Smart Pricing (Hindi)


क्या आप भी उन महान लोगो में से है जो सामान की कीमत बस तुक्का मारकर तय करते है? मुबारक हो, आप हर रोज अपनी टेबल पर रखे करोड़ो रूपये कचरे में फेक रहे है और आपको पता भी नहीं है। जब गूगल और प्राइसलाइन स्मार्ट प्राइसिंग से नोट छाप रहे है, तब आप शायद अपनी लागत जोड़कर खुश हो रहे है।

इस आर्टिकल में हम जगमोहन राजू और जेड जॉन झांग की बुक स्मार्ट प्राइसिंग का पूरा कच्चा चिट्ठा खोलेगे। हम ऐसे ३ पावरफुल लेसन देखेगे जो आपके बिजनेस को घाटे के गढ्ढे से निकालकर मुनाफे के पहाड़ पर खड़ा कर देगे। तो चलिए, बिजनेस की दुनिया के इन सीक्रेट्स को गहराई से समझते है।


लेसन १ : कोस्ट प्लस प्राइसिंग का जाल और वैल्यू का जादू

दोस्तो, अगर आप भी उन लोगो में से है जो अपना प्रोडक्ट बनाने में लगे सौ रूपये में दस रूपये का मुनाफा जोड़कर उसे ११० में बेच देते है, तो यकीन मानिए आप बिजनेस नहीं बल्कि चैरिटी कर रहे है। स्मार्ट प्राइसिंग बुक के लेखक जगमोहन राजू और जेड जॉन झांग कहते है कि कोस्ट प्लस प्राइसिंग यानी लागत में मुनाफा जोड़कर दाम तय करना दुनिया का सबसे पुराना और सबसे खतरनाक जुआ है। यह सुनने में बड़ा सुरक्षित लगता है कि भाई मुझे तो दस रूपये का फायदा हो रहा है, लेकिन असलियत में आप उस कस्टमर की जेब में हाथ डालने से डर रहे है जो शायद उसी चीज के हजार रूपये देने को तैयार बैठा था।

सोचिए, आप तपती धूप में रेगिस्तान के बीच में फसे है और आपको एक ठंडी पानी की बोतल मिलती है। अब क्या आप उस दुकानदार से कहेगे कि भाई इस बोतल की लागत तो सिर्फ दस रूपये है, तो मुझे बारह में दे दो? बिल्कुल नहीं। आप उसके लिए अपनी आधी जायदाद भी लिख देने को तैयार हो जाएगे। यही है वैल्यू बेस्ड प्राइसिंग का असली खेल। आपकी चीज की कीमत वह नहीं है जो उसे बनाने में लगी है, बल्कि वह है जो आपका कस्टमर उसे इस्तेमाल करते वक्त महसूस करता है। अगर आप सिर्फ लागत देखते रहे, तो आप कभी भी बड़ा ब्रांड नहीं बन पाएगे क्योंकि ब्रांड्स इमोशन बेचते है, प्लास्टिक या लोहा नहीं।

ज्यादातर इंडियन बिजनेस ओनर्स इसी जाल में फस जाते है। वे सोचते है कि अगर पडोसी दुकानदार ने दाम कम कर दिए, तो मुझे भी कम करने पड़ेगे। लेकिन स्मार्ट प्राइसिंग कहती है कि अगर आपकी वैल्यू ज्यादा है, तो दाम भी ज्यादा होने चाहिए। मान लीजिए आप एक रेस्टोरेंट चलाते है। आपके पास दो तरीके है। पहला यह कि आप पनीर की सब्जी की लागत निकाले और उस पर थोडा मार्जिन रख ले। दूसरा तरीका यह है कि आप अपने रेस्टोरेंट का माहौल ऐसा बना दे कि लोग वहाँ अपनी पहली डेट पर आना चाहे। अब उस पल की जो वैल्यू है, वो आपके पनीर की लागत से हजार गुना ज्यादा है। यहाँ आप खाने के पैसे नहीं, बल्कि उस यादगार शाम के पैसे ले रहे है।

