Don't Pay for Your MBA (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो लाखों का लोन लेकर एमबीए की डिग्री दीवार पर टांगने का सपना देख रहे हैं। बधाई हो। आप अपनी मेहनत की कमाई और जिंदगी के दो कीमती साल एक ऐसे कागज के टुकड़े के पीछे बर्बाद कर रहे हैं जिसकी वैल्यू अब कचरे के भाव जितनी ही बची है।

अगर आपको लगता है कि सिर्फ भारी फीस भरने से ही बिजनेस की समझ आएगी तो आपकी मासूमियत पर हमें तरस आता है। लोरी पिकार्ड की यह किताब आपको वह सच दिखाएगी जिससे कॉलेज डरते हैं। चलिए जानते हैं कैसे आप बिना बैंक बैलेंस खाली किए टॉप क्लास बिजनेस एजुकेशन खुद ही हासिल कर सकते हैं और दुनिया को पीछे छोड़ सकते हैं।


लेसन १ : अपना खुद का सिलेबस बनाएं और कॉलेज की गुलामी छोड़ें

आज के दौर में अगर आप अभी भी यह सोच रहे हैं कि कोई बड़ा कॉलेज आपको बिजनेस करना सिखाएगा तो शायद आप अभी भी नब्बे के दशक में जी रहे हैं। कॉलेज वाले आपको वही घिसी पिटी थ्योरी बेच रहे हैं जो इंटरनेट पर मुफ्त में धूल फांक रही है। लोरी पिकार्ड का सबसे पहला और बड़ा लेसन यही है कि अपना खुद का सिलेबस खुद डिजाइन करें। कॉलेज में आप उन सब्जेक्ट्स के लिए भी पैसे देते हैं जिनका आपकी असल जिंदगी या करियर से दूर दूर तक कोई लेना देना नहीं होता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक पूरी थाली के पैसे दें लेकिन आपको सिर्फ दाल चावल ही खाना हो।

सोचिए आपके पड़ोस वाले शर्मा जी का बेटा दो साल तक एमबीए कॉलेज में रहा और लाखों रुपए फूंकने के बाद उसे पता चला कि जो मार्केटिंग वह वहां सीख रहा था वह तो इंस्टाग्राम के नए अपडेट के सामने पुरानी पड़ चुकी है। यह उन लोगों की कहानी है जो सिलेबस को भगवान मानते हैं। असल में बिजनेस की दुनिया हर मिनट बदल रही है। किताब कहती है कि आपको एमओओसी (MOOC) यानी मैसिव ओपन ऑनलाइन कोर्सेज का इस्तेमाल करना चाहिए। कोर्सेरा या ईडीएक्स जैसे प्लेटफॉर्म्स पर हार्वर्ड और एमआईटी जैसे बड़े संस्थानों के कोर्सेज फ्री में या बहुत कम पैसों में उपलब्ध हैं।

अपना सिलेबस बनाने का मतलब यह नहीं है कि आप कुछ भी पढ़ने लगें। आपको एक जासूस की तरह यह देखना होगा कि आपकी इंडस्ट्री में अभी किस स्किल की सबसे ज्यादा मांग है। अगर आप डेटा एनालिटिक्स में जाना चाहते हैं तो आपको फाइनेंस की उन भारी भरकम किताबों को रटने की जरूरत नहीं है जो सिर्फ लाइब्रेरी की शोभा बढ़ाती हैं। आपको सिर्फ वही उठाना है जो आपके काम का है। यह स्मार्ट तरीका आपको उन लोगों से मीलों आगे ले जाएगा जो सिर्फ एक डिग्री के कागज के लिए अपनी रातों की नींद और बैंक का बैलेंस खराब कर रहे हैं।

