Peak Performance (Hindi)


क्या आप भी गधों की तरह चौबीस घंटे मेहनत करके खुद को बहुत बड़ा तीस मार खां समझ रहे हैं। मुबारक हो आप सक्सेस की नहीं बल्कि हॉस्पिटल के बेड की तरफ बढ़ रहे हैं। बिना रेस्ट के काम करना कोई अचीवमेंट नहीं बल्कि बेवकूफी की निशानी है।

आज की भागदौड़ भरी लाइफ में हम सब मशीन बनने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि असली विनर्स बिना बर्नआउट हुए टॉप पर कैसे पहुंचते हैं। चलिए इस आर्टिकल में पीक परफॉरमेंस बुक के वो तीन सीक्रेट लेसन जानते हैं जो आपकी लाइफ बदल देंगे।


लेसन १ : स्ट्रेस प्लस रेस्ट इज इक्वल टू ग्रोथ

हम में से ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगर हमें लाइफ में कुछ बड़ा उखाड़ना है तो हमें पागलों की तरह काम करना होगा। हमें सिखाया जाता है कि जब दुनिया सो रही हो तब तुम जागो और जब दुनिया पार्टी कर रही हो तब तुम पसीना बहाओ। सुनने में यह बातें बहुत कूल लगती हैं लेकिन असलियत में यह आपको सक्सेसफुल नहीं बल्कि बीमार बनाती हैं। पीक परफॉरमेंस का सबसे पहला और सबसे बड़ा फार्मूला यह है कि ग्रोथ सिर्फ मेहनत से नहीं बल्कि मेहनत और आराम के सही बैलेंस से आती है।

मान लीजिए आपको अपनी बाइसेप्स बनानी है। आप जिम जाते हैं और भारी डंबल उठाते हैं। जब आप वर्कआउट करते हैं तो असल में आप अपनी मसल्स को थोड़ा सा डैमेज कर रहे होते हैं। उस वक्त आपकी मसल्स ग्रो नहीं कर रही होतीं बल्कि वो स्ट्रेस में होती हैं। आपकी मसल्स तब बढ़ती हैं जब आप जिम से घर आकर सो जाते हैं या आराम करते हैं। अगर आप चौबीस घंटे जिम में डंबल ही उठाते रहेंगे तो आपकी बॉडी बनेगी नहीं बल्कि टूट जाएगी। यही सेम रूल हमारे दिमाग और करियर पर भी लागू होता है।

आजकल के कॉर्पोरेट मजनू सुबह नौ से रात के नौ बजे तक लैपटॉप से चिपके रहते हैं। उन्हें लगता है कि जितना ज्यादा वो खुद को घिसेंगे उतना जल्दी उनका प्रमोशन होगा। लेकिन भाई साहब जरा रुकिए। अगर आप अपने माइंड को रिकवरी का टाइम नहीं देंगे तो आपकी क्रिएटिविटी दम तोड़ देगी। आप सिर्फ एक थके हुए रोबोट बनकर रह जाएंगे जो काम तो कर रहा है पर जिसमें कोई जान नहीं है।

लेखक कहते हैं कि स्ट्रेस बुरा नहीं है। स्ट्रेस वह ताकत है जो आपको अपनी कम्फर्ट जोन से बाहर धकेलती है। लेकिन बिना रेस्ट के स्ट्रेस लेना वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी को धक्का मारना। बहुत लोग कहते हैं कि उनके पास सोने का टाइम नहीं है क्योंकि वो बहुत बिजी हैं। सच तो यह है कि आप बिजी नहीं हैं बल्कि आप अपनी लाइफ मैनेज करने में थोड़े कच्चे हैं। दुनिया के सबसे बड़े एथलीट और सीईओ भी अपनी नींद और रेस्ट को सबसे ऊपर रखते हैं।