लेकिन हम इंडियंस को हर चीज में डिस्काउंट चाहिए होता है, है ना? दुकानदार कहता है कि भाई साहब यह हजार का है, और हम कहते है कि भाई पाँच सौ में देना है तो दे वरना रहने दे। लेखक कहते है कि जब आप डिस्काउंट देते है, तो आप अपने प्रोडक्ट की इज्जत अपने हाथो से कम कर रहे होते है। गूगल को ही देख लीजिए। क्या कभी गूगल ने आपसे कहा कि भाई इस महीने सर्च कम करना, हम आपको डिस्काउंट देगे? नहीं। उन्होंने अपनी सर्विस की वैल्यू इतनी बढ़ा दी है कि अब हम उसके बिना रह ही नहीं सकते। जब आपकी चीज की जरुरत इतनी बढ़ जाए कि लोग उसे पाने के लिए बेताब हो, तब दाम आप तय करते है, कस्टमर नहीं।

तो आज से ही कोस्ट प्लस प्राइसिंग के इस घिसे पिटे तरीके को कचरे के डिब्बे में डाल दीजिए। अपने कस्टमर के दिमाग को पढ़िए। यह देखिये कि आपका प्रोडक्ट उसकी लाइफ की कौन सी बड़ी प्रॉब्लम सॉल्व कर रहा है। अगर आप उसकी सरदर्द की दवा बेच रहे है, तो वो उसकी कीमत नहीं पूछेगा। लेकिन अगर आप सिर्फ एक और सफेद गोली बेच रहे है, तो वो आपसे मोलभाव जरुर करेगा। बिजनेस में वही जीतता है जो अपनी वैल्यू को दाम से बड़ा बना देता है। जब वैल्यू बड़ी होती है, तो कस्टमर खुशी खुशी अपनी जेब खाली करता है और आपको थैंक यू भी बोलकर जाता है।


लेसन २ : पे एज़ यू विश यानी अपनी मर्जी से कीमत चुकाओ

पिछले लेसन में हमने समझा कि वैल्यू क्या होती है, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या आप इतने जिगर वाले है कि आप अपने कस्टमर से कहे कि भाई जो अच्छा लगे वो दे देना? सुनिए, यह कोई मजाक नहीं है। स्मार्ट प्राइसिंग बुक हमे पे एज़ यू विश यानी अपनी मर्जी से पैसे देने के उस अनोखे तरीके के बारे में बताती है जिसने बड़ी बड़ी कंपनियों के होश उड़ा दिए है। ज्यादातर बिजनेस वाले इस बात को सुनकर ही बेहोश हो जाएगे। वे सोचेगे कि अगर हमने कस्टमर पर कीमत छोड़ दी, तो वो तो हमे भिखारी बना देगा। लेकिन सच इसके बिल्कुल उल्टा है।

सोचिए, आप एक म्यूजिक बैंड है और आप अपना नया एल्बम लॉन्च करते है। आप कहते है कि जिसे फ्री में चाहिए वो फ्री में ले जाए और जिसे पैसे देने है वो अपनी मर्जी से दे दे। आपको लगेगा कि लोग फ्री में लेकर भाग जाएगे। लेकिन रेडियोहेड नाम के एक मशहूर बैंड ने यही किया। नतीजा? उन्होंने अपने पिछले सभी रिकॉर्ड्स से ज्यादा पैसे कमाए। ऐसा क्यों हुआ? क्योंकि जब आप कस्टमर को मालिक बना देते है, तो उसके ऊपर एक नैतिक दबाव (Moral Pressure) आ जाता है। वह सोचता है कि अगर इसने मुझे इतनी अच्छी चीज दी है, तो क्या मै इतना गिरा हुआ हु कि इसे कुछ भी न दू?

