क्या आप अब भी वही पुराने घिसे पिटे लीडर बने रहना चाहते हैं जो सिर्फ आर्डर देना जानता है। मुबारक हो। आपकी टीम बहुत जल्द आपका साथ छोड़ने वाली है और आप अकेले बैठकर अपनी ईगो को सहलाते रह जाएंगे। अगर आप बदलाव से डरते हैं तो यह आर्टिकल पढ़कर अपना टाइम खराब मत कीजिए।
लेकिन अगर आप सच में जानना चाहते हैं कि आपकी टीम आपको पीठ पीछे क्या बोलती है और आप अपनी लीडरशिप को कैसे बचा सकते हैं तो जॉन मैक्सवेल के ये तीन लेसन आपकी आंखें खोल देंगे। चलिए जानते हैं कैसे आप एक फेलियर से लेजेंड बन सकते हैं।
लेसन १ : सोलोइस्ट से कंडक्टर तक का सफर
सोचिए, आप एक म्यूजिक कॉन्सर्ट में हैं। स्टेज पर एक आदमी खड़ा है जो खुद ही तबला बजा रहा है खुद ही गिटार बजा रहा है और खुद ही माइक पर चिल्ला रहा है। क्या आप उसे जीनियस कहेंगे। बिल्कुल नहीं। आप कहेंगे कि यह पागल हो गया है। लीडरशिप में भी हम अक्सर यही गलती करते हैं। हम सोचते हैं कि अगर मैं सब कुछ खुद करूंगा तो काम परफेक्ट होगा। इसे कहते हैं सोलोइस्ट माइंडसेट। यानी वह अकेला खिलाड़ी जो सोचता है कि उसके बिना पत्ता भी नहीं हिलेगा। लेकिन जॉन मैक्सवेल कहते हैं कि अगर आप एक बड़े लेवल पर पहुंचना चाहते हैं तो आपको सोलोइस्ट से कंडक्टर बनना पड़ेगा। एक कंडक्टर खुद कोई इंस्ट्रूमेंट नहीं बजाता। वह बस हाथ में एक स्टिक लेकर खड़ा होता है। लेकिन उसकी असली ताकत यह है कि वह अलग अलग टैलेंट वाले लोगों को एक साथ जोड़ देता है।
क्या आपने कभी अपने ऑफिस के उस मैनेजर को देखा है जो छोटी छोटी चीजों में टांग अड़ाता है। उसे लगता है कि ईमेल का फॉन्ट भी वही डिसाइड करेगा। ऐसे लोग असल में अपनी टीम का दम घोंट देते हैं। जब आप सोलोइस्ट मोड में होते हैं तो आप अपनी कैपेसिटी के हिसाब से काम करते हैं। लेकिन जब आप कंडक्टर बनते हैं तो आप अपनी पूरी टीम की कैपेसिटी का इस्तेमाल करते हैं। यह शिफ्ट करना आसान नहीं है क्योंकि इसमें आपको अपनी ईगो को साइड में रखना पड़ता है। आपको यह मानना पड़ता है कि शायद आपकी टीम का कोई बंदा आपसे बेहतर काम कर सकता है। और सच तो यह है कि अगर आप अपनी टीम में सबसे स्मार्ट इंसान हैं तो इसका मतलब है कि आप गलत टीम में हैं।
एक कंडक्टर का काम म्यूजिक बजाना नहीं बल्कि म्यूजिक बनवाना है। आपको अपनी टीम के हर मेम्बर की स्ट्रेंथ को पहचानना होगा। जैसे एक कंडक्टर जानता है कि कब वायलिन को तेज होना चाहिए और कब ड्रम्स को धीमा होना चाहिए। वैसे ही आपको पता होना चाहिए कि किस सिचुएशन में कौन सा एम्प्लॉई बेस्ट परफॉर्म करेगा। अगर आप अपनी टीम को माइक्रो मैनेज कर रहे हैं तो आप म्यूजिक नहीं सिर्फ शोर मचा रहे हैं। सोलोइस्ट बनने में मेहनत बहुत है लेकिन इम्पैक्ट बहुत कम है। कंडक्टर बनने में दिमाग बहुत लगता है लेकिन उसका रिजल्ट पूरी दुनिया को सुनाई देता है। क्या आप अब भी स्टेज पर अकेले उछल कूद करना चाहते हैं या फिर एक शानदार ऑर्केस्ट्रा को लीड करना चाहते हैं। चॉइस आपकी है। लेकिन याद रखिए कि दुनिया तालियां कंडक्टर के लिए बजाती है अकेले चिल्लाने वाले के लिए नहीं।
