क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो गधे की तरह दिन रात मेहनत करके थक चुके हैं पर बैंक बैलेंस अभी भी खाली पड़ा है। बधाई हो आप अपनी लाइफ का कीमती वक्त और एनर्जी नाली में बहा रहे हैं क्योंकि आपको लेवरेज का ल भी नहीं पता। बिना टिपिंग पॉइंट समझे सक्सेस पाने का सपना देखना छोड़ दीजिये।
आज हम डार्बी चेकेट्स की शानदार किताब लेवरेज के बारे में बात करेंगे। यह बुक आपको सिखाएगी कि कैसे स्मार्ट लोग कम मेहनत करके आपसे दस गुना ज्यादा रिजल्ट्स अचीव कर लेते हैं। आइये जानते हैं वो ३ कमाल के लेसन्स जो आपकी जिंदगी बदल देंगे।
लेसन १ : अपनी एनर्जी को लेजर की तरह फोकस करना सीखें
अगर आपको लगता है कि आप एक साथ दस नावों पर पैर रखकर समंदर पार कर लेंगे तो आप डूबने की तैयारी कर रहे हैं। हमारे आसपास ऐसे बहुत से 'सुपरमैन' घूमते हैं जो ईमेल भी चेक कर रहे हैं खाना भी खा रहे हैं और फोन पर क्लाइंट से बात भी कर रहे हैं। अंत में होता क्या है। क्लाइंट भाग जाता है खाना ठंडा हो जाता है और ईमेल में स्पेलिंग मिस्टेक्स की भरमार होती है। डार्बी चेकेट्स कहते हैं कि लेवरेज का सबसे पहला नियम है अपनी पूरी ताकत को एक ही पॉइंट पर लगा देना। जैसे एक छोटा सा पत्थर अगर सही जगह पर मारा जाए तो वो कांच के बड़े पहाड़ को भी चकनाचूर कर सकता है। लेकिन अगर आप अपनी एनर्जी को हर तरफ बिखेर देंगे तो आप सिर्फ धूल उड़ाएंगे और कुछ नहीं।
जरा अपने पड़ोस के उस शर्मा जी को देखिये जो हर नए बिजनेस आइडिया पर ऐसे टूट पड़ते हैं जैसे फ्री की चाट मिल रही हो। कभी वो मोमोज की दुकान खोलते हैं तो कभी यूट्यूब चैनल शुरू कर देते हैं। नतीजा यह निकलता है कि आज वो अपनी पुरानी फटी हुई साइकिल पर ही घूम रहे हैं। क्यों। क्योंकि उन्होंने लेवरेज के पावर को कभी समझा ही नहीं। लेवरेज का मतलब यह नहीं है कि आप बहुत सारे काम करें। इसका मतलब है कि आप वो एक काम करें जो बाकी दस कामों को आसान या गैर जरूरी बना दे। इसे हम अक्सर अपनी भाषा में 'सही जगह पर हथौड़ा मारना' कहते हैं। अगर आप अपनी उंगलियों से दीवार तोड़ने की कोशिश करेंगे तो दीवार का तो पता नहीं पर आपके नाखून जरूर टूट जाएंगे। लेकिन वही ताकत अगर आप एक लोहे के हथौड़े यानी एक सही टूल पर लगा दें तो दीवार गिरना तय है।
बिजनेस में भी यही होता है। आप हर किसी को अपना कस्टमर नहीं बना सकते। अगर आप सबको खुश करने की कोशिश करेंगे तो आप किसी को भी खुश नहीं कर पाएंगे। अपनी नीश पकड़िये और वहां अपनी पूरी जान लगा दीजिये। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे जलते हुए सूरज की रोशनी पूरे शहर में फैली होती है पर किसी को नहीं जलाती। लेकिन अगर आप एक मैग्नीफाइंग ग्लास लेकर उस रोशनी को एक कागज पर फोकस कर दें तो वो कागज जलने लगता है। आपकी मेहनत वो रोशनी है और लेवरेज वो शीशा है जो आपको रिजल्ट दिलाता है। तो क्या आप अभी भी हर जगह अपनी नाक घुसा रहे हैं या फिर उस एक टिपिंग पॉइंट को ढूंढ रहे हैं जो आपकी लाइफ को बदल देगा।
