Kiss Theory Goodbye (Hindi)


क्या आप अभी भी उन भारी भरकम बिजनेस थ्योरीज के भरोसे बैठे हैं जो सिर्फ सुनने में अच्छी लगती हैं पर बैंक बैलेंस रत्ती भर भी नहीं बढ़ातीं। अगर हां तो मुबारक हो आप अपनी कंपनी को डूबते हुए देखने का पूरा मजा ले रहे हैं। बिना रिजल्ट्स वाली प्लानिंग सिर्फ टाइम पास है और आप इसमें मास्टर बन चुके हैं।

लेकिन रुकिए। अगर आप वाकई अपनी कंपनी को एक्स्ट्राऑर्डिनरी बनाना चाहते हैं और फालतू की बातों को टाटा बाय बाय कहना चाहते हैं तो बॉब प्रोसेन के ये ५ तरीके आपकी आंखें खोल देंगे। चलिए जानते हैं वो ३ बड़े लेसन जो आपके काम करने का तरीका हमेशा के लिए बदल देंगे।


लेसन १ : क्लैरिटी और अकाउंटेबिलिटी की पावर

जरा सोचिए आप एक टैक्सी में बैठते हैं और ड्राइवर आपसे पूछता है कि साहब कहां जाना है। आप उसे जवाब देते हैं कि बस कहीं भी ले चलो जहां हरियाली हो और शांति हो। ड्राइवर आपको श्मशान घाट छोड़ आता है। अब आप गुस्सा तो बहुत करेंगे पर गलती किसकी है। आपकी। क्योंकि आपने उसे साफ गोल नहीं बताया। बिजनेस में भी यही ड्रामा रोज होता है। बॉब प्रोसेन कहते हैं कि जब तक आपके एम्प्लॉई को यह नहीं पता कि उसे शाम तक क्या उखाड़ना है तब तक वह सिर्फ ऑफिस की कुर्सी तोड़ेगा और फ्री की कॉफी पिएगा। क्लैरिटी का मतलब यह नहीं कि आपने एक लंबी चौड़ी मीटिंग की और भारी इंग्लिश बोलकर निकल गए। क्लैरिटी का मतलब है कि हर इंसान को अपना टारगेट शीशे की तरह साफ दिखना चाहिए।

ज्यादातर कंपनियों में बॉस खुद कंफ्यूज रहते हैं। वे सुबह आकर कहते हैं कि हमें सेल्स बढ़ानी है। दोपहर को कहते हैं कि हमें क्वालिटी देखनी है और शाम तक वे भूल जाते हैं कि उन्होंने सुबह क्या कहा था। यह तो वही बात हो गई कि आप जिम जा रहे हैं पर आपको पता ही नहीं कि आपको वजन घटाना है या डोले बनाने हैं। बिना क्लैरिटी के आप सिर्फ पसीना बहा रहे हैं रिजल्ट्स नहीं ला रहे। बॉब प्रोसेन का मंत्र बहुत सिंपल है। अगर आप अपने गोल को एक लाइन में नहीं समझा सकते तो समझ लीजिए कि आप खुद अंधेरे में तीर चला रहे हैं। जब गोल साफ होता है तो बहाने अपने आप खत्म हो जाते हैं। लोग अक्सर कहते हैं कि हम बहुत बिजी हैं। पर भाई साहब बिजी होना और प्रोडक्टिव होना दो अलग बातें हैं। एक मक्खी भी सारा दिन शीशे पर सिर मारती रहती है वह बहुत बिजी है पर वह कहीं पहुंचती नहीं है। आपको अपनी टीम को मक्खी नहीं बल्कि बाज बनाना है जिसे अपना शिकार दूर से ही साफ दिखता है।

इसके बाद नंबर आता है अकाउंटेबिलिटी का। यह वो शब्द है जिससे लोग वैसे ही डरते हैं जैसे बच्चे स्कूल के रिजल्ट से। अकाउंटेबिलिटी का मतलब है जिम्मेदारी लेना। हमारे यहां तो कल्चर यह है कि अगर काम बिगड़ा तो गलती दूसरे डिपार्टमेंट की है। सेल्स वाले कहेंगे कि मार्केटिंग वालों ने लीड्स खराब दी। मार्केटिंग वाले कहेंगे कि प्रोडक्ट ही बेकार है। और प्रोडक्ट वाले कहेंगे कि बजट ही नहीं था। यह जो पासिंग द पार्सल वाला खेल चल रहा है ना यही कंपनी की लंका लगाता है। आपको अपनी कंपनी में ऐसी दीवार खड़ी करनी होगी जहां आकर बहाने दम तोड़ दें। हर टास्क के साथ एक नाम जुड़ा होना चाहिए। अगर रिजल्ट नहीं आया तो उस नाम वाले को जवाब देना होगा। कोई कहानी नहीं कोई इमोशनल ड्रामा नहीं।

