How NASA Builds Teams (Hindi)


अगर आपको लगता है कि आपकी टीम सिर्फ इसलिए फेल हो रही है क्योंकि वे आलसी है तो मुबारक हो आप नासा के रॉकेट साइंटिस्ट से भी ज्यादा गलत है। आप अपनी टीम को बिना सही सिस्टम के चलाकर वैसे ही सुसाइड कर रहे है जैसे बिना ऑक्सीजन सिलेंडर के स्पेस में जाना। अपनी ईगो को थोड़ा आराम दीजिए और असलियत समझिए वरना आपकी ग्रोथ भी नासा के उस खराब सैटेलाइट की तरह क्रैश हो जाएगी जिसका मलबा भी किसी को नही मिलेगा।

इतने करोड़ों के मिशन आखिर फेल क्यों होते है। क्या सच में कमी टेक्निकल थी या फिर हम इंसानों के बीच की वो सोशल दीवारें जो हमें साथ काम करने से रोकती है। आइए नासा के इस सीक्रेट सिस्टम को समझते है जो आपकी टीम को फेल होने से बचाएगा।


लेसन १ : ४ डी सिस्टम - अपनी टीम का असली रंग पहचानिए

दुनिया में दो तरह के लोग होते है। एक वो जो सोचते है कि टीम का मतलब है बस कुछ लोगों को एक कमरे में बंद कर देना और दूसरा वो जो नासा की तरह सोचते है। नासा के पूर्व डायरेक्टर चार्ल्स पेलरीन ने जब हबल टेलीस्कोप की गड़बड़ी देखी तो उन्हें समझ आया कि कमी टेलिस्कोप के शीशे में नही बल्कि टीम के सोशल सिस्टम में थी। इसी से जन्म हुआ ४ डी सिस्टम का। यह कोई रॉकेट साइंस नही है लेकिन रॉकेट उड़ाने के लिए सबसे जरूरी चीज है।

कल्पना कीजिए कि आपकी टीम एक ऐसी शादी की तरह है जहां फूफा जी को पनीर नही मिला और वो मुंह फुलाकर बैठे है। अगर आप टीम लीडर है और आपको पता ही नही कि कौन सा मेंबर किस मूड में है तो आपका प्रोजेक्ट तो भगवान भरोसे ही है। चार्ल्स कहते है कि हर इंसान और हर टीम के चार मुख्य आयाम या डाइमेंशन्स होते है। कल्टीवेटिंग, इंक्लूडिंग, विजनिंग और डायरेक्टिंग। इसे आप ऐसे समझ सकते है जैसे कुछ लोग दिल से सोचते है तो कुछ सिर्फ डेटा और नंबर्स की बात करते है।

अगर आपकी टीम में सब लोग सिर्फ डेटा वाले है तो आपकी टीम एक रोबोट की तरह काम करेगी जिसमें इमोशन्स की कोई जगह नही होगी। और अगर सब सिर्फ इमोशनल है तो काम कम और गप्पे ज्यादा होंगे। मान लीजिए आपकी एक सेल्स टीम है। वहां आपको ऐसे लोग चाहिए जो डायरेक्टिंग मोड में हो यानी जो रिजल्ट्स पर फोकस करे। लेकिन अगर वहां आपने ऐसे लोग बिठा दिए जो सिर्फ यह सोचते रहते है कि चाय ठंडी क्यों है तो समझ लीजिए आपकी कंपनी का दिवाला निकलना पक्का है।

नासा ने सिखाया कि टीम की पर्सनैलिटी को मापना उतना ही जरूरी है जितना इंजन के टेम्परेचर को चेक करना। अगर आप एक लीडर है और आप अपनी टीम के साथ बैठकर सिर्फ टास्क लिस्ट पर टिक लगा रहे है तो आप लीडर नही बल्कि एक महंगे क्लर्क है। असली लीडर वो है जो टीम के माहौल को भांप सके। जैसे जब आपके घर में कोई मेहमान आता है और आपकी मम्मी आपको आंखों ही आंखों में इशारे करती है कि बेटा बिस्किट कम खाओ। वो एक सोशल सिग्नल है। ठीक वैसे ही टीम के अंदर के इन सिग्नल्स को समझना ही ४ डी सिस्टम की असली ताकत है।

हम लोग फोन खरीदते वक्त उसके दस स्पेसिफिकेशन्स चेक करते है लेकिन टीम बनाते वक्त बस यह देखते है कि बंदा दिखने में ठीक है और कम सैलरी मांग रहा है। यह तो वही बात हुई कि आप रेस में हिस्सा लेने जा रहे है और आपने घोड़े की जगह गधे पर दांव लगा दिया है क्योंकि गधा घास कम खाता है। ४ डी सिस्टम आपको यह चश्मा देता है जिससे आप देख पाते है कि आपकी टीम का बैलेंस कहां बिगड़ा हुआ है। क्या वहां लोग एक दूसरे की तारीफ करते है या सिर्फ पीठ पीछे बुराई।

