क्या आप अभी भी पुराने जमाने की मार्केटिंग करके अपना पैसा और धरती दोनों बर्बाद कर रहे हैं। मुबारक हो, आपकी घटिया स्ट्रेटजी और प्लास्टिक वाले आइडियाज आपको जल्दी ही कंगाल बना देंगे। अगर आपको लगता है कि कस्टमर को बेवकूफ बनाकर आप अंबानी बन जाएंगे, तो शायद आप किसी दूसरी दुनिया में रह रहे हैं।
आज हम जय लेविंसन की बुक गुरिल्ला मार्केटिंग गोज ग्रीन से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपके बिजनेस को प्रॉफिटेबल और प्लेनेट को सेफ बनाएंगे। अगर आप भी जानना चाहते हैं कि बिना ज्यादा पैसा खर्च किए ब्रांड को बड़ा कैसे बनाया जाता है, तो ये ३ लेसन आपके लिए गेम चेंजर साबित होंगे।
लेसन १ : इको फ्रेंडली मार्केटिंग से कस्टमर का भरोसा जीतना
आजकल के मार्केटिंग के जमाने में हर कोई बस चिल्ला रहा है। 'मेरा प्रोडक्ट खरीदो' और 'मुझसे सस्ता कहीं नहीं मिलेगा'। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि जनता आपकी बात पर भरोसा क्यों करे। जय लेविंसन कहते हैं कि मार्केटिंग का मतलब सिर्फ पैसा फेंकना नहीं होता। बल्कि इसका असली मतलब होता है लोगों का दिल जीतना। और दिल जीतने का सबसे आसान रास्ता है उनकी परवाह करना। अगर आप अपने बिजनेस में 'ग्रीन' एलिमेंट जोड़ते हैं, तो आप सिर्फ सामान नहीं बेच रहे होते। आप एक विजन बेच रहे होते हैं।
सोचिए आपके पड़ोस में दो किराने की दुकानें हैं। एक दुकान वाला हर सामान को प्लास्टिक की तीन-तीन परतों में लपेट कर देता है। जैसे कि वो कोई कोहिनूर हीरा पैक कर रहा हो। दूसरी तरफ एक स्मार्ट दुकानदार है। वो आपको जूट के बैग में सामान देता है और कहता है कि अगली बार ये बैग वापस लाने पर आपको ५ परसेंट डिस्काउंट मिलेगा। अब आप ही बताइए कि आप किसके पास बार-बार जाएंगे। जाहिर सी बात है कि उस स्मार्ट वाले के पास। क्योंकि उसने आपके दिमाग में ये बात डाल दी है कि वो सिर्फ अपना गल्ला नहीं भर रहा। उसे इस धरती की और आपके भविष्य की भी फिक्र है। ये होती है असली गुरिल्ला मार्केटिंग। जहाँ बिना करोड़ों का विज्ञापन दिए आप कस्टमर के परमानेंट दोस्त बन जाते हैं।
आज का युवा, जो २५ से ३४ साल की उम्र का है, वो बहुत होशियार है। उसे पता है कि ग्लोबल वार्मिंग क्या बला है। वो ऐसी कंपनियों को पसंद करता है जो दिखावा कम और काम ज्यादा करती हैं। अगर आप अभी भी वही घिसे-पिटे तरीके अपना रहे हैं, तो आप खुद को मार्केट से बाहर करने की तैयारी कर रहे हैं। आपको क्या लगता है कि हजारों पंपलेट छपवाकर सड़कों पर फेंकने से आपकी सेल बढ़ेगी। नहीं भाई, इससे सिर्फ सड़कें गंदी होंगी और लोग आपको गाली देंगे। असली मार्केटिंग तो वो है जो लोगों की लाइफ में वैल्यू ऐड करे।
