Makers (Hindi)


अगर आपको लगता है कि बड़ी फैक्ट्री और करोड़ों का इन्वेस्टमेंट ही बिजनेस का इकलौता रास्ता है, तो मुबारक हो, आप अभी भी डायनासोर के जमाने में जी रहे हैं। दुनिया बदल चुकी है और आप बस अपनी पुरानी सोच और बेरोजगारी को सीने से चिपकाकर बैठे रहिए।

आज की दुनिया में जिसके पास सिर्फ एक लैपटॉप और इंटरनेट है, वो पूरी दुनिया को अपना प्रोडक्ट बेच रहा है। लेकिन आपको तो शायद वही पुरानी घिसी पिटी नौकरी ही पसंद है। चलिए जानते हैं कैसे यह किताब आपकी सोच को पूरी तरह से बदल सकती है।

आज हम क्रिस एंडरसन की मास्टरपीस 'मेकर्स' के उन 3 महान लेसन के बारे में बात करेंगे, जो आपको एक साधारण इंसान से एक मॉडर्न इंडस्ट्रियलिस्ट बना सकते हैं। यह जर्नी आपके बिजनेस देखने के नजरिए को हमेशा के लिए बदल देगी।


लेसन १ : सबके हाथ में फैक्ट्री — मैन्युफैक्चरिंग का नया दौर

पुराने जमाने में अगर आपको एक छोटी सी प्लास्टिक की बोतल भी बनानी होती थी, तो आपको किसी बड़े सेठ के पास जाना पड़ता था। जिसके पास लाखों की मशीनें, सैकड़ों मजदूर और शहर के बाहर एक बड़ा सा गोदाम होता था। लेकिन आज? आज अगर आप वही पुरानी घिसी-पिटी सोच लेकर बैठे हैं कि फैक्ट्री का मतलब सिर्फ धुआं उगलती चिमनियां हैं, तो यकीन मानिए आप इतिहास के किसी म्यूजियम में होने चाहिए थे। क्रिस एंडरसन कहते हैं कि अब पावर बड़े कॉर्पोरेट्स के हाथ से निकलकर आपके स्टडी रूम के कोने में रखे एक छोटे से डेस्कटॉप तक आ गई है।

इसे ऐसे समझिए कि जैसे नब्बे के दशक में फोटो खिंचवाने के लिए आपको किसी स्टूडियो वाले अंकल के सामने हाथ-पैर जोड़कर हफ़्तों इंतज़ार करना पड़ता था, और आज आप अपने फोन से फिल्टर लगाकर खुद को हीरो बना लेते हैं। ठीक वैसा ही बदलाव अब फिजिकल चीजों के साथ हो रहा है। अगर आपके पास एक 3D प्रिंटर या लेजर कटर जैसा छोटा सा टूल है, तो आप अपने घर के बेडरूम में बैठकर वही काम कर सकते हैं जो कभी फोर्ड या टाटा जैसी कंपनियां करती थीं। अब आपको किसी इन्वेस्टर के तलवे चाटने की जरूरत नहीं है कि सर प्लीज मेरा आईडिया देख लीजिए। अब आप खुद ही डिजाइनर हैं, खुद ही इंजीनियर हैं और खुद ही अपनी कंपनी के मालिक भी।

मान लीजिए आपके चश्मे का एक छोटा सा हिस्सा टूट जाता है। पुराने वक्त में आप या तो नया चश्मा खरीदते या फिर फेवीक्विक लगाकर अपनी नाक पर केमिकल का आनंद लेते। लेकिन आज का 'मेकर' क्या करेगा? वो बस इंटरनेट से उस पार्ट का डिजाइन डाउनलोड करेगा, उसे थोड़ा कस्टमाइज करेगा और आधे घंटे में अपने टेबल पर रखे प्रिंटर से नया पार्ट निकालकर तैयार कर लेगा। इसे कहते हैं डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग। यहाँ मशीनों को चलाने के लिए आपको किसी भारी लेबर की जरूरत नहीं है, बस एक माउस क्लिक काफी है।

लोग कहते हैं कि इंडिया में स्टार्टअप करना मुश्किल है क्योंकि जमीन महंगी है और बिजली के बिल आसमान छूते हैं। अरे भाई, जब फैक्ट्री ही आपके कंप्यूटर के अंदर सिमट गई है, तो जमीन का क्या अचार डालोगे? ये बिल्कुल वैसा ही है जैसे लोग कहते थे कि फिल्म बनाने के लिए बड़ा कैमरा चाहिए, फिर टिकटॉक और रील ने आकर सबकी गलतफहमी दूर कर दी। अब वही क्रांति फिजिकल प्रोडक्ट्स में आ रही है। जो लोग इस बदलाव को नहीं देख पा रहे, वो असल में उस ड्राइवर की तरह हैं जो जीपीएस होते हुए भी राहगीरों से रास्ता पूछ रहा है।