लोग अक्सर डरते हैं कि बिना डिग्री के उन्हें नौकरी कौन देगा। लेकिन सच तो यह है कि आज की बड़ी कंपनियां यह नहीं पूछतीं कि आपने किस कॉलेज के कैंटीन में समोसे खाए हैं। वे यह पूछती हैं कि क्या आपको काम आता है। जब आप खुद अपना सिलेबस बनाते हैं तो आप सिर्फ वही सीखते हैं जो मार्केट में बिकता है। आप अपनी पढ़ाई के खुद मालिक होते हैं। आप अपनी स्पीड से सीखते हैं। अगर आपको कोई टॉपिक समझ नहीं आ रहा तो आप उसे दस बार देख सकते हैं जबकि कॉलेज में प्रोफेसर को आपकी समझ से ज्यादा अपनी सैलरी और समय की चिंता होती है।

लोग नेटवर्किंग के नाम पर कॉलेज के फेस्ट में नाचते गाते हैं और सोचते हैं कि वे बिजनेस टाइकून बन जाएंगे। असल बिजनेस नेटवर्किंग और एजुकेशन आपकी खुद की बनाई हुई राह पर चलने से आती है। जब आप खुद अपनी स्किल्स चुनते हैं तो आप एक स्पेशलिस्ट बनते हैं न कि एक भीड़ का हिस्सा। तो भाई साहब अपनी अक्ल का इस्तेमाल कीजिए और उन भारी भरकम किताबों के बोझ से बाहर निकलिए। अपना खुद का एमबीए डिजाइन कीजिए और दुनिया को दिखा दीजिए कि सीखने के लिए लाखों का कर्ज लेना जरूरी नहीं है।


लेसन २ : स्मार्ट नेटवर्किंग और बिना कॉलेज के कनैक्शंस बनाना

अक्सर लोग एमबीए कॉलेज सिर्फ इसलिए जाते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि वहां उन्हें बड़े-बड़े लोगों के साथ उठने-बैठने का मौका मिलेगा। उन्हें लगता है कि कैंपस की हवा में ही कुछ ऐसा जादू है कि वे रातों-रात बिजनेस के धुरंधर बन जाएंगे। लेकिन सच तो यह है कि आजकल कॉलेज की नेटवर्किंग सिर्फ साथ में चाय पीने और एग्जाम के नोट्स शेयर करने तक ही सीमित रह गई है। लोरी पिकार्ड का दूसरा सबसे अहम लेसन यह है कि आपको नेटवर्किंग के लिए किसी आलीशान कैंपस की जरूरत नहीं है। आप अपने घर के सोफे पर बैठकर भी दुनिया के सबसे सफल लोगों के साथ अपना नेटवर्क बना सकते हैं।

मान लीजिए आपके एक दोस्त हैं जिनका नाम राजू है। राजू ने लाखों का लोन लेकर एक नामी कॉलेज में एडमिशन लिया ताकि वह बड़े इन्वेस्टर्स से मिल सके। लेकिन दो साल बाद उसे पता चला कि उसके पास सिर्फ अपने जैसे ही उन बेरोजगार दोस्तों का ग्रुप है जो खुद नौकरी की तलाश में हैं। दूसरी तरफ आप हैं जो लिंक्डइन और ट्विटर का सही इस्तेमाल करना जानते हैं। यह किताब कहती है कि असली नेटवर्किंग का मतलब सिर्फ लोगों से हाथ मिलाना नहीं है बल्कि उनकी लाइफ में वैल्यू जोड़ना है। अगर आप किसी एक्सपर्ट को एक बहुत अच्छा सुझाव देते हैं या उनके काम की तारीफ करते हैं तो वे आपसे जुड़ने में ज्यादा दिलचस्पी लेंगे।