मान लीजिए आप एक कैफे चलाते हैं। अब आप वहां प्लास्टिक के स्ट्रॉ इस्तेमाल करना बंद कर देते हैं। इसकी जगह आप स्टील या पेपर के स्ट्रॉ रखते हैं। और साथ में एक छोटा सा बोर्ड लगा देते हैं कि 'हमने कछुओं को बचाने के लिए ये कदम उठाया है'। यकीन मानिए, लोग आपके कॉफी के स्वाद से ज्यादा आपके इस स्टेप की फोटो खींचकर इंस्टाग्राम पर डालेंगे। आपकी फ्री में पब्लिसिटी हो जाएगी और आपको एक रुपया भी एक्स्ट्रा खर्च नहीं करना पड़ा। ये है वो मैजिक जो ग्रीन मार्केटिंग आपके बिजनेस में लाती है। प्रॉफिट भी बढ़ेगा और दुआएं भी मिलेंगी। और दुआओं का मार्केट में बहुत बड़ा रोल होता है, भले ही वो बैलेंस शीट में न दिखती हों।
लेसन २ : कॉम्पिटिशन नहीं कोलाबरेशन पर फोकस
मार्केट में अक्सर सिखाया जाता है कि अपने कॉम्पिटिटर का गला काट दो। जैसे कि आप कोई पुरानी हिंदी फिल्म के विलेन हों जो हर किसी को रास्ते से हटाना चाहता है। लेकिन गुरिल्ला मार्केटिंग गोज ग्रीन कहती है कि भाई, थोड़ा रिलैक्स करो। अकेले दौड़ोगे तो जल्दी थक जाओगे, लेकिन साथ मिलकर चलोगे तो पूरा जंगल आपका होगा। बुक हमें सिखाती है कि कोलाबरेशन यानी सहयोग ही आज का असली वेपन है। जब आप अपने प्रतिद्वंद्वियों के साथ हाथ मिलाते हैं, तो आप अपनी ताकत और अपनी पहुंच दोनों को दोगुना कर लेते हैं।
मान लीजिए आपकी एक छोटी सी ऑर्गेनिक साबुन बनाने की कंपनी है। आपके शहर में ही एक और बंदा है जो इको फ्रेंडली बांस के ब्रश बेचता है। अब आप चाहो तो उसे अपना दुश्मन मान सकते हो क्योंकि वो भी 'ग्रीन' मार्केट का हिस्सा है। या फिर आप थोड़े समझदार बन सकते हैं। आप दोनों मिलकर एक 'ग्रीन मॉर्निंग किट' बना सकते हैं। जो कस्टमर साबुन खरीदेगा उसे ब्रश पर डिस्काउंट मिलेगा और जो ब्रश खरीदेगा उसे साबुन पर। अब देखिए कमाल। आपने अपनी मार्केटिंग कॉस्ट आधी कर दी और अपनी सेल डबल। इसे कहते हैं दिमाग की बत्ती जलाना। जो लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे रहते हैं, वो अक्सर खुद भी नीचे ही गिर जाते हैं।
आजकल का जमाना ईगो का नहीं बल्कि इकोसिस्टम का है। अगर आप एक फिटनेस कोच हैं, तो एक डाइटिशियन के साथ दुश्मनी क्यों करना। बल्कि उसके साथ मिलकर एक पूरा हेल्थ पैकेज क्यों नहीं बनाते। यहाँ ह्यूमर वाली बात ये है कि कुछ लोग अपनी दुकान के सामने बोर्ड लगा देते हैं कि 'उधार मांगकर शर्मिंदा न करें' और बगल वाली दुकान वाले को घूरते रहते हैं। अरे भाई, बगल वाले से दोस्ती कर लो, शायद वही तुम्हारे पास चार नए कस्टमर भेज दे। जब आप ग्रीन मार्केटिंग की बात करते हैं, तो आपका मकसद सिर्फ खुद का भला करना नहीं होता। आपका मकसद पूरे समाज को एक बेहतर दिशा में ले जाना होता है।
इस कोलाबरेशन का एक और बड़ा फायदा है। जब दो या तीन छोटे बिजनेस साथ आते हैं, तो वो बड़े मगरमच्छों का मुकाबला आसानी से कर सकते हैं। बड़ी कंपनियां करोड़ों रुपए एडवरटाइजिंग पर खर्च करती हैं। लेकिन आप और आपके पार्टनर्स मिलकर एक ऐसी कम्युनिटी बना सकते हैं जो भरोसे पर टिकी हो। याद रखिए, भरोसा विज्ञापन से नहीं बल्कि व्यवहार से आता है। अगर आप किसी और के बिजनेस को बढ़ने में मदद करेंगे, तो कुदरत का कानून है कि आपका बिजनेस भी अपने आप बढ़ेगा। तो अगली बार जब आप अपने कॉम्पिटिटर को देखें, तो उसे गाली देने के बजाय एक कप चाय पर बुलाएं। क्या पता वहीं से आपके अगले बड़े प्रॉफिट का रास्ता निकल आए।
