Loonshots (Hindi)


आपकी कंपनी या करियर इसलिए नहीं डूब रहा क्योंकि आपके पास टैलेंट की कमी है। असल में आप इतने समझदार बन चुके हैं कि आपने हर क्रेजी आइडिया का गला घोंट दिया है। बधाई हो। आप अपनी ग्रोथ की अर्थी खुद उठा रहे हैं और आपको पता भी नहीं है।

अब वक्त आ गया है कि आप अपनी उस बोरियत भरी स्ट्रैटेजी को डस्टबिन में फेंकें। साफी बाकल की किताब लूणशॉट्स हमें सिखाती है कि कैसे पागलों जैसे दिखने वाले आइडियाज ही दुनिया बदलते हैं। चलिए इन ३ लेसन्स के जरिए आपके बिजनेस और करियर को फिर से जिंदा करते हैं।


लेसन १ : पी३ फ्रेमवर्क - राजनीति को छोड़ो और प्रोजेक्ट पर ध्यान दो

जब आपकी टीम या कंपनी छोटी होती है तो हर कोई एक ही मकसद के लिए लड़ रहा होता है। सब एक ही नाव में सवार होते हैं। लेकिन जैसे ही कंपनी बड़ी होने लगती है और वहां पैसा और पावर आने लगती है तो मंजर बदल जाता है। लोग प्रोजेक्ट्स को जिताने के बजाय खुद को प्रमोट कराने के खेल में लग जाते हैं। इसे ही साफी बाकल पॉलिटिक्स वर्सेस प्रोजेक्ट्स का झगड़ा कहते हैं।

सोचिए आपके ऑफिस में एक ऐसा शख्स है जिसके पास एक क्रांतिकारी आइडिया है। वह आइडिया शायद कंपनी की किस्मत बदल दे। लेकिन आपके बॉस को डर है कि अगर यह आइडिया चल गया तो वह जूनियर उससे आगे निकल जाएगा। अब बॉस उस आइडिया को सपोर्ट करने के बजाय उसमें कमियां निकालने लगता है। यहाँ राजनीति जीत गई और प्रोजेक्ट हार गया। हम भारतीय वैसे भी राजनीति के शौकीन हैं पर जब यह ऑफिस की चारदीवारी में घुसती है तो इनोवेशन की मौत हो जाती है।

ज्यादातर बड़ी कंपनियां इसलिए डूब जाती हैं क्योंकि उनके एम्प्लॉई अपना ५० परसेंट टाइम इस बात में लगाते हैं कि मीटिंग में किसको नीचा दिखाना है। उन्हें इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मार्केट में नया कॉम्पिटिटर क्या कर रहा है। वह तो बस अपने केबिन का साइज बड़ा करने के सपने देख रहे होते हैं। अगर आप एक लीडर हैं तो आपका काम सिर्फ टैलेंटेड लोगों को हायर करना नहीं है। आपका असली काम एक ऐसा स्ट्रक्चर बनाना है जहाँ लोगों को काम के लिए रिवॉर्ड मिले न कि चापलूसी के लिए।

जब तक किसी इंसान को यह लगेगा कि बॉस की जी हुज़ूरी करने से उसका इंक्रीमेंट ज्यादा होगा तो वह कभी भी अपनी जान दांव पर लगाकर कोई नया आइडिया नहीं लाएगा। वह बस वही करेगा जो सेफ है। और सेफ आइडियाज कभी भी आपको लूणशॉट नहीं देते। आपको यह पक्का करना होगा कि आपकी टीम का हर मेंबर प्रोजेक्ट की सक्सेस को अपनी पर्सनल जीत समझे। जब तक इंसेंटिव्स का तालमेल प्रोजेक्ट के साथ नहीं होगा तब तक आपकी कंपनी में सिर्फ चापलूस बचेंगे और जीनियस लोग इस्तीफा देकर अपनी खुद की स्टार्टअप शुरू कर लेंगे।

हमें यह समझना होगा कि एक बड़ा विजन तब ही पूरा होता है जब नीचे से लेकर ऊपर तक सब एक ही गोल के लिए पागल हों। अगर आपकी टीम में कोई अपना सीवी चमकाने में लगा है तो समझ जाइये कि आपके जहाज में छेद हो चुका है। असली लीडरशिप वह है जो राजनीति के इस कीचड़ को साफ करे और प्रोजेक्ट्स के लिए एक साफ रास्ता बनाए। यह लेसन सिर्फ बड़ी कंपनियों के लिए नहीं बल्कि छोटे स्टार्टअप्स और आपके पर्सनल करियर के लिए भी उतना ही जरूरी है।


