It's Not What You Sell, It's What You Stand For (Hindi)


आप शायद अभी भी यही सोच रहे हैं कि सिर्फ बढ़िया प्रोडक्ट बेचने से आप करोड़पति बन जाएंगे। क्या जोक मारा है आपने। सच तो यह है कि आपका बिजनेस बिना किसी बड़े पर्पस के एक लावारिस पतंग की तरह है जो आज नहीं तो कल जमीन पर गिरेगी ही। आप बस सेल करने के पीछे भाग रहे हैं और दुनिया के महान ब्रांड्स आपको पीछे छोड़कर रॉकेट की तरह आगे निकल रहे हैं। शर्म की बात है कि आप अब तक उस असली सीक्रेट को मिस कर रहे हैं जो एक दुकान और एक लीजेंड के बीच का अंतर है।

चिंता मत कीजिये क्योंकि आज हम इस कड़वे सच का सामना करेंगे। हम रॉय स्पेंस की इस बेहतरीन किताब के जरिए यह समझेंगे कि कैसे एक बड़ा मकसद आपके बिजनेस की पूरी किस्मत बदल सकता है।


लेसन १ : पर्पस ही असली प्रॉफिट है

अगर आप आज भी यह सोच रहे हैं कि बिजनेस का मतलब सिर्फ 'माल बेचना और गल्ला भरना' है, तो यकीन मानिए आप अभी भी उन्नीसवीं सदी में जी रहे हैं। रॉय स्पेंस अपनी किताब में सबसे पहले इसी भ्रम को तोड़ते हैं। वो कहते हैं कि लोग वह नहीं खरीदते जो आप बेचते हैं, बल्कि वह खरीदते हैं कि आप उस चीज के लिए खड़े क्यों हैं। इसे एक मिसाल से समझते हैं। मान लीजिये आप एक मोहल्ले में किराने की दुकान खोलते हैं। आपका मकसद है कि बस शाम तक पांच हजार की सेल हो जाए। अब आपके बगल में एक और लड़का दुकान खोलता है जिसका मकसद यह है कि उसके मोहल्ले का कोई भी बच्चा मिलावटी दूध न पिए।

अब आप खुद सोचिये। आप सिर्फ आटा-दाल बेच रहे हैं, लेकिन वह लड़का 'भरोसा' और 'सेहत' बेच रहा है। जब आपके पास कोई कस्टमर आएगा, तो आप उसे एक नंबर की तरह देखेंगे। लेकिन जब उसके पास कोई आएगा, तो वह उसे एक परिवार की तरह देखेगा। यही वह बारीक फर्क है जो एक मामूली दुकानदार और एक ब्रांड के बीच होता है। हम अक्सर प्रॉफिट के पीछे ऐसे भागते हैं जैसे कोई कुत्ता गाड़ी के पीछे भागता है। उसे पता ही नहीं होता कि अगर गाड़ी रुक गई तो करना क्या है।

अरे भाई, पैसा तो बाय-प्रोडक्ट है। वह तो खुद-ब-खुद आएगा ही। लेकिन अगर आपके पास कोई बड़ा मकसद नहीं है, तो आपकी कंपनी की आत्मा ही गायब है। आज के दौर में कस्टमर बहुत स्मार्ट हो गया है। उसे आपके डिस्काउंट से ज्यादा इस बात में दिलचस्पी है कि आप दुनिया को बेहतर बनाने के लिए क्या कर रहे हैं। अगर आप सिर्फ पैसा कमाने आए हैं, तो आप एक ट्रांजेक्शन कर रहे हैं। लेकिन अगर आप किसी प्रॉब्लम को सॉल्व करने आए हैं, तो आप एक रिलेशनशिप बना रहे हैं।

