क्या आप अभी भी अपने ऑफिस के बंद कमरे में बैठकर वर्ल्ड क्लास प्रोडक्ट बनाने का सपना देख रहे हैं। सच तो यह है कि आपका टैलेंटेड दिमाग और वो बोरिंग मीटिंग्स आपको बर्बादी की तरफ ले जा रही हैं क्योंकि असली बॉस यानी आपका कस्टमर तो बाहर खड़ा हंस रहा है।
आज के दौर में अगर आप कस्टमर को सिर्फ एक खरीदार समझ रहे हैं तो यकीन मानिए आप अपने बिजनेस की अर्थी खुद सजा रहे हैं। पैट्रिशिया बी सेबौल्ड की किताब आउटसाइड इनोवेशन हमें सिखाती है कि कैसे कस्टमर को अपना पार्टनर बनाकर आप मार्केट पर राज कर सकते हैं। चलिए इन 3 पावरफुल लेसन के जरिए जानते हैं कि कस्टमर के साथ मिलकर फ्यूचर कैसे डिजाइन किया जाता है।
लेसन १ : कस्टमर को को-डिजाइनर बनाइये
जरा सोचिये, आप एक रेस्टोरेंट खोलते हैं और वहां सिर्फ वही डिश परोसते हैं जो आपको पसंद है। आपको लगता है कि आप दुनिया के सबसे बड़े शेफ हैं, लेकिन बाहर टेबल पर बैठा कस्टमर बेचारा नमक के लिए तरस रहा है और मन ही मन आपको गालियां दे रहा है। बिजनेस की दुनिया में भी हम अक्सर यही गलती करते हैं। हम अपने एयर कंडीशनर वाले केबिन में बैठकर ऐसे प्रोडक्ट्स की प्लानिंग करते हैं जिनका असल दुनिया से कोई लेना देना ही नहीं होता। पैट्रिशिया बी सेबौल्ड कहती हैं कि अगर आपको सच में कोई ऐसी चीज बनानी है जो मार्केट में आग लगा दे, तो अपने कस्टमर को सिर्फ एक यूजर मत समझिये। उसे अपना को-डिजाइनर बना लीजिये।
ये सुनने में थोड़ा अजीब लग सकता है क्योंकि हमें लगता है कि कस्टमर को क्या पता कि उसे क्या चाहिए। लेकिन असलियत तो ये है कि आपको क्या पता कि कस्टमर किस मुसीबत से गुजर रहा है। मान लीजिये आप एक मोबाइल ऐप बना रहे हैं जो लोगों को एक्सरसाइज करने में मदद करे। आपने उसमें हजार फीचर्स डाल दिए, ग्राफिक्स ऐसे लगा दिए कि नासा का कंप्यूटर भी शर्मा जाए। लेकिन जब एक आम यूजर उसे खोलता है, तो उसे समझ ही नहीं आता कि बटन कहाँ है। यहाँ आपकी ईगो हार जाती है और कस्टमर का एक्सपीरियंस जीत जाता है। अगर आपने ऐप बनाने से पहले किसी ऐसे आलसी इंसान से पूछा होता जिसे सोफे से उठने में भी दिक्कत होती है, तो शायद आपका ऐप ज्यादा प्रैक्टिकल होता।
इन्नोवेशन का असली मतलब ये नहीं है कि आप कोई बहुत ही कॉम्प्लिकेटेड रॉकेट साइंस बना लें। असली इन्नोवेशन का मतलब है कि आप कस्टमर के हाथ में पेंसिल पकड़ा दें और कहें कि भाई, तू बता कि तुझे ये चीज कैसी चाहिए। जब कस्टमर को लगता है कि इस प्रोडक्ट को बनाने में उसकी राय ली गई है, तो वो आपका कस्टमर नहीं बल्कि आपका सबसे बड़ा ब्रांड एम्बेसेडर बन जाता है। वो लोगों को चिल्ला-चिल्ला कर बताता है कि देखिये, इस कंपनी ने मेरी बात सुनी। और भाई, इंडिया में जब कोई बात इमोशन से जुड़ जाती है, तो फिर वो चीज बिकती नहीं, बल्कि लोग उसे हाथों-हाथ उठाते हैं।