जब आप काम के बीच में छोटे ब्रेक लेते हैं या दिन भर की थकान के बाद एक गहरी नींद लेते हैं तो आपका ब्रेन उस स्ट्रेस को प्रोसेस करता है और आपको पहले से ज्यादा स्ट्रॉन्ग बनाता है। यह एक साइकिल है। पहले खुद को चैलेंज करो और फिर खुद को शांत करो। अगर आप सिर्फ खुद को चैलेंज करते रहेंगे तो एक दिन आपका सिस्टम क्रैश हो जाएगा। और यकीन मानिए उस वक्त आपका बॉस या आपकी कंपनी आपको रिपेयर करने नहीं आएगी।

इसलिए अगर आप चाहते हैं कि आप लंबे समय तक अपनी फील्ड के खिलाड़ी बने रहें तो आराम को आलस समझना छोड़ दीजिए। आराम करना भी आपके काम का एक हिस्सा है। जब आप रिलैक्स होते हैं तब आपका सबकॉन्शियस माइंड उन प्रॉब्लम्स के सोल्यूशन ढूंढता है जिन्हें आप डेस्क पर बैठकर नहीं सुलझा पा रहे थे। अगली बार जब आप थक जाएं तो काम छोड़ने की बजाय थोड़ा आराम करना सीखें। क्योंकि असली विनर वही है जो रेस खत्म होने तक मैदान में टिका रहे न कि वो जो शुरुआत में ही तेज दौड़कर बेहोश हो जाए।


लेसन २ : रूटीन और माइंडसेट का जादू

जब आप यह समझ जाते हैं कि रेस्ट और स्ट्रेस का बैलेंस ही असली खेल है तो अगला सवाल आता है कि इस खेल को रोज कैसे खेलें। बहुत से लोग जोश में आकर एक दिन तो जिम चले जाते हैं या एक दिन बारह घंटे पढ़ाई कर लेते हैं लेकिन अगले दिन वो बिस्तर से चिपक जाते हैं। पीक परफॉरमेंस का दूसरा बड़ा सच यह है कि आपकी सक्सेस आपके टैलेंट पर नहीं बल्कि आपके डेली रूटीन और आपके माइंडसेट पर टिकी होती है। दुनिया के टॉप परफॉर्मर्स किस्मत के भरोसे नहीं बैठते बल्कि वो अपने दिन को इस तरह डिजाइन करते हैं कि उनका दिमाग अपने आप काम करने के मूड में आ जाए।

इस बात को ऐसे समझिए कि हमारे दिमाग को हर छोटी चीज के लिए फैसला लेना पसंद नहीं है। अगर आपको रोज सुबह यह सोचना पड़े कि आज पहले ब्रश करूँ या पहले चाय पियूँ तो आपका दिमाग दोपहर तक ही थक जाएगा। इसे डिसीजन फटीग कहते हैं। जो लोग लाइफ में स्ट्रगल कर रहे हैं वो अक्सर अपने दिन की शुरुआत बिना किसी प्लान के करते हैं। वो सोकर उठते हैं और फोन चेक करने लगते हैं। फिर किसी रील को देखकर दुखी होते हैं और किसी मीम को देखकर हंसते हैं। उनका मूड और उनका काम दूसरों के हाथ में होता है।

असली खिलाड़ी अपने दिमाग को बेवकूफ बनाना जानते हैं। वो एक ऐसा रूटीन बनाते हैं जिसे लेखक प्री परफॉरमेंस रूटीन कहते हैं। इसका मतलब है कि काम शुरू करने से पहले की जाने वाली कुछ छोटी एक्टिविटीज। जैसे कोई महान लेखक लिखने से पहले अपनी डेस्क साफ़ करता है या कोई एथलीट मैच से पहले एक खास तरह का गाना सुनता है। यह कोई जादू नहीं है बल्कि आप अपने दिमाग को एक सिग्नल दे रहे हैं कि भाई अब मजाक बंद करो और काम पर लग जाओ। अगर आप हर दिन एक ही समय पर और एक ही तरीके से अपना काम शुरू करते हैं तो आपका दिमाग उस एनवायरनमेंट का गुलाम बन जाता है और आपको फोकस करने के लिए एक्स्ट्रा मेहनत नहीं करनी पड़ती।

