क्या आप भी अपनी टीम को रोबोट समझकर उन पर पैसों और डर का चाबुक चला रहे हैं। बधाई हो। आप अपनी कंपनी की बर्बादी का प्रीमियम सब्स्क्रिप्शन ले चुके हैं। बिना टोटल मोटिवेशन के आप सिर्फ गधे पाल रहे हैं जो बिना क्रिएटिविटी के आपकी ग्रोथ की लंका लगा देंगे।
इस ब्लॉग में हम नील दोषी की किताब प्राइम्ड टू परफॉर्म से वह राज खोलेंगे जो आपको एक थके हुए बॉस से एक लीजेंडरी लीडर बना देगा। चलिए हाई परफॉरमेंस और असली मोटिवेशन के पीछे छिपी साइंस को तीन बड़े लेसन में गहराई से समझते हैं।
लेसन १ : टोटल मोटिवेशन (ToMo) का पावरफुल फॉर्मूला
क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ लोग ऑफिस में ऐसे काम करते हैं जैसे उन्हें किसी ने सजा सुनाई हो। वहीं कुछ लोग ऐसे होते हैं जो काम को मजे लेकर करते हैं। सारा खेल इस बात का है कि आपके मोटिवेशन का सोर्स क्या है। नील दोषी और लिंडसे मैकग्रेगर कहते हैं कि मोटिवेशन के छह मुख्य कारण होते हैं। लेकिन इनमें से सिर्फ तीन ऐसे हैं जो आपको असली परफॉर्मर बनाते हैं। इसे ही लेखक टोटल मोटिवेशन या ToMo कहते हैं।
सबसे पहला और सबसे बड़ा फैक्टर है प्ले। इसका मतलब यह नहीं कि आप ऑफिस में छुपम छुपाई खेलें। प्ले का असली मतलब है कि आपको वह काम करने में मजा आ रहा है। आप उसे इसलिए कर रहे हैं क्योंकि वह काम ही अपने आप में एक रिवॉर्ड है। मान लीजिए आपके पास एक पडोसी है जिसे गार्डनिंग का शौक है। वह पसीने में तरबतर होकर भी पौधों को पानी देता है और उसे उसमें मजा आता है। वह थकता नहीं है क्योंकि उसके लिए वह प्ले है। अब जरा सोचिए अगर आप अपने ऑफिस के बोरिंग एक्सेल शीट को किसी गेम की तरह देखने लगें। जब काम बोझ न लगे बल्कि एक खेल बन जाए तो उसे प्ले कहते हैं। यह परफॉरमेंस बढ़ाने का सबसे ताकतवर जरिया है। लेकिन हमारे यहाँ तो काम को बस घर चलाने का जरिया समझा जाता है।
दूसरा फैक्टर है पर्पज। यहाँ बात आती है काम के नतीजे की। आपको काम करने में शायद बहुत मजा न आए पर आपको पता है कि उस काम का रिजल्ट बहुत बड़ा होने वाला है। जैसे एक डॉक्टर जो रात भर जागकर ऑपरेशन करता है। उसे शायद नींद न आने से परेशानी हो पर उसे पता है कि उसकी मेहनत से एक जान बचेगी। यह पर्पज ही उसे थकने नहीं देता। अगर आपकी टीम को यह नहीं पता कि उनके छोटे से काम से दुनिया में क्या बदलाव आ रहा है तो उनका मोटिवेशन डब्बे में बंद होकर रह जाएगा। उन्हें यह अहसास दिलाना जरूरी है कि वे सिर्फ ईंटें नहीं उठा रहे बल्कि एक खूबसूरत महल बना रहे हैं।
तीसरा फैक्टर है पोटेंशियल। आप काम इसलिए कर रहे हैं क्योंकि आपको पता है कि इससे भविष्य में आपका फायदा होगा। जैसे कोई इंटर्न बिना सैलरी के भी जी तोड़ मेहनत करता है क्योंकि उसे पता है कि यह अनुभव उसे एक शानदार करियर देगा। प्ले और पर्पज के मुकाबले यह थोड़ा कमजोर है पर फिर भी यह आपको आगे बढ़ाता है।
अब आता है असली सटायर। हमारे यहाँ ज्यादातर कंपनियां इन तीनों पर ध्यान देने के बजाय इनडायरेक्ट मोटिवेटर्स पर फोकस करती हैं। यानी पैसा, डर और इमोशनल प्रेशर। यह तो वही बात हुई कि आप किसी घोड़े को गाजर दिखाकर या डंडा मारकर दौड़ा रहे हैं। वह दौड़ेगा तो सही पर वह कभी रेस का घोड़ा नहीं बनेगा। वह सिर्फ डर के मारे भागेगा। जब आप केवल इंसेंटिव और बोनस के पीछे भागते हैं तो आपका दिमाग क्रिएटिव काम करना बंद कर देता है। आप सिर्फ वही करते हैं जिससे टारगेट पूरा हो जाए चाहे क्वालिटी कैसी भी हो।
