क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर बिजी रहने का नाटक तो करते हैं पर काम रत्ती भर भी नहीं होता। मुबारक हो आप अपनी जिंदगी के कीमती घंटे रील स्क्रॉल करने और बिना मतलब के नोटिफिकेशन चेक करने में बर्बाद कर रहे हैं। अगर यही हाल रहा तो सक्सेस सिर्फ आपके सपनों में ही आएगी।
आज के इस दौर में जहां हमारा ध्यान चाय में डूबे बिस्कुट की तरह जल्दी टूट जाता है वहां फोकस करना एक सुपरपावर है। चलिए क्रिस बेली की बुक हाइपरफोकस से जानते हैं वह ३ लाइफ चेंजिंग लेसन्स जो आपकी प्रोडक्टिविटी को रॉकेट की तरह उड़ा देंगे।
लेसन १ : हाइपरफोकस - एक समय में एक ही काम का जादू
आजकल के जमाने में हम सब खुद को शक्तिमान समझने की गलती कर बैठते हैं। हमें लगता है कि हम एक हाथ से ईमेल टाइप कर सकते हैं और दूसरे हाथ से समोसा खाते हुए नेटफ्लिक्स देख सकते हैं। इसे हम बड़े गर्व से मल्टीटास्किंग कहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि आपका दिमाग कोई सुपर कंप्यूटर नहीं है बल्कि वह एक पुराने जमाने के रेडियो जैसा है जो एक बार में एक ही स्टेशन पकड़ता है। जब आप एक साथ दस काम करने की कोशिश करते हैं तो असल में आप किसी भी काम को ढंग से नहीं कर रहे होते। आप बस अपने दिमाग को एक काम से दूसरे काम पर टेनिस बॉल की तरह टप्पा खिलवा रहे होते हैं। क्रिस बेली इसे अटेंशन स्पेस कहते हैं। आपके दिमाग में काम करने की एक फिक्स जगह है और जब आप उसमें फालतू की चीजें भर देते हैं तो असली काम के लिए जगह ही नहीं बचती।
मान लीजिए आप अपनी गर्लफ्रेंड या बॉयफ्रेंड के साथ डेट पर बैठे हैं। अब अगर आप सामने वाले की आंखों में देखने के बजाय हर दो मिनट में अपना फोन चेक कर रहे हैं तो यकीन मानिए आप वहां हैं ही नहीं। आपका शरीर वहां कुर्सी पर पड़ा है पर आपका दिमाग कहीं और इंस्टाग्राम की गलियों में घूम रहा है। यही हाल हमारे काम का होता है। हम लैपटॉप खोलकर बैठते तो हैं रिपोर्ट बनाने के लिए पर जैसे ही पिंकी का मैसेज आता है हमारा फोकस रिपोर्ट छोड़कर पिंकी के रिप्लाई पर चला जाता है। फिर वापस रिपोर्ट पर आने में दिमाग को उतनी ही मेहनत लगती है जितनी सर्दी की सुबह रजाई से बाहर निकलने में लगती है। हाइपरफोकस का मतलब है अपने अटेंशन स्पेस को पूरी तरह से केवल एक ही महत्वपूर्ण काम से भर देना। जब आप ऐसा करते हैं तो आप कम समय में वह काम कर लेते हैं जिसे दूसरे लोग पूरा दिन लगाकर भी नहीं कर पाते।
हाइपरफोकस में उतरने के लिए आपको अपने दिमाग को यह बताना होगा कि भाई अभी सिर्फ यह एक काम ही दुनिया का सबसे जरूरी काम है। चाहे आसमान गिर जाए या पड़ोस वाले शर्मा जी का कुत्ता भौंकने लगे आपको अपनी नजरें स्क्रीन या कागज से नहीं हटानी हैं। शुरू में यह बहुत मुश्किल लगेगा क्योंकि हमारा दिमाग एक बिगड़े हुए बच्चे की तरह है जिसे हर पल कुछ नया और चमकता हुआ चाहिए। लेकिन जैसे ही आप इस स्टेट में पहुंच जाते हैं तो आपको समय का पता ही नहीं चलता। इसे ही लोग फ्लो स्टेट कहते हैं। तो अगर आप चाहते हैं कि आपका बॉस आपकी तारीफ करे या आपका स्टार्टअप वाकई में कुछ कमाल करे तो मल्टीटास्किंग के इस कीड़े को मारना होगा। एक बार में एक काम करना कोई कमजोरी नहीं बल्कि आज के शोर शराबे वाले दौर में सबसे बड़ी समझदारी है।