लेसन ३ : सच्चाई और ईमानदारी ही असली मार्केटिंग है
आजकल मार्केट में एक नया फैशन चला है जिसे कहते हैं 'ग्रीनवाशिंग'। ये कुछ वैसा ही है जैसे कोई इंसान रोज तंबाकू खाए और बाहर बोर्ड लगा दे कि 'मैं सिर्फ शुद्ध हवा बेचता हूँ'। कुछ कंपनियां अपनी पैकेजिंग पर एक छोटा सा हरा पत्ता छाप देती हैं और खुद को दुनिया का सबसे बड़ा पर्यावरण प्रेमी बताने लगती हैं। लेकिन जय लेविंसन और शेल् होरोविट्ज कहते हैं कि पब्लिक अब इतनी भी भोली नहीं है। अगर आप झूठ बोलकर अपना सामान बेच रहे हैं, तो आप मार्केटिंग नहीं बल्कि सुसाइड कर रहे हैं। सच्चाई और ईमानदारी वो फाउंडेशन है जिस पर आपका प्रॉफिट खड़ा होता है।
मान लीजिए आपकी एक टी-शर्ट की ब्रांड है। आप दावा करते हैं कि ये १०० परसेंट आर्गेनिक कॉटन है। लेकिन हकीकत में वो आधा प्लास्टिक और आधा पुराना कचरा है। जब कस्टमर को ये पता चलेगा, तो वो सिर्फ आपकी टी-शर्ट वापस नहीं करेगा, बल्कि सोशल मीडिया पर आपकी ऐसी बैंड बजाएगा कि अगली बार आप अपनी खुद की फोटो भी फेसबुक पर डालने से डरेंगे। ईमानदारी का मतलब ये नहीं कि आप हर बात पर सच बोलें, बल्कि इसका मतलब ये है कि जो आप कह रहे हैं, उसे करके दिखाएं। अगर आप अपने प्रोसेस को ट्रांसपेरेंट रखते हैं, तो लोग आपकी छोटी कमियों को भी माफ कर देते हैं। लेकिन अगर आप झूठ पकड़वाते हैं, तो आपका ब्रांड एक मिनट में मिट्टी में मिल सकता है।
सोचिए एक रेस्टोरेंट मालिक जो कहता है कि हम बचा हुआ खाना गरीब बच्चों को देते हैं। अब अगर कोई चुपके से देख ले कि वो सारा खाना पीछे वाले नाले में फेंक रहा है, तो क्या होगा। उसकी साख की धज्जियां उड़ जाएंगी। लेकिन अगर वो सच में ऐसा करता है और कभी गलती से खाने में नमक थोड़ा कम भी हो जाए, तो लोग उसे 'नेक इंसान' समझकर इग्नोर कर देंगे। ये है सच्चाई की सुपरपावर। ये आपको एक ऐसी सुरक्षा कवच देती है जिसे कोई भी कॉम्पिटिटर नहीं तोड़ सकता।
सच्चा गुरिल्ला मार्केटर वो है जो अपनी गलतियों को स्वीकार करने का दम रखता है। अगर आपकी डिलीवरी में देरी हुई है, तो बहाने बनाने के बजाय सच बताइए। कस्टमर को ये अहसास कराइए कि आप एक इंसान हैं, कोई रोबोट नहीं। जब आप एथिकल तरीके से बिजनेस करते हैं, तो आपको रात में सुकून की नींद आती है और दिन में बढ़ता हुआ बैंक बैलेंस मिलता है। लॉन्ग टर्म प्रॉफिट के लिए शॉर्टकट मत ढूंढिए। दुनिया बहुत छोटी है और आपकी इमेज बहुत कीमती। इसे संभाल कर रखिए क्योंकि एक बार ये हाथ से गई, तो करोड़ों का एडवरटाइजिंग बजट भी इसे वापस नहीं ला पाएगा।
दोस्तो, पैसा कमाना और धरती को बचाना दो अलग चीजें नहीं हैं। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आज ही अपने बिजनेस और लाइफ में एक छोटा सा 'ग्रीन' बदलाव लाइए। कमेंट्स में बताइए कि आप अपने काम को और ज्यादा इको फ्रेंडली बनाने के लिए कौन सा पहला कदम उठाएंगे। चलिए मिलकर इस दुनिया को थोड़ा और हरा-भरा और अपने बैंक बैलेंस को थोड़ा और बड़ा बनाते हैं।
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