Mobilizing Minds (Hindi)


क्या आप अभी भी उसी पुराने घिसे पिटे तरीके से ऑफिस चला रहे हैं जहाँ टैलेंटेड लोग सिर्फ ईमेल का रिप्लाई देने में अपनी जिंदगी बर्बाद कर रहे हैं। अगर हाँ तो बधाई हो आप अपनी कंपनी और करियर दोनों की कब्र खुद ही खोद रहे हैं। सच तो यह है कि बिना टैलेंट को सही से मोबिलाइज किए आप सिर्फ भीड़ इकट्ठा कर रहे हैं वेल्थ नहीं।

आज हम लोवेल ब्रायन और क्लॉडिया जॉयस की किताब मोबिलाइजिंग माइंड्स से वेल्थ क्रिएशन के वो सीक्रेट्स जानेंगे जो आपके काम करने के नजरिए को हमेशा के लिए बदल देंगे। चलिए इन ३ पावरफुल लेसन्स को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : टैलेंट ही असली सोना है और आप इसे तिजोरी में बंद कर रहे हैं

आज के जमाने में अगर आप अभी भी यह सोच रहे हैं कि बड़ी बड़ी मशीनें, आलीशान ऑफिस और बैंक बैलेंस ही आपकी कंपनी की असली ताकत है, तो यकीन मानिए आप अभी भी अठारहवीं सदी के किसी कारखाने में जी रहे हैं। लोवेल ब्रायन और क्लॉडिया जॉयस अपनी किताब में चिल्ला चिल्ला कर कह रहे हैं कि भाई साहब जाग जाइए। २१st सेंचुरी में असली वेल्थ मशीनों से नहीं बल्कि लोगों के दिमाग से पैदा होती है। इसे ही वो इनटेंजिबल एसेट्स कहते हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि ज्यादातर कंपनियां अपने सबसे महंगे एसेट यानी टैलेंट को ऐसे मैनेज करती हैं जैसे कोई कंजूस अपनी पुरानी साइकिल को जंग लगने के लिए छोड़ देता है।

जरा सोचिए, आपके पास एक ऐसा एम्प्लॉई है जो आइडियाज का पावरहाउस है, लेकिन आप उसे दिन भर एक्सेल शीट में डेटा एंट्री करने और फालतू की मीटिंग्स में चाय पीने के लिए बिठाकर रखते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक फरारी खरीदकर उसे संकरी गलियों में सब्जी ढोने के काम में लगा दें। आपको लग रहा होगा कि काम तो हो ही रहा है, लेकिन हकीकत में आप उस फरारी का इंजन और अपनी किस्मत दोनों बर्बाद कर रहे हैं। ऑथर्स कहते हैं कि जब तक आप टैलेंट को मोबिलाइज नहीं करेंगे, तब तक वह सिर्फ एक खर्चा बनकर रह जाएगा, इन्वेस्टमेंट नहीं।

असली समस्या यह है कि हम आज भी उन पुराने रूल्स को फॉलो कर रहे हैं जो फिजिकल एसेट्स के लिए बने थे। पुराने जमाने में जिसके पास ज्यादा जमीन और कोयला होता था, वही राजा था। आज राजा वही है जिसके पास ऐसे दिमाग हैं जो कॉम्प्लेक्स प्रॉब्लम्स को चुटकियों में सॉल्व कर सकें। लेकिन हमने क्या किया है। हमने टैलेंटेड लोगों के चारों तरफ रूल्स, रेगुलेशंस और पदानुक्रम की ऐसी दीवारें खड़ी कर दी हैं कि उनका दम घुटने लगा है। आप उन्हें सैलरी तो देते हैं, लेकिन उनके आइडियाज को इस्तेमाल करने का लाइसेंस लेना भूल जाते हैं।

मान लीजिए एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी है। वहां एक लड़का है राहुल, जो मीम्स बनाने में और ट्रेंड्स को पकड़ने में माहिर है। लेकिन उसका बॉस उसे सिर्फ रिपोर्ट बनाने के काम पर लगाता है क्योंकि कंपनी के स्ट्रक्चर में मीम बनाना किसी जॉब डिस्क्रिप्शन का हिस्सा ही नहीं है। राहुल का टैलेंट वहां दम तोड़ रहा है और कंपनी सोच रही है कि हमारी ग्रोथ क्यों रुकी हुई है। यह विडंबना नहीं तो और क्या है। आप सोने की खदान पर बैठे हैं और बाहर जाकर चिल्लर मांग रहे हैं।

