Extreme Teams (Hindi)


क्या आपको लगता है कि ऑफिस में समोसे खिलाने और हैप्पी फ्राइडे मनाने से आपकी टीम नेटफ्लिक्स या पिक्सर बन जाएगी। अगर हाँ तो आप बहुत बड़े धोखे में जी रहे हैं। आपकी बोरिंग टीम वर्क स्ट्रेटेजी और वही पुराने घिसे पिटे तरीके आपकी बर्बादी का सबसे बड़ा कारण बन रहे हैं।

रॉबर्ट ब्रूस शॉ की किताब एक्सट्रीम टीम्स हमें बताती है कि टॉप कंपनियां कैसे काम करती हैं। आज के इस आर्टिकल में हम उन ३ जबरदस्त लेसन के बारे में बात करेंगे जो आपकी टीम को एक विनिंग मशीन बना देंगे।


लेसन १ : कंफर्ट जोन की ऐसी तैसी और हेल्दी लड़ाई का जादू

अक्सर हमारे ऑफिस में क्या होता है। बॉस ने कुछ गलत भी कहा तो हम सिर हिलाकर जी सर बोल देते हैं। क्योंकि हमें लगता है कि चुप रहने से शांति बनी रहेगी। लेकिन रॉबर्ट ब्रूस शॉ कहते हैं कि अगर आपकी टीम में सब एक दूसरे की हां में हां मिला रहे हैं तो समझो आपकी नैया डूबने वाली है। पिक्सर और नेटफ्लिक्स जैसी कंपनियां इसलिए महान नहीं बनीं क्योंकि वहां सब बहुत शरीफ थे। बल्कि वे इसलिए सफल हुईं क्योंकि वहां लोग एक दूसरे के आइडियाज की धज्जियां उड़ाने से पीछे नहीं हटते। इसे कहते हैं हेल्दी कॉन्फ्लिक्ट यानी ऐसी लड़ाई जो काम को बेहतर बनाए।

अब आप सोचेंगे कि क्या ऑफिस में कुश्ती लड़ना जरूरी है। बिल्कुल नहीं। लेकिन जब तक आप एक दूसरे को चैलेंज नहीं करेंगे तब तक नया और क्रांतिकारी आइडिया पैदा ही नहीं होगा। ज्यादातर इंडियन स्टार्टअप्स में लोग सिर्फ इसलिए फेल हो जाते हैं क्योंकि वे बहुत अच्छे बनने की कोशिश करते हैं। वे सोचते हैं कि अगर मैंने सामने वाले की गलती पकड़ी तो उसे बुरा लग जाएगा। अरे भाई उसे बुरा लगे या भला अगर प्रोडक्ट खराब बना तो कंपनी ही बंद हो जाएगी। फिर सब मिलकर घर पर आराम से बुरा मानना।

एक्सट्रीम टीम्स का पहला रूल यही है कि आपको कंफर्ट जोन को आग लगानी होगी। एक ऐसी टीम बनाओ जहां सच बोलना और कमियां निकालना बुरा नहीं बल्कि सबसे बड़ा गुण माना जाए। पिक्सर में एक मीटिंग होती है जिसे ब्रेन ट्रस्ट कहते हैं। वहां डायरेक्टर के काम को लोग बिना किसी रहम के क्रिटिसाइज करते हैं। वहां कोई ईगो नहीं पालता। सबको पता है कि मकसद फिल्म को हिट कराना है ना कि किसी की तारीफ करना।

जरा सोचिए आप एक क्रिकेट टीम में हैं। आपका साथी खिलाड़ी गलत शॉट खेल रहा है। क्या आप उसे टोकेंगे नहीं क्योंकि उसे बुरा लगेगा। अगर आप नहीं टोकेंगे तो मैच हारना तय है। ठीक यही बात ऑफिस की टीम पर भी लागू होती है। अगर आप सच बोलने की हिम्मत नहीं रखते तो आप एक टीम नहीं बल्कि सिर्फ एक भीड़ हैं। भीड़ हमेशा शोर मचाती है लेकिन जीतती सिर्फ टीम है। तो आज से ही अपनी टीम में वो माहौल बनाइए जहां लोग डरें नहीं। जहां लोग सवाल पूछें और काम को बेहतर बनाने के लिए एक दूसरे से भिड़ जाएं। क्योंकि असली हीरा घिसने के बाद ही चमकता है और आपकी टीम भी तभी चमकेगी जब उसे कंफर्ट की जगह चैलेंज मिलेगा।