भारत के संदर्भ में देखे तो हमारे यहाँ तो लोग मंदिर के बाहर रखे जूतों की रखवाली करने वाले को भी दस रूपये दे देते है क्योंकि वहाँ उनकी श्रद्धा जुड़ी होती है। स्मार्ट प्राइसिंग यही सिखाती है कि अगर आप अपने प्रोडक्ट के साथ एक इमोशनल कनेक्शन बना ले, तो लोग आपको आपकी उम्मीद से ज्यादा पैसे देकर जाएगे। यह मॉडल उन जगहों पर कमाल करता है जहाँ आपकी लागत कम हो और आपका प्रोडक्ट दिल को छू लेने वाला हो। जैसे कि कोई डिजिटल कोर्स या कोई आर्ट गैलरी। यहाँ आप कस्टमर का भरोसा जीतते है और जब भरोसा जीत लिया जाए, तो बटुआ अपने आप खुल जाता है।

लेकिन रुकिए, इसका मतलब यह नहीं है कि आप कल से अपनी दुकान पर बोर्ड लगा दे कि जो मन करे वो दे दो। इसके लिए भी दिमाग चाहिए होता है। लेखक कहते है कि यह मॉडल तब सबसे अच्छा काम करता है जब आप कस्टमर को एक सजेस्टेड प्राइस यानी एक इशारा दे दे कि आम तौर पर लोग इसके सौ रूपये देते है। अब कस्टमर के पास एक बेंचमार्क है। अगर उसे आपकी सर्विस बहुत पसंद आई, तो वो आपको १२० भी दे सकता है। और जिसे सच में तंगी है, वो ५० देगा। लेकिन कुल मिलाकर आपका मुनाफा बढ़ जाएगा क्योंकि आपने उन लोगो को भी अपना बना लिया जो शायद १०० रूपये देखकर कभी आपकी दुकान के अंदर ही नहीं आते।

यह स्ट्रेटेजी उन लोगो के लिए तमाचा है जो सोचते है कि बिजनेस सिर्फ नंबर्स का खेल है। नहीं दोस्त, बिजनेस इंसानी व्यवहार का खेल है। जब आप किसी को अपनी मर्जी का मालिक बनाते है, तो आप उसे इज्जत दे रहे होते है। और दुनिया में इज्जत से बड़ी कोई चीज नहीं है। लोग आपके साथ जुड़ा हुआ महसूस करते है। वे आपके ब्रांड के एम्बेसडर बन जाते है। वे दूसरो को जाकर बताते है कि भाई उस दुकान पर जा, वो बंदा बहुत नेक है। और देखते ही देखते आपकी दुकान पर वो भीड़ जमा हो जाती है जिसकी आपने कभी कल्पना भी नहीं की थी।

तो क्या आप में वो हिम्मत है कि आप अपनी काबिलियत पर इतना भरोसा करे कि कीमत का फैसला कस्टमर पर छोड़ दे? अगर आप अपनी सर्विस में बेस्ट है, तो यकीन मानिए आप कभी घाटे में नहीं रहेगे। स्मार्ट प्राइसिंग का यह लेसन हमे डर से बाहर निकलकर विश्वास के साथ बिजनेस करना सिखाता है। यह सिर्फ एक प्राइसिंग मॉडल नहीं है, यह कस्टमर के साथ एक गहरा रिश्ता बनाने का जरिया है। जब रिश्ता पक्का होता है, तो पैसे तो सिर्फ एक छोटा सा हिस्सा बनकर रह जाते है।


लेसन ३ : प्राइस वॉर का मुकाबला और जीत का असली फॉर्मूला

अब बात करते है उस स्थिति की जो हर बिजनेसमैन के लिए किसी डरावने सपने जैसी होती है यानी प्राइस वॉर। मान लीजिए आपने मेहनत से एक ब्रांड खड़ा किया और अचानक आपका पड़ोसी या कोई ऑनलाइन कंपनी वही चीज आधे दाम पर बेचने लगती है। अब आप क्या करेगे? क्या आप भी अपने दाम गिरा देगे? स्मार्ट प्राइसिंग बुक के लेखक कहते है कि दाम गिराना अपनी कब्र खुद खोदने जैसा है। अगर आप सिर्फ इसलिए दाम कम करते है क्योंकि कोई और कम कर रहा है, तो आप एक ऐसी रेस में दौड़ रहे है जिसका अंत सिर्फ बर्बादी है।