मान लीजिए आप एक क्रिकेट मैच खेल रहे हैं और कैच छूट जाता है। अगर फील्डर कहे कि अरे धूप बहुत तेज थी या बॉल बहुत स्पिन हो रही थी तो क्या उसे अगली बार टीम में होना चाहिए। बिल्कुल नहीं। अकाउंटेबिलिटी का मतलब है कि आप अपनी गलती मानकर उसे सुधारें। जब सबको पता होता है कि उनकी गर्दन फंसी हुई है तो लोग अपने आप काम को सीरियसली लेने लगते हैं। यह सुनने में थोड़ा कड़वा लग सकता है पर बिजनेस कोई चैरिटी शो नहीं है। यहां तो रिजल्ट ही भगवान है। अगर आप अपनी टीम को सिर्फ प्यार और दुलार से चलाना चाहते हैं तो फिर आप बिजनेस नहीं बल्कि एक प्ले स्कूल चला रहे हैं। असली लीडर वो है जो साफ टारगेट देता है और फिर उस पर डंडा लेकर खड़ा रहता है। जब क्लैरिटी और अकाउंटेबिलिटी का मिलन होता है तो वहां से एक्स्ट्राऑर्डिनरी रिजल्ट्स का जन्म होता है। बिना इसके आप सिर्फ एक ऐसी गाड़ी चला रहे हैं जिसमें पेट्रोल तो बहुत है पर स्टीयरिंग गायब है।


लेसन २ : सही लोगों को सही जगह बिठाना

क्या आपने कभी किसी मछली को पेड़ पर चढ़ते हुए देखा है। अगर देखा है तो या तो वह कोई चमत्कार है या फिर आप किसी बहुत ही गलत कंपनी के ऑफिस में बैठे हैं। बॉब प्रोसेन कहते हैं कि बिजनेस में सबसे बड़ी बर्बादी तब होती है जब आप एक शेर को घास काटने के लिए लगा देते हैं और गधे को लीडरशिप की कुर्सी पर बिठा देते हैं। लोग अक्सर कहते हैं कि हमारे पास बहुत बड़ी टीम है। पर भाई साहब टीम की गिनती से घर नहीं चलता। असली खेल तो टैलेंट के सही इस्तेमाल का है। अगर आप अपने बेस्ट सेल्समैन को डेटा एंट्री के काम में लगा देंगे तो वह ना तो सेल कर पाएगा और ना ही डेटा सही भरेगा। वह बस अपनी नौकरी और आपकी कंपनी को कोसता रहेगा।

ज्यादातर बॉस को लगता है कि जिसे जो काम दे दो उसे वो करना ही चाहिए क्योंकि हम उसे पैसे दे रहे हैं। यह सोच वैसी ही है जैसे आप किसी हलवाई से कहें कि भाई तू आज मेरा ऑपरेशन कर दे क्योंकि तू भी तो चाकू चलाना जानता ही है। नतीजा क्या होगा। पेशेंट सीधा ऊपर जाएगा। बिजनेस में भी यही होता है। जब आप गलत इंसान को गलत जिम्मेदारी देते हैं तो सिर्फ प्रोजेक्ट नहीं डूबता बल्कि पूरी टीम का हौसला भी टूट जाता है। आपको अपनी टीम के हर मेंबर की ताकत और कमजोरी पता होनी चाहिए। एक अच्छा मैनेजर वही है जो जानता है कि किस खिलाड़ी को ओपनिंग पर भेजना है और किसे फील्डिंग के लिए बाउंड्री पर खड़ा करना है। अगर आपकी टीम में कोई ऐसा है जो बात करने में बहुत माहिर है पर आपने उसे कोडिंग में बिठा रखा है तो आप अपनी कंपनी का सबसे बड़ा नुकसान कर रहे हैं।

