देंगे, तो फेरारी तेज नहीं चलेगी, बस गधा लग्जरी में घूमेगा। आपको अपनी पूरी वर्कफोर्स और प्रोसेस का माइंडसेट बदलना होगा। डिजिटल टूल्स का काम आपकी गलतियों को छुपाना नहीं, बल्कि आपकी ताकत को बढ़ाना है।
वैल्यू आउटपुट बढ़ाने का मतलब है कि आप डेटा का इस्तेमाल करके यह जानें कि पैसा कहाँ बर्बाद हो रहा है। क्या आपका लॉजिस्टिक्स का रूट गलत है? क्या आपकी इन्वेंट्री बिना वजह गोदाम में सड़ रही है? एक सही डिजिटल बिजनेस इन सब फालतू के खर्चों को खत्म कर देता है।
हद तो तब होती है जब कुछ लोग डिजिटल होने के नाम पर जूम मीटिंग्स का अंबार लगा देते हैं। उन्हें लगता है कि जितनी ज्यादा स्क्रीन पर शक्लें दिखेंगी, उतना ज्यादा डिजिटल काम होगा। असली डिजिटल वैल्यू तब आती है जब मीटिंग्स की जरूरत ही न पड़े क्योंकि सारा डेटा डैशबोर्ड पर साफ दिख रहा हो।
याद रखिए, फ्यूचर में वो कंपनियां नहीं टिकेंगी जिनके पास सबसे ज्यादा एम्प्लॉई हैं, बल्कि वो टिकेंगी जिनका डिजिटल आउटपुट सबसे ज्यादा है। अगर आप आज भी मैन्युअल प्रोसेस के भरोसे बैठे हैं, तो आप बस अपनी कंपनी की चिता तैयार कर रहे हैं। स्मार्ट बनिए, डेटा को अपना हथियार बनाइए और कोल्हू के बैल वाली जिंदगी को अलविदा कहिए।
दोस्तो, हाउ डिजिटल इस योर बिजनेस सिर्फ एक किताब नहीं, बल्कि बदलते वक्त की चेतावनी है। अगर आपने आज अपने बिजनेस का डिजाइन नहीं बदला, कस्टमर की डिजिटल जरूरतों को नहीं समझा और अपनी एफिशिएंसी नहीं बढ़ाई, तो कल आप सिर्फ एक भूली बिसरी कहानी बनकर रह जाएंगे।
तो अब आपकी बारी है। क्या आप अभी भी पुरानी लाल डायरी और मैन्युअल सिस्टम के भरोसे बैठना चाहते हैं या अपने बिजनेस को फ्यूचर की सुपरफास्ट ट्रेन बनाना चाहते हैं? नीचे कमेंट में हमें बताइए कि आप अपने बिजनेस का कौन सा हिस्सा सबसे पहले डिजिटल करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिए जो आज भी पुराने जमाने में जी रहे हैं। चलिए, साथ मिलकर भारत के बिजनेस को सच में डिजिटल बनाते हैं।
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