जरा गौर कीजिये। साउथवेस्ट एयरलाइंस का नाम सुना है आपने। उन्होंने सिर्फ प्लेन की टिकटें नहीं बेचीं। उन्होंने आम आदमी को उड़ने की आजादी दी। उनका पर्पस 'डेमोक्रेटाइजेशन ऑफ द स्काइज' था। जब आपका विजन इतना बड़ा होता है, तो आपकी टीम संडे को भी खुशी-खुशी काम पर आती है। वरना आपके ऑफिस में तो लोग सोमवार की सुबह ऐसे आते हैं जैसे किसी की तेरहवीं में जा रहे हों। अगर आप चाहते हैं कि आपका स्टार्टअप या बिजनेस कल को एक मिसाल बने, तो पहले अपनी तिजोरी देखना बंद कीजिये और अपने दिल के अंदर झाँकिये।

पूछिये खुद से कि अगर कल आपकी कंपनी बंद हो जाए, तो क्या दुनिया को वाकई कोई फर्क पड़ेगा। अगर जवाब 'ना' है, तो समझ जाइये कि आप बिजनेस नहीं कर रहे, बस टाइम पास कर रहे हैं। एक महान बिजनेस वह है जिसकी कमी दुनिया को खलनी चाहिए। जब आप किसी बड़े मिशन के लिए खड़े होते हैं, तो पूरी कायनात आपको सफल बनाने में जुट जाती है। और हाँ, इसका मतलब यह नहीं कि आप प्रॉफिट छोड़ दें। इसका मतलब सिर्फ इतना है कि प्रॉफिट को अपनी मंजिल नहीं, बल्कि अपनी गाड़ी का पेट्रोल समझिये। बिना पेट्रोल के गाड़ी नहीं चलेगी, लेकिन आप सिर्फ पेट्रोल भरने के लिए तो गाड़ी नहीं चलाते ना।

तो अगली बार जब आप अपने ऑफिस की कुर्सी पर बैठें, तो सेल की रिपोर्ट देखने से पहले यह देखिये कि आज आपने कितने लोगों की लाइफ में वैल्यू ऐड की है। क्योंकि अंत में जीतता वही है जो सिर्फ माल नहीं, बल्कि एक भरोसा खड़ा करता है।


लेसन २ : सर्विस से बड़ा कुछ नहीं

अगर आपको लगता है कि कस्टमर को सामान चेप देना ही 'सेल्स' है, तो आपको अपनी सोच का इलाज करवाने की सख्त जरूरत है। रॉय स्पेंस हमें सिखाते हैं कि असली बिजनेस सेल्स में नहीं, बल्कि 'सर्विस' में छुपा है। आज के जमाने में लोग इतने चालाक हो गए हैं कि उन्हें दूर से ही सेल्समैन की खुशबू आ जाती है। जैसे ही आप किसी शोरूम में घुसते हैं और वो सेल्समैन दांत चियार कर आपके पास आता है, आपका मन करता है कि वहीं से यू-टर्न ले लें। क्यों। क्योंकि आपको पता है कि उसे आपकी खुशी में नहीं, बल्कि आपकी जेब में रखे नोटों में दिलचस्पी है।

असली लीजेंड वह होता है जो कस्टमर की प्रॉब्लम को अपनी प्रॉब्लम समझ लेता है। इसे एक मजेदार उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिये आप एक जिम चलाते हैं। अब एक तरीका तो यह है कि आप हर किसी को साल भर की मेंबरशिप बेच दें और फिर दुआ करें कि वो कभी जिम की शक्ल न देखे। इससे आपकी जेब तो भर जाएगी, लेकिन आप कभी ब्रांड नहीं बन पाएंगे। दूसरा तरीका यह है कि आप उस बंदे को देखें जो अपने बढ़ते पेट से परेशान होकर आपके पास आया है। आप उसे सेल्स की नजर से नहीं, बल्कि उसकी हेल्थ सुधारने के मिशन से देखते हैं। आप उसे मोटिवेट करते हैं, उसका डाइट प्लान बनाते हैं और जब उसका वजन कम होता है, तो वो इंसान आपकी मार्केटिंग खुद करता है।