लेसन २ : गोल्स से ग्रोथ की तरफ बढ़ना
ज्यादातर लीडर्स की लाइफ एक चूहा दौड़ की तरह होती है। उनके पास एक डायरी होती है जिसमें बड़े बड़े गोल्स लिखे होते हैं। अगले महीने इतनी सेल करनी है या अगले साल इतना बड़ा ऑफिस लेना है। गोल्स रखना अच्छी बात है लेकिन जॉन मैक्सवेल कहते हैं कि सिर्फ गोल्स पर फोकस करना आपको एक लिमिट में बांध देता है। जब आप गोल सेट करते हैं तो आप एक डेस्टिनेशन यानी मंजिल तय कर लेते हैं। जैसे ही आप वहां पहुंचते हैं आप रिलैक्स हो जाते हैं और आपकी ग्रोथ रुक जाती है। लेकिन जब आप ग्रोथ पर फोकस करते हैं तो आप किसी मंजिल पर नहीं रुकते बल्कि आप हर दिन बेहतर होने का सफर एन्जॉय करते हैं। इसे कहते हैं गोल्स माइंडसेट से ग्रोथ माइंडसेट की तरफ शिफ्ट होना।
मान लीजिए आपने गोल बनाया कि आपको दस किलो वजन कम करना है। आपने बहुत मेहनत की और वजन कम कर लिया। अब क्या। अब आप वापस समोसे और कचोरी पर टूट पड़ेंगे क्योंकि आपका गोल तो पूरा हो गया। लेकिन अगर आपका फोकस ग्रोथ यानी एक हेल्दी लाइफस्टाइल पर होता तो आप वजन कम होने के बाद भी अपनी हेल्थ पर ध्यान देते रहते। लीडरशिप में भी यही होता है। जब एक लीडर सिर्फ टारगेट पूरे करने के पीछे भागता है तो वह अपनी टीम को निचोड़ देता है। काम तो हो जाता है लेकिन टीम का मनोबल गिर जाता है। वहीं एक ग्रोथ ओरिएंटेड लीडर यह देखता है कि इस प्रोजेक्ट के बाद उसकी टीम ने क्या नया सीखा। क्या उनके स्किल्स पहले से बेहतर हुए।
सर्कस के शेर को भी गोल अचीव करना आता है। उसे पता है कि रिंग से कूदना है और उसे खाना मिल जाएगा। लेकिन वह ग्रो नहीं कर रहा है वह बस ट्रेन हो रहा है। क्या आप भी अपनी टीम को सिर्फ ट्रेन करना चाहते हैं या उन्हें ग्रो करना चाहते हैं। अगर आप अपनी टीम की ग्रोथ पर पैसा और टाइम इनवेस्ट करेंगे तो आपके गोल्स अपने आप पूरे हो जाएंगे। आपको उनके पीछे डंडा लेकर भागने की जरूरत नहीं पड़ेगी। एक लीडर के तौर पर आपको खुद से हर रोज पूछना चाहिए कि आज मैंने क्या नया सीखा। अगर आपकी नॉलेज पिछले साल वाली ही है तो आप अपनी टीम को आगे नहीं ले जा सकते। गोल्स आपको आज की जीत दिला सकते हैं लेकिन ग्रोथ आपको कल का सुपरस्टार बना देगी। इसलिए टारगेट की फाइलों को थोड़ी देर के लिए बाजू में रखिये और खुद को और अपनी टीम को बेहतर बनाने में लग जाइये।
लेसन ३ : पोजीशनल पावर से पर्सनल पावर की शिफ्ट