जब आप इस सिस्टम को अपनी टीम पर लागू करते है तो आपको पता चलता है कि टीम की परफॉरमेंस उनके टैलेंट से ज्यादा उनके बीच के तालमेल पर टिकी है। यह तालमेल ही वो अदृश्य धागा है जो नासा के बड़े से बड़े मिशन को जमीन से आसमान तक ले जाता है और इसी तालमेल की कमी करोड़ों के प्रोजेक्ट को कबाड़ बना देती है। अब जब आप समझ गए है कि टीम का स्ट्रक्चर कैसा होना चाहिए तो सवाल यह आता है कि आप इस टीम के लिए माहौल कैसा बनाते है।


लेसन २ : कॉन्टेक्स्ट का जादू - माहौल बदलिए, किस्मत नही

क्या आपने कभी सोचा है कि एक ही इंसान एक कंपनी में स्टार परफॉर्मर होता है और दूसरी में जाकर फ्लॉप हो जाता है। क्या उसका दिमाग चोरी हो गया। बिल्कुल नही। असल में फर्क पड़ता है कॉन्टेक्स्ट यानी उस माहौल से जो उसके चारों तरफ है। चार्ल्स पेलरीन कहते है कि एक लीडर का सबसे बड़ा काम काम करना नही बल्कि एक ऐसा कॉन्टेक्स्ट बनाना है जिसमें लोग खुद ब खुद अच्छा काम करने लगे। इसे ऐसे समझिए कि अगर आप रेगिस्तान में गुलाब का पौधा लगाएंगे तो चाहे आप कितनी भी खाद डाल ले, वो सूख ही जाएगा। कमी पौधे में नही, उस माहौल में है।

ज्यादातर बॉस अपनी टीम को ऐसे ट्रीट करते है जैसे वो जिम के ट्रेनर हो, बस डंडा लेकर खड़े रहेंगे और चिल्लाएंगे कि और मेहनत करो। लेकिन नासा का तरीका अलग है। वो जानते है कि अगर कॉन्टेक्स्ट जहरीला है तो दुनिया का बेस्ट इंजीनियर भी वहां कबाड़ ही प्रोड्यूस करेगा। एक मजेदार मिसाल देखिए। मान लीजिए आप एक ऐसी शादी में गए है जहां दूल्हा और दुल्हन के घरवाले आपस में लड़ रहे है। वहां खाना कितना भी लजीज क्यों न हो, आपको हजम नही होगा क्योंकि वहां का कॉन्टेक्स्ट खराब है। टीम के साथ भी यही होता है। अगर ऑफिस में पॉलिटिक्स चल रही है और लोग एक दूसरे की टांग खींच रहे है, तो आप चाहे कितना भी मोटिवेशनल भाषण दे दे, परफॉरमेंस जीरो ही रहेगी।

हम लोग अक्सर कंटेंट पर फोकस करते है यानी कि क्या काम करना है, लेकिन कॉन्टेक्स्ट को भूल जाते है कि काम किस माहौल में करना है। चार्ल्स ने अपनी रिसर्च में पाया कि जब लोग खुद को सुरक्षित महसूस करते है और उन्हें लगता है कि उनकी कद्र हो रही है, तो उनका दिमाग १० गुना बेहतर चलता है। लेकिन हमारे यहाँ तो लीडरशिप का मतलब है टीम को डराकर रखना। अगर आपकी टीम आपसे सवाल पूछने से डरती है, तो मुबारक हो, आपने अपनी टीम को प्रोफेशनल गूंगा बना दिया है। और फिर आप उम्मीद करते है कि ये लोग नासा जैसा इनोवेशन करेंगे। यह तो वही बात हुई कि आप किसी के पैर बांध दे और फिर उससे उम्मीद करे कि वो उसैन बोल्ट का रिकॉर्ड तोड़ दे।

सच्चाई तो यह है कि कॉन्टेक्स्ट अदृश्य होता है पर इसका असर सबसे ज्यादा दिखता है। एक लीडर के तौर पर आपकी बातचीत, आपका व्यवहार और आपकी बॉडी लैंग्वेज ही वो माहौल तय करती है। अगर आप खुद सुबह १० बजे ऑफिस आकर फ्रस्ट्रेटेड रहते है, तो आपकी टीम से खुशमिजाजी की उम्मीद करना बेवकूफी है। नासा में उन्होंने इसे मैनेज करने के लिए 'एप्रिसिएशन' और 'शेयर्ड विजन' को टूल की तरह इस्तेमाल किया। अगर आप अपनी टीम को यह नही बता पा रहे कि उनका छोटा सा काम एक बड़े मिशन में कैसे मदद कर रहा है, तो वो बस अपनी शिफ्ट खत्म होने का इंतजार करेंगे।

हम लोग अपनी कार की सर्विसिंग पर हजारों खर्च कर देते है ताकि वो स्मूथ चले, लेकिन टीम के बीच की कड़वाहट को साफ करने के लिए एक 'थैंक यू' तक नही बोलते। यह जो छोटी-छोटी बातें है, यही कॉन्टेक्स्ट बनाती है। जब टीम का कॉन्टेक्स्ट पॉजिटिव होता है, तो गलतियां कम होती है और लोग जिम्मेदारी लेना शुरू करते है। नासा ने इसी तरीके से अपनी टीम्स को मिशन क्रिटिकल बनाया। जब माहौल में भरोसा होता है, तो लोग अपनी कमियां छुपाते नही बल्कि उन्हें सुधारने के लिए मदद मांगते है। और यही वो मोड़ है जहां एक आम टीम एक लेजेंडरी टीम बन जाती है। अब जब आप माहौल बनाना सीख गए है, तो चलिए जानते है उस खतरे के बारे में जो अच्छे से अच्छे मिशन को मिट्टी में मिला सकता है।