असली हाई परफॉर्मिंग कल्चर वह है जहाँ लोग इसलिए काम करें क्योंकि उन्हें वह काम पसंद है। जब आपकी टीम में प्ले, पर्पज और पोटेंशियल का तड़का लग जाता है तो आपकी कंपनी की ग्रोथ रॉकेट की तरह ऊपर जाती है। बिना इसके आप सिर्फ एक ऐसी भीड़ जमा कर रहे हैं जो शाम के छह बजने का इंतज़ार करती है।
लेसन २ : इनडायरेक्ट मोटिवेटर्स की कड़वी सच्चाई
जरा सोचिए कि आपको एक पेंटिंग बनानी है और आपका बॉस आपके पीछे डंडा लेकर खड़ा है और कह रहा है कि अगर यह पेंटिंग सुंदर नहीं बनी तो तुम्हारी सैलरी काट ली जाएगी। क्या आप एक मास्टरपीस बना पाएंगे। बिल्कुल नहीं। आप बस किसी तरह रंग पोतकर पीछा छुड़ाना चाहेंगे। नील दोषी और लिंडसे मैकग्रेगर इसे इनडायरेक्ट मोटिवेटर्स कहते हैं और यह किसी भी कंपनी के कल्चर के लिए स्लो पॉइजन की तरह काम करते हैं।
इनडायरेक्ट मोटिवेटर्स में सबसे पहला विलेन है इमोशनल प्रेशर। यह वह स्थिति है जहाँ आप काम इसलिए करते हैं क्योंकि आपको डर है कि अगर काम नहीं किया तो लोग क्या कहेंगे। या फिर आपको गिल्ट महसूस कराया जाता है। आपने वो बॉस तो देखे ही होंगे जो कहते हैं कि क्या तुम अपनी टीम के लिए इतना भी नहीं कर सकते। यह मोटिवेशन नहीं है यह तो इमोशनल ब्लैकमेल है। जब आप शर्म या डर की वजह से काम करते हैं तो आपका दिमाग पूरी तरह से ब्लॉक हो जाता है। आप बस सर्वाइवल मोड में चले जाते हैं। ऐसे माहौल में कोई नया आईडिया आना तो दूर की बात है लोग ढंग से सांस भी नहीं ले पाते।
दूसरा विलेन है इकोनॉमिक प्रेशर। जी हां जिसे हम रिवॉर्ड या बोनस कहते हैं वह भी कई बार जहर बन जाता है। जब आप किसी को कहते हैं कि अगर तुमने यह टारगेट पूरा किया तो तुम्हें इतना पैसा मिलेगा तो उस इंसान का पूरा फोकस सिर्फ उस पैसे पर चला जाता है। वह काम की क्वालिटी को भूल जाता है। वह शॉर्टकट ढूंढने लगता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी बच्चे को चॉकलेट का लालच देकर होमवर्क करवाना। वह होमवर्क तो कर लेगा पर उसे कुछ समझ नहीं आएगा। अगर आप अपनी टीम को सिर्फ पैसों के दम पर नचा रहे हैं तो याद रखिए जिस दिन कोई और ज्यादा पैसे देगा वे आपको छोड़कर भाग जाएंगे। आपकी कंपनी में कोई वफादारी या क्रिएटिविटी नहीं बचेगी सिर्फ ट्रांजेक्शन रह जाएगा।
तीसरा और सबसे खतरनाक विलेन है जड़ता यानी इनरशिया। यहाँ इंसान को पता ही नहीं होता कि वह काम क्यों कर रहा है। वह बस कल आया था इसलिए आज भी आ गया है। यह वह लोग हैं जो ऑफिस में लाश बनकर घूमते हैं। उन्हें न तो काम में मजा आता है न उन्हें कंपनी के विजन से कोई लेना देना है। वे बस एक रूटीन का हिस्सा बन चुके हैं।
लेखक समझाते हैं कि जब ये इनडायरेक्ट मोटिवेटर्स बढ़ते हैं तो आपकी टीम का ToMo (टोटल मोटिवेशन) स्कोर गिर जाता है। जब स्कोर गिरता है तो लोग एडैप्टिव होना छोड़ देते हैं। वे बस उतना ही करते हैं जितना उनसे कहा गया है। अगर ऑफिस में आग भी लग जाए और उनके केपीआई में आग बुझाना नहीं लिखा है तो वे शायद आग भी न बुझाएं। यह कल्चर किसी भी बिजनेस के लिए मौत की घंटी है। असली लीडर वह नहीं है जो गाजर और डंडे का इस्तेमाल करे बल्कि वह है जो इन बाहरी दबावों को कम करे ताकि लोग अपनी मर्जी से और खुशी से काम कर सकें।
