अगर आप आज भी पुराने घिसे पिटे तरीके से सामान बेच रहे हैं तो मुबारक हो। आप अपने बिजनेस की अर्थी खुद सजा रहे हैं। लोग अब आपके प्रोडक्ट से नफरत करते हैं क्योंकि आप उन्हें सिर्फ चलते फिरते एटीएम समझते हैं। क्या आपको लगता है कि कस्टमर बेवकूफ है?
इस आर्टिकल में हम मार्केटिंग ३.० की उन गहराइयों को समझेंगे जो आपके बिजनेस को सिर्फ एक दुकान नहीं बल्कि एक इमोशन बना देंगी। चलिए फिलिप कोटलर के इन ३ कीमती लेसन को डिकोड करते हैं जो आपकी ग्रोथ को रॉकेट बना देंगे।
लेसन १ : वैल्यू ड्रिवन मार्केटिंग (सिर्फ दिमाग नहीं, आत्मा को जीतो)
क्या आपको सच में लगता है कि लोग आपका सामान इसलिए खरीदते हैं क्योंकि वो बहुत अच्छा है? अगर हाँ, तो शायद आप अभी भी पिछली सदी के ख्यालों में खोए हुए हैं। मार्केटिंग १.० के जमाने में हम सिर्फ प्रोडक्ट बेचते थे। मार्केटिंग २.० आया तो हम कस्टमर के दिमाग से खेलने लगे। लेकिन अब दुनिया बदल गई है। अब दौर है मार्केटिंग ३.० का। अब कस्टमर सिर्फ सामान नहीं खरीदता, वो आपका मकसद खरीदता है। अगर आपके ब्रांड का कोई बड़ा विजन नहीं है, तो समझ लीजिए कि आप बस भीड़ का हिस्सा हैं।
आज का कस्टमर बहुत होशियार और थोड़ा टेढ़ा भी है। उसे पता है कि आप उसे मक्खन लगा रहे हैं। मान लीजिए आप एक साबुन बेच रहे हैं। अगर आप कहते हैं कि यह साबुन गोरा कर देगा, तो कस्टमर मन ही मन आपको गालियां देगा। लेकिन अगर आप कहते हैं कि इस साबुन को खरीदने से गरीब बच्चों को साफ पानी मिलेगा, तो वही कस्टमर खुशी खुशी आपकी जेब भरेगा। इसे कहते हैं वैल्यू ड्रिवन मार्केटिंग। फिलिप कोटलर कहते हैं कि आपको लोगों के दिल और उनकी रूह तक पहुंचना होगा।
मान लीजिए आपके पड़ोस में दो समोसे वाले हैं। पहला वाला समोसा बहुत अच्छा बनाता है लेकिन उसका व्यवहार रुखा है। उसे सिर्फ अपने गल्ले से मतलब है। दूसरा वाला समोसा शायद उतना परफेक्ट न हो, लेकिन वो हर समोसे के साथ एक मुस्कान देता है और अपनी कमाई का एक छोटा हिस्सा सड़क पर रहने वाले कुत्तों के खाने पर खर्च करता है। आप किसके पास जाएंगे? जाहिर है दूसरे वाले के पास। क्यों? क्योंकि वहां आपको सिर्फ समोसा नहीं, एक अच्छी फीलिंग मिल रही है।
मार्केटिंग ३.० का मतलब है कि आपकी कंपनी दुनिया की किसी बड़ी समस्या का समाधान बने। लोग अब उन ब्रांड्स को प्यार करते हैं जो सोशल जस्टिस, पर्यावरण या इंसानियत की बात करते हैं। अगर आप अपनी कंपनी को सिर्फ पैसा छापने की मशीन समझेंगे, तो लोग भी आपको सिर्फ एक लुटेरा समझेंगे। आपको यह साबित करना होगा कि आप इस दुनिया को एक बेहतर जगह बनाने आए हैं। जब आप अपनी मार्केटिंग में ईमानदारी और वैल्यूज जोड़ देते हैं, तो आपका ब्रांड एक कम्युनिटी बन जाता है।
पुराने जमाने के सेल्समैन की तरह चिल्लाना बंद कीजिए। अपनी वैल्यूज को ऊंचा कीजिए। जब आपकी नियत साफ होती है और आपका विजन बड़ा होता है, तो सेल्स अपने आप आती है। आपको कस्टमर को यह महसूस कराना होगा कि आपके साथ जुड़कर वो भी एक महान काम का हिस्सा बन रहा है। याद रखिए, लोग दिमाग से लॉजिक ढूंढते हैं लेकिन खरीदारी हमेशा दिल और जज्बात से करते हैं। अगर आपने उनकी आत्मा को छू लिया, तो वो आपके ब्रांड के लिए फ्री में एडवर्टाइजिंग करेंगे।