लेसन ३ : सोशल रिस्क - क्यों सिर्फ अकलमंद होना काफी नही है

क्या आपको लगता है कि अगर आप दुनिया के सबसे जीनियस लोगों को एक कमरे में भर देंगे तो वे एक कमाल का रॉकेट बना लेंगे। अगर आपका जवाब हा है तो आप गलत है। नासा के इतिहास में सबसे बड़े एक्सीडेंट्स इसलिए नही हुए कि वहां लोगों को गणित नही आता था बल्कि इसलिए हुए क्योंकि वहां लोग एक दूसरे से बात करने में डरते थे। इसी को चार्ल्स पेलरीन सोशल रिस्क कहते है। यह वो अदृश्य खतरा है जो बड़े से बड़े टैलेंट को दीमक की तरह खा जाता है।

मान लीजिए आप एक ट्रिप पर जा रहे है और आपको पता है कि गाड़ी का टायर पंचर है। लेकिन आप ड्राइवर को नही बताते क्योंकि ड्राइवर बहुत गुस्से वाला है और आपको डर है कि वो आप पर चिल्लाएगा। नतीजा। आपकी गाड़ी खाई में गिर जाती है। यहां गलती टायर की नही थी बल्कि उस सोशल रिस्क की थी जिसकी वजह से आपने सच बोलना ठीक नही समझा। ऑफिस में भी यही होता है। जब एक जूनियर को पता होता है कि प्रोजेक्ट में कोई बड़ी गलती है लेकिन वो अपने बॉस के ईगो के डर से चुप रहता है तो इसे ही मिशन क्रिटिकल फेलियर कहते है।

हम लोग अक्सर आईक्यू (IQ) के पीछे भागते है लेकिन ईक्यू (EQ) और सोशल इंटेलिजेंस को भूल जाते है। नासा ने सीखा कि अगर आपकी टीम में सोशल रिस्क हाई है तो समझ लीजिए आप एक टाइम बम पर बैठे है। चार्ल्स कहते है कि जब लोग खुद को जज किए जाने के डर से जीते है तो उनकी क्रिएटिविटी मर जाती है। मजेदार बात यह है कि हम लोग अपने सोशल मीडिया पर तो बड़े कूल बनते है लेकिन जब असल में टीम के सामने अपनी गलती माननी होती है तो हमारी सांसें फूलने लगती है। यह वही डर है जो नासा जैसे संस्थानों को भी ले डूबता है।

एक लीडर का काम है इस सोशल रिस्क को कम करना। आपको अपनी टीम के लिए एक ऐसा सेफ्टी नेट बनाना होगा जहां कोई भी अपनी बात बिना डरे रख सके। अगर आपकी टीम में लोग गलती छुपा रहे है तो इसका मतलब है कि आपने उन्हें सुधारने का नही बल्कि डराने का माहौल दिया है। यह तो वही बात हुई कि डॉक्टर मरीज को इसलिए डांट रहा है क्योंकि उसे बीमारी हुई है। अगर मरीज सच नही बताएगा तो डॉक्टर इलाज कैसे करेगा। ठीक वैसे ही अगर टीम अपनी कमियां नही बताएगी तो मिशन कभी कामयाब नही होगा।

रॉकेट लोहे और फ्यूल से नही बल्कि भरोसे और टीम वर्क से उड़ते है। नासा की सफलता का राज सिर्फ उनकी बड़ी मशीनें नही बल्कि उनकी टीम के बीच का वो मजबूत रिश्ता है जो मुश्किल समय में भी नही टूटता। अगर आप अपनी टीम को सिर्फ सैलरी के लिए काम करने वाले मजदूरों की तरह देखेंगे तो आपकी कंपनी कभी चांद तक नही पहुंच पाएगी। लेकिन अगर आप इन सोशल स्किल्स को मास्टर कर लेते है तो यकीन मानिए आसमान भी आपके लिए छोटा पड़ जाएगा।


नासा की यह कहानी हमें सिखाती है कि सफलता सिर्फ हार्ड वर्क से नही बल्कि सही हार्ट वर्क से मिलती है। आपकी टीम आपकी सबसे बड़ी एसेट है। आज ही अपनी टीम के साथ बैठिए और उनसे काम की नही बल्कि उनके दिल की बात कीजिए। देखिए कि क्या वे खुद को सुरक्षित महसूस करते है। अगर आप आज बदलाव नही करेंगे तो कल शायद आपके पास कोई टीम ही न बचे। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिए जो अपनी टीम को लीड कर रहे है और कमेंट में बताइए कि आपकी टीम की सबसे बड़ी ताकत क्या है।

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