क्या आपको वह स्कूल का टीचर याद है जिसकी क्लास में सब इसलिए चुप बैठते थे क्योंकि उसके हाथ में एक मोटा डंडा होता था। जैसे ही वह क्लास से बाहर जाता था सब शोर मचाना शुरू कर देते थे। वह टीचर असल में लीडर नहीं था उसके पास सिर्फ पोजीशनल पावर थी। यानी उसकी कुर्सी और उसके हाथ का डंडा उसे ताकत देते थे। जॉन मैक्सवेल कहते हैं कि एक असली लीडर वह होता है जिसके पास पर्सनल पावर होती है। पोजीशनल पावर आपको टाइटल से मिलती है जैसे मैनेजर या डायरेक्टर। लेकिन पर्सनल पावर आपको अपने व्यवहार और अपने रिश्तों से कमानी पड़ती है। लोग आपकी बात इसलिए नहीं मानें क्योंकि उन्हें माननी पड़ेगी बल्कि इसलिए मानें क्योंकि वह दिल से आपकी इज्जत करते हैं।
कल्पना कीजिए कि आपके ऑफिस में आग लग गई है। अब वहां खड़ा हुआ सिक्योरिटी गार्ड अगर सबको चिल्लाकर बाहर जाने के लिए कहेगा तो सब उसकी बात मानेंगे। उस वक्त कोई यह नहीं पूछेगा कि भाई तेरी सैलरी कितनी है या तेरा पद क्या है। वह गार्ड उस पल में अपनी पर्सनल पावर यानी अपनी सूझबूझ से लीड कर रहा है। लीडरशिप कुर्सी का नाम नहीं है यह इम्पैक्ट का नाम है। अगर आप सोचते हैं कि ऑफिस में केबिन के बाहर बड़ा सा बोर्ड लगाकर आप लीडर बन गए हैं तो आप गलतफहमी में हैं। असली लीडरशिप तब शुरू होती है जब आप लोगों की केयर करना शुरू करते हैं। जब आपकी टीम को यह यकीन हो जाता है कि आप उनके साथ सिर्फ काम निकालने के लिए नहीं बल्कि उनके भले के लिए खड़े हैं।
पोजीशनल लीडर सिर्फ हुकुम चलाता है और पर्सनल लीडर हाथ पकड़कर साथ चलता है। पर्सनल पावर का मतलब है इन्फ्लुएंस। और इन्फ्लुएंस उधार नहीं मिलता इसे हर दिन की मेहनत से बनाना पड़ता है। अगर आपकी टीम आपसे सवाल पूछने में डरती है तो आपकी लीडरशिप खतरे में है। अपनी ईगो की दीवार को तोड़िए और लोगों से कनेक्ट होइए। याद रखिए कि लोग आपकी डिग्री को याद नहीं रखेंगे लेकिन वह इस बात को कभी नहीं भूलेंगे कि आपने उन्हें कैसा फील कराया। जिस दिन आपकी टीम आपके कहे बिना भी पूरी जान लगाकर काम करने लगे समझ लेना कि आपने पर्सनल पावर हासिल कर ली है। अब फैसला आपका है। आप डंडे वाला टीचर बनना चाहते हैं या वह मेंटर जिसके लिए लोग कुछ भी करने को तैयार हो जाएं।
लीडरशिप का यह सफर आसान नहीं है लेकिन यह मुमकिन है। आज ही अपने अंदर झांक कर देखिए कि आप किस मोड़ पर खड़े हैं। क्या आप बदलाव के लिए तैयार हैं। अगर यह आर्टिकल आपको पसंद आया और इसने आपकी सोच को थोड़ा भी बदला है तो इसे अपने उस दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जिसे एक अच्छे लीडर बनने की जरूरत है। कमेंट में बताएं कि आपको कौन सा लेसन सबसे ज्यादा पसंद आया। चलिए मिलकर एक बेहतर लीडरशिप वाली दुनिया बनाते हैं।
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