अक्सर हम हायरिंग के वक्त सिर्फ डिग्री और सर्टिफिकेट देखते हैं। पर बॉब प्रोसेन के हिसाब से एटीट्यूड और स्किल का सही बैलेंस ही असली एसेट है। कुछ लोग काम करने में बहुत तेज होते हैं पर वे अकेले ही चलना पसंद करते हैं। उन्हें आप टीम लीडर बना देंगे तो वे पूरी टीम का कचरा कर देंगे। वहीं कुछ लोग शायद काम में थोड़े धीमे हों पर वे सबको साथ लेकर चलने का हुनर जानते हैं। उन्हें लीडरशिप में होना चाहिए। आपको यह समझना होगा कि हर कोई हर काम के लिए नहीं बना है। अगर आप एक बंदर से उम्मीद करेंगे कि वह हाथी की तरह वजन उठाए तो आप बेवकूफ हैं बंदर नहीं। और सबसे मजेदार बात तो यह है कि जब काम नहीं होता तो हम उसी बंदे को डांटते हैं जिसे हमने खुद गलत काम पर लगाया था। यह तो वही बात हो गई कि आपने कुत्ते को उड़ना नहीं सिखाया और अब आप उसे काट रहे हैं।

सही लोगों को सही जगह बिठाने का मतलब यह भी है कि जो लोग आपकी कंपनी के कल्चर में फिट नहीं बैठते उन्हें रास्ता दिखा दिया जाए। बॉब प्रोसेन बहुत साफ शब्दों में कहते हैं कि एक सड़ा हुआ सेब पूरी टोकरी खराब कर देता है। अगर आपकी टीम में कोई ऐसा है जिसके पास स्किल तो बहुत है पर नियत खराब है तो वह आपकी कंपनी के लिए एक टाइम बम की तरह है। आपको उसे निकालने में हिचकिचाना नहीं चाहिए। बिजनेस में इमोशंस अपनी जगह हैं पर परफॉरमेंस अपनी जगह। अगर आप अपनी कंपनी को एक एलीट क्लब बनाना चाहते हैं तो आपको सिर्फ एलीट लोगों को ही अंदर रखना होगा। इसका मतलब यह नहीं कि आप खड़ूस बन जाएं। इसका मतलब यह है कि आप अपनी कंपनी के भविष्य के प्रति ईमानदार रहें। जब सही इंसान सही कुर्सी पर बैठता है तो काम बोझ नहीं बल्कि एक जुनून बन जाता है। फिर आपको बार बार पूछना नहीं पड़ता कि भाई काम हुआ या नहीं। वो खुद आकर आपको रिजल्ट दिखाएगा और यही एक सफल बिजनेस की पहचान है।


लेसन ३ : एग्जीक्यूशन ही सब कुछ है

दुनिया में आइडियाज की कोई कमी नहीं है। आप किसी भी चाय की टपरी पर चले जाइए वहां आपको कम से कम पांच ऐसे लोग मिल जाएंगे जिनके पास गूगल और अमेजॉन को पीछे छोड़ने वाले खतरनाक प्लान तैयार हैं। पर वे वहां बैठकर सिर्फ चाय की चुस्की ले रहे हैं। क्यों। क्योंकि प्लान बनाना मुफ्त है पर उसे जमीन पर उतारना यानी एग्जीक्यूशन करना असली टेढ़ी खीर है। बॉब प्रोसेन कहते हैं कि एक औसत दर्जे का प्लान जिसे पूरी ताकत से लागू किया गया हो वह उस महान प्लान से हजार गुना बेहतर है जो सिर्फ आपकी फाइलों में धूल फांक रहा है। बिजनेस की दुनिया में थ्योरी के नंबर नहीं मिलते यहां सिर्फ और सिर्फ रिजल्ट्स के नंबर मिलते हैं।

