Indispensable by Monday (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो ऑफिस में गधे की तरह मेहनत करते हैं और प्रमोशन के वक्त बॉस आपके पास से ऐसे गुजर जाता है जैसे आप कोई अदृश्य भूत हों। अगर आपको लगता है कि सिर्फ समय पर ऑफिस आने से आपकी जॉब सेफ है तो मुबारक हो आप अपनी बर्बादी की तरफ बहुत तेज दौड़ रहे हैं।

आज के इस जबरदस्त आर्टिकल में हम लेरी मायलर की किताब इन्डिस्पेंसेबल बाई मंडे से वे सीक्रेट्स सीखेंगे जो आपको एक मामूली एम्प्लॉई से कंपनी की सबसे बड़ी जरूरत बना देंगे। तैयार हो जाइये अपनी वैल्यू को आसमान तक ले जाने के लिए क्योंकि इन ३ लेसन्स के बाद बॉस आपको खोने के नाम से ही डरने लगेगा।


लेसन १ : एम्प्लॉई नहीं बल्कि ओनर की तरह सोचना

ज्यादातर लोग ऑफिस इस माइंडसेट से जाते हैं कि बस किसी तरह शाम के ६ बज जाएं और वो घर भाग सकें। उनका पूरा ध्यान इस पर होता है कि महीने की पहली तारीख को सैलरी क्रेडिट का मैसेज आ जाए। लेकिन लेरी मायलर कहते हैं कि अगर आप सच में कंपनी की मजबूरी बनना चाहते हैं तो आपको एम्प्लॉई वाला चश्मा उतारकर ओनर यानी मालिक का चश्मा पहनना होगा। मालिक की तरह सोचने का मतलब यह नहीं है कि आप ऑफिस में जाकर अपनी टांगें टेबल पर रख दें और दूसरों पर हुक्म चलाने लगें। इसका असली मतलब है कंपनी के हर एक पैसे और समय को वैसे ही देखना जैसे आप अपने खुद के बटुए को देखते हैं।

सोचिये कि आप एक किराना स्टोर के मालिक हैं और आपका एक स्टाफ मेंबर कोपचे में बैठकर फोन पर रील्स देख रहा है जबकि सामने एक कस्टमर बिना सामान लिए वापस जा रहा है। आपको कैसा लगेगा। शायद आप उसे वहीं से उड़ाकर बाहर फेंकना चाहेंगे। अब खुद को ऑफिस में देखिये। जब आप बेवजह लंबी कॉफी ब्रेक्स लेते हैं या ऑफिस के प्रिंटर से अपने पर्सनल डॉक्यूमेंट्स निकालते हैं तो आप कंपनी का नुकसान कर रहे होते हैं। एक इन्डिस्पेंसेबल इंसान वह होता है जो यह नोटिस करता है कि ऑफिस की लाइटें फालतू जल रही हैं या कोई ऐसा सॉफ्टवेयर है जिस पर कंपनी फालतू पैसे खर्च कर रही है जबकि उसका कोई सस्ता विकल्प मौजूद है।

हम में से कई लोग ऐसे हैं जिन्हें लगता है कि कंपनी अंबानी की है तो हमें क्या फर्क पड़ता है। हम तो बस अपनी नौ से छह की ड्यूटी बजाएंगे। लेकिन भाई साहब जब कंपनी की नाव डूबती है तो सबसे पहले वही चूहे बाहर फेंके जाते हैं जो सिर्फ वजन बढ़ा रहे होते हैं। मालिक की तरह सोचने वाला इंसान हमेशा यह ढूंढता है कि वह कंपनी की एफिशिएंसी कैसे बढ़ा सकता है। वह यह नहीं देखता कि उसके जॉब डिस्क्रिप्शन में क्या लिखा है बल्कि वह यह देखता है कि बिजनेस को कहां फायदा हो सकता है।

मान लीजिये आपके ऑफिस में हर हफ्ते एक मीटिंग होती है जिसमें १० लोग २ घंटे तक सिर्फ फालतू की बातें करते हैं जिसका कोई नतीजा नहीं निकलता। एक आम एम्प्लॉई वहां बैठकर समोसे खाएगा और झपकियां लेगा। लेकिन ओनर माइंडसेट वाला इंसान बॉस को सजेस्ट करेगा कि सर इस मीटिंग को १५ मिनट में कैसे खत्म किया जा सकता है या इसे ईमेल पर कैसे शिफ्ट किया जा सकता है। ऐसा करके आप कंपनी के २० कीमती घंटे बचा रहे हैं। और यकीन मानिये जब आप कंपनी का पैसा बचाना शुरू करते हैं तो कंपनी आपको अपना हिस्सा मानने लगती है। यह एक ऐसा बिहेवियर है जो आपको रातों रात बाकियों से अलग खड़ा कर देता है। आप सिर्फ एक काम करने वाले रोबोट नहीं रह जाते बल्कि आप एक प्रॉब्लम सॉल्वर बन जाते हैं। और दुनिया में प्रॉब्लम सॉल्वर्स की ही सबसे ज्यादा डिमांड है।


