अगर आपको लगता है कि आपकी कंपनी की ग्रोथ सिर्फ मार्केटिंग वालों का काम है और आप बस ऑफिस में फ्री की कॉफी पीने जाते हैं तो मुबारक हो। आप अपने करियर और बिजनेस को उसी गड्ढे में धकेल रहे हैं जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है।
आज के इस आर्टिकल में हम राम चरन की फेमस किताब प्रॉफिटेबल ग्रोथ इज एवरिवन्स बिजनेस से वो १० टूल्स समझेंगे जो आपकी बोरिंग मंडे मॉर्निंग को सक्सेस की मशीन बना देंगे। आइये इन ३ पावरफुल लेसन्स को विस्तार से देखते हैं।
लेसन १ : हिट मेनी सिंगल्स एंड डबल्स
ज्यादातर बिजनेस ओनर्स और एम्प्लॉईज को लगता है कि ग्रोथ का मतलब है रातों रात कोई बड़ा धमाका करना। वो सोचते हैं कि बस एक जादुई आईडिया आएगा और उनका स्टार्टअप रॉकेट की तरह चाँद पर पहुँच जाएगा। लेकिन राम चरन साहब कहते हैं कि यह सोच वैसी ही है जैसे कोई पहली बार क्रिकेट बैट पकड़कर हर बॉल पर छक्का मारने की कोशिश करे। सच तो यह है कि असली मैच वो जीतते हैं जो स्ट्राइक रोटेट करते हैं और चुपचाप सिंगल और डबल रन बटोरते रहते हैं।
मान लीजिये आपके मोहल्ले में दो किराना स्टोर हैं। पहले वाले का नाम है 'मिस्टर झकास' जो हर हफ्ते नई स्कीम निकालता है और बड़े डिस्काउंट के पोस्टर लगाता है। लेकिन उसकी दुकान पर सामान कभी पूरा नहीं मिलता। दूसरा है 'गुप्ता जी' की दुकान। गुप्ता जी कोई बड़ा धमाका नहीं करते। वो बस इतना ध्यान रखते हैं कि उनके पास हर छोटी चीज स्टॉक में हो और वो हर कस्टमर को मुस्कुराकर ग्रीट करें।
गुप्ता जी छोटे छोटे सुधार करते हैं। जैसे सामान की पैकिंग थोड़ी बेहतर कर दी या फिर होम डिलीवरी के लिए एक लड़का रख लिया। ये सब सुनने में बहुत मामूली लगता है लेकिन यही वो 'सिंगल्स' और 'डबल्स' हैं जो लंबे समय में प्रॉफिट का पहाड़ खड़ा कर देते हैं। मिस्टर झकास छक्का मारने के चक्कर में अक्सर क्लीन बोल्ड हो जाते हैं क्योंकि उनका फाउंडेशन ही कमजोर है।
बिजनेस में भी यही होता है। कंपनियां अक्सर किसी एक बड़े कॉन्ट्रैक्ट या एक बड़े प्रोडक्ट के पीछे अपनी सारी एनर्जी लगा देती हैं। और जब वो हाथ नहीं आता तो सब मातम मनाने लगते हैं। राम चरन कहते हैं कि अपनी ईगो को साइड में रखिये और रोजमर्रा के छोटे सुधारों पर ध्यान दीजिये। क्या आप अपने कस्टमर का फोन १० सेकंड पहले उठा सकते हैं? क्या आप अपनी डिलीवरी को एक दिन फास्ट कर सकते हैं? क्या आप अपने ऑफिस की फालतू बिजली बचा सकते हैं?