लेसन २ : कम्युनिटी बिल्डिंग (ग्राहक नहीं, फैंस की फ़ौज बनाओ)
आजकल के मार्केटिंग के नाम पर लोग क्या कर रहे हैं? बस फेसबुक और इंस्टाग्राम पर ऐड चलाकर सोचते हैं कि काम हो गया। भाई साहब, अगर आपको लगता है कि सिर्फ पैसा फेंकने से लोग आपके वफादार बन जाएंगे, तो आप किसी बड़े धोखे में जी रहे हैं। मार्केटिंग ३.० में कोटलर साहब समझाते हैं कि अब वन वे ट्रैफिक का जमाना खत्म हो चुका है। अब आप ऊपर बैठकर भाषण नहीं दे सकते। अब आपको लोगों के बीच उतरना होगा। मार्केटिंग का नया मंत्र है कम्युनिटी बनाना।
इमेजिन कीजिए कि आप एक जिम खोलते हैं। आप शहर भर में पोस्टर लगवाते हैं कि हमारे पास सबसे अच्छी मशीनें हैं। कोई नहीं आएगा। लेकिन अगर आप एक ऐसा ग्रुप बनाते हैं जहां लोग अपनी फिटनेस जर्नी शेयर करते हैं, एक दूसरे को मोटिवेट करते हैं और संडे को साथ में पार्क में वर्कआउट करते हैं, तो क्या होगा? लोग आपके जिम नहीं, आपकी कम्युनिटी से जुड़ने आएंगे। आज के दौर में इंसान अकेला महसूस कर रहा है। उसे एक ऐसी जगह चाहिए जहां उसे लगे कि वह किसी खास ग्रुप का हिस्सा है।
बुलेट बाइक चलाने वालों को आपने देखा होगा। वो सिर्फ एक मोटरसाइकिल नहीं चला रहे होते, वो एक भाईचारे का हिस्सा होते हैं। अगर बीच सड़क पर किसी की बुलेट खराब हो जाए, तो दूसरा बुलेट वाला रुककर मदद जरूर करेगा। ये कंपनी ने नहीं सिखाया, ये उस कम्युनिटी ने पैदा किया है। इसे कहते हैं पावरफुल मार्केटिंग। आपको अपने ब्रांड के इर्द गिर्द एक ऐसा माहौल बनाना है जहां कस्टमर को लगे कि यार ये तो मेरी अपनी जगह है।
आजकल लोग टीवी एड्स पर भरोसा नहीं करते। वो उस दोस्त पर भरोसा करते हैं जो व्हाट्सएप ग्रुप में किसी प्रोडक्ट की तारीफ करता है। अगर आपने एक मजबूत कम्युनिटी बना ली, तो आपको करोड़ों के विज्ञापन की जरूरत नहीं पड़ेगी। आपके फैंस ही आपके सबसे बड़े सेल्समैन बन जाएंगे। वो इंटरनेट पर आपकी ढाल बनकर खड़े होंगे और आपके विजन को घर घर तक पहुंचाएंगे। लेकिन इसके लिए आपको लालच छोड़ना होगा। आपको बेचना कम और सुनना ज्यादा होगा।
जब आप कम्युनिटी बनाते हैं, तो आप एक दीवार खड़ी कर देते हैं जिसे कोई भी कॉम्पिटिटर आसानी से नहीं गिरा सकता। क्यों? क्योंकि कॉम्पिटिटर आपका जैसा प्रोडक्ट तो बना सकता है, लेकिन वो आपके लोगों का प्यार और उनका आपस का जुड़ाव नहीं चुरा सकता। याद रखिए, अकेला इंसान ग्राहक होता है, लेकिन जब वो एक ग्रुप का हिस्सा बनता है, तो वो एक ताकत बन जाता है। अपने बिजनेस को एक मंदिर बनाइए जहां लोग सिर्फ सौदा करने नहीं, बल्कि एक विजन से जुड़ने आएं।
लेसन ३ : को-क्रिएशन (कस्टमर को अपना बिजनेस पार्टनर बनाओ)