मोबिलाइजिंग माइंड्स हमें सिखाती है कि टैलेंट को मैनेज करना उसे कंट्रोल करना नहीं है। उसे कंट्रोल करना तो ऐसा है जैसे आप किसी परिंदे को पिंजरे में रखकर उससे कह रहे हैं कि भाई तू बादलों को छूकर दिखा। आपको उसे उड़ने के लिए आसमान देना होगा। इसका मतलब है कि आपको अपने ऑर्गेनाइजेशन का पूरा डिजाइन ही बदलना होगा। आपको यह समझना होगा कि एक टैलेंटेड इंसान की वैल्यू उसके काम के घंटों से नहीं, बल्कि उसके द्वारा क्रिएट की गई वैल्यू से मापी जानी चाहिए। अगर आप उसे सिर्फ ९ से ५ की ड्यूटी में बांधकर रखेंगे, तो वो आपको अपना शरीर तो देगा, लेकिन अपना दिमाग घर पर ही छोड़ आएगा।

सर्कस के शेर और जंगल के शेर में बहुत फर्क होता है। सर्कस वाला सिर्फ कोड़े के डर से नाचता है, जबकि जंगल वाला अपनी मर्जी से शिकार करता है। आपकी कंपनी में आपको शिकारी चाहिए, ना कि नाचने वाले। लेकिन इसके लिए आपको कोड़ा छोड़ना होगा और उन्हें वो माहौल देना होगा जहाँ वो अपनी पूरी क्षमता का इस्तेमाल कर सकें। याद रखिए, २१st सेंचुरी में जीत उसी की होगी जिसके पास सबसे ज्यादा मोबिलाइज्ड दिमाग होंगे। अगर आप उन्हें सही जगह नहीं लगा पाए, तो आपके कॉम्पिटिटर उन्हें उठा ले जाएंगे और आप हाथ मलते रह जाएंगे।


लेसन २ : फालतू की माथापच्ची बंद कीजिए और टैलेंट को खुलकर खेलने दीजिए

क्या आपको भी ऐसा लगता है कि आपकी कंपनी में काम कम और काम होने का नाटक ज्यादा होता है। लोवेल ब्रायन और क्लॉडिया जॉयस इसे 'ऑर्गेनाइजेशनल कॉम्प्लेक्सिटी' कहते हैं। सरल भाषा में कहें तो यह वो दलदल है जिसमें फँसकर अच्छे से अच्छे टैलेंटेड इंसान का दिमाग दही बन जाता है। आज की बड़ी कंपनियों का हाल यह है कि एक छोटा सा फैसला लेने के लिए भी दस मैनेजरों की परमिशन चाहिए और पच्चीस मीटिंग्स अटेंड करनी पड़ती हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आपको प्यास लगी हो और पानी पीने के लिए आपको पहले पूरे मोहल्ले से एनओसी (NOC) लेनी पड़े। जब तक परमिशन मिलेगी, तब तक आप प्यास से दम तोड़ चुके होंगे।

ऑथर्स कहते हैं कि हमने अपने ऑफिसों को भूल भुलैया बना दिया है। हर तरफ फॉर्म्स, अप्रूवल्स और लंबी चौड़ी हायराार्की (hierarchy) है। एक टैलेंटेड बंदा सुबह जोश के साथ ऑफिस आता है कि आज कुछ तूफानी करेगा, लेकिन शाम तक वो सिर्फ मेल फॉरवर्ड करने और 'थैंक्स एंड रिगार्ड्स' लिखने में अपनी पूरी एनर्जी खत्म कर देता है। आप उसे लाखों की सैलरी दे रहे हैं लेकिन उसे काम क्या दे रहे हैं। बाबूगिरी। यह तो वही बात हुई कि आपने एक वर्ल्ड क्लास पेंटर को बुलाया और उससे कहा कि भाई साहब जरा हमारे घर की दीवारों पर सफेदी कर दो।

मान लीजिए एक सॉफ्टवेयर कंपनी है। वहां एक डेवलपर को एक नया फीचर ऐड करना है जिससे कंपनी का करोड़ों का फायदा हो सकता है। अब वो अपने मैनेजर के पास जाता है। मैनेजर कहता है कि पहले प्रपोजल बनाओ। प्रपोजल जाता है डिपार्टमेंट हेड के पास। वो कहता है कि अगले हफ्ते की बोर्ड मीटिंग में इसे डिस्कस करेंगे। बोर्ड मीटिंग में आधे लोग सो रहे होते हैं और बाकी आधे इस बात पर लड़ रहे होते हैं कि प्रेजेंटेशन का फॉन्ट साइज छोटा क्यों है। अंत में फैसला होता है कि एक नई कमेटी बनाई जाएगी जो इस बात की जांच करेगी कि फीचर की जरूरत है भी या नहीं। तब तक कॉम्पिटिटर वही फीचर लॉन्च करके मार्केट ले उड़ता है। और हमारी कंपनी अभी भी कमेटी की चाय का बिल भर रही होती है।