ये छोटे बदलाव दिखने में शायद सेक्सी न लगें लेकिन जब आप साल के अंत में अपनी बैलेंस शीट देखेंगे तो आपको समझ आएगा कि इन छोटे रनों ने ही आपको मैच जिताया है। बड़ी जीत हमेशा छोटे सुधारों का ही नतीजा होती है। अगर आप सिर्फ बड़े मौके के इन्तजार में हाथ पर हाथ धरे बैठे हैं तो याद रखिये कि दुनिया के सबसे सफल लोग भी हर रोज सिर्फ थोडा बेहतर होने की कोशिश करते हैं। इसलिए अगली मंडे मॉर्निंग को जब आप ऑफिस जाएँ तो किसी 'ग्रैंड आईडिया' की तलाश छोड़कर उन छोटी चीजों को ठीक करें जो काफी समय से रुकी हुई हैं।
लेसन २ : गुड ग्रोथ वर्सेस बैड ग्रोथ
बिजनेस की दुनिया में एक बहुत बड़ी गलतफहमी है कि अगर सेल बढ़ रही है तो सब चंगा है। लोग सेल्स के ग्राफ को ऐसे देखते हैं जैसे वो उनके पड़ोसी की नई कार की लंबाई हो। लेकिन राम चरन साहब हमें एक बहुत ही गहरी बात समझाते हैं कि हर चमकती हुई ग्रोथ सोना नहीं होती। असल में ग्रोथ दो तरह की होती है: 'गुड ग्रोथ' और 'बैड ग्रोथ'। अगर आप बिना सोचे समझे अपनी सेल बढ़ा रहे हैं तो आप असल में अपने बिजनेस के लिए कब्र खोद रहे हैं।
मान लीजिये आपका एक जिम है। आप जोश में आकर एक स्कीम निकालते हैं कि 'सिर्फ १०० रुपये में पूरे साल की मेंबरशिप'। अब क्या होगा? आपके जिम में इतनी भीड़ हो जाएगी कि लोगों को डंबल उठाने के लिए भी लाइन लगानी पड़ेगी। आपकी सेल्स का ग्राफ तो आसमान छू लेगा और लोग कहेंगे कि क्या बात है भाई साहब का बिजनेस तो रॉकेट हो गया। लेकिन महीने के अंत में जब आप बिजली का बिल, ट्रेनर की सैलरी और फटे हुए मैट को देखेंगे तो आपको अहसास होगा कि जेब से तो पैसे जा रहे हैं। यह है 'बैड ग्रोथ'। आपने भीड़ तो जुटा ली लेकिन प्रॉफिट के नाम पर सिर्फ पसीना बचा।
'गुड ग्रोथ' वो होती है जो सस्टेनेबल हो और जिसमें आपका मार्जिन सुरक्षित रहे। यह वो ग्रोथ है जो आपके कस्टमर को आपके पास वापस लाती है क्योंकि आप उन्हें वैल्यू दे रहे हैं, न कि सिर्फ सस्ता माल। अगर आप डिस्काउंट की बैसाखी पर चल रहे हैं तो आप कभी दौड़ नहीं पाएंगे। जैसे ही डिस्काउंट हटेगा आपकी सेल्स धराशायी हो जाएगी।
राम चरन कहते हैं कि असली खिलाड़ी वो है जो यह पहचान सके कि कौन सा कस्टमर उसके लिए फायदेमंद है और कौन सा सिर्फ उसका टाइम और रिसोर्सेज बर्बाद कर रहा है। कई बार हम ऐसे क्लाइंट्स के पीछे भागते हैं जो काम तो पहाड़ जैसा देते हैं लेकिन पैसे देने के वक्त गायब हो जाते हैं या इतना माथापच्ची करते हैं कि आपके एम्प्लॉईज का मोटिवेशन ही खत्म हो जाता है। ऐसे 'जहरीले' कस्टमर्स से दूर रहना ही बिजनेस की भलाई है।
सच्ची ग्रोथ तब आती है जब आप अपने मौजूदा कस्टमर्स को और बेहतर सर्विस देते हैं ताकि वो आपसे और ज्यादा जुड़ें। क्या आपका प्रोडक्ट उनकी किसी बड़ी प्रॉब्लम को सॉल्व कर रहा है? क्या वो आपके ब्रांड पर भरोसा करते हैं? अगर हाँ, तो वो आपको प्रॉफिट देंगे। बिजनेस का मकसद सिर्फ टर्नओवर बढ़ाना नहीं बल्कि 'लेफ्टओवर' बढ़ाना होना चाहिए यानी सब खर्चे निकालने के बाद आपकी जेब में क्या बचता है। इसलिए अगली बार जब आप अपनी टीम के साथ मीटिंग करें तो सिर्फ नंबर्स पर नहीं, बल्कि उन नंबर्स की क्वालिटी पर बात करें।
