क्या आप भी अपनी टीम के पीछे डंडा लेकर भाग रहे हैं और रिजल्ट के नाम पर आपको सिर्फ बाबा जी का ठुल्लू मिल रहा है। बधाई हो आप एक लीडर नहीं बल्कि एक थके हुए चरवाहे बन चुके हैं जो जबरदस्ती घोड़े को पानी पिलाने की नाकाम कोशिश कर रहा है।
एलेक्स हियाम की किताब मेकिंग हॉर्सेज ड्रिंक हमें यही सिखाती है कि असल लीडरशिप पावर दिखाने में नहीं बल्कि प्यास जगाने में है। चलिए आज उन 3 लेसन को समझते हैं जो आपके डूबते हुए बिजनेस और टीम मैनेजमेंट को फिर से जिंदा कर सकते हैं।
लेसन १ : घोड़े को प्यासा बनाना सीखो, उसे नहलाना नहीं
बिजनेस की दुनिया में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि अगर आप अपने एम्प्लॉइज को अच्छी सैलरी दे रहे हैं, तो वे आपके लिए जान छिड़क देंगे। लेकिन सच तो यह है कि ज्यादा पैसे देने से लोग सिर्फ ऑफिस आते हैं, काम करने का जुनून नहीं लाते। एलेक्स हियाम अपनी किताब में एक बहुत ही पुरानी कहावत का इस्तेमाल करते हैं कि आप घोड़े को पानी तक ले जा सकते हैं, पर उसे पानी पिला नहीं सकते। लेकिन भाई साहब, असल लीडर वो है जो घोड़े को इतना प्यासा कर दे कि वो खुद पानी ढूंढता हुआ तालाब तक पहुँच जाए।
आजकल के मैनेजर्स का हाल देखिए। वे सुबह 9 बजे से ही अपनी टीम के सिर पर सवार हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि जितनी ज्यादा मीटिंग्स करेंगे और जितने ज्यादा ईमेल्स भेजेंगे, टीम उतना ही बढ़िया परफॉर्म करेगी। पर असलियत में आप अपनी टीम को मोटिवेट नहीं कर रहे, बल्कि उन्हें इरिटेट कर रहे हैं। आप उस मालिक की तरह हैं जो घोड़े का मुंह जबरदस्ती पानी की बाल्टी में डाल रहा है। नतीजा क्या होता है। घोड़ा छटपटाता है, पानी फैलता है और अंत में आप दोनों गीले और परेशान हो जाते हैं। काम रत्ती भर भी नहीं होता।
मान लीजिए आपकी एक सेल्स टीम है। आप उन्हें रोज सुबह बुलाकर लेक्चर देते हैं कि सेल्स बढ़ाओ वरना बोनस नहीं मिलेगा। यह डर दिखाने का पुराना तरीका है। अब इसकी जगह थोड़ा दिमाग लगाइए। उन्हें यह मत बताइए कि उन्हें क्या करना है, उन्हें यह महसूस कराइए कि यह प्रोजेक्ट उनके करियर के लिए कितना बड़ा गेम चेंजर हो सकता है। जब इंसान को खुद की ग्रोथ दिखने लगती है, तो वो संडे को भी लैपटॉप खोलकर बैठ जाता है। उसे फिर आपके रिमाइंडर की जरूरत नहीं पड़ती।
असली लीडरशिप का सीक्रेट यह है कि आप अपनी टीम की "हंगर" यानी भूख को पहचानें। किसी को इज्जत चाहिए, किसी को नई स्किल सीखनी है, तो किसी को बस ऑफिस में अपनी अलग पहचान बनानी है। जब आप उनकी पर्सनल जरूरतों को कंपनी के गोल से जोड़ देते हैं, तब मैजिक होता है। तब आपको डंडा लेकर पीछे नहीं भागना पड़ता। आपकी टीम खुद भागती है क्योंकि अब प्यास उन्हें लगी है, आपको नहीं।
