क्या आप अब भी वही इंसान हैं जो सब्जी मंडी में दस रुपये बचाने के लिए आधा घंटा बहस करता है पर ऑफिस की बड़ी डील्स में बस सिर हिलाकर चुपचाप आ जाता है। मुबारक हो। आप अपनी लाइफ की सबसे बड़ी अपॉर्चुनिटीज और पैसा दोनों ही गटर में डाल रहे हैं क्योंकि आपको बात मनवाना नहीं आता। सच में बहुत दुख की बात है।
दीपक मल्होत्रा की यह किताब आपको वह सीक्रेट सिखाएगी जिससे आप बिना पैसा या ताकत दिखाए किसी भी नामुमकिन डेडलॉक को तोड़ पाएंगे। चलिए जानते हैं वह ३ लाइफ चेंजिंग लेसन्स जो आपकी नेगोशिएशन की गेम को हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : फ्रेमिंग का जादू - बात वही पर अंदाज नया
अगर आप किसी को जाकर कहेंगे कि मुझे आपकी जायदाद चाहिए तो शायद वह आपको घर से बाहर फिंकवा दे। लेकिन अगर आप उसे यह समझा दें कि आप उसकी जायदाद का बोझ अपने कंधों पर उठाकर उसे जन्नत की सैर कराना चाहते हैं तो वह खुद आपको चाबियां थमा देगा। इसे कहते हैं फ्रेमिंग। नेगोशिएशन सिर्फ इस बारे में नहीं है कि आप क्या मांग रहे हैं। बल्कि इस बारे में है कि आप उसे कैसे पेश कर रहे हैं। अक्सर हम सोचते हैं कि सामने वाला लालची है। पर सच तो यह है कि वह बस अपनी इज्जत बचाना चाहता है। या शायद वह डरता है कि कहीं आप उसका फायदा न उठा लें। दीपक मल्होत्रा कहते हैं कि जब हालात एकदम रुक जाएं और सामने वाला नो कह दे तो समझ जाइए कि आपकी फ्रेमिंग गलत है।
मान लीजिए आपका बॉस आपको एक ऐसा प्रोजेक्ट दे रहा है जो नामुमकिन है। अब आप उसे मुंह पर मना करेंगे तो आपकी रेटिंग और नौकरी दोनों का भगवान ही मालिक है। यहाँ काम आता है फ्रेमिंग का हथियार। आप उसे यह मत कहिए कि काम ज्यादा है। बल्कि उसे यह दिखाइए कि इस काम को करने से कंपनी का कितना नुकसान हो सकता है क्योंकि अभी आपके पास जरूरी रिसोर्स नहीं हैं। जब आप अपनी समस्या को सामने वाले की समस्या बनाकर पेश करते हैं तब असली जादू होता है। लोग अपनी मदद करने में कंजूसी कर सकते हैं पर खुद को किसी बड़े नुकसान से बचाने के लिए वे पहाड़ भी हिला देते हैं।
ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को एक जंग की तरह देखते हैं। जहाँ एक जीतेगा और दूसरा हारेगा। लेकिन असल खिलाड़ी वह है जो सामने वाले को यह यकीन दिला दे कि यह डील उसकी अपनी जीत है। अगर आप किसी पुरानी कार को बेचने निकले हैं और सामने वाला कम पैसे दे रहा है तो उसे इंजन की तारीफ मत सुनाइए। उसे यह बताइए कि यह कार उसके स्टेटस को कैसे सूट करती है। उसे यह अहसास दिलाइए कि यह सौदा नहीं बल्कि उसकी लाइफ का एक अपग्रेड है। जब आप बातचीत का ढांचा ही बदल देते हैं तो बड़े से बड़ा जिद्दी इंसान भी नरम पड़ जाता है।
अक्सर हम बहस में इतना उलझ जाते हैं कि भूल जाते हैं कि सामने वाला भी एक इंसान है। उसके पास अपनी ईगो है और अपने डर हैं। फ्रेमिंग वह पुल है जो आपके और उसके बीच की खाई को भरता है। बिना एक रुपया खर्च किए आप सिर्फ अपने शब्दों के चुनाव से किसी का भी दिल जीत सकते हैं। और अगर आप अब भी वही पुरानी रटी रटाई बातें बोल रहे हैं तो यकीन मानिए आप अपनी किस्मत खुद ही खराब कर रहे हैं। नेगोशिएशन कोई कुश्ती नहीं है। यह तो एक खूबसूरत डांस है जहाँ आपको पार्टनर के कदम से कदम मिलाकर चलना होता है ताकि वह आपके इशारों पर नाचने लगे।