याद रखिये कि मल्टीटास्किंग असल में एक स्कैम है जो कॉर्पोरेट दुनिया ने आपको बेचा है ताकि आप पागलों की तरह काम करते रहें। असली लेवरेज तो तब मिलता है जब आप शांति से बैठकर यह तय करते हैं कि आज के दिन का सबसे इम्पोर्टेन्ट काम क्या है। जब आप उस एक काम को खत्म करते हैं तो आपको जो मोमेंटम मिलता है वो आपको अगले लेवल पर ले जाता है। यह एक चेन रिएक्शन की तरह काम करता है। एक छोटी सी जीत आपको बड़ा कॉन्फिडेंस देती है और वही कॉन्िडेंस आपको बड़े रिस्क लेने की हिम्मत देता है। बिना फोकस के आप सिर्फ एक ऐसी गाड़ी की तरह हैं जो न्यूट्रल गियर में खड़ी है और जिसका ड्राइवर रेस दिए जा रहा है। शोर बहुत होगा धुआं भी बहुत निकलेगा पर गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ेगी।
लेसन २ : टिपिंग पॉइंट का जादू और स्नोबॉल इफेक्ट
क्या आपने कभी पहाड़ से गिरती हुई बर्फ की एक छोटी सी गेंद को देखा है। शुरू में वो बहुत छोटी और मासूम लगती है जैसे कोई बच्चा खेल रहा हो। लेकिन जैसे जैसे वो नीचे आती है वो अपने साथ और बर्फ लपेटती जाती है और अंत में एक विशाल हिमस्खलन यानी एवलांच बन जाती है। डार्बी चेकेट्स कहते हैं कि हमारी कामयाबी भी बिलकुल ऐसी ही होती है। इसे ही वो टिपिंग पॉइंट कहते हैं। टिपिंग पॉइंट वो जादुई पल है जब आपकी छोटी छोटी मेहनत अचानक एक बहुत बड़े रिजल्ट में बदल जाती है। लेकिन परेशानी यह है कि ज्यादातर लोग उस मोमेंट तक पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं। वो दो दिन जिम जाते हैं और तीसरे दिन आईने में अपनी एब्स ढूंढने लगते हैं। जब नहीं दिखती तो वो पिज्जा ऑर्डर कर देते हैं।
असली लेवरेज का सीक्रेट यह है कि आपको उस वक्त भी काम करते रहना पड़ता है जब कोई रिजल्ट नहीं दिख रहा होता। इसे आप एक पानी के घड़े की तरह समझिये जिसे आप धीरे धीरे भर रहे हैं। जब तक घड़ा पूरा नहीं भरता तब तक बाहर से कुछ नहीं दिखता। लेकिन जैसे ही आखिरी बूंद गिरती है पानी बाहर बहने लगता है। लोग अक्सर उस आखिरी बूंद को चमत्कार समझते हैं पर असली खेल तो उन हजारों बूंदों का था जो आपने पहले डाली थीं। अगर आप बिजनेस कर रहे हैं और आपके पास सेल्स नहीं आ रही तो समझ जाइये कि आप अभी टिपिंग पॉइंट के करीब पहुंच रहे हैं। लेकिन हमारे भाई लोग क्या करते हैं। वो सोचते हैं कि शायद धंधा ही खराब है और दुकान बढ़ाकर घर बैठ जाते हैं।
