How Great Decisions Get Made (Hindi)


आप अभी भी पुराने ढर्रे पर गलत फैसले लेकर अपनी लाइफ और करियर का कचरा कर रहे हैं। बधाई हो। आपकी टीम आपको पीठ पीछे बेवकूफ समझती है क्योंकि आप कभी सही एग्रीमेंट बना ही नहीं पाए। सच तो यह है कि बिना सही प्रोसेस के आप बस अंधेरे में तीर मार रहे हैं।

डॉन मारुस्का की यह किताब आपको उस अंधेरे से बाहर निकालेगी। हम सीखेंगे कि कैसे मुश्किल से मुश्किल सिचुएशन में भी सबकी सहमति से सही फैसला लिया जाता है। आइए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन्स जो आपकी लीडरशिप बदल देंगे।


लेसन १ : डर को कहें टाटा और होप का थामें हाथ

क्या आपको याद है जब पिछली बार ऑफिस की मीटिंग में आपके बॉस ने एक नया आईडिया दिया था और आपके मन में बस एक ही ख्याल आया था। यह तो पक्का फ्लॉप होगा। लेकिन आपने मुंह नहीं खोला। क्यों। क्योंकि आपको डर था कि कहीं आप विलेन न बन जाएं। डॉन मारुस्का कहते हैं कि ज्यादातर ग्रुप डिसीजंस इसलिए घटिया होते हैं क्योंकि वो डर की नींव पर बने होते हैं। हम अक्सर यह सोचकर फैसला लेते हैं कि कहीं कुछ गलत न हो जाए। कहीं नुकसान न हो जाए। या कहीं लोग बुरा न मान जाएं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप गोवा ट्रिप का प्लान बना रहे हों और पूरा ग्रुप बस इस बात पर चर्चा कर रहा हो कि अगर टायर पंचर हो गया तो क्या होगा। भाई पहले यह तो डिसाइड कर लो कि पहुंचना कहां है।

ग्रेट डिसीजन मेकिंग का पहला नियम है कि चर्चा को फियर यानी डर से हटाकर होप यानी उम्मीद पर ले आएं। जब हम डर में होते हैं तो हमारा दिमाग सिकुड़ जाता है। हम बस खुद को बचाने की सोचते हैं। लेकिन जब हम उम्मीद की बात करते हैं तो हम पॉसिबिलिटीज की बात करते हैं। मान लीजिए आप अपनी फैमिली के साथ नया घर खरीदने का प्लान बना रहे हैं। अब अगर आप बस बजट और लोन के बोझ की बात करेंगे तो आधे लोग तो वैसे ही डिप्रेशन में चले जाएंगे। इसकी जगह यह पूछिए कि इस घर में हम साथ में दिवाली कैसे मनाएंगे। जब आप विजन और उम्मीद को सामने रखते हैं तो लोगों का इंगेजमेंट लेवल रॉकेट की तरह ऊपर जाता है।

हमारे देश में लोग शादी का डिसीजन भी इसी डर से लेते हैं कि पड़ोसी क्या कहेंगे। फिर पूरी जिंदगी बस पड़ोसियों को खुश करने में निकल जाती है और खुद का सुख तेल लेने चला जाता है। डॉन मारुस्का समझाते हैं कि जब आप किसी मुश्किल मुद्दे पर फंसे हों तो यह मत पूछिए कि हम फेल होने से कैसे बचें। बल्कि यह पूछिए कि अगर हम सफल हो गए तो हमारी लाइफ कितनी कूल हो जाएगी। उम्मीद लोगों को जोड़ती है जबकि डर उन्हें दूर भागता है। अगर आप चाहते हैं कि हर कोई आपके फैसले से सहमत हो तो उन्हें एक ऐसा सपना दिखाइए जिसमें उनका भी फायदा हो। बिना उम्मीद के कोई भी एग्रीमेंट बस एक मजबूरी का सौदा होता है और मजबूरी में लिए गए फैसले कभी इतिहास नहीं रचते।

जब आप होप पर फोकस करते हैं तो माहौल में एक पॉजिटिव वाइब आती है। लोग अपने डिफेंसिव मोड से बाहर आते हैं। वो अब आपको अपना दुश्मन नहीं बल्कि अपना पार्टनर समझने लगते हैं। यह बदलाव छोटा लग सकता है लेकिन इसका असर बहुत बड़ा होता है। याद रखिए एक लीडर का काम सिर्फ हुक्म चलाना नहीं बल्कि लोगों के दिल में उम्मीद जगाना है। जब आप डर के साये से बाहर निकलकर पॉसिबिलिटीज की बात करते हैं तो सबसे मुश्किल और कड़वे लोग भी आपके साथ आने को तैयार हो जाते हैं। और यही वह पॉइंट है जहां से एक महान फैसले की शुरुआत होती है। अगले लेसन में हम देखेंगे कि इस उम्मीद को एक सुरक्षित माहौल कैसे दिया जाए।