लेसन २ : टैलेंट का अचार नहीं डालना बल्कि सही फिट ढूंढना है

अब आपने लड़ना तो सीख लिया पर किसके साथ लड़ेंगे। अगर आपकी टीम में ऐसे लोग भरे हैं जिन्हें सिर्फ महीने की आखिरी तारीख और सैलरी से मतलब है तो समझो खेल खत्म। नेटफ्लिक्स और एयरबीएनबी जैसी कंपनियां किसी को भी सिर्फ इसलिए हायर नहीं करतीं क्योंकि उसके पास बड़ी डिग्री है। वे यह देखती हैं कि क्या वह बंदा उनके कल्चर का पागलपन झेल पाएगा। इसे लेखक कहते हैं ऑब्सेसिव टैलेंट फोकस। यानी ऐसे लोगों को ढूंढना जो काम के लिए उतने ही जुनूनी हों जितने कि आप।

अक्सर हमारे यहाँ क्या होता है। शर्मा जी का लड़का बेरोजगार है तो उसे अपनी टीम में रख लिया। या फिर कोई ऐसा बंदा जिसे काम तो बहुत आता है पर उसका ईगो आसमान पर है। लेखक कहते हैं कि एक टैलेंटेड लेकिन बदतमीज इंसान आपकी पूरी टीम के कल्चर को जहर की तरह खराब कर सकता है। नेटफ्लिक्स में एक बहुत मशहूर पॉलिसी है जिसे कीपर टेस्ट कहते हैं। मैनेजर खुद से पूछता है कि अगर यह एम्प्लॉई आज नौकरी छोड़कर जाए तो क्या मैं उसे रोकने के लिए जी जान लगा दूंगा। अगर जवाब ना है तो उसे तुरंत टाटा बाय बाय बोल दिया जाता है।

यह सुनने में थोड़ा निर्दयी लग सकता है पर असल में यही ईमानदारी है। एक खराब सेब पूरी टोकरी खराब कर देता है। आप अपनी टीम में सिर्फ जीनियस नहीं चाहते बल्कि आप ऐसे लोग चाहते हैं जो मिशन के लिए मर मिटने को तैयार हों। एयरबीएनबी के शुरुआती दिनों में ब्रायन चेस्की ने पहले कुछ एम्प्लॉई को हायर करने के लिए सैकड़ों इंटरव्यू लिए थे। लोग उन्हें पागल कहते थे कि भाई काम कब शुरू करोगे। लेकिन उनका मानना था कि नींव अगर कमजोर हुई तो इमारत गिर जाएगी।

सोचिए आपकी एक बैंड है। आप दुनिया के सबसे बड़े गिटारिस्ट को बुला लाए पर उसे आपकी धुन ही पसंद नहीं। क्या संगीत बनेगा। बिल्कुल नहीं। वह अपनी बजाएगा और आप अपनी। अंत में जनता आपको टमाटर ही मारेगी। टीम मैनेजमेंट का भी यही हाल है। आपको ऐसे लोग चाहिए जो आपकी धुन को समझें और उसमें अपनी मेहनत का सुर मिलाएं। स्किल तो सिखाई जा सकती है पर एटीट्यूड और कल्चर फिट होना पैदाइशी होता है। इसलिए अपनी टीम में भर्ती करते वक्त किसी की मीठी बातों में ना आएं। यह देखें कि क्या वह मुश्किल वक्त में आपके साथ खड़ा रहेगा या पहली फुर्सत में दूसरी कंपनी का ऑफर लेकर भाग जाएगा। जब टीम में हर कोई एक ही विजन के साथ चलता है तभी वो जादू होता है जिसे दुनिया सक्सेस कहती है।