आप उस इंसान की तरह मत बनिए जो कुआं खोदना शुरू करता है और दस फीट बाद पानी न मिलने पर दूसरी जगह गड्ढा करने लगता है। शाम तक उसके पास दस गड्ढे होते हैं पर पीने को एक बूंद पानी नहीं होता। लेवरेज कहता है कि एक ही जगह पर टिके रहो और तब तक प्रहार करो जब तक कि वो टिपिंग पॉइंट न आ जाए। डार्बी चेकेट्स समझाते हैं कि जब आप कंसिस्टेंट रहते हैं तो आप एक कंपाउंडिंग इफेक्ट पैदा करते हैं। आपकी आज की मेहनत कल के लिए लेवरेज बन जाती है। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप बैंक में पैसे जमा करते हैं और फिर ब्याज पर ब्याज मिलने लगता है। बस फर्क इतना है कि लाइफ में आपको शुरुआत में बहुत ज्यादा एफर्ट डालना पड़ता है और रिटर्न बहुत कम मिलता है।
लेकिन जैसे ही आप उस जादुई टिपिंग पॉइंट को पार करते हैं कहानी पूरी तरह पलट जाती है। अब आपको मेहनत कम करनी पड़ती है और रिजल्ट्स खुद ब खुद खिंचे चले आते हैं। इसे ही हम 'सक्सेस ब्रीड्स सक्सेस' कहते हैं। एक बार जब आप मार्केट में अपनी पहचान बना लेते हैं तो लोग आपके पास खुद आते हैं। आपको चिल्ला चिल्लाकर अपनी मार्केटिंग नहीं करनी पड़ती। लेकिन याद रखिये कि उस लेवल तक पहुंचने के लिए आपको बोरियत को झेलना पड़ेगा। महान काम अक्सर बहुत बोरिंग होते हैं। डेली वही काम बार बार करना ही आपको मास्टर बनाता है। जो लोग हर रोज नया ड्रामा और एक्साइटमेंट ढूंढते हैं वो अक्सर लेवरेज की दौड़ में पीछे रह जाते हैं। क्या आप उस आखिरी बूंद तक इंतजार करने का दम रखते हैं या आप भी बीच रास्ते से वापस लौटने वालों में से हैं।
लेसन ३ : दूसरों के टैलेंट और नेटवर्क का सही इस्तेमाल
अगर आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे समझदार इंसान हैं और सारे काम खुद ही परफेक्ट तरीके से कर सकते हैं तो यकीन मानिए आप अपनी ग्रोथ के सबसे बड़े दुश्मन हैं। डार्बी चेकेट्स कहते हैं कि असली लेवरेज कभी भी अकेले नहीं आता। एक अकेला इंसान चाहे कितना भी टैलेंटेड क्यों न हो उसके पास दिन में सिर्फ २४ घंटे ही होते हैं। लेकिन अगर आप १० लोगों की टीम के साथ काम करते हैं तो आपके पास हर रोज २४० घंटे होते हैं। इसे कहते हैं 'अदर पीपल्स टाइम' और 'अदर पीपल्स टैलेंट' का इस्तेमाल करना। लेकिन हमारे यहाँ लोग 'मैं ही सब कुछ करूंगा' वाले सिंड्रोम के शिकार होते हैं। वो अपनी छोटी सी दुकान में झाड़ू भी खुद मारना चाहते हैं और अकाउंट्स भी खुद देखना चाहते हैं। नतीजा यह होता है कि वो कभी बड़े बिजनेसमैन नहीं बन पाते बल्कि अपनी ही दुकान के नौकर बनकर रह जाते हैं।
मान लीजिये आपको एक बहुत भारी पत्थर हटाना है। आप अपनी पूरी जान लगा देते हैं पर पत्थर टस से मस नहीं होता। अब आप अपने चार दोस्तों को बुलाते हैं और एक लोहे की रॉड का इस्तेमाल करते हैं। पत्थर एक सेकंड में हट जाता है। यहाँ वो लोहे की रॉड एक टूल है और वो दोस्त आपका नेटवर्क हैं। लाइफ में भी यही नियम लागू होता है। आपके पास जो हुनर नहीं है वो शायद आपके पड़ोसी या आपके पार्टनर के पास हो सकता है। स्मार्ट लोग अपनी कमियों को छिपाते नहीं हैं बल्कि उन कमियों को दूसरों के टैलेंट से भर देते हैं। लेकिन कुछ लोग इतने कंजूस होते हैं कि वो दूसरों को क्रेडिट या पैसा देने के डर से सारा बोझ खुद उठा लेते हैं। यह बिलकुल वैसा ही है जैसे आप एक हवाई जहाज को धक्का मारकर उड़ाने की कोशिश कर रहे हों क्योंकि आप पायलट को सैलरी नहीं देना चाहते।