सोचिये उन ब्रांड्स के बारे में जो आज टॉप पर हैं। वो इसलिए वहां नहीं हैं क्योंकि उनके पास सबसे स्मार्ट इंजीनियर्स हैं, बल्कि इसलिए हैं क्योंकि उन्होंने अपने कस्टमर्स को ये अहसास दिलाया कि वो भी इस कंपनी के मालिक हैं। अगर आप अभी भी ये सोच रहे हैं कि कस्टमर को सिर्फ डिस्काउंट देकर फंसाया जा सकता है, तो आप गलतफहमी के शिकार हैं। डिस्काउंट से आप सेल्स ला सकते हैं, लेकिन लॉयल्टी सिर्फ को-डिजाइनिंग से आती है। जब आपका कस्टमर आपके साथ बैठकर आपके फ्यूचर प्रोडक्ट्स का नक्शा तैयार करता है, तब आप एक ऐसी दीवार खड़ी करते हैं जिसे कोई भी कॉम्पिटिटर तोड़ नहीं सकता। तो अगली बार जब कोई नया आईडिया आये, तो उसे अपने टीम मीटिंग में डिस्कस करने से पहले अपने सबसे टेढ़े कस्टमर के सामने रखिये। वही आपको असली आईना दिखाएगा कि आपका आईडिया हीरा है या कचरा।
लेसन २ : कस्टमर के स्ट्रगल को समझिये
दुनिया में दो तरह के लोग होते हैं। एक वो जो समस्या आने पर रोते हैं, और दूसरे वो जो उस समस्या को देखकर पैसा कमाने का आईडिया निकाल लेते हैं। आउटसाइड इनोवेशन का दूसरा सबसे बड़ा लेसन यही है कि आपको कस्टमर के स्ट्रगल यानी उसकी जद्दोजहद को समझना होगा। कई बार तो बेचारे कस्टमर को खुद पता नहीं होता कि वो किसी समस्या में है। वो तो बस उस तकलीफ का आदि हो चुका होता है। जैसे हम इंडियंस को आदत होती है कि अगर रिमोट काम न करे, तो उसे दो थप्पड़ मारकर चला लेते हैं। अब जो समझदार कंपनी होगी, वो ये नहीं सोचेगी कि रिमोट को और मजबूत कैसे बनाएं ताकि थप्पड़ सह सके, बल्कि वो ये सोचेगी कि रिमोट की जरूरत ही क्यों है।
आजकल की कंपनियां डेटा के पीछे ऐसे भागती हैं जैसे कोई प्यासा रेगिस्तान में पानी के पीछे। लेकिन डेटा आपको ये तो बता देगा कि कस्टमर ने क्या खरीदा, पर ये कभी नहीं बताएगा कि उसने वो चीज खरीदते वक्त कितनी गालियां दी थीं। मान लीजिये आप एक ऑनलाइन ग्रोसरी ऐप चलाते हैं। आपका डेटा कहता है कि सेल्स बहुत बढ़िया है। लेकिन क्या आपने कभी उस होममेकर का चेहरा देखा है जो ऐप पर टमाटर सर्च करते-करते थक गई क्योंकि आपने उसे फ्रूट्स की कैटेगरी में डाल रखा था। ये जो छोटा सा गुस्सा है ना, यही आपके लिए इनोवेशन का रास्ता है। अगर आप कस्टमर के उस स्ट्रगल को पकड़ लें जिसे दुनिया देख नहीं पा रही, तो आप रातों-रात मार्केट के राजा बन सकते हैं।