लेसन ३ : सॉफ्ट स्किल्स और एक ही मकसद का तगड़ा कॉम्बो

अब तक हमने लड़ाई और सही लोगों की बात की। पर सवाल यह है कि वो लोग साथ क्यों रहेंगे। जब तक टीम के हर मेंबर का दिल एक ही धड़कन पर नहीं धड़कता तब तक वो एक्सट्रीम टीम नहीं बन सकती। लेखक इसे शेयरर्ड पर्पज कहते हैं। मतलब एक ऐसा बड़ा सपना जिसके सामने पैसा और पद छोटे लगने लगें। नेटफ्लिक्स या एयरबीएनबी के लोग सिर्फ कोड लिखने या रूम बुक करने के लिए काम नहीं करते। वे एक ऐसी दुनिया बनाने के लिए काम करते हैं जहां एंटरटेनमेंट और ट्रेवल का तरीका ही बदल जाए।

हमारे यहाँ अक्सर क्या होता है। बॉस चिल्ला रहा है कि टारगेट पूरा करो और एम्प्लॉई सोच रहा है कि बस शाम के छह बजें और मैं यहाँ से भागूं। यह कोई टीम नहीं है बल्कि यह एक जेल है जहाँ सबको सजा मिल रही है। एक्सट्रीम टीम्स में लोग एक दूसरे की केयर करते हैं और उनके बीच एक इमोशनल बॉन्ड होता है। लेकिन यह बॉन्ड कोई फालतू की पिकनिक या टीम बिल्डिंग एक्सरसाइज से नहीं आता। यह साथ में मिलकर बड़ी मुश्किलों को हल करने से आता है।

पिक्सर की ही बात ले लीजिए। जब वे टॉय स्टोरी फिल्म बना रहे थे तब एक समय ऐसा आया जब सब कुछ बर्बाद होने वाला था। लेकिन पूरी टीम ने अपनी नींद और चैन त्याग कर उस फिल्म को बचाया। क्यों। क्योंकि उन्हें अपनी फिल्म पर गर्व था। वे सिर्फ नौकरी नहीं कर रहे थे बल्कि इतिहास रच रहे थे। जब आपकी टीम को पता होता है कि उनका काम दुनिया में क्या बदलाव ला रहा है तब उनका जोश सातवें आसमान पर होता है।

इसे एक शादी की तरह समझिए। अगर पति और पत्नी का मकसद सिर्फ एक दूसरे की कमियां निकालना है तो तलाक पक्का है। पर अगर दोनों का मकसद एक खुशहाल घर बनाना है तो छोटी मोटी लड़ाइयाँ भी प्यार बढ़ाती हैं। ऑफिस में भी यही होता है। अगर आपका मकसद सिर्फ अपना प्रमोशन है तो आप कभी टीम प्लेयर नहीं बन सकते। लेकिन अगर आपका मकसद कंपनी को नंबर वन बनाना है तो आप अपने साथी की मदद भी करेंगे और उसे आगे भी बढ़ाएंगे। असली लीडर वही है जो अपनी टीम को यह महसूस कराए कि वे किसी बहुत बड़े मिशन का हिस्सा हैं। जब इंसान को इज्जत और एक बड़ा मकसद मिलता है तो वह अपनी औकात से बाहर निकलकर परफॉर्म करता है।


तो दोस्तों, एक्सट्रीम टीम्स बनाना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। यह बस थोड़े साहस और बहुत सारी ईमानदारी का खेल है। कंफर्ट को छोड़िए सही लोगों को चुनिए और एक ऐसा मकसद ढूंढिए जो सबको जोड़ दे। याद रखिए कि महान काम कभी अकेले नहीं होते वे हमेशा एक पागल और जुनूनी टीम के जरिए ही मुमकिन होते हैं।

क्या आप अपनी टीम को बदलने के लिए तैयार हैं। आज ही अपने किसी एक टीम मेंबर की ईमानदारी से तारीफ करें या उसे एक नई चुनौती दें। नीचे कमेंट में बताएं कि आपकी टीम की सबसे बड़ी ताकत क्या है। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो एक नया स्टार्टअप शुरू कर रहा है या अपनी टीम से परेशान है।

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