लोग सोचते हैं कि कॉलेज के एलुमनाई नेटवर्क के बिना उनका करियर डूब जाएगा। भाई साहब आज इंटरनेट के जमाने में हर सफल आदमी बस एक मैसेज की दूरी पर है। बस आपको यह पता होना चाहिए कि दरवाजा खटखटाना कैसे है। अगर आप किसी कंपनी के सीईओ को एक ऐसा ईमेल लिखते हैं जिसमें आप उनकी किसी समस्या का हल बता रहे हैं तो वह आपकी डिग्री नहीं देखेगा। वह आपका काम देखेगा। यह स्मार्ट नेटवर्किंग का सबसे बड़ा हथियार है। कॉलेज में आप सिर्फ उन लोगों से मिलते हैं जो आपकी क्लास में बैठे हैं लेकिन इंटरनेट पर आप पूरी दुनिया के टैलेंट से जुड़ सकते हैं।

नेटवर्किंग का मतलब यह कतई नहीं है कि आप हर किसी को अपना सीवी भेजने लगें। यह वैसा ही है जैसे आप किसी की शादी में बिना बुलाए चले जाएं और वहां खाना खाने के बाद उनसे काम मांगें। यह काम नहीं करता है। आपको पहले अपना पोर्टफोलियो बनाना होगा। जब आप इंटरनेट पर अपनी स्किल्स दिखाते हैं तो लोग खुद आपके पास आते हैं। किताब में बताया गया है कि आपको इंफोर्मेशनल इंटरव्यूज करने चाहिए। यानी उन लोगों से बात करें जो उस मुकाम पर पहुंच चुके हैं जहाँ आप जाना चाहते हैं। उनसे पूछिए कि उन्होंने क्या गलतियां कीं। यकीन मानिए एक कप कॉफी की कीमत पर मिलने वाली वह सलाह आपके दो साल के एमबीए प्रोग्राम से ज्यादा कीमती होगी।

आजकल के दौर में आपकी वैल्यू इस बात से नहीं तय होती कि आपके पास कौन से कॉलेज का टैग है। आपकी वैल्यू इस बात से तय होती है कि आपके नेटवर्क में कितने लोग आपको आपके काम की वजह से पहचानते हैं। अगर आप सिर्फ कॉलेज के भरोसे बैठे रहे तो आप उसी भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे जो डिग्री हाथ में लिए नौकरी की लाइन में खड़ी है। स्मार्ट बनिए और अपनी नेटवर्किंग की दुकान खुद सजाइए। लोगों की मदद कीजिए उनके काम में हाथ बंटाइए और फिर देखिए कैसे बिना किसी कॉलेज फीस के आपका नेटवर्क आपको आसमान की ऊंचाइयों पर ले जाता है।


लेसन ३ : एप्लाइड नॉलेज और डिग्री से बड़ा पोर्टफोलियो

अब बात करते हैं उस सबसे बड़े झूठ की जो समाज ने आपके कान में फूंका है कि डिग्री होगी तो ही इज्जत होगी। सच तो यह है कि डिग्री सिर्फ उस एंट्री गेट की चाबी है जो अब धीरे-धीरे जंग खा रही है। लोरी पिकार्ड का तीसरा और सबसे जरूरी लेसन यह है कि दुनिया को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आपने क्या पढ़ा है दुनिया को फर्क सिर्फ इस बात से पड़ता है कि आप क्या कर सकते हैं। इसे कहते हैं एप्लाइड नॉलेज। अगर आप तैरने पर दस किताबें पढ़ लें लेकिन पानी में उतरते ही पत्थर की तरह डूब जाएं तो उन किताबों का क्या फायदा। यही हाल उन एमबीए डिग्री धारकों का है जिन्हें थ्योरी तो पूरी रटी होती है लेकिन असल मार्केट में एक छोटा सा प्रोडक्ट बेचने में उनके पसीने छूट जाते हैं।