तो बात साफ है, अगर आप अभी भी इस इंतजार में हैं कि कोई सरकारी स्कीम आएगी या कोई फरिश्ता आकर आपकी फैक्ट्री लगवाएगा, तो आप बस इंतजार ही करते रह जाएंगे। दुनिया अब 'डू इट योरसेल्फ' (DIY) से आगे बढ़कर 'डू इट विद अदर्स' (DIWO) पर आ गई है। डिजिटल टूल्स ने मैन्युफैक्चरिंग को इतना सस्ता और आसान बना दिया है कि अब बहाने बनाने की जगह भी नहीं बची। अब सवाल यह नहीं है कि आप बना सकते हैं या नहीं, सवाल यह है कि क्या आपके पास वो दिमाग है जो इस मशीन को कमांड दे सके।


लेसन २ : ओपन सोर्स मॉडल — शेयरिंग ही असली पावर है

दुनिया का सबसे बड़ा झूठ यह है कि आपको अपने आइडियाज को तिजोरी में बंद करके रखना चाहिए ताकि कोई उसे चुरा न ले। पुराने जमाने के बिजनेसमैन अपने फॉर्मूले ऐसे छुपाते थे जैसे वो कोई कोका कोला की सीक्रेट रेसिपी हो। लेकिन क्रिस एंडरसन कहते हैं कि अगर आप आज भी अपने डिजाइन्स को छुपाकर बैठे हैं, तो आप उस कंजूस रिश्तेदार की तरह हैं जो शादी में पनीर का टुकड़ा प्लेट के नीचे छुपा देता है ताकि कोई और न ले ले। असलियत यह है कि आज की दुनिया में 'शेयरिंग' ही सबसे बड़ी 'कौम्युनिटी' खड़ी करती है।

इसे ओपन सोर्स मॉडल कहते हैं। मतलब आपने एक प्रोडक्ट बनाया और उसका ब्लूप्रिंट इंटरनेट पर डाल दिया ताकि पूरी दुनिया उसे देख सके, सुधार सके और इस्तेमाल कर सके। अब आप सोचेंगे कि भाई अगर सब फ्री में दे दिया तो मेरा क्या फायदा? यहाँ पर आता है असली सार्केज्म। अगर आप अकेले कमरे में बैठकर कुछ बना रहे हैं, तो आपके पास सिर्फ एक दिमाग है। लेकिन अगर आपने उसे ओपन सोर्स कर दिया, तो आपके पास दुनिया के सबसे टैलेंटेड हजारों इंजीनियर्स का दिमाग फ्री में काम करने के लिए मिल जाता है। यह वैसा ही है जैसे आप मोहल्ले की आंटी को अपनी सब्जी का स्वाद चखाएं और वो मुफ्त में आपको बता दें कि इसमें नमक कम है या मिर्च ज्यादा।

मान लीजिए आपने एक बेहतरीन ड्रोन बनाया। अगर आप इसे छुपाकर बेचेंगे, तो शायद आप साल में सौ पीस बेच पाएंगे। लेकिन अगर आप उसका सॉफ्टवेयर और डिजाइन ओपन सोर्स कर देते हैं, तो दुनिया भर के लोग उसमें नए फीचर्स जोड़ेंगे। कोई उसे खेती के लिए बेहतर बना देगा, तो कोई उसे फोटोग्राफी के लिए। देखते ही देखते आपका एक छोटा सा आईडिया एक ग्लोबल मूवमेंट बन जाएगा। फिर आप प्रोडक्ट नहीं, बल्कि उस प्रोडक्ट के आसपास की 'सर्विस' और 'ट्रस्ट' बेचते हैं।

आज के दौर में ईगो लेकर चलना बहुत महंगा पड़ता है। लोग अक्सर कहते हैं कि मेरा आईडिया करोड़ों का है। भाई साहब, आईडिया की कीमत रद्दी के भाव भी नहीं है अगर उसे कोई इस्तेमाल न करे। असली वैल्यू उस कम्युनिटी की है जो आपके साथ जुड़ती है। जब आप अपनी जानकारी दूसरों के साथ बांटते हैं, तो आप सिर्फ एक सेलर नहीं बल्कि एक लीडर बन जाते हैं। जो लोग सोचते हैं कि सब कुछ खुद ही कर लेंगे, वो अक्सर अकेले ही रह जाते हैं और जो मिलकर चलते हैं, वो पूरा का पूरा साम्राज्य खड़ा कर देते हैं।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे विकिपीडिया ने ब्रिटानिका जैसे बड़े एनसाइक्लोपीडिया को धूल चटा दी। ब्रिटानिका वाले पैसे लेकर एक्सपर्ट्स से लिखवाते थे, जबकि विकिपीडिया ने पूरी दुनिया के लिए दरवाजे खोल दिए। नतीजा आपके सामने है। आज अगर आपको किसी चीज के बारे में जानना होता है, तो आप ब्रिटानिका की दुकान नहीं खोजते। ठीक यही चीज अब फिजिकल हार्डवेयर में हो रही है। अगर आप इस कम्युनिटी का हिस्सा नहीं बने, तो आप बस उस पुराने टाइपराइटर की तरह रह जाएंगे जिसे कोई छूना भी पसंद नहीं करता।