लेसन ३ : अडाप्टिव परफॉरमेंस और टैक्टिकल परफॉरमेंस का बैलेंस
कल्पना कीजिए कि आप एक रेस्टोरेंट में गए हैं। वहां का वेटर बिल्कुल रोबोट की तरह आता है। वह वही बोलता है जो उसे ट्रेनिंग में सिखाया गया है। भले ही आपकी टेबल पर पानी गिर जाए पर वह उसे साफ नहीं करेगा क्योंकि उसके मैन्युअल में लिखा है कि उसे सिर्फ आर्डर लेना है। इसे लेखक टैक्टिकल परफॉरमेंस कहते हैं। यानी कि जैसा प्लान बनाया गया है बस उसी पर बिना दिमाग चलाए चलते रहना। ज्यादातर कंपनियां इसी के पीछे पागल रहती हैं। उन्हें लगता है कि अगर हर कोई प्रोसेस फॉलो करेगा तो कंपनी टॉप पर पहुँच जाएगी। लेकिन सच तो यह है कि सिर्फ प्रोसेस से आप एवरेज बन सकते हैं महान नहीं।
असली खेल शुरू होता है अडाप्टिव परफॉरमेंस से। यह वह काबिलियत है जहाँ आप प्लान से हटकर सोचते हैं जब हालात बदल जाते हैं। मान लीजिए वही वेटर देखता है कि आप परेशान हैं और वह बिना किसी के कहे आपके लिए एक एक्स्ट्रा ड्रिंक ले आता है या आपकी समस्या सुलझा देता है। उसने कोई रूल बुक नहीं पढ़ी उसने अपना दिमाग चलाया। यही वह मोमेंट है जो एक कस्टमर को आपका फैन बना देता है। नील दोषी कहते हैं कि जिस कंपनी में अडाप्टिव परफॉरमेंस ज्यादा होती है वही कंपनियां इतिहास रचती हैं।
लेकिन दिक्कत यह है कि अडाप्टिव परफॉरमेंस और टैक्टिकल परफॉरमेंस अक्सर एक दूसरे के दुश्मन होते हैं। जब आप बहुत ज्यादा नियम और कानून बना देते हैं तो लोग अपना दिमाग चलाना बंद कर देते हैं। वे डरते हैं कि अगर कुछ नया किया और गलत हो गया तो बॉस उनकी क्लास लगा देगा। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी को स्विमिंग पूल के किनारे खड़ा करके उसे तैराकी की किताब पढ़ा रहे हों। जब तक वह पानी में कूदेगा नहीं और हाथ पैर नहीं मारेगा वह कभी नहीं सीखेगा।
लेखक हमें बताते हैं कि एक हाई परफॉर्मिंग कल्चर बनाने के लिए आपको अपनी टीम को आजादी देनी होगी। उन्हें गलतियां करने का मौका देना होगा। जब तक लोग डरे रहेंगे वे कभी अडाप्टिव नहीं हो पाएंगे। आपको अपनी कंपनी के स्ट्रक्चर को ऐसा बनाना होगा कि लोग प्रोसेस को फॉलो तो करें पर जरूरत पड़ने पर उसे तोड़ने की हिम्मत भी रखें।
तो क्या आप अब भी अपनी टीम को सिर्फ टारगेट के पीछे दौड़ाएंगे या उन्हें वह माहौल देंगे जहाँ वे खेल सकें और खुद को साबित कर सकें। याद रखिए एक खुश और मोटिवेटेड टीम वह चमत्कार कर सकती है जो करोड़ों का विज्ञापन भी नहीं कर सकता। अपनी कंपनी का कल्चर आज ही बदलें वरना कल शायद बदलने के लिए कंपनी ही न बचे।
अगर आप भी एक ऐसा लीडर बनना चाहते हैं जिसे लोग सैलरी के लिए नहीं बल्कि उसके विजन के लिए फॉलो करें तो आज ही अपनी टीम के साथ बैठकर उनकी बातें सुनें। उनसे पूछें कि उन्हें काम में मजा क्यों नहीं आ रहा। छोटे बदलाव ही बड़े रिजल्ट लाते हैं। इस आर्टिकल को उन मैनेजर्स के साथ शेयर करें जो अब भी गाजर और डंडे वाली पुरानी सोच में फंसे हुए हैं। चलिए साथ मिलकर एक बेहतर वर्क कल्चर बनाते हैं।
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