यहाँ एक और मजेदार बात यह है कि आपका एनवायरनमेंट आपके माइंडसेट को कंट्रोल करता है। अगर आप अपने बेड पर बैठकर ऑफिस का काम करेंगे तो आपका दिमाग कन्फ्यूज रहेगा कि यहाँ सोना है या एक्सेल शीट भरनी है। नतीजा यह होगा कि आपको काम करते वक्त नींद आएगी और सोते वक्त काम की चिंता सताएगी। इसलिए एक खास जगह चुनें जहाँ आप सिर्फ और सिर्फ अपना सबसे जरूरी काम करेंगे। वह जगह आपके लिए मंदिर जैसी होनी चाहिए जहाँ फोन और फालतू की बकवास वर्जित हो।

बहुत से लोग सोचते हैं कि रूटीन का मतलब बोरिंग लाइफ है। लेकिन असल में रूटीन ही आपको आज़ादी देता है। जब आपकी छोटी-छोटी चीजें जैसे खाना और एक्सरसाइज फिक्स होती हैं तो आपके पास बड़े फैसलों के लिए मेंटल एनर्जी बची रहती है। याद रखिए कि कंसिस्टेंसी ही असली किंग है। एक दिन में दस घंटे पढ़ने से ज्यादा बेहतर है रोज दो घंटे पढ़ना। क्योंकि आपका दिमाग एक बार में बहुत सारा डेटा स्टोर नहीं कर सकता। वह छोटे-छोटे किस्तों में सीखना पसंद करता है।

पीक परफॉरमेंस पाने वाले लोग यह भी जानते हैं कि उनका सबसे प्रोडक्टिव समय कौन सा है। कुछ लोग सुबह जल्दी उठकर शेर की तरह काम करते हैं तो कुछ रात के सन्नाटे में अपना बेस्ट देते हैं। आपको किसी को कॉपी करने की जरूरत नहीं है। बस यह पहचानिए कि आपका दिमाग कब सबसे ज्यादा अलर्ट रहता है और उस समय को दुनिया की नजरों से बचाकर रखिए। उस वक्त कोई मीटिंग नहीं और कोई चैटिंग नहीं। सिर्फ और सिर्फ आपका काम। जब आप इस तरह अपने रूटीन को अपनी स्ट्रेंथ बना लेते हैं तो सक्सेस पाना आपकी आदत बन जाती है।


लेसन ३ : पर्पस की ताकत

अब तक आपने सीख लिया कि बॉडी को आराम कैसे देना है और दिमाग को रूटीन में कैसे बांधना है। लेकिन मान लीजिए आपकी लाइफ में सब कुछ सेट है फिर भी एक दिन ऐसा आता है जब आपका मन करता है कि सब छोड़ छाड़ कर हिमालय चले जाएं। उस दिन न आपका रूटीन काम आता है और न ही आपकी कल रात की आठ घंटे की नींद। उस वक्त आपको जरूरत होती है एक ऐसी ताकत की जो आपको बिस्तर से लात मारकर बाहर निकाल सके। लेखक इसे पर्पस की ताकत कहते हैं। साइंस यह कहता है कि जब आप सिर्फ अपने लिए काम करते हैं तो आपका दिमाग बहुत जल्दी थक जाता है। लेकिन जब आप किसी और के लिए या किसी बड़े मकसद के लिए काम करते हैं तो आपका शरीर और दिमाग अपनी लिमिट्स को तोड़ देते हैं।