लेकिन हम क्या करते हैं। हम माइक्रो मैनेजमेंट के जाल में फंस जाते हैं। हम हर छोटी चीज पर नजर रखते हैं जैसे कि कोई जासूस हों। "अरे राहुल, तुमने वो फॉन्ट साइज 12 की जगह 14 क्यों रखा।" "पिंकी, तुम्हारा लंच ब्रेक 5 मिनट ज्यादा कैसे हो गया।" भाई साहब, आप बिजनेस चला रहे हैं या किंडरगार्टन स्कूल। जब आप लोगों का दम घोंटते हैं, तो उनकी क्रिएटिविटी मर जाती है। वे बस उतना ही काम करते हैं जिससे उनकी नौकरी बची रहे। वे एक्स्ट्रा एफर्ट कभी नहीं डालेंगे क्योंकि आपने उन्हें कभी अपनापन महसूस ही नहीं होने दिया।
मेकिंग हॉर्सेज ड्रिंक हमें सिखाती है कि लोगों को कंट्रोल करना छोड़िए और माहौल बनाना शुरू कीजिए। एक ऐसा माहौल जहाँ काम करना मजबूरी नहीं बल्कि एक चॉइस बन जाए। जब आपकी टीम को लगेगा कि उनकी राय की कीमत है और उनके काम से सच में कुछ बदल रहा है, तो वे खुद पानी पिएंगे और आपको शुक्रिया भी कहेंगे। याद रखिए, जबरदस्ती की गई मेहनत कभी भी एक्सीलेंस पैदा नहीं कर सकती। एक्सीलेंस तो उस प्यास से आती है जो अंदर से जागती है।
लेसन २ : आप लीडर हैं, कोई जेल के वार्डन नहीं
बिजनेस की दुनिया में आधे से ज्यादा मैनेजर खुद को खुदा समझने लगते हैं। उन्हें लगता है कि ऑफिस की कुर्सी पर बैठते ही उनके पास दिव्य शक्तियां आ गई हैं और अब उनका काम सिर्फ उंगली उठाकर लोगों को बताना है कि "तू ये कर और तू वो कर"। एलेक्स हियाम अपनी किताब में इस सोच की धज्जियां उड़ाते हैं। वे कहते हैं कि एक सच्चे लीडर का काम कंट्रोल करना नहीं बल्कि सपोर्ट करना है। इसे एक आसान मिसाल से समझिए। अगर आप एक माली हैं, तो आपका काम पौधों को खींचकर बड़ा करना नहीं है। आपका काम है उन्हें सही मिट्टी, पानी और धूप देना ताकि वे अपनी रफ्तार से बढ़ सकें। लेकिन हमारे यहां तो मैनेजर साहब पौधों के पत्तों को पकड़कर खींच रहे हैं कि "जल्दी फूल खिलाओ वरना अप्रेजल रुक जाएगा"।
इमेजिन कीजिए कि आपकी टीम एक ऐसी रेस में दौड़ रही है जहाँ रास्ते में बड़े-बड़े पत्थर और कांटे पड़े हैं। एक घटिया लीडर फिनिश लाइन पर खड़े होकर चिल्लाएगा कि "जल्दी आओ, तुम इतने धीरे क्यों दौड़ रहे हो"। लेकिन एक ग्रेट लीडर अपनी टीम के साथ दौड़ता है और रास्ते के पत्थर हटाता जाता है ताकि उसकी टीम बिना रुके अपना बेस्ट दे सके। अगर आपकी टीम का कोई बंदा परफॉर्म नहीं कर पा रहा है, तो उसे डांटने से पहले यह पूछिए कि "भाई, तुझे क्या दिक्कत आ रही है। क्या तेरे पास सही सॉफ्टवेयर है। क्या तुझे प्रोसेस समझ आया है।" जब आप लोगों की मुश्किलें आसान करते हैं, तो वे आपके लिए पहाड़ भी खोद देते हैं।
मान लीजिए आपके पास एक बहुत ही टैलेंटेड ग्राफिक डिजाइनर है। आप उसे एक प्रोजेक्ट देते हैं और फिर हर 10 मिनट में उसके सिर पर खड़े होकर पूछते हैं कि "भाई, ये नीले की जगह थोड़ा और नीला नहीं हो सकता क्या"। या फिर आप उसे पुराने जमाने का स्लो कंप्यूटर पकड़ा देते हैं और उम्मीद करते हैं कि वो आपको पिकासो जैसी पेंटिंग बनाकर दे दे। भाई साहब, अगर आपने उसे सही टूल्स और थोड़ी शांति नहीं दी, तो वो डिजाइन नहीं बनाएगा, वो बस अपना इस्तीफा टाइप करेगा। मेकिंग हॉर्सेज ड्रिंक का सीधा फंडा है कि अपनी टीम को रिसोर्स और आजादी दीजिए। जब आप उन पर भरोसा करते हैं, तो वे उस भरोसे को टूटने नहीं देते।