लेसन २ : डायनामिक इक्विलिब्रियम - पुराने कैश और नए पागलपन का बैलेंस

जब आप लेसन १ की राजनीति से बाहर निकल आते हैं तब आपके सामने एक नया पहाड़ खड़ा होता है। इसे कहते हैं अपनी ही कामयाबी का शिकार होना। मान लीजिए आपकी एक दुकान है जो बहुत बढ़िया समोसे बेचती है। अब आप इतने मशहूर हो गए हैं कि आप कुछ नया ट्राई ही नहीं करना चाहते। आपको डर है कि अगर आपने समोसे की रेसिपी बदली या कुछ नया डिश मेनू में जोड़ा तो पुराने ग्राहक भाग जाएंगे। बस यही वह जाल है जहाँ बड़े से बड़ा सुरमा ढेर हो जाता है।

साफी बाकल कहते हैं कि एक सफल सिस्टम वह है जो डायनामिक इक्विलिब्रियम में रहे। इसका मतलब है कि आपको अपनी पुरानी अच्छी चल रही चीजों (फ्रैंचाइजी) और भविष्य के पागलपन भरे आइडियाज (लूणशॉट्स) के बीच एक मजबूत दीवार खड़ी करनी होगी। अगर आप इन दोनों को एक ही कमरे में बिठा देंगे तो पुराने और समझदार लोग नए और पागल रिसर्चर्स का मजाक उड़ाकर उन्हें भगा देंगे। पुराने लोगों को लगता है कि जो चल रहा है उसे छेड़ो मत और नए लोगों को लगता है कि पुराना सब बेकार है।

इस झगड़े को सुलझाने का तरीका यह है कि आप खुद को एक गार्डियन की तरह देखें। आपका काम इन दोनों ग्रुप्स के बीच एक पुल बनाना है। इसे एक रियल लाइफ उदाहरण से समझते हैं। एक तरफ आपकी सेल्स टीम है जो दिन-रात भागकर टार्गेट पूरा कर रही है। दूसरी तरफ आपकी आर एंड डी टीम है जो कुछ ऐसा बना रही है जो शायद १० साल बाद काम आए। सेल्स टीम को लगेगा कि यह आर एंड डी वाले बस फ्री की कॉफी पी रहे हैं और कंपनी का पैसा बर्बाद कर रहे हैं। वहीं आर एंड डी वालों को लगेगा कि सेल्स वाले बस बोरिंग काम कर रहे हैं।

अगर आपने इन दोनों को एक दूसरे की इज्जत करना नहीं सिखाया तो आपकी ग्रोथ रुक जाएगी। आपको एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहाँ आपकी फ्रैंचाइजी यानी जो पैसा कमा कर दे रही है वह चलती रहे लेकिन उसका थोड़ा हिस्सा उन लूणशॉट्स पर खर्च हो जो कल को आपको मार्केट का राजा बनाएंगे। आप नोकिया का हाल तो जानते ही हैं। वह अपने पुराने कीपैड वाले फोन से इतना प्यार कर बैठे कि उन्होंने टचस्क्रीन जैसे लूणशॉट को कचरा समझ लिया। नतीजा आज आपके हाथ में नोकिया नहीं बल्कि कोई और फोन है।

सक्सेस का मतलब यह नहीं है कि आप रिस्क लेना बंद कर दें। असली सक्सेस यह है कि आप अपने रिस्क को एक अलग लैब में पालें और अपनी डेली रोटी को एक अलग फैक्ट्री में बनाएं। जब आप इन दोनों दुनियाओं के बीच एक बैलेंस बना लेते हैं तभी आप लंबी रेस के घोड़े बनते हैं। याद रखिये अगर आप आज कुछ नया और अजीब नहीं कर रहे हैं तो आप बस अपनी बर्बादी की तारीख का इंतजार कर रहे हैं।