लेखक हमे एक बहुत ही स्मार्ट तरीका बताते है जिसे फाइटर ब्रांड कहा जाता है। यह कुछ ऐसा है जैसे आप अपनी असली सेना को बचाकर रखे और एक छोटी टुकड़ी जंग के मैदान में उतार दे। अगर आपका कॉम्पिटिटर सस्ते दाम पर खेल रहा है, तो आप अपनी मेन सर्विस के दाम मत गिराइए। बल्कि एक नया छोटा ब्रांड या प्रोडक्ट लॉन्च कर दीजिए जो सिर्फ उस सस्ते मार्केट को टक्कर देने के लिए हो। इससे आपके असली ब्रांड की इज्जत भी बची रहेगी और आप उन सस्ते ग्राहकों को भी नहीं खोएगे जो सिर्फ कम कीमत के पीछे भागते है।

सोचिए, अगर एप्पल कल को अपने आईफोन की कीमत बीस हजार कर दे सिर्फ इसलिए कि बाकी कंपनियां सस्ते फोन बेच रही है, तो क्या होगा? एप्पल की वो साख, वो रुतबा खत्म हो जाएगा। एप्पल कभी दाम नहीं गिराता, बल्कि वो अपनी वैल्यू को इतना ऊपर ले जाता है कि लोग उसके लिए किडनी बेचने वाले जोक्स बनाने लगते है फिर भी उसे ही खरीदते है। आपको भी अपने बिजनेस में यही करना है। जब कोई आपके दाम पर सवाल उठाए, तो अपने फीचर्स या अपनी सर्विस की क्वालिटी को इतना बढ़ा दीजिए कि सामने वाला खुद शर्मिंदा हो जाए।

स्मार्ट प्राइसिंग हमे सिखाती है कि ग्राहकों के अलग-अलग हिस्से होते है। कुछ को सिर्फ सस्ता चाहिए, कुछ को सबसे अच्छा चाहिए, और कुछ को बस वैल्यू चाहिए। एक स्मार्ट बिजनेसमैन वह है जो एक ही प्रोडक्ट को अलग-अलग पैकिंग और अलग-अलग प्राइसिंग के साथ पेश करे। इसे वर्जनिंग कहते है। जैसे एयरलाइंस में होता है। जहाज वही है, मंजिल वही है, लेकिन बिजनेस क्लास वाला ज्यादा पैसे देता है क्योंकि उसे एक्स्ट्रा इज्जत और आराम चाहिए। अगर आप सबको एक ही लाठी से हाकेगे, तो आप बहुत सारा पैसा टेबल पर ही छोड़कर घर आ जाएगे।

याद रखिए कि प्राइसिंग सिर्फ एक नंबर नहीं है, यह एक मैसेज है जो आप दुनिया को देते है। अगर आप अपनी कीमत कम रखते है, तो आप दुनिया को बता रहे है कि आपकी मेहनत की कोई खास कीमत नहीं है। लेकिन अगर आप अपनी सही कीमत मांगते है, तो दुनिया आपको एक लीडर की तरह देखती है। स्मार्ट प्राइसिंग का मतलब लालच नहीं, बल्कि अपनी मेहनत और अपने आईडिया का सही सम्मान पाना है। जब आप अपने काम की इज्जत करेगे, तभी पूरी दुनिया और आपका बैंक बैलेंस भी आपकी इज्जत करेगा।

तो क्या आप आज भी उसी पुराने ढर्रे पर चलेगे या अपनी प्राइसिंग स्ट्रेटजी को स्मार्ट बनाकर अपने बिजनेस की तकदीर बदलेगे? फैसला आपके हाथ में है। अगर आप अपनी वैल्यू जानते है, तो उसे दुनिया को दिखाने से मत डरिए। उठिए और अपने बिजनेस को वो मुकाम दिलाइए जिसका वो हकदार है।

आर्टिकल पसंद आया हो तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करे जो बिजनेस में डिस्काउंट दे-देकर परेशान है। और हमे कमेंट्स में बताए कि आप अपने प्रोडक्ट की कीमत कैसे तय करते है। चलिए, मिलकर इंडिया के हर बिजनेस को स्मार्ट बनाते है।

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