हकीकत तो यह है कि ज्यादा रूल्स और रेगुलेशंस टैलेंट के दुश्मन होते हैं। जब आप लोगों को हर कदम पर टोकते हैं, तो वो रिस्क लेना बंद कर देते हैं। वो सोचते हैं कि क्यों फालतू में अपना दिमाग चलाऊं, जैसा चल रहा है चलने दो। इससे आपकी कंपनी में 'यस मैन' तो बढ़ जाते हैं, लेकिन लीडर्स खत्म हो जाते हैं। ऑथर्स सलाह देते हैं कि अगर आपको २१st सेंचुरी में टिकना है, तो अपनी इस उलझन भरी दुनिया को सिंपल बनाना होगा। लोगों को जिम्मेदारी दीजिए, सिरदर्द नहीं। उन्हें बताइए कि मंजिल कहाँ है, रास्ता उन्हें खुद ढूँढने दीजिए।

जरा सोचिए, अगर सचिन तेंदुलकर को बैटिंग करने से पहले हर गेंद पर डगआउट से पूछना पड़ता कि 'सर क्या मैं इसे बाउंड्री के बाहर मारूँ', तो क्या वो कभी मास्टर ब्लास्टर बन पाते। बिल्कुल नहीं। मैदान पर खिलाड़ी को फैसले लेने की आजादी होनी चाहिए। वैसे ही आपके ऑफिस में आपके बेस्ट एम्प्लॉई को यह पावर मिलनी चाहिए कि वो बिना किसी फालतू कागजी कार्रवाई के अपना काम कर सके। कॉम्प्लेक्सिटी को कम करने का मतलब यह नहीं है कि आप कंट्रोल छोड़ दें, इसका मतलब है कि आप फालतू के अवरोध हटा दें ताकि काम की स्पीड रॉकेट जैसी हो जाए।

अक्सर बॉस को लगता है कि अगर उन्होंने हर चीज पर नजर नहीं रखी, तो सब बर्बाद हो जाएगा। इस बीमारी को 'माइक्रो मैनेजमेंट' कहते हैं। यह बीमारी टैलेंटेड लोगों के लिए जहर की तरह है। अगर आप एक प्रोफेशनल को काम पर रख रहे हैं, तो उस पर भरोसा करना सीखिए। अगर आप उसे उंगली पकड़कर चलाना चाहते हैं, तो फिर प्रोफेशनल को नहीं, किसी रोबोट को काम पर रखिए। याद रखिए, जितनी कम उलझन होगी, उतना ज्यादा आउटपुट मिलेगा। टैलेंट को फाइलों के नीचे मत दबाइए, उन्हें उन फाइलों से आजाद कीजिए ताकि वो असली वेल्थ क्रिएट कर सकें।


लेसन ३ : अकेले चने भाड़ नहीं फोड़ते और अकेले जीनियस वेल्थ नहीं बनाते

अक्सर हमें लगता है कि कोई एक सुपरस्टार आएगा और हमारी कंपनी की किस्मत रातों रात बदल देगा। लेकिन लोवेल ब्रायन और क्लॉडिया जॉयस कहते हैं कि २१st सेंचुरी में 'लोन रेंजर' का जमाना गया। अब जमाना है कोलाबोरेशन का। अगर आपकी कंपनी में बहुत सारे टैलेंटेड लोग हैं लेकिन वो सब अपने अपने कमरों में कुंडी लगाकर बैठे हैं, तो समझ लीजिए कि आप एक ऐसी लाइब्रेरी चला रहे हैं जहाँ की सारी किताबों पर ताला लगा है। नॉलेज और आइडियाज जब तक एक दिमाग से दूसरे दिमाग तक नहीं पहुँचते, उनकी वैल्यू जीरो होती है।