ज्यादातर कंपनियां अपनी फेलियर का दोष मार्केट या किस्मत को देती हैं पर असलियत में वे इसलिए डूबती हैं क्योंकि वे सिर्फ बातें करती हैं काम नहीं। आपने भी देखा होगा कि ऑफिसों में घंटों मीटिंग्स चलती हैं। बड़े बड़े प्रेजेंटेशन दिखाए जाते हैं और आखिर में सब लोग समोसे खाकर घर चले जाते हैं। अगले दिन किसी को याद नहीं रहता कि कल क्या तय हुआ था। यह बिजनेस नहीं यह तो सिर्फ एक किटी पार्टी है। एग्जीक्यूशन का मतलब है कि जो तय हुआ है उसे चाहे कुछ भी हो जाए पूरा करना है। अगर आपने कहा है कि इस महीने सेल्स १० परसेंट बढ़ेगी तो फिर बहानेबाजी के लिए खिड़कियां बंद हो जानी चाहिए। अक्सर लोग कहते हैं कि अरे भाई साहब बहुत कॉम्पिटिशन है। पर सच तो यह है कि कॉम्पिटिशन उनसे ज्यादा है जो आपसे बेहतर एग्जीक्यूशन कर रहे हैं।

एग्जीक्यूशन का दुश्मन है परफेक्शन का भूत। कुछ लोग सोचते हैं कि जब तक सब कुछ एकदम परफेक्ट नहीं हो जाएगा तब तक हम शुरू नहीं करेंगे। ऐसे लोग बस सोचते ही रह जाते हैं और कोई दूसरा आकर बाजी मार ले जाता है। बिजनेस में आपको भागते हुए ही अपनी गाड़ी के टायर बदलने पड़ते हैं। अगर आप रुक कर सही समय का इंतजार करेंगे तो यकीन मानिए वो समय कभी नहीं आएगा। बॉब प्रोसेन का मंत्र बहुत सीधा है। शुरू करो गलतियां करो और फिर तुरंत उन्हें सुधारो। जो कंपनी अपनी गलतियों से सीखकर तेजी से आगे बढ़ती है वही मार्केट की लीडर बनती है। बाकी लोग तो बस केस स्टडी पढ़ते रह जाते हैं। क्या आपने कभी किसी रेस में उस धावक को जीतते देखा है जिसके पास सबसे महंगे जूते हैं पर वह खड़ा होकर सिर्फ जूतों की तारीफ कर रहा है। नहीं ना। जीतता वही है जो दौड़ता है।

असली लीडर वही है जो अपनी टीम के साथ कीचड़ में उतरने को तैयार रहता है। सिर्फ एयरकंडीशन कमरे में बैठकर हुक्म चलाने से रिजल्ट नहीं आते। आपको यह देखना होगा कि काम रुक कहां रहा है। क्या लोगों के पास रिसोर्स की कमी है या फिर उनमें मोटिवेशन गायब है। जब आप ग्राउंड पर जाकर चीजों को ठीक करते हैं तो टीम को भी लगता है कि बॉस सिर्फ बोलता नहीं है उसे काम करना भी आता है। याद रखिए एक्स्ट्राऑर्डिनरी रिजल्ट्स कोई जादू नहीं हैं। ये उन हजारों छोटे छोटे कामों का नतीजा हैं जो हर रोज पूरी शिद्दत के साथ किए जाते हैं। अगर आप आज अपनी थ्योरीज को गुडबाय कह देते हैं और एक्शन मोड में आ जाते हैं तो कामयाबी आपके कदम चूमने के लिए मजबूर हो जाएगी। अब फैसला आपका है। आपको बातों का राजा बनना है या काम का महाराजा।


तो दोस्तों, किस थ्योरी गुडबाय हमें यह सिखाती है कि कामयाबी कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यह सिर्फ क्लैरिटी सही लोग और जबरदस्त एग्जीक्यूशन का कॉम्बिनेशन है। अगर आप अब भी अपनी असफलता के लिए दुनिया को दोष दे रहे हैं तो यह बुक आपके लिए एक जोरदार तमाचा है। उठिए अपनी टीम को साफ लक्ष्य दीजिए सही बंदे को सही काम पर लगाइए और आज से ही काम शुरू कर दीजिए। याद रखिए दुनिया को आपके प्लान में कोई दिलचस्पी नहीं है उसे सिर्फ आपके रिजल्ट्स देखने हैं।

आज ही अपनी कंपनी में इन ५ तरीकों को लागू करें और खुद फर्क देखें। अगर आप अपनी ग्रोथ को लेकर सीरियस हैं तो इस आर्टिकल को अपनी टीम के साथ शेयर करें और आज ही एक एक्शन प्लान तैयार करें। क्या आप तैयार हैं अपनी थ्योरीज को गुडबाय कहने के लिए। कमेंट में जरूर बताएं।

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