हम अक्सर कस्टमर को बेवकूफ समझते हैं। हमें लगता है कि हम उसे जो देंगे वो चुपचाप ले लेगा। लेकिन बॉस, आज का कस्टमर बहुत शातिर है। उसे अगर आपके प्रोडक्ट को इस्तेमाल करने में जरा सा भी पसीना आया, तो वो आपको छोड़कर आपके कॉम्पिटिटर के पास चला जाएगा और जाते-जाते सोशल मीडिया पर आपकी कंपनी की इज्जत का कचरा भी कर देगा। इसलिए पैट्रिशिया कहती हैं कि कस्टमर के जूतों में पैर डालकर देखिये कि कांटा कहाँ चुभ रहा है। जब आप उनके स्ट्रगल को अपना स्ट्रगल बना लेते हैं, तो आप सिर्फ एक प्रोडक्ट नहीं बेचते, आप एक सल्यूशन बेचते हैं।
सोचिये उन कंपनियों के बारे में जिन्होंने हमारी छोटी-छोटी मुश्किलों को समझा। पहले कैब ढूंढने के लिए सड़क पर खड़े होकर हाथ हिलाना पड़ता था और ऑटो वाले भैया ऐसे भाव खाते थे जैसे वो दामाद हों। फिर किसी ने इस स्ट्रगल को समझा और उबर या ओला जैसा आईडिया आया। उन्होंने आपकी मजबूरी को बिजनेस में बदल दिया। यही असली इनोवेशन है। आपको कोई बहुत बड़ी मशीन नहीं बनानी है, बस कस्टमर की लाइफ से एक छोटा सा सिरदर्द कम करना है। अगर आप कस्टमर के उस स्ट्रगल को खत्म कर देते हैं जिसे वो किस्मत मानकर स्वीकार कर चुका था, तो यकीन मानिए वो आपको भगवान मान लेगा। और इंडिया में तो हम वैसे भी इमोशनल लोग हैं, जो हमारी मुश्किल आसान करता है, हम उसे सिर आंखों पर बिठाते हैं।
लेसन ३ : ओपन प्लेटफॉर्म और कम्युनिटी बनाइये
पुराने जमाने में बिजनेस करने का तरीका किसी किले जैसा होता था। मोटी दीवारें, भारी दरवाजे और अंदर क्या पक रहा है किसी को पता नहीं होता था। लेकिन आज अगर आप अपने बिजनेस को इस तरह बंद रखेंगे, तो लोग आपको किसी म्यूजियम का हिस्सा बना देंगे। पैट्रिशिया बी सेबौल्ड का तीसरा सबसे कीमती लेसन ये है कि अपने बिजनेस को एक ओपन प्लेटफॉर्म बनाइये जहाँ कस्टमर सिर्फ सामान न खरीदे, बल्कि एक कम्युनिटी का हिस्सा बन जाए। इंडिया में हम वैसे भी 'चार लोग क्या कहेंगे' वाली सोच से घिरे रहते हैं, तो क्यों न उन चार लोगों को एक साथ लाकर अपने ही ब्रांड की तारीफ करवाई जाए।
एक ओपन प्लेटफॉर्म का मतलब ये है कि आप अपने कस्टमर्स को एक ऐसा मैदान दे रहे हैं जहाँ वो एक-दूसरे से बात कर सकें और एक-दूसरे की समस्याओं को सुलझा सकें। मान लीजिये आप कैमरा बेचते हैं। अब अगर आप सिर्फ कैमरा बेचकर भूल जाएंगे, तो कस्टमर आपसे सिर्फ एक बार जुड़ेगा। लेकिन अगर आप एक ऐसा ऑनलाइन फोरम या कम्युनिटी बना दें जहाँ प्रोफेशनल फोटोग्राफर्स नए लोगों को टिप्स दें, अपनी खींची हुई फोटो शेयर करें और एक-दूसरे की टांग खिंचाई भी करें, तो वो आपकी कंपनी का हिस्सा बन जाते हैं। अब वो किसी और कंपनी का कैमरा खरीदने से पहले दस बार सोचेंगे क्योंकि उनकी पूरी दुनिया, उनके दोस्त और उनका रुतबा आपके प्लेटफॉर्म से जुड़ा हुआ है।