हकीकत तो यह है कि हम 'हेल्प' करने के बजाय 'हड़पने' के चक्कर में ज्यादा रहते हैं। अरे भाई, अगर आप किसी की लाइफ आसान बना रहे हैं, तो वो बंदा आपको छोड़कर कहीं नहीं जाएगा। लेकिन अगर आप उसे बस एक टारगेट की तरह देख रहे हैं, तो वो पहली फुर्सत में आपको टाटा-बाय बाय बोल देगा। सर्विस का मतलब सिर्फ मुस्कुराकर बात करना नहीं है, बल्कि उस वैल्यू को डिलीवर करना है जिसके लिए सामने वाले ने अपना पसीना बहाकर कमाया हुआ पैसा आपको दिया है।

अक्सर लोग पूछते हैं कि 'एप्पल' जैसी कंपनियां इतनी महंगी होने के बाद भी क्यों बिकती हैं। क्या वो सिर्फ फोन बेचते हैं। बिल्कुल नहीं। वो एक ऐसा एक्सपीरियंस और सर्विस देते हैं जो यूजर को स्पेशल फील कराता है। उनका पर्पस आपको सिर्फ एक गैजेट देना नहीं, बल्कि आपकी क्रिएटिविटी को पंख देना है। और यहाँ हमारे देसी बिजनेसमैन का हाल देखिये। प्रोडक्ट बेचते वक्त तो वो आपके पैर छुएगा, लेकिन जैसे ही कंप्लेंट लेकर जाओ, वो आपको ऐसे पहचानता भी नहीं जैसे आप उसके बचपन के दुश्मन हों।

सच तो यह है कि जो बिजनेस सिर्फ फायदे के लिए सर्विस देता है, उसका अंत बहुत बुरा होता है। सर्विस आपके खून में होनी चाहिए। जब आप इस नीयत से काम करते हैं कि 'मुझे आज किसी की जिंदगी थोड़ी और बेहतर बनानी है', तो बिजनेस का स्ट्रेस अपने आप खत्म हो जाता है। आप फिर कॉम्पिटिशन से नहीं डरते, क्योंकि आपको पता है कि आपसे बेहतर सर्विस और कोई नहीं दे सकता। याद रखिये, सेल से आपको कमीशन मिलता है, लेकिन अच्छी सर्विस से आपको एक ऐसा 'प्रमोटर' मिलता है जो मरते दम तक आपके साथ खड़ा रहता है। इसलिए अगली बार जब कोई क्लाइंट आपके पास आए, तो अपनी सेल की पिच रटने के बजाय, उसकी तकलीफ को गहराई से समझने की कोशिश कीजिये। क्योंकि दुनिया में सेल्समैन तो लाखों हैं, लेकिन सच्चे मददगार बहुत कम।


लेसन ३ : कल्चर ही कंपनी की जान है

अगर आपको लगता है कि ऑफिस में चार एसी लगा देने और दीवारों पर 'मोटिवेशनल कोट्स' चिपका देने से एक बढ़िया कंपनी बन जाती है, तो आप शायद किसी मुगालते में जी रहे हैं। रॉय स्पेंस अपनी किताब में बड़े साफ शब्दों में कहते हैं कि आपकी कंपनी का कल्चर ही उसका असली डीएनए है। और यह कल्चर किसी पॉलिसी बुक से नहीं, बल्कि आपके पर्पस से पैदा होता है। अगर आपकी टीम को यही नहीं पता कि वो सुबह उठकर ऑफिस आ क्यों रहे हैं, तो वो बस एक रोबोट की तरह काम करेंगे जो सिर्फ महीने की सात तारीख का इन्तजार करता है।