अगर आप अभी भी अपने ऑफिस के बंद कमरे में बैठकर यह सोच रहे हैं कि कस्टमर को क्या चाहिए, तो आपसे बड़ा अंतर्यामी कोई नहीं है। लेकिन अफसोस, असलियत में आप सिर्फ अंधेरे में तीर चला रहे हैं। मार्केटिंग ३.० का सबसे क्रांतिकारी लेसन है को-क्रिएशन। इसका मतलब है कि अब आप अकेले भगवान नहीं हैं जो प्रोडक्ट बनाएंगे और जनता उसे चुपचाप खरीदेगी। अब जनता आपके साथ बैठकर प्रोडक्ट डिजाइन करेगी। अगर आपने उन्हें अपने सफर का हिस्सा नहीं बनाया, तो वो आपको पलक झपकते ही रिजेक्ट कर देंगे।
मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट खोलते हैं और बिना किसी से पूछे मेनू में 'पनीर चॉकलेट समोसा' डाल देते हैं। आपको लगता है आप बहुत बड़े क्रिएटिव जीनियस हैं। लेकिन लोग उसे देखकर ही भाग जाते हैं। वहीं दूसरी तरफ, अगर आप सोशल मीडिया पर पोल डालते और पूछते कि आपको कौन सा नया फ्लेवर चाहिए, तो शायद लोग आपको बताते कि भाई हमें तो बस 'चीजी तंदूरी समोसा' चाहिए। जब आप लोगों की राय लेकर कुछ बनाते हैं, तो वो सिर्फ ग्राहक नहीं रहते, वो उस क्रिएशन के पार्टनर बन जाते हैं। उन्हें लगता है कि यह प्रोडक्ट तो उन्हीं की मेहनत का नतीजा है।
आजकल की दुनिया में इंटरनेट ने सबको एक माइक दे दिया है। लोग अब सिर्फ सुनना नहीं चाहते, वो बोलना चाहते हैं। जब आप अपने कस्टमर से फीडबैक मांगते हैं या उन्हें नए आईडिया देने के लिए कहते हैं, तो उनके अंदर एक अपनापन जागता है। वो आपके ब्रांड को अपना बच्चा समझने लगते हैं। अब सोचिए, क्या कोई अपने बच्चे की बुराई सुन सकता है? बिल्कुल नहीं। यही वो जादू है जो को-क्रिएशन आपके बिजनेस के लिए कर सकता है।
फिलिप कोटलर कहते हैं कि को-क्रिएशन का मतलब सिर्फ सर्वे करना नहीं है। इसका मतलब है कस्टमर को अपनी कंपनी के किचन तक आने देना। उन्हें यह महसूस कराना कि उनकी एक राय आपके लिए पत्थर की लकीर है। जब लोग देखते हैं कि उनके सुझाव पर आपने अपना प्रोडक्ट बदला है, तो वो आपके साथ इमोशनली जुड़ जाते हैं। वो आपके ब्रांड के लिए सड़कों पर उतरने को तैयार हो जाते हैं।
तो भाई साहब, ईगो को साइड में रखिए और अपने कस्टमर्स से बात करना शुरू कीजिए। उन्हें अपने ब्रांड की कहानी का हीरो बनाइए। जब लोग आपके साथ मिलकर कुछ क्रिएट करते हैं, तो वो उसे कभी फेल नहीं होने देते। मार्केटिंग ३.० में जीत उसकी नहीं होती जिसके पास सबसे ज्यादा पैसा है, बल्कि उसकी होती है जिसके पास सबसे ज्यादा सुनने वाले कान और समझने वाला दिल है।
मार्केटिंग ३.० सिर्फ एक किताब नहीं है, यह एक आईना है जो आपको दिखाता है कि बिजनेस सिर्फ लेन देन का नाम नहीं है। यह इंसानी रूह से जुड़ने का एक मौका है। अगर आप दुनिया को सिर्फ प्रॉफिट की नजर से देखेंगे, तो दुनिया भी आपको सिर्फ एक स्वार्थी कंपनी समझेगी। लेकिन अगर आप ईमानदारी, कम्युनिटी और को-क्रिएशन के साथ आगे बढ़ेंगे, तो आप सिर्फ पैसा नहीं बल्कि इतिहास बनाएंगे।
आज ही अपने आपसे पूछिए, क्या आपका बिजनेस किसी की जिंदगी में कोई वैल्यू जोड़ रहा है? क्या आप सिर्फ सामान बेच रहे हैं या खुशियां बांट रहे हैं? वक्त आ गया है कि हम अपनी मार्केटिंग को सिर्फ दिमाग से हटाकर दिल और आत्मा तक ले जाएं। चलिए मिलकर एक ऐसा ब्रांड बनाते हैं जिस पर लोग गर्व कर सकें।
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