नेटवर्किंग का मतलब सिर्फ लोगों से हाथ मिलाना या विजिटिंग कार्ड बांटना नहीं है। इसका असली मतलब है ऐसे रिश्ते बनाना जहाँ एक और एक मिलकर ग्यारह हो जाएं। डार्बी चेकेट्स समझाते हैं कि जब आप दूसरों की मदद करते हैं तो आप अनजाने में अपने लिए लेवरेज तैयार कर रहे होते हैं। एक स्ट्रॉन्ग रिलेशनशिप आपको वो दरवाजे खोलकर दे सकती है जो करोड़ों रूपये खर्च करके भी नहीं खुलते। जरा उन लोगों को देखिये जो हमेशा अकेले कोने में बैठकर काम करते हैं और फिर शिकायत करते हैं कि उन्हें प्रमोशन नहीं मिला। दूसरी तरफ वो लोग हैं जो शायद काम थोड़ा कम जानते हों पर उनकी नेटवर्किंग इतनी तगड़ी होती है कि पूरी कंपनी उनके इशारों पर चलती है। यह कोई चापलूसी नहीं है बल्कि यह लोगों के साथ जुड़ने की कला है।
लेवरेज का यह तीसरा लेसन हमें सिखाता है कि अपनी ईगो को साइड में रखिये। अगर कोई आपसे बेहतर काम कर सकता है तो उसे करने दीजिये। आपका काम है बड़े विजन पर फोकस करना न कि छोटी छोटी बारीकियों में उलझे रहना। जब आप दूसरों को आगे बढ़ने का मौका देते हैं तो आप असल में खुद के लिए फ्रीडम खरीद रहे होते हैं। असली अमीरी पैसा नहीं बल्कि वो खाली वक्त है जो आपको लेवरेज की वजह से मिलता है। तो क्या आप अभी भी वन मैन आर्मी बनने के चक्कर में अपनी सेहत और सुकून की बलि दे रहे हैं या फिर आप एक ऐसा सिस्टम बना रहे हैं जो आपके बिना भी रॉकेट की तरह उड़े। चुनाव आपका है क्योंकि बोझ उठाने वाले को मजदूर कहते हैं और सिस्टम बनाने वाले को लीडर।
डार्बी चेकेट्स की यह बुक 'लेवरेज' हमें सिर्फ बिजनेस नहीं बल्कि जिंदगी जीने का एक नया नजरिया देती है। याद रखिये कि मेहनत तो गधा भी करता है पर जंगल का राजा शेर कहलाता है क्योंकि उसे पता है कि कब अपनी ताकत का इस्तेमाल करना है और कब दूसरों से काम करवाना है। अपनी एनर्जी को फोकस कीजिये टिपिंग पॉइंट का इंतजार कीजिये और लोगों के साथ मिलकर आगे बढ़िये। आपकी सक्सेस आपकी मेहनत पर नहीं बल्कि आपके लेवरेज पर निर्भर करती है।
आज ही अपनी लाइफ के उस एक काम को पहचानिये जहाँ आप लेवरेज का इस्तेमाल कर सकते हैं। क्या वो आपकी कोई पुरानी आदत है या कोई नया बिजनेस आइडिया। नीचे कमेंट में लिखिये कि आप आज से कौन सा एक बड़ा बदलाव करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो दिन भर बिजी रहने का नाटक करता है पर असल में कुछ हासिल नहीं कर पा रहा। याद रखिये कि शेयर करना भी एक तरह का लेवरेज है जिससे आप दूसरों की लाइफ बदल सकते हैं।
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