लेसन ३ : ग्रोथ इज एवरिवन्स बिजनेस
ज्यादातर कंपनियों में माहौल ऐसा होता है जैसे कोई सरकारी दफ्तर हो। सेल्स वाले सोचते हैं कि बेचना हमारा काम है, अकाउंट्स वाले सोचते हैं कि बस बिल फाड़ना हमारा काम है, और रिसेप्शन पर बैठी मैडम सोचती हैं कि बस फोन उठाना ही मेरी जिंदगी का मकसद है। लेकिन राम चरन साहब कहते हैं कि अगर आप ऐसी सोच रखते हैं तो आप उस डूबते हुए जहाज पर सवार हैं जिसके छेद को देखकर आप कह रहे हैं कि 'शुक्र है छेद मेरी तरफ नहीं है'। ग्रोथ किसी एक आदमी या डिपार्टमेंट की जिम्मेदारी नहीं है, यह कंपनी के हर एक इंसान का बिजनेस है।
मान लीजिये आप एक बड़े रेस्टोरेंट में खाना खाने जाते हैं। वहाँ का खाना वर्ल्ड क्लास है और शेफ ने अपनी पूरी जान लगा दी है। लेकिन जैसे ही आप अंदर घुसते हैं, वेटर आपको ऐसे देखता है जैसे आपने उससे उसकी किडनी मांग ली हो। वो टेबल पर पानी का गिलास पटक कर चला जाता है। अब आप मुझे बताइये, क्या आप दोबारा उस रेस्टोरेंट में जाएंगे? बिल्कुल नहीं। यहाँ शेफ ने अपना काम बखूबी किया, मार्केटिंग टीम ने आपको होटल तक खींच लिया, लेकिन उस एक वेटर के एटीट्यूड ने पूरी 'ग्रोध' की लंका लगा दी।
राम चरन समझाते हैं कि कस्टमर के साथ होने वाला हर छोटा कॉन्ट्रैक्ट सेल बढ़ाने का एक मौका होता है। चाहे वो आपकी कंपनी का ड्राइवर हो या सिक्योरिटी गार्ड, अगर वो कस्टमर के साथ सही से पेश नहीं आता तो वो आपकी ग्रोथ को रोक रहा है। असली ग्रोथ तब होती है जब आपकी कंपनी का हर एम्प्लॉई 'ग्रोथ माइंडसेट' के साथ काम करता है। उन्हें यह समझ होना चाहिए कि अगर कंपनी बढ़ेगी तभी उनकी सैलरी और पोजीशन बढ़ेगी।
इसे लागू करने के लिए आपको कोई रॉकेट साइंस नहीं चाहिए। बस अपनी टीम को यह सिखाना है कि वो जो भी काम कर रहे हैं, क्या उससे कस्टमर का एक्सपीरियंस बेहतर हो रहा है? क्या वो किसी ऐसी प्रॉब्लम को देख पा रहे हैं जो शायद सेल्स टीम की नजरों से बच गई हो? कई बार एक डिलीवरी बॉय को वो बातें पता होती हैं जो कंपनी के सीईओ को कभी पता नहीं चलतीं, क्योंकि वो ग्राउंड पर कस्टमर की असली नाराजगी या खुशी को देखता है।
प्रॉफिटेबल ग्रोथ कोई इत्तेफाक नहीं है। यह एक सामूहिक कोशिश है। जब आप, आपकी टीम और आपका हर छोटा रिसोर्स एक ही दिशा में काम करते हैं, तब जाकर वो मैजिक क्रिएट होता है जिसे हम सक्सेस कहते हैं। तो मंडे मॉर्निंग को जब आप ऑफिस के गेट में कदम रखें, तो यह याद रखियेगा कि आप सिर्फ एक एम्प्लॉई नहीं हैं, आप उस कंपनी के ग्रोथ पार्टनर हैं। अपनी जिम्मेदारी समझिये, छोटे सुधारों पर ध्यान दीजिये और 'गुड ग्रोथ' को अपनी आदत बना लीजिये।
उठिए, एक्शन लीजिये और अपने बिजनेस को उस मुकाम पर ले जाइये जिसका आपने सपना देखा था। क्योंकि याद रखिये, अगर आप नहीं बदलेंगे तो समय आपको बदल देगा।
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