जरा सोचिये, आपके ऑफिस का माहौल कैसा है। क्या वहां लोग एक-दूसरे की टांग खींचने में लगे रहते हैं या फिर वो सब मिलकर किसी एक बड़े मकसद के लिए लड़ रहे हैं। इसे एक मजेदार मिसाल से समझिये। मान लीजिये आप एक सॉफ्टवेयर कंपनी चला रहे हैं। अगर आपके एम्प्लोयी को लगता है कि उसे सिर्फ 'कोड' लिखना है, तो वो बोर हो जाएगा। लेकिन अगर उसे यह पता है कि उसके लिखे कोड की वजह से देश के दूर-दराज गांव के किसी किसान की फसल खराब होने से बच रही है, तो उसकी एनर्जी का लेवल ही बदल जाएगा। वह फिर थकेगा नहीं, क्योंकि अब उसके पास काम करने की एक ठोस वजह है।

अक्सर बॉस लोग अपनी टीम को डराकर काम करवाना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि जितना ज्यादा प्रेशर होगा, उतनी ज्यादा प्रोडक्टिविटी आएगी। क्या मजाक है। डर से आप किसी से काम तो करवा सकते हैं, लेकिन उसका 'इन्नोवेशन' और 'लॉयल्टी' कभी नहीं जीत सकते। जब टीम को यह अहसास होता है कि कंपनी जिस मकसद के लिए खड़ी है, वो मकसद खुद उन लोगों से बड़ा है, तब जाकर एक 'एक्स्ट्राऑर्डिनरी' बिजनेस का जन्म होता है। वॉलमार्ट के फाउंडर सैम वॉल्टन ने जब शुरुआत की थी, तो उनका पर्पस कोई अरबपति बनना नहीं था। उनका मकसद था कि वो कम आमदनी वाले लोगों के पैसे बचा सकें ताकि वो एक बेहतर जिंदगी जी सकें। यही पर्पस उनके कल्चर में बस गया।

अगर आपका कल्चर खोखला है, तो दुनिया की कोई भी मार्केटिंग स्ट्रेटेजी आपको नहीं बचा पाएगी। आपके एम्प्लोयी ही आपके पहले और सबसे बड़े ब्रांड एम्बेसडर होते हैं। अगर वो खुश नहीं हैं, तो वो कस्टमर को कभी खुश नहीं रख पाएंगे। यह एक चेन रिएक्शन है। इसलिए राजनीति और चापलूसी वाले माहौल को खत्म कीजिये और एक ऐसा ईकोसिस्टम बनाइये जहाँ हर किसी को लगे कि उसका काम मायने रखता है। जब लोग आपके विजन पर भरोसा करने लगते हैं, तो वो आपके लिए नहीं, बल्कि उस विजन को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं।


तो दोस्तों, रॉय स्पेंस और हेली रशिंग की यह किताब हमें बस एक ही बात सिखाती है कि बिजनेस सिर्फ लेन-देन का खेल नहीं है, बल्कि यह एक बड़ा बदलाव लाने का जरिया है। अगर आप आज भी सिर्फ सेल्स और नंबर्स के पीछे भाग रहे हैं, तो रुकिए और सोचिये कि आपका असली मकसद क्या है। दुनिया को आपकी चीजों की जरूरत शायद न हो, लेकिन दुनिया को आपके 'पर्पस' की जरूरत हमेशा रहेगी।

क्या आपने कभी सोचा है कि आपका बिजनेस या आपका काम किस बड़े मकसद के लिए खड़ा है। अगर नहीं, तो आज ही अपनी डायरी उठाइए और लिखिये वह एक चीज जिसके लिए आप दुनिया में याद रखे जाना चाहते हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ जरूर शेयर कीजिये जो सिर्फ प्रॉफिट की रेस में अपनी पहचान खोते जा रहे हैं। याद रखिये, जब आप किसी चीज के लिए खड़े होते हैं, तभी दुनिया आपके पीछे खड़ी होती है।

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