लेसन २ : प्रोसेस की ताकत - खेल के नियम आप तय करें
अक्सर लोग बातचीत की टेबल पर इस तरह बैठते हैं जैसे किसी ढाबे पर खाना आर्डर कर रहे हों। उन्हें लगता है कि बस अपनी डिमांड्स रख दीं और काम हो गया। पर असल में नेगोशिएशन उस खाने से पहले की रेसिपी है। दीपक मल्होत्रा समझाते हैं कि अगर आप प्रोसेस को कंट्रोल नहीं करते तो आप पहले ही हार चुके हैं। प्रोसेस का मतलब है कि बातचीत कहाँ होगी। कौन कौन शामिल होगा। और अगर बात नहीं बनी तो अगला कदम क्या होगा। अगर आप बिना तैयारी के किसी अंधेरी गली में घुस जाएंगे तो लूटने के चांसेस तो बढ़ेंगे ही ना।
सोचिए आप किसी बड़ी कंपनी में इंटरव्यू देने गए हैं। एचआर ने आपसे पूछा कि आपकी सैलरी एक्सपेक्टेशन क्या है। अब आप यहाँ सीधे एक नंबर फेंक देते हैं। मुबारक हो। आपने अपनी पूरी ताकत सामने वाले को गिफ्ट कर दी। प्रोसेस का स्मार्ट खिलाड़ी यहाँ नंबर नहीं बोलेगा। वह पहले यह पूछेगा कि इस रोल के लिए कंपनी का बजट क्या है या परफॉरमेंस को कैसे नापा जाएगा। जब आप बातचीत के तरीके को कंट्रोल करते हैं तो आप सामने वाले को अपने इशारों पर चलने पर मजबूर कर देते हैं। लोग अक्सर कंटेंट यानी मुद्दे पर लड़ते रहते हैं पर प्रोसेस को नजरअंदाज कर देते हैं। यह वैसा ही है जैसे आप बिना मैप के जंगल में खजाना ढूंढने निकल पड़े हों। अंत में आप बस थकेंगे और हाथ कुछ नहीं आएगा।
मान लीजिए दो भाई एक ही आम के लिए लड़ रहे हैं। मम्मी आती हैं और बीच से आम काट देती हैं। इसे कहते हैं घटिया नेगोशिएशन। एक स्मार्ट मम्मी पहले पूछती कि तुम्हें आम क्यों चाहिए। पता चलता है कि एक को आम खाना है और दूसरे को उसके छिलके से साइंस प्रोजेक्ट बनाना है। यहाँ प्रोसेस ने दोनों को जीत दिला दी। अगर आप सीधे मुद्दे पर कूद पड़ेंगे तो आप कभी वह गहरी बात नहीं जान पाएंगे जो सामने वाला छिपा रहा है। अपनी ईगो को जेब में डालकर पहले यह तय कीजिए कि बातचीत का रास्ता क्या होगा। अगर रास्ता सही है तो मंजिल अपने आप मिल जाएगी।
प्रोसेस की ताकत आपको एक और कमाल का फायदा देती है और वह है समय का इस्तेमाल। जो इंसान जल्दबाजी में होता है वह हमेशा घाटे में रहता है। अगर आप दिखाएंगे कि आपको यह डील अभी के अभी चाहिए तो सामने वाला आपको निचोड़ लेगा। शांत रहिए। चेहरे पर ऐसी मुस्कान रखिए जैसे आपको कोई जल्दी नहीं है। जब आप प्रोसेस को धीमा कर देते हैं तो सामने वाला घबराने लगता है। उसे लगता है कि शायद वह आपको खो रहा है। और बस। यहीं से आपकी जीत शुरू होती है। अगर आप अब भी अपनी बात मनवाने के लिए चिल्ला रहे हैं तो यकीन मानिए आप सिर्फ अपना गला खराब कर रहे हैं और कुछ नहीं।
याद रखिए कि हर बड़ी जंग मैदान में कम और प्लानिंग की टेबल पर ज्यादा जीती जाती है। अगर आपने बातचीत शुरू होने से पहले ही अपने नियम तय नहीं किए तो आप सिर्फ दूसरों के बिछाए जाल में फंसते रहेंगे। प्रोसेस को समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है पर इसे अनदेखा करना खुद के पैर पर कुल्हाड़ी मारने जैसा है। तो अगली बार जब किसी से कोई डील करें तो पहले यह तय करें कि खेल कैसे खेला जाएगा। फिर देखिएगा कि कैसे सामने वाला आपकी धुन पर थिरकने लगता है।