लेसन २ : सेफ्टी नेट तैयार करें ताकि सच बाहर आ सके

क्या आपने कभी गौर किया है कि टीम मीटिंग्स में सबसे ज्यादा अक्लमंद इंसान अक्सर खामोश क्यों रहता है। और सबसे ज्यादा शोर वो मचाता है जिसे टॉपिक का 'ट' भी नहीं पता होता। असल में हमारे यहाँ मीटिंग्स का मतलब डिस्कशन नहीं, बल्कि 'दंगल' होता है। हर कोई एक दूसरे को नीचा दिखाने या अपनी बात थोपने में लगा रहता है। डॉन मारुस्का कहते हैं कि अगर आप चाहते हैं कि लोग बेहतरीन फैसले लें, तो आपको एक सेफ्टी नेट बनाना होगा। यानी एक ऐसा सुरक्षित माहौल जहाँ कोई भी इंसान अपनी बात कहते हुए यह न सोचे कि "अगर मैंने यह बोला तो कल मेरी सैलरी तो नहीं कट जाएगी" या "बॉस मुझे बेवकूफ तो नहीं समझेंगे"।

इमेजिन कीजिए आप अपनी गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड के साथ यह डिसाइड कर रहे हैं कि डिनर में क्या खाना है। अगर आपने पिछले हफ्ते उनके पसंद के रेस्टोरेंट की बुराई की थी, तो यकीन मानिए इस बार वो अपना असली मन कभी नहीं बताएंगे। वो बस कहेंगे, "जो तुम्हें अच्छा लगे"। और फिर पूरा रास्ता मुँह फुलाकर बैठेंगे। यही हाल ऑफिस और बिजनेस में होता है। जब तक लोगों को यह भरोसा नहीं होता कि उनके आईडिया का मजाक नहीं उड़ेगा, तब तक वो अपने बेस्ट आईडिया अपनी जेब में लेकर घूमते रहेंगे। एक लीडर का काम पुलिसवाला बनना नहीं है जो सबकी गलतियाँ पकड़े, बल्कि एक माली की तरह है जो ऐसा एनवायरनमेंट दे जहाँ हर फूल खिल सके।

हमारे यहाँ लोग सजेशन बॉक्स तो लगा देते हैं, लेकिन अगर किसी ने सच लिख दिया तो सीसीटीव फुटेज चेक करने लगते हैं कि यह क्रांतिकारी विचार किसका था। डॉन मारुस्का समझाते हैं कि असली एग्रीमेंट तब होता है जब लोग अपनी शंकाएं, अपने डर और अपने अजीब से अजीब आइडियाज भी बिना डरे सामने रख सकें। आपको लोगों को यह यकीन दिलाना होगा कि यहाँ कोई भी सवाल गलत नहीं है। जब आप एक सेफ्टी नेट बनाते हैं, तो लोग अपनी 'पॉलिटिकल मास्क' उतार देते हैं। वो अब सिर्फ खुद को बचाने के लिए नहीं, बल्कि प्रोजेक्ट को सफल बनाने के लिए बात करते हैं।

इस सेफ्टी को बनाने का एक आसान तरीका है - सुनना। और सुनने का मतलब यह नहीं कि आप बस दूसरे के चुप होने का इन्तजार कर रहे हैं ताकि आप अपना भाषण शुरू कर सकें। असली सुनने का मतलब है दूसरे के नजरिए को समझने की कोशिश करना। जब आप लोगों को इम्पॉर्टेंस देते हैं, तो वो भी फैसले की जिम्मेदारी लेने लगते हैं। अगर माहौल सुरक्षित नहीं है, तो लोग सिर्फ 'हाँ' में 'हाँ' मिलाएंगे और बाद में काम बिगड़ने पर कहेंगे, "मुझे तो पहले ही पता था यह नहीं चलेगा"। अगर आप इस हार से बचना चाहते हैं, तो पहले भरोसा जीतिए, फिर फैसला लीजिए। जब हर कोई सुरक्षित महसूस करता है, तभी सबसे टफ मुद्दों पर भी ऐसी सहमति बनती है जो पत्थर की लकीर बन जाती है। और जब यह भरोसा और उम्मीद मिल जाते हैं, तब जन्म होता है एक ऐसे एग्रीमेंट का जहाँ कोई नहीं हारता।