लेसन २ : प्रॉफिट बढ़ाने वाले काम पर फोकस करना

क्या आपको भी लगता है कि ऑफिस में पूरा दिन बिजी रहना ही आपकी सफलता की गारंटी है। अगर हां तो शायद आप भी उस चूहे की तरह हैं जो एक पहिए पर पागलों की तरह दौड़ तो रहा है पर पहुंच कहीं नहीं रहा है। लेरी मायलर इस किताब में बहुत साफ कहते हैं कि बिजी होना और प्रोडक्टिव होना दो बिल्कुल अलग चीजें हैं। एक आम एम्प्लॉई उन कामों में उलझा रहता है जो बस उसकी डेस्क पर आ जाते हैं लेकिन एक स्मार्ट एम्प्लॉई हमेशा यह पूछता है कि क्या मेरे इस काम से कंपनी की जेब में चार पैसे आएंगे। अगर आपका जवाब नहीं है तो समझ लीजिये कि आप बस अपनी जगह पक्की नहीं कर रहे बल्कि कंपनी पर बोझ बन रहे हैं।

मान लीजिये आप एक रेस्टोरेंट में काम करते हैं। एक तरफ आप घंटों लगाकर मेनू कार्ड की डिजाइन को और सुंदर बना रहे हैं जबकि दूसरी तरफ टेबल पर कस्टमर्स बैठे हैं जिन्हें कोई अटेंड नहीं कर रहा। अब आप खुद सोचिये कि रेस्टोरेंट के मालिक के लिए कौन सा काम ज्यादा कीमती है। सुंदर मेनू कार्ड या उन कस्टमर्स से ऑर्डर लेना जो पैसे देकर जाएंगे। जाहिर है सेल्स ही असली राजा है। लेकिन ऑफिस के माहौल में हम अक्सर एडमिनिस्ट्रेटिव कामों ईमेल के रिप्लाई करने या फालतू की फाइलों को सजाने में इतने खो जाते हैं कि हमें पता ही नहीं चलता कि हम प्रॉफिट जनरेट करने वाले कामों को इग्नोर कर रहे हैं।

किताब में बताया गया है कि हर एम्प्लॉई को अपनी एक प्रॉफिट एबिलिटी रिपोर्ट तैयार करनी चाहिए। आपको यह सोचना होगा कि आप कंपनी को १० रुपए कमाकर दे रहे हैं या कंपनी के १०० रुपए खर्च करवा रहे हैं। अगर आप सेल्स में नहीं भी हैं तब भी आप प्रॉफिट बढ़ा सकते हैं। कैसे। शायद आप ऑपरेशंस में कोई ऐसी गलती पकड़ लें जिससे वेस्टेज कम हो जाए। या फिर आप कस्टमर सर्विस में ऐसा जादू चलाएं कि क्लाइंट्स खुशी के मारे कंपनी को छोड़कर कहीं जाएं ही नहीं। जब आप सीधे रेवेन्यू या बचत से जुड़ जाते हैं तो आप कंपनी के लिए एटीएम मशीन बन जाते हैं। और भला कौन सा समझदार मालिक अपनी चालू एटीएम मशीन को बेचना या हटाना चाहेगा।

ज्यादातर लोग शिकायत करते हैं कि उन्हें इंक्रीमेंट नहीं मिल रहा। भाई साहब इंक्रीमेंट भी तभी मिलता है जब आप कंपनी के प्रॉफिट का ग्राफ ऊपर ले जाते हैं। आप खुद को एक इन्वेस्टमेंट की तरह देखिये। क्या आप खुद पर पैसा लगाना पसंद करेंगे अगर आपको उससे कोई रिटर्न न मिले। बिल्कुल नहीं। तो फिर अपनी कंपनी से यह उम्मीद क्यों रखना। हमेशा उन टॉप ३ कामों की लिस्ट बनाइये जो आपकी कंपनी के बिजनेस को आगे बढ़ाते हैं। अपनी ८० परसेंट एनर्जी उन्हीं कामों में झोंक दीजिये। जब आप प्रॉफिट की भाषा बोलने लगते हैं तो आपको मैनेजमेंट की मीटिंग्स में जगह मिलने लगती है। आप सिर्फ एक खर्चा नहीं बल्कि एक एसेट बन जाते हैं। याद रखिये ऑफिस में पसीना बहाने वाले बहुत हैं लेकिन पैसा बहाकर लाने वाले बहुत कम। आपको बस वही कम लोगों की लिस्ट में शामिल होना है।