अक्सर बिजनेस चलाने वाले लोग इस बात से डरते हैं कि अगर कस्टमर्स आपस में बात करेंगे, तो शायद वो हमारी बुराई भी करेंगे। अरे भाई, बुराई तो वो वैसे भी पीठ पीछे कर ही रहे हैं, तो क्यों न उनके सामने ही उन्हें बोलने का मौका दिया जाए। जब आप ट्रांसपेरेंट होते हैं और कस्टमर को अपनी आवाज रखने का मौका देते हैं, तो उनका भरोसा आप पर और बढ़ जाता है। ये कुछ वैसा ही है जैसे मोहल्ले की आंटी जो सबको सलाह देती फिरती हैं। अगर आपने उन्हें इग्नोर किया तो वो आपकी बुराई करेंगी, लेकिन अगर आपने उन्हें पंचायत का मुखिया बना दिया, तो वो खुद आगे बढ़कर आपके घर की इज्जत बचाएंगी। कस्टमर को भी वही सम्मान चाहिए।
असली इनोवेशन अब लैबोरेट्री में नहीं, बल्कि कम्युनिटी के बीच होता है। जब हजार लोग मिलकर किसी आईडिया पर चर्चा करते हैं, तो वहां से वो हीरा निकलकर आता है जो आपका सबसे महंगा इंजीनियर भी नहीं सोच सकता था। तो अपने ईगो को साइड में रखिये और एक ऐसा इकोसिस्टम बनाइये जहाँ आपका रोल सिर्फ एक दुकानदार का नहीं, बल्कि एक होस्ट का हो। जब कस्टमर को लगेगा कि ये जगह उसकी अपनी है, तो वो आपके बिजनेस को बढ़ाने के लिए अपनी जान लगा देगा। याद रखिये, अकेले आप सिर्फ एक दुकान चला सकते हैं, लेकिन एक कम्युनिटी के साथ आप एक साम्राज्य खड़ा कर सकते हैं।
तो दोस्तों, आउटसाइड इनोवेशन का सार यही है कि आप अपने कस्टमर को भगवान मानना छोड़िये और उसे अपना पार्टनर बनाना शुरू कीजिये। भगवान तो दूर बैठकर आशीर्वाद देते हैं, लेकिन पार्टनर कंधे से कंधा मिलाकर मेहनत करता है। अगर आप आज भी ये सोच रहे हैं कि आपका आईडिया दुनिया का सबसे बेस्ट आईडिया है और आपको किसी की सलाह की जरूरत नहीं है, तो मुबारक हो, आप बहुत जल्द इतिहास का हिस्सा बनने वाले हैं।
दुनिया बदल रही है और लोग अब सिर्फ चीजें खरीदना नहीं चाहते, वो उन चीजों को बनाने का हिस्सा बनना चाहते हैं। पैट्रिशिया की ये किताब हमें आइना दिखाती है कि बिजनेस सिर्फ पैसों का लेन-देन नहीं, बल्कि रिश्तों की को-क्रिएशन है। अब फैसला आपके हाथ में है। क्या आप अभी भी बंद कमरे में बैठकर अपनी बर्बादी का नक्शा बनाएंगे, या बाहर निकलकर अपने कस्टमर का हाथ थामेंगे।
अगर आप आज से ही अपने बिजनेस या आईडिया में कस्टमर को शामिल करने के लिए तैयार हैं, तो हमें कमेंट्स में अपनी राय जरूर बताइये। क्या आपने कभी किसी कंपनी को कोई ऐसा फीडबैक दिया है जिससे उनका प्रोडक्ट बदल गया। अपनी कहानी शेयर कीजिये और इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो खुद को बहुत बड़ा इन्नोवेटर समझते हैं, ताकि उनकी गलतफहमी भी थोड़ी दूर हो सके।
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