लेसन २ : स्कैटरफोकस - दिमाग को भटकने देने की कला
अभी हमने बात की कि फोकस करना कितना जरूरी है पर क्या आप जानते हैं कि चौबीस घंटे फोकस करना नामुमकिन है। अगर आप जबरदस्ती अपने दिमाग को हर वक्त काम में जोते रखेंगे तो आपका दिमाग गरम होकर फटने लगेगा। यहीं पर एंट्री होती है स्कैटरफोकस की। स्कैटरफोकस का मतलब है अपने दिमाग को खुला छोड़ देना ताकि वह इधर-उधर भटक सके। यह वह समय होता है जब आप जानबूझकर कोई काम नहीं कर रहे होते। जैसे कि नहाते समय या पार्क में टहलते समय अक्सर हमें बड़े कमाल के आइडियाज आते हैं। कभी सोचा है ऐसा क्यों होता है। क्योंकि जब आप फोकस नहीं कर रहे होते तब आपका दिमाग पुरानी यादों और नई जानकारी के बीच डॉट्स कनेक्ट कर रहा होता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप पूरे दिन जिम में पसीना बहाते हैं लेकिन आपकी मसल्स तब बनती हैं जब आप रात को सो रहे होते हैं।
मान लीजिए आप एक बहुत मुश्किल पहेली सुलझाने की कोशिश कर रहे हैं। आप दो घंटे से अपना सिर पटक रहे हैं पर जवाब नहीं मिल रहा। फिर आप हार मानकर चाय पीने चले जाते हैं। अचानक जैसे ही आप बिस्कुट चाय में डुबोते हैं आपके दिमाग की बत्ती जल जाती है और आपको जवाब मिल जाता है। अब आप सोचेंगे कि क्या चाय के बिस्कुट में कोई जादू था। बिल्कुल नहीं। असल में जब आपने फोकस करना बंद किया तो आपके दिमाग को वह सांस लेने की जगह मिल गई जहां वह क्रिएटिव हो सके। हम भारतीयों की आदत होती है कि अगर हम खाली बैठे हैं तो हमें लगता है कि हम टाइम बर्बाद कर रहे हैं। मम्मी पीछे से आकर बोल देंगी कि खाली क्यों बैठा है कुछ काम ही कर ले। लेकिन सच तो यह है कि यह खाली समय ही आपके दिमाग का रिचार्जिंग स्टेशन है।
क्रिस बेली कहते हैं कि आपको स्कैटरफोकस को अपनी डेली लाइफ का हिस्सा बनाना चाहिए। इसका मतलब यह नहीं है कि आप दिन भर सोफे पर पड़े रहें और कहें कि मैं तो स्कैटरफोकस कर रहा हूँ। इसका मतलब है ऐसी एक्टिविटीज करना जिसमें दिमाग पर जोर न पड़े जैसे कि पौधों को पानी देना या बर्तन धोना। जब आप ऐसे काम करते हैं तो आपका दिमाग आजाद हो जाता है। वह पास्ट की गलतियों से सीखता है और फ्यूचर की प्लानिंग करता है। यह वह समय होता है जब आपके सबसे बेहतरीन बिजनेस आइडियाज या लाइफ की मुश्किलों के हल सामने आते हैं। तो अगर आप चाहते हैं कि आपका काम सिर्फ हार्ड वर्क न रहे बल्कि स्मार्ट वर्क बन जाए तो अपने दिमाग को कभी-कभी आवारागर्दी करने की परमिशन जरूर दें। यह भटकाव आपको भटकाएगा नहीं बल्कि सही रास्ता दिखाएगा।
लेसन ३ : डिस्ट्रैक्शन मैनेजमेंट - ध्यान भटकाने वाली चीजों की विदाई