ऑथर्स कहते हैं कि असली जादू तब होता है जब आप 'फॉर्मल नेटवर्क्स' बनाते हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि ऑफिस की कैंटीन में खड़े होकर गप्पे मारना। इसका मतलब है एक ऐसा सिस्टम जहाँ मार्केटिंग वाले को पता हो कि रिसर्च टीम के पास क्या आईडिया है, और सेल्स वाले को पता हो कि प्रोडक्ट टीम क्या नया कमाल कर रही है। ज्यादातर कंपनियों में 'साइलो मेंटालिटी' होती है। मतलब हर डिपार्टमेंट एक अलग टापू की तरह काम करता है। उन्हें लगता है कि अपनी जानकारी दूसरों से शेयर करना मतलब अपनी पावर कम करना है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे एक ही नाव में बैठे चार लोग अलग अलग दिशा में चप्पू चला रहे हों। नाव कहीं नहीं जाएगी, बस गोल गोल घूमकर वहीं डूब जाएगी।

मान लीजिए एक बड़ी टेक कंपनी है। वहां का एक इंजीनियर एक ऐसी टेक्नोलॉजी बनाता है जिससे बैटरी की लाइफ डबल हो सकती है। लेकिन वो इसे किसी को नहीं बताता क्योंकि उसे लगता है कि कोई उसका क्रेडिट चोरी कर लेगा। दूसरी तरफ, उसी कंपनी की मार्केटिंग टीम एक नया कैंपेन डिजाइन कर रही है लेकिन उनके पास कोई 'यूनिक सेलिंग पॉइंट' नहीं है। अगर ये दोनों मिल जाते, तो कंपनी धमाका कर देती। लेकिन कोलाबोरेशन की कमी की वजह से इंजीनियर का आईडिया उसकी हार्ड ड्राइव में दम तोड़ देता है और मार्केटिंग टीम का कैंपेन फ्लॉप हो जाता है। अंत में बॉस मीटिंग बुलाकर सबको डांटता है, जबकि समाधान वहीं ऑफिस की दीवार के दूसरी तरफ बैठा था।

मोबिलाइजिंग माइंड्स हमें सिखाती है कि टैलेंट को मोबिलाइज करने का मतलब है नॉलेज का फ्लो बढ़ाना। आपको अपने ऑफिस का कल्चर ऐसा बनाना होगा जहाँ लोग सवाल पूछने से न डरें और अपने फेलियर्स को भी गर्व से शेयर करें। जब आइडियाज आपस में टकराते हैं, तभी इनोवेशन की चिंगारी निकलती है। अगर आप सिर्फ एक ही तरह के लोगों को एक ही कमरे में बंद रखेंगे, तो वहां सिर्फ बोरियत पैदा होगी, वेल्थ नहीं। कोलाबोरेशन को बोझ मत समझिए, यह आपकी कंपनी का टर्बो बूस्टर है।

याद रखिए, आज के दौर में प्रॉब्लम्स इतनी बड़ी और पेचीदा हो गई हैं कि कोई एक इंसान उन्हें अकेले सॉल्व नहीं कर सकता। आपको अलग अलग बैकग्राउंड और अलग अलग स्किल वाले लोगों को एक साथ लाना होगा। और यह काम सिर्फ एक ईमेल भेजकर नहीं होगा। इसके लिए आपको ऐसे प्लेटफॉर्म्स और नेटवर्क्स तैयार करने होंगे जहाँ लोग आसानी से एक दूसरे की मदद कर सकें। जब टैलेंट को सही नेटवर्क मिलता है, तो उसकी ताकत दस गुना बढ़ जाती है।


तो दोस्तों, मोबिलाइजिंग माइंड्स हमें यही सिखाती है कि टैलेंट कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप खरीदकर स्टोर कर सकें। यह एक बहती हुई नदी की तरह है, जिसे अगर आप रोकेंगे तो वो सड़ जाएगी, और अगर आप उसे सही दिशा देंगे तो वो पूरे रेगिस्तान को हरा भरा कर देगी। अपनी कंपनी और अपने करियर को उन पुरानी बेड़ियों से आजाद कीजिए। टैलेंट की कद्र कीजिए, उलझनों को खत्म कीजिए और मिलकर काम करने की आदत डालिए।

क्या आप आज भी पुरानी सोच के पिंजरे में कैद हैं या आप अपने और अपनी टीम के टैलेंट को पंख देने के लिए तैयार हैं। नीचे कमेंट्स में बताइए कि आप अपने ऑफिस की कौन सी एक फालतू कॉम्प्लेक्सिटी को आज ही खत्म करना चाहेंगे। इस आर्टिकल को अपने उस बॉस या दोस्त के साथ शेयर कीजिए जो अभी भी ९ से ५ की गुलामी को ही असली काम समझता है। चलिए साथ मिलकर २१st सेंचुरी की नई वेल्थ क्रिएट करते हैं।

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