लेसन ३ : अपनी विजिबिलिटी और वैल्यू बढ़ाना

क्या आपने कभी सोचा है कि ऑफिस में वह शर्मा जी का लड़का जो काम आपसे आधा करता है उसे प्रमोशन आपसे पहले कैसे मिल जाता है। शायद आप मन ही मन उसे मक्खनबाज कहते होंगे लेकिन असलियत यह है कि उसे अपनी वैल्यू बेचना आता है। लेरी मायलर कहते हैं कि सिर्फ एक अच्छा और मेहनती एम्प्लॉई होना काफी नहीं है बल्कि आपको एक विजिबल एम्प्लॉई बनना होगा। अगर आप अंधेरे कमरे में बैठकर दुनिया का सबसे बेहतरीन आविष्कार भी कर लें और किसी को पता ही न चले तो आपकी मेहनत की कीमत जीरो है। ऑफिस में खुद को छिपाकर रखना कोई महानता नहीं बल्कि करियर की आत्महत्या है।

मान लीजिये आपने घर पर बहुत टेस्टी बिरयानी बनाई है लेकिन आपने उसे एक ऐसी पुरानी और गंदी बाल्टी में परोसा है जिस पर जंग लगा है। क्या कोई उसे खाना चाहेगा। शायद नहीं। यही हाल आपके काम का है। अगर आप बेहतरीन काम कर रहे हैं लेकिन उसकी पैकेजिंग और प्रेजेंटेशन बेकार है तो कोई आपकी कद्र नहीं करेगा। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि आप हर वक्त अपनी तारीफ के कसीदे पढ़ें या दूसरों का काम चुराकर क्रेडिट लें। इसका असली मतलब है कि आपके किए गए अच्छे काम का इम्पैक्ट सही लोगों तक पहुंचना चाहिए। जब भी आप कंपनी का कोई बड़ा फायदा कराएं या कोई मुश्किल प्रॉब्लम सॉल्व करें तो उसे सही तरीके से रिपोर्ट करें।

अक्सर लोग सोचते हैं कि मेरा काम खुद बोलेगा। भाई साहब काम बेजुबान होता है वह नहीं बोलता। आपको बोलना पड़ता है। आपको यह सुनिश्चित करना होगा कि आपके बॉस को पता हो कि आपने पिछ्ले हफ्ते जो नया प्रोसेस शुरू किया था उससे टीम का कितना समय बचा। विजिबिलिटी बढ़ाने का एक और बेहतरीन तरीका है उन प्रोजेक्ट्स के लिए हाथ उठाना जो बाकी लोग करने से डरते हैं। जब आप कोई ऐसा काम हाथ में लेते हैं जिसमें रिस्क है और उसे सक्सेसफुल बना देते हैं तो सबकी नजरें आप पर टिक जाती हैं। आप धीरे-धीरे कंपनी के वो भरोसेमंद इंसान बन जाते हैं जिसके बिना कोई भी बड़ा फैसला नहीं लिया जाता।

जैसे एक फिल्म का ट्रेलर हिट होता है तभी लोग पूरी फिल्म देखने जाते हैं वैसे ही आपको अपनी वैल्यू का ट्रेलर हर वक्त दिखाते रहना होगा। अपनी स्किल्स को लगातार अपडेट करें और यह दिखाएं कि आप बदलती मार्केट के हिसाब से खुद को ढाल रहे हैं। जब आप अपनी वैल्यू और विजिबिलिटी का सही तालमेल बिठा लेते हैं तो आप सिर्फ एक कर्मचारी नहीं बल्कि एक ब्रांड बन जाते हैं। और याद रखिये ब्रांड्स को कभी निकाला नहीं जाता बल्कि उन्हें रिटेन करने के लिए कंपनियां अपनी तिजोरियां खोल देती हैं। अब फैसला आपका है कि आपको गुमनाम सिपाही बने रहना है या कंपनी का सबसे कीमती सितारा बनना है।


तो दोस्तों, आज ही खुद से एक सवाल पूछिये कि क्या आप अपनी कंपनी के लिए सिर्फ एक खर्चा हैं या एक ऐसा एसेट जिसे खोने का डर बॉस की रातों की नींद उड़ा दे। करियर की रेस में आगे बढ़ने के लिए सिर्फ मेहनत नहीं बल्कि सही दिशा में मेहनत करना जरूरी है। अगर आपको यह ३ लेसन्स काम के लगे तो इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो दिन रात मेहनत तो करता है पर फिर भी तरक्की नहीं पा रहा। नीचे कमेंट में लिखिये कि आप कल मंडे से अपनी कौन सी एक आदत बदलने वाले हैं।

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