आज के दौर में हमारा फोकस एक कांच के गिलास जैसा हो गया है जो जरा सी आहट से ही चकनाचूर हो जाता है। आप बड़े जोश के साथ काम शुरू करते हैं और तभी आपके फोन की स्क्रीन चमकती है 'राहुल ने आपकी फोटो पर कमेंट किया है'। बस वहीं आपका खेल खत्म। आप एक मिनट का बोलकर इंस्टाग्राम पर जाते हैं और फिर आधे घंटे बाद होश आता है कि आप तो किसी रशियन इन्फ्लुएंसर के वर्कआउट वीडियो देख रहे हैं। क्रिस बेली कहते हैं कि हम डिस्ट्रैक्शंस के इतने आदी हो चुके हैं कि हमारा दिमाग खुद ही उन्हें ढूंढता है। जब काम थोड़ा बोरिंग या मुश्किल होने लगता है तो दिमाग को चाहिए होता है डोपामाइन का एक छोटा सा शॉट। और वह शॉट मिलता है उन नोटिफिकेशंस और फालतू की खबरों से।
सोचिए आप एक सर्जरी कर रहे डॉक्टर हैं। क्या आप ऑपरेशन के बीच में अपना फोन चेक करेंगे कि कल के मैच में कौन जीता। बिल्कुल नहीं। तो फिर अपने काम को इतना हल्का क्यों समझते हैं। असल में हमारी सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि हमारे पास समय कम है बल्कि यह है कि हमारी अटेंशन बिखरी हुई है। डिस्ट्रैक्शंस चार तरह के होते हैं। पहले वह जो जरूरी और मजेदार होते हैं जैसे कोई जरूरी कॉल। दूसरे वह जो गैर जरूरी पर मजेदार होते हैं जैसे सोशल मीडिया। तीसरे वह जो बोरिंग पर जरूरी होते हैं जैसे ऑफिस की मीटिंग्स। और चौथे वह जो बोरिंग और गैर जरूरी दोनों होते हैं जैसे स्पैम ईमेल्स। आपको इन सबका इलाज करना होगा।
अपने वर्कस्पेस को एक मंदिर की तरह साफ रखिए। अगर आपकी मेज पर दस फालतू चीजें पड़ी हैं तो आपका दिमाग बार-बार उनकी तरफ जाएगा। फोन को दूसरे कमरे में फेंक दीजिए या कम से कम 'डू नॉट डिस्टर्ब' मोड पर डाल दीजिए। यह जो आपके दोस्त बार-बार 'भाई एक बात सुन' कहकर आते हैं उन्हें प्यार से समझा दीजिए कि अभी आप दुनिया के लिए मर चुके हैं। जब आप अपने आसपास के वातावरण को कंट्रोल करते हैं तभी आप अपने दिमाग को कंट्रोल कर पाते हैं। याद रखिए हर बार जब आपका ध्यान भटकता है तो उसे वापस काम पर लाने में कम से कम बीस मिनट का समय लगता है। इसका मतलब है कि अगर आप दिन में पांच बार फोन चेक करते हैं तो आपने अपने कीमती डेढ़ दो घंटे नाले में बहा दिए।
अक्सर हम कहते हैं कि हम बहुत बिजी हैं पर असल में हम सिर्फ डिस्ट्रैक्टेड होते हैं। बिजी होना और प्रोडक्टिव होना दो अलग बातें हैं। गधा भी दिन भर बिजी रहता है पर वह कोई कंपनी नहीं खड़ा कर पाता। अगर आप चाहते हैं कि आपके काम में वजन हो तो आपको अपनी अटेंशन की पहरेदारी करनी होगी। फालतू के नोटिफिकेशंस को ऑफ कीजिए और अपने सबसे जरूरी काम को वह सम्मान दीजिए जिसका वह हकदार है। जब आप अपने डिस्ट्रैक्शंस को मैनेज करना सीख जाते हैं तभी आप सही मायने में अपनी जिंदगी के मालिक बनते हैं।
हाइपरफोकस सिर्फ एक किताब नहीं बल्कि आज के शोर भरे संसार में जीने का एक तरीका है। हमने सीखा कि कैसे एक समय में एक काम करना जादू की तरह काम करता है कैसे दिमाग को खाली छोड़ना नई ऊर्जा देता है और कैसे डिस्ट्रैक्शंस को रोककर हम अपने समय को बचा सकते हैं। अब फैसला आपके हाथ में है। क्या आप वही औसत जिंदगी जीना चाहते हैं जहां आप हर वक्त थके हुए और अधूरे महसूस करते हैं या फिर आप अपनी अटेंशन को अपनी सुपरपावर बनाना चाहते हैं। आज ही कमेंट्स में बताएं कि वह कौन सा एक डिस्ट्रैक्शन है जिसे आप कल से अपनी लाइफ से हटा देंगे। चलिए साथ मिलकर अपने फोकस को बुलंद करते हैं।
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