लेसन ३ : द लॉन्ग टेल ऑफ थिंग्स — छोटे मार्केट का बड़ा धमाका

पुराने जमाने में अगर आपको कोई सामान बेचना होता था, तो आपको वॉलमार्ट या बिग बाजार जैसे बड़े स्टोर्स की मिन्नतें करनी पड़ती थीं। वो आपसे कहते थे कि भाई साहब, अगर आपका सामान लाखों की तादाद में नहीं बिकेगा, तो हम अपनी शेल्फ पर जगह नहीं देंगे। नतीजा यह होता था कि हम सब वही घिसी-पिटी चीजें खरीदने पर मजबूर थे जो सबको पसंद आती थीं। लेकिन क्रिस एंडरसन यहाँ एक गजब की बात कहते हैं। वो कहते हैं कि अब जमाना 'हिट' प्रोडक्ट्स का नहीं, बल्कि 'यूनिक' प्रोडक्ट्स का है। इसे ही वो 'द लॉन्ग टेल' कहते हैं।

मान लीजिए आपको एक ऐसा कुत्ता पसंद है जिसे सिर्फ गुलाबी रंग के मोजे पहनना अच्छा लगता है। पुराने वक्त में आप ऐसे मोजे ढूंढते-ढूंढते थक जाते, लेकिन कोई कंपनी इसे नहीं बनाती क्योंकि उनके लिए यह घाटे का सौदा था। लेकिन आज? आज इंटरनेट और पर्सनल मैन्युफैक्चरिंग की वजह से आप जैसे दस हजार लोग भी अगर पूरी दुनिया में फैले हैं, तो वो एक बहुत बड़ा मार्केट बन जाता है। अब आपको करोड़ों ग्राहकों की जरूरत नहीं है, बस कुछ वफादार और जुनूनी लोग ही काफी हैं जो आपकी उस खास चीज के लिए पैसे देने को तैयार हों।

यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आज के दौर में म्यूजिक या कंटेंट का हाल है। एक वक्त था जब सिर्फ बॉलीवुड के गाने चलते थे, लेकिन आज एक लड़का अपने कमरे में बैठकर गिटार बजाता है और उसके पास भी लाखों की ऑडियंस है। मैन्युफैक्चरिंग में भी यही हो रहा है। अगर आप ऐसी कोई चीज बना रहे हैं जो बहुत कम लोगों को चाहिए, लेकिन उन्हें वो 'बहुत ज्यादा' चाहिए, तो आप मालामाल हो सकते हैं। आज का बिजनेस मॉडल यह नहीं है कि एक चीज सबको बेचो, बल्कि यह है कि हर किसी के लिए कुछ खास बनाओ।

लोग अक्सर डरते हैं कि बड़ी कंपनियां हमें कुचल देंगी। अरे भाई, बड़ी कंपनियां उस हाथी की तरह हैं जो एक तंग गली में नहीं घुस सकता। आप उस गली के राजा हैं। आप वो कस्टमाइज्ड और खास चीजें बना सकते हैं जो एक बड़ी फैक्ट्री कभी सोच भी नहीं सकती। अगर आप अभी भी इस डर में जी रहे हैं कि मार्केट में कॉम्पिटिशन बहुत है, तो यकीन मानिए आप कॉम्पिटिशन वाली जगह पर खड़े ही क्यों हैं? अपनी खुद की एक ऐसी जगह बनाइए जहाँ आप इकलौते खिलाड़ी हों।

तो दोस्तों, क्रिस एंडरसन की यह किताब हमें बस एक ही बात समझाती है कि इंडस्ट्रियल रिवोल्यूशन अब इतिहास की किताबों से बाहर निकलकर आपके हाथों में आ चुका है। अब आपके पास टूल्स हैं, कम्युनिटी है और पूरी दुनिया का मार्केट है। अब भी अगर आप बैठकर सिर्फ हाथ मल रहे हैं, तो गलती आपकी किस्मत की नहीं, आपकी हिम्मत की है। उठिए, डिजाइन करिए और दुनिया को दिखा दीजिए कि एक छोटा सा 'मेकर' क्या कर सकता है।

अपनी सोच को बड़ा कीजिए और आज ही अपना पहला कदम उठाइए। क्या आप भी अपना खुद का कुछ अनोखा बनाना चाहते हैं? हमें नीचे कमेंट्स में जरूर बताएं।

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