मान लीजिए आपको अकेले पांच किलोमीटर दौड़ना है। आधे रास्ते में ही आपकी सांस फूलने लगेगी और आपका दिमाग आपसे कहेगा कि भाई रहने दे इतनी मेहनत करके क्या मिलेगा। आप रुक जाएंगे और घर जाकर सो जाएंगे। लेकिन अब कल्पना कीजिए कि आपके पीछे एक भूखा कुत्ता पड़ा है जो आपको अपना लंच बनाना चाहता है। अब क्या आप रुकेंगे। बिलकुल नहीं। उस वक्त आप ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट की स्पीड से दौड़ेंगे। क्यों। क्योंकि अब आपके पास एक ठोस कारण है। लाइफ में भी जब तक आपका कारण यानी व्हाई क्लियर नहीं होता तब तक आप एवरेज ही बने रहेंगे।

हम में से बहुत से लोग सिर्फ इसलिए काम करते हैं क्योंकि उन्हें ईएमआई भरनी है या पड़ोसी को नीचा दिखाना है। यह बहुत ही छोटे और खोखले मकसद हैं। इनमें कोई असली पावर नहीं है। पीक परफॉरमेंस पाने वाले लोग जानते हैं कि जब वो थक जाते हैं तो वो अपने अहम् को यानी अपनी ईगो को पीछे छोड़ देते हैं। वो सोचते हैं कि मेरा यह काम मेरी फैमिली की लाइफ कैसे सुधारेगा या समाज में क्या बदलाव लाएगा। जब आप खुद से बाहर निकलकर सोचना शुरू करते हैं तो आपका ब्रेन कोर्टिसोल यानी स्ट्रेस हार्मोन को कम कर देता है और डोपामाइन बढ़ा देता है।

आजकल के इन्फ्लुएंसर्स आपको सिर्फ पैसा और फेम के सपने दिखाते हैं। लेकिन पैसा कमाने के बाद क्या। अगर आपके पास कोई बड़ा विजन नहीं है तो आप बहुत जल्दी बोर हो जाएंगे और डिप्रेशन का शिकार हो जाएंगे। लेखक कहते हैं कि गिविंग यानी दूसरों को देना ही सबसे बड़ी प्रोडक्टिविटी है। जब आप अपनी स्किल्स का इस्तेमाल दूसरों की मदद के लिए करते हैं तो आपको एक अलग ही लेवल की एनर्जी महसूस होती है। यह वो एनर्जी है जो आपको रात को देर तक जगाए रखती है और सुबह सूरज निकलने से पहले उठा देती है।

पीक परफॉरमेंस कोई मंजिल नहीं है जहाँ पहुँचकर आप बैठ जाएं। यह एक सफर है। यह खुद को हर दिन थोड़ा बेहतर बनाने की कला है। अगर आप सिर्फ अपनी जीत के बारे में सोचेंगे तो हार का डर आपको हमेशा डराएगा। लेकिन अगर आप अपने काम को एक सेवा की तरह देखेंगे तो हार या जीत आपके लिए सिर्फ एक फीडबैक बन जाएगी। अपने काम में जान डालिए और उसे किसी बड़े मकसद से जोड़िए। फिर देखिए कि आप कैसे वो सब हासिल कर लेते हैं जो आपने कभी सपने में भी नहीं सोचा था।


तो दोस्तों, पीक परफॉरमेंस का यह सफर आपको कैसा लगा। क्या आप अब भी खुद को बिना ब्रेक के घिसना चाहते हैं या फिर स्ट्रेस और रेस्ट के इस नए साइंस को अपनाकर अपनी लाइफ बदलना चाहते हैं। याद रखिए कि आपकी बॉडी और आपका माइंड आपकी सबसे बड़ी संपत्ति है। इनका सम्मान करें। आज ही कमेंट बॉक्स में लिखकर बताएं कि आप इन तीन लेसन्स में से कौन सा लेसन सबसे पहले अपनी लाइफ में लागू करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा बिजी होने का रोना रोता रहता है। चलिए साथ मिलकर एक ऐसी कम्युनिटी बनाते हैं जो सिर्फ हार्ड वर्क नहीं बल्कि स्मार्ट और सस्टेनेबल वर्क में विश्वास रखती है।

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