लेसन ३ : एम्पैथी का इस्तेमाल - बिना तलवार के जंग जीतना
अगर आपको लगता है कि एम्पैथी यानी सहानुभूति सिर्फ फिल्मों या इमोशनल विज्ञापनों के लिए है तो आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। नेगोशिएशन की दुनिया में एम्पैथी का मतलब सामने वाले को प्यार करना नहीं है। बल्कि उसकी खोपड़ी के अंदर घुसकर यह देखना है कि उसे किस बात का डर सता रहा है। दीपक मल्होत्रा कहते हैं कि जब आप सामने वाले की मजबूरी और उसके इंटरेस्ट को समझ जाते हैं तो आप उसे वह दे सकते हैं जो वह चाहता है। और बदले में वह ले सकते हैं जो आपकी जरूरत है। वह भी बिना एक भी रुपया एक्स्ट्रा खर्च किए।
सोचिए आपका मकान मालिक अचानक किराया बढ़ाने की धमकी दे रहा है। अब आपके पास दो रास्ते हैं। या तो आप उस पर चिल्लाएं और सड़क पर आ जाएं। या फिर आप यह समझने की कोशिश करें कि वह ऐसा क्यों कर रहा है। शायद उसे पैसों की उतनी जरूरत नहीं है जितनी इस बात की चिंता है कि घर की देखभाल नहीं हो रही। अगर आप उसे यह भरोसा दिला दें कि आप घर को अपने मंदिर की तरह साफ रखेंगे और छोटे मोटे रिपेयर खुद करवा लेंगे तो वह शायद किराया बढ़ाने का ख्याल ही छोड़ दे। इसे कहते हैं दिमाग की बत्ती जलाना। लोग अक्सर अपनी जरूरतों के लिए इतने अंधे हो जाते हैं कि उन्हें सामने वाले की परेशानी दिखाई ही नहीं देती। और फिर वह बैठ जाते हैं रोने कि दुनिया बहुत जालिम है।
ह्यूमन साइकोलॉजी बहुत ही अजीब चीज है। हम अक्सर उन लोगों की बात मान लेते हैं जो हमें सुनते हैं। जब आप किसी की बात को गहराई से सुनते हैं और उसे यह अहसास दिलाते हैं कि आप उसकी स्थिति को समझते हैं तो उसका ईगो पिघलने लगता है। वह आपको अपना दुश्मन समझना बंद कर देता है और एक पार्टनर की तरह देखने लगता है। अगर आप किसी डील में फंसे हैं और सामने वाला पीछे हटने को तैयार नहीं है तो उससे बहस मत कीजिए। उससे पूछिए कि वह यह डील क्यों करना चाहता है। उसके 'क्यों' में ही आपकी जीत का रास्ता छिपा है। अक्सर लोग गलत चीजों के लिए लड़ रहे होते हैं क्योंकि उन्हें खुद नहीं पता होता कि उन्हें असल में क्या चाहिए।
ज्यादातर नेगोशिएशन पैसों पर नहीं बल्कि सम्मान और सुरक्षा पर आकर रुक जाते हैं। अगर आप किसी को नीचा दिखाकर डील जीत भी गए तो यकीन मानिए वह जीत बहुत छोटी होगी। एक असली लीडर वह है जो सामने वाले को भी जीत का अहसास कराए। एम्पैथी वह हथियार है जो सबसे सख्त इंसान को भी मोम बना देता है। अगर आप अब भी अपनी बात मनवाने के लिए टेबल पटक रहे हैं या धमकियां दे रहे हैं तो आप नेगोशिएटर नहीं बल्कि बस एक शोर मचाने वाले इंसान हैं।
तो दोस्तों, नेगोशिएशन कोई जादू नहीं है। यह तो बस लोगों को समझने की कला है। जब आप फ्रेमिंग। प्रोसेस और एम्पैथी को एक साथ मिला देते हैं तो आप वह कर सकते हैं जो दुनिया को नामुमकिन लगता है। अब समय आ गया है कि आप अपनी लाइफ के छोटे बड़े डेडलॉक्स को तोड़ें और वह हासिल करें जिसके आप हकदार हैं। इस किताब के लेसन्स को सिर्फ पढ़िए मत। इन्हें आज ही अपनी अगली बातचीत में इस्तेमाल करके देखिए। फिर देखिएगा कि कैसे बंद दरवाजे अपने आप खुलने लगते हैं।
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