लेकिन नहीं, हमें तो सब कुछ अपनी आंखों के सामने चाहिए। हमें लगता है कि अगर हमने मीटिंग में किसी की बेइज्जती नहीं की, तो हमारी लीडरशिप का दबदबा कम हो जाएगा। याद रखिए, डर से आप लोगों का शरीर काम पर ला सकते हैं, उनका दिमाग और दिल नहीं। जब आप अपनी टीम के लिए एक ढाल बनकर खड़े होते हैं और उन्हें गलतियां करने की थोड़ी जगह देते हैं, तब वे सच में कुछ नया करने की हिम्मत जुटा पाते हैं। एक अच्छा लीडर क्रेडिट खुद नहीं लेता बल्कि जब टीम जीतती है तो उन्हें आगे कर देता है और जब हारती है तो खुद सामने आकर जिम्मेदारी लेता है।
ज्यादातर कंपनियों में लोग काम से नहीं बल्कि अपने बॉस से परेशान होकर नौकरी छोड़ते हैं। क्यों। क्योंकि बॉस को लगता है कि वो सबसे ज्यादा स्मार्ट है और बाकी सब बेवकूफ। एलेक्स हियाम कहते हैं कि अपनी टीम के टैलेंट को पहचानिए और उन्हें चमकने का मौका दीजिए। अगर आप हर छोटी चीज खुद ही अप्रूव करेंगे, तो आपकी टीम कभी भी बड़ी सोच नहीं रख पाएगी। वे बस आपके इशारों पर नाचने वाले कठपुतली बन जाएंगे। और यकीन मानिए, कठपुतलियों से आप दुनिया की नंबर वन कंपनी नहीं बना सकते। आपको शेर चाहिए, और शेरों को पिंजरे में बंद करके नहीं, उन्हें खुला छोड़कर लीड किया जाता है।
तो अगली बार जब आपको लगे कि आपकी टीम सुस्त पड़ रही है, तो शीशे में खुद को देखिए। क्या आप उनके रास्ते का पत्थर बने हुए हैं या आप वो रास्ता साफ कर रहे हैं। क्या आप उन्हें वो सब कुछ दे रहे हैं जिसकी उन्हें जरूरत है। अगर आप सिर्फ हुकुम चला रहे हैं और सपोर्ट के नाम पर सन्नाटा है, तो आप एक लीडर नहीं बल्कि एक थके हुए डिक्टेटर हैं। सपोर्ट सिस्टम बनिए, कंट्रोल सिस्टम नहीं। जब टीम को लगेगा कि उनका बॉस उनके साथ खड़ा है, तो वे दुनिया की किसी भी मुश्किल को पार कर लेंगे।
लेसन ३ : हर दिन एक परसेंट का जादू, न कि एक दिन में सौ परसेंट का फितूर
अक्सर नए-नवेले मैनेजर्स और बिजनेस ओनर्स को एक बीमारी होती है जिसे मैं "मैजिक वैंड सिंड्रोम" कहता हूं। उन्हें लगता है कि एक धमाकेदार मीटिंग होगी, एक जादुई प्रेजेंटेशन दिया जाएगा और अगले दिन से पूरी कंपनी गूगल और एप्पल को टक्कर देने लगेगी। एलेक्स हियाम अपनी किताब मेकिंग हॉर्सेज ड्रिंक में इस गुब्बारे की हवा निकालते हुए कहते हैं कि असली और टिकाऊ कामयाबी छोटे-छोटे लगातार सुधारों से आती है। आप एक ही दिन में दुनिया नहीं बदल सकते, लेकिन आप आज की एक गलती को कल ठीक जरूर कर सकते हैं।
सोचिए अगर आप एक दिन जिम जाएं और 10 घंटे वर्कआउट करें, तो क्या अगले दिन आपकी बॉडी बन जाएगी। बिल्कुल नहीं, अगले दिन सिर्फ आपका बदन दर्द होगा और आप जिम का नाम सुनकर भी कांपने लगेंगे। लेकिन अगर आप रोज सिर्फ 20 मिनट एक्सरसाइज करें, तो कुछ महीनों में आप फिट नजर आने लगेंगे। बिजनेस और लीडरशिप में भी यही नियम लागू होता है। जब आप अपनी टीम पर एक साथ बहुत सारे बदलावों का बोझ डाल देते हैं, तो वे मोटिवेट होने की जगह कंफ्यूज हो जाते हैं। उन्हें लगता है कि बॉस पागल हो गया है, चलो कहीं और नौकरी ढूंढते हैं।