लेसन ३ : सिस्टम डिजाइन माइंडसेट - अपनी हार का पोस्टमार्टम करना सीखें

ज्यादातर लोग जब फेल होते हैं, तो उनका पहला रिएक्शन होता है उस फेलियर को दफना देना। जैसे किसी ने चोरी छुपे पड़ोस के घर की घंटी बजाई हो और भाग गया हो। हम भारतीयों में तो यह आदत और भी गहरी है, हारने पर हम अक्सर किस्मत या कुंडली को दोष देकर आगे बढ़ जाते हैं। लेकिन 'लूणशॉट्स' हमें सिखाती है कि अगर आप सिस्टम डिजाइन माइंडसेट नहीं अपनाएंगे, तो आप अपनी गलतियों से कभी कुछ नहीं सीख पाएंगे।

सोचिए एक क्रिकेट टीम है जो मैच हार गई। एक तरीका तो यह है कि कप्तान खिलाड़ियों को गाली दे और कहे कि कल से ज्यादा प्रैक्टिस करो। यह एक 'आउटकम ओरिएंटेड' सोच है जो सिर्फ रिजल्ट देखती है। दूसरा तरीका है 'सिस्टम डिजाइन' सोच, जहाँ कोच बैठकर वीडियो देखता है कि शॉट सिलेक्शन में कहाँ गलती हुई, पिच कैसी थी और क्या स्ट्रैटेजी में कोई कमी थी। यहाँ फोकस हार पर नहीं, बल्कि उस प्रोसेस पर है जिसकी वजह से हार मिली।

साफी बाकल कहते हैं कि जब कोई नया और क्रेजी आइडिया (लूणशॉट) फेल होता है, तो लोग अक्सर उस आइडिया को ही बेकार मान लेते हैं। जबकि असलियत में शायद उस आइडिया को पेश करने का तरीका गलत था या टाइमिंग सही नहीं थी। आपको अपनी हार से डेटा निकालना होगा। अगर आपका स्टार्टअप या प्रोजेक्ट फेल हुआ है, तो रोने बैठने के बजाय यह देखिये कि सिस्टम में कहाँ लीकेज था। क्या आपकी टीम के बीच कम्युनिकेशन गैप था। क्या आपने कस्टमर की जरूरत को समझने में गलती की।

जब आप 'आउटकम' के बजाय 'सिस्टम' पर ध्यान देते हैं, तो फेलियर आपको डराता नहीं है। वह आपको स्मार्ट बनाता है। एक बड़ा लीडर वह नहीं है जो कभी फेल न हो, बल्कि वह है जो एक ऐसा सिस्टम बनाए जहाँ फेलियर को भी एक लेसन की तरह सेलिब्रेट किया जाए। अगर आपकी टीम में लोग गलती करने से डरेंगे, तो वे कभी भी कुछ नया ट्राई नहीं करेंगे। और जिस दिन आपकी टीम ने नया ट्राई करना बंद कर दिया, समझ लीजिये आपका पतन शुरू हो गया।

इसलिए, अगली बार जब कुछ गलत हो, तो यह मत पूछिए कि 'किसने गलती की', बल्कि यह पूछिए कि 'सिस्टम ने हमें फेल होने से क्यों नहीं रोका'। अपने ईगो को साइड में रखिये और एक साइंटिस्ट की तरह अपनी प्रोसेस को एनालाइज कीजिये। जब आप प्रोसेस को सही कर लेते हैं, तो रिजल्ट अपने आप शानदार आने लगते हैं। यही वह आखिरी कड़ी है जो आपको एक साधारण बिजनेसमैन से एक लेजेंडरी इनोवेटर बनाती है।


सफलता कोई तुक्का नहीं है और न ही यह सिर्फ टैलेंट का खेल है। यह खेल है सही स्ट्रक्चर का, सही बैलेंस का और अपनी गलतियों से सीखने के जिगरे का। अगर आप भी अपने करियर या बिजनेस में वही पुराने घिसे-पिटे रास्तों पर चल रहे हैं, तो रुकिए। अपने अंदर के उस 'पागल' आइडिया को बाहर निकालिए, उसे एक सुरक्षित माहौल दीजिये और राजनीति से ऊपर उठकर काम कीजिये।

आज ही अपने आपसे एक सवाल पूछिए: क्या आप अपनी कामयाबी की जेल में कैद हैं या आप एक नया लूणशॉट लेने के लिए तैयार हैं। कमेंट्स में हमें बताएं कि आपकी लाइफ का वह कौन सा 'क्रेजी आइडिया' है जिसे लोग नामुमकिन समझते हैं। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो कुछ बड़ा करने का सपना देख रहे हैं पर सिस्टम में फंसे हुए हैं। चलिए, साथ मिलकर इस दुनिया को अपने लूणशॉट्स से बदलते हैं।

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