लेसन ३ : सिर्फ मेजोरिटी नहीं, सबकी जीत वाली सहमति बनाएं

हमारे यहाँ फैसला लेने का मतलब होता है वोटिंग करवाना। और वोटिंग का मतलब है कि अगर १० में से ६ लोगों ने 'हाँ' कह दिया, तो बाकी ४ लोग भाड़ में जाएं। डॉन मारुस्का कहते हैं कि यह सबसे बड़ी गलती है। क्योंकि जिन ४ लोगों की बात नहीं सुनी गई, वो मन ही मन उस फैसले को फेल करने की कसम खा लेते हैं। वो टीम का हिस्सा तो होते हैं, लेकिन उनका दिल उस काम में नहीं होता। असली टैलेंट इसमें नहीं है कि आप अपनी बात मनवा लें, बल्कि इसमें है कि आप एक ऐसा विन विन एग्रीमेंट बनाएं जिसमें हर किसी को अपना फायदा नजर आए। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, बस थोड़ा सा दिमाग और दूसरों की फिक्र करने का मामला है।

मान लीजिए घर में टीवी पर क्या चलेगा इस बात पर जंग छिड़ी है। पापा को न्यूज देखनी है, मम्मी को सीरियल और बच्चों को क्रिकेट। अब अगर पापा रिमोट छीनकर न्यूज लगा दें, तो मम्मी किचन में बर्तन पटकेंगी और बच्चे पढ़ाई का बहाना बनाकर कमरे में दुबक जाएंगे। घर का माहौल खराब। लेकिन अगर आप एक ऐसा एग्रीमेंट करें कि आधे घंटे सब साथ में न्यूज देखेंगे, फिर मैच के जरूरी ओवर्स और फिर मम्मी का फेवरेट शो। तो यहाँ हर कोई थोड़ा सा एडजस्ट तो कर रहा है, लेकिन किसी को भी यह नहीं लग रहा कि वह हार गया। यही फॉर्मूला बिजनेस और लाइफ के हर बड़े फैसले पर लागू होता है।

सच तो यह है कि लोग अक्सर अपनी ईगो की वजह से हार जाते हैं। उन्हें लगता है कि अगर उन्होंने दूसरे की बात मान ली, तो उनका दबदबा कम हो जाएगा। भाई, दबदबा काम से होता है, तानाशाही से नहीं। डॉन मारुस्का समझाते हैं कि जब आप किसी टफ मुद्दे पर फंसे हों, तो यह मत देखिए कि कौन सही है, बल्कि यह देखिए कि सबके लिए क्या सही है। जब आप लोगों से पूछते हैं कि "इस फैसले में आपके लिए क्या जरूरी है", तो आप उनकी असली जरूरत को पकड़ लेते हैं। हो सकता है कोई आपकी पूरी प्लानिंग से असहमत न हो, बस उसे एक छोटे से हिस्से से दिक्कत हो। उस हिस्से को ठीक कर दीजिए और देखिए कैसे वही इंसान आपका सबसे बड़ा सपोर्टर बन जाता है।

एक महान फैसला वह होता है जिसमें हर इंसान को लगे कि उसकी आवाज सुनी गई है। जब लोग महसूस करते हैं कि फैसले की रेसिपी में उनके भी मसालों का इस्तेमाल हुआ है, तो वो उस डिश को बड़े चाव से खाते हैं। यानी वो उस डिसीजन को सफल बनाने के लिए जान लगा देते हैं। याद रखिए, जीत अकेले भागने में नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर फिनिश लाइन पार करने में है। जब आप उम्मीद जगाते हैं, एक सुरक्षित माहौल देते हैं और फिर सबकी जीत वाला एग्रीमेंट करते हैं, तो कोई भी मुश्किल आपको रोक नहीं सकती। यही वह रास्ता है जो एक साधारण टीम को एक लेजेंडरी टीम में बदल देता है। अब फैसला आपके हाथ में है कि आप एक तानाशाह बनना चाहते हैं या एक ग्रेट डिसीजन मेकर।


जिंदगी फैसलों का ही तो नाम है। आज आप जो भी हैं, वो आपके कल के फैसलों का नतीजा है। डॉन मारुस्का की यह बातें सिर्फ कागजी नहीं हैं, बल्कि यह वो औजार हैं जो आपकी पर्सनल और प्रोफेशनल लाइफ को सॉर्ट कर सकते हैं। तो अगली बार जब किसी मुद्दे पर फंसें, तो डर को छोड़कर उम्मीद की बात करें, सबको सुरक्षित महसूस कराएं और ऐसी सहमति बनाएं जहाँ कोई न हारे।

क्या आप भी अपनी टीम या लाइफ में किसी ऐसे फैसले पर अटके हैं जहाँ सहमति नहीं बन पा रही। नीचे कमेंट में बताएं कि इस आर्टिकल का कौन सा लेसन आपको सबसे ज्यादा रिलेटेबल लगा। इस ज्ञान को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा कंफ्यूज रहता है। आइए मिलकर बेहतर फैसले लेना सीखते हैं।

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