मान लीजिए आपके ऑफिस की कैंटीन का खाना बहुत खराब है, एसी ठीक से काम नहीं करता और रिपोर्टिंग का सिस्टम बहुत पेचीदा है। अब आप एक बड़ी मीटिंग बुलाकर विजन और मिशन की बातें कर रहे हैं। भाई साहब, आपकी टीम का ध्यान आपके विजन पर नहीं, बल्कि उस पसीने और भूख पर है जो उन्हें परेशान कर रही है। एक स्मार्ट लीडर क्या करेगा। वो पहले कैंटीन ठीक करवाएगा, फिर एसी सुधरवाएगा और धीरे-धीरे प्रोसेस को आसान बनाएगा। जब छोटे-छोटे सुधार होते हैं, तो टीम को लगता है कि उनकी लाइफ बेहतर हो रही है। और जब लाइफ बेहतर होती है, तो परफॉरमेंस अपने आप सुधर जाती है।
हम अक्सर बड़ी जीत के पीछे भागते हुए उन छोटी चीजों को भूल जाते हैं जो रोज की वर्किंग को स्मूथ बनाती हैं। एलेक्स हियाम कहते हैं कि अपनी टीम से पूछिए कि आज हम कौन सी एक छोटी चीज बेहतर कर सकते हैं। शायद वो सिर्फ एक फालतू की ईमेल को बंद करना हो या फाइल शेयरिंग का एक आसान तरीका ढूंढना हो। ये छोटी जीतें टीम का कॉन्फिडेंस बढ़ाती हैं। जब लोग देखते हैं कि छोटे बदलावों से फर्क पड़ रहा है, तो वे बड़े बदलावों के लिए खुद ही तैयार हो जाते हैं।
आजकल के स्टार्टअप कल्चर में सब कुछ "फास्ट" चाहिए। लेकिन फास्ट के चक्कर में हम अक्सर "क्वालिटी" और "पीस ऑफ माइंड" को कचरे के डिब्बे में डाल देते हैं। सार्केस्म की बात तो ये है कि हम फास्ट होने के लिए इतनी मीटिंग्स करते हैं कि असली काम करने का टाइम ही नहीं बचता। मेकिंग हॉर्सेज ड्रिंक हमें याद दिलाती है कि कंसिस्टेंसी ही असली किंग है। अगर आप अपनी टीम की छोटी-छोटी जरूरतों का ख्याल रखेंगे और हर दिन प्रोसेस को थोड़ा और आसान बनाएंगे, तो एक दिन आप पीछे मुड़कर देखेंगे और पाएंगे कि आपने पहाड़ चढ़ लिया है।
तो दोस्तों, सुपरमैन बनने की कोशिश छोड़िए और एक चतुर माली बनिए जो रोज पौधों की छंटाई करता है। बड़ी क्रांति के सपने देखना अच्छी बात है, लेकिन उन सपनों की नींव छोटे और ठोस सुधारों पर टिकी होनी चाहिए। जब आप अपनी टीम को हर दिन जीतते हुए देखते हैं, तो उनका जोश अपने आप बढ़ जाता है। याद रखिए, समंदर भी बूंद-बूंद से ही भरता है। अपनी टीम को हर दिन थोड़ा बेहतर बनने का मौका दीजिए, और वे आपको वो रिजल्ट देंगे जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की होगी।
लीडरशिप का मतलब सिर्फ टाइटल या कुर्सी नहीं है, बल्कि यह एक जिम्मेदारी है कि आप दूसरों को उनके बेस्ट वर्जन तक कैसे पहुँचाते हैं। आज ही अपनी टीम से जाकर पूछिए कि उनके रास्ते का वो एक पत्थर कौन सा है जिसे आप हटा सकते हैं। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप भी अपनी टीम को जबरदस्ती पानी पिलाने की जगह उनकी प्यास जगाना चाहते हैं, तो इसे अपने नेटवर्क में शेयर करें और कमेंट में बताएं कि आपका सबसे बड़ा लीडरशिप लेसन क्या रहा है।
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