जरा सोचिए एक तरफ एक लड़का है जिसने दो साल तक मार्केटिंग की बड़ी-बड़ी डेफिनेशंस याद कीं और दूसरी तरफ आप हैं जिसने एक छोटा सा ऑनलाइन स्टोर शुरू किया और उसे प्रॉफिट में लाकर दिखाया। जब आप किसी जॉब इंटरव्यू में जाएंगे तो वह डिग्री वाला लड़का अपनी मार्कशीट दिखाएगा और आप अपना चलता हुआ बिजनेस दिखाएंगे। अब आप ही बताइए कि बॉस किसे चुनेगा। जाहिर है आपको क्योंकि आपने वह काम करके दिखाया है जिसे वह लड़का सिर्फ किताबों में पढ़ रहा था। यह किताब हमें सिखाती है कि अपना एक पोर्टफोलियो तैयार करें। पोर्टफोलियो यानी आपके काम का सबूत। चाहे वह कोई ब्लॉग हो कोई कंसल्टिंग प्रोजेक्ट हो या कोई छोटा सा स्टार्टअप।

लोग डिग्री पर बीस लाख खर्च करने को निवेश मानते हैं लेकिन खुद के किसी छोटे आईडिया पर दस हजार खर्च करने में उन्हें डर लगता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप जिम की मेंबरशिप तो ले लें लेकिन एक्सरसाइज करने के नाम पर सिर्फ वहां के एसी की हवा खाकर वापस आ जाएं। एप्लाइड नॉलेज का मतलब है अपने हाथ गंदे करना। जब आप खुद कोई काम करते हैं तो आप वह चीजें सीखते हैं जो कोई भी प्रोफेसर आपको ब्लैकबोर्ड पर नहीं समझा सकता। आप हारना सीखते हैं आप रिस्क लेना सीखते हैं और सबसे बड़ी बात आप यह सीखते हैं कि पैसा असल में बनता कैसे है।

आजकल की बड़ी टेक कंपनियां जैसे गूगल या एप्पल अब डिग्री नहीं मांगतीं। वे मांगती हैं स्किल्स। वे देखना चाहती हैं कि आपने पास्ट में क्या उखाड़ा है। अगर आपके पास दिखाने के लिए कोई शानदार प्रोजेक्ट है तो आपकी वो बिना मोहर वाली पढ़ाई उस गोल्ड मेडल से ज्यादा कीमती है जो किसी कॉलेज की अलमारी में बंद पड़ा है। हंसी आती है उन लोगों पर जो सोचते हैं कि डिग्री मिल गई तो लाइफ सेट है। भाई साहब लाइफ तब सेट होती है जब आपकी स्किल्स मार्केट की डिमांड से मैच करती हैं। यह किताब साफ कहती है कि अपने आप को एक प्रोजेक्ट मैनेजर की तरह देखें और हर रोज कुछ नया बनाकर उसे अपनी लिस्ट में जोड़ें।

एमबीए की असली वैल्यू उसके नाम में नहीं बल्कि उस काम में है जो आप उसके बाद करते हैं। अगर आप बिना पैसे खर्च किए वही सब सीख लेते हैं और उसे असल दुनिया में इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं तो आप असल में उन लोगों से बहुत आगे निकल चुके हैं जो अभी भी कॉलेज की कैंटीन में असाइनमेंट कॉपी कर रहे हैं। अपनी काबिलियत को कागज के एक टुकड़े तक सीमित मत रखिए। बाहर निकलिए काम कीजिए गलतियां कीजिए और एक ऐसा पोर्टफोलियो बनाइए जिसे देखकर बड़ी से बड़ी कंपनी आपको खुद बुलाए। असली जीत डिग्री में नहीं आपके काम के दम पर दुनिया बदलने में है।


अब फैसला आपका है। क्या आप अभी भी उस पुरानी भीड़ का हिस्सा बने रहना चाहते हैं जो सिर्फ एक डिग्री के भरोसे बैठी है। या फिर आप अपनी लाइफ के सीईओ खुद बनना चाहते हैं। आज ही अपनी पहली स्किल चुनिए और उस पर काम करना शुरू कीजिए। कमेंट में बताएं कि आप कौन सी ऐसी बिजनेस स्किल है जिसे बिना कॉलेज जाए मास्टर करना चाहते हैं। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जो लाखों का लोन लेकर एमबीए करने की सोच रहा है। शायद उसकी जिंदगी बदल जाए।

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