आप अपनी प्रोफेशनल सर्विस को बेस्ट समझकर सो रहे हैं और वहां आपके कॉम्पिटिटर आपकी नाक के नीचे से क्लाइंट्स उड़ा रहे हैं। क्या फायदा ऐसी डिग्री और नॉलेज का जब मार्केटिंग के नाम पर आपके पास सिर्फ खाली इनबॉक्स बचा है। बिना सही स्ट्रेटेजी के आप सिर्फ एक स्किल्ड लेबर हैं।
प्रोफेशनल सर्विसेज मार्केटिंग की यह समरी आपको बताएगी कि कैसे एक एवरेज फर्म से उठकर आप मार्केट के असली खिलाड़ी बन सकते हैं। इन 3 लेसन में छिपा है आपकी सक्सेस और ब्रांड बनने का असली राज जिसे जानकर आप अपने कॉम्पिटिशन को पीछे छोड़ देंगे।
लेसन १ : ब्रांड अथॉरिटी और लीड जनरेशन का तालमेल
आप अपनी फील्ड के आइंस्टीन हो सकते हैं लेकिन अगर दुनिया को यह पता ही नहीं है कि आपकी दुकान खुली है तो उस ज्ञान का क्या फायदा। प्रोफेशनल सर्विसेज की दुनिया में सबसे बड़ी गलती यही होती है कि लोग सोचते हैं उनका काम खुद बोलेगा। भाई काम तब बोलेगा जब उसे सुनने वाला कोई सामने होगा। आपके पास दुनिया की बेस्ट कंसल्टिंग सर्विस हो सकती है या आप सबसे खतरनाक वकील हो सकते हैं लेकिन अगर मार्केट में आपकी धाक यानी अथॉरिटी नहीं है तो आप बस एक और बायोडाटा बनकर रह जाएंगे जो क्लाइंट की टेबल पर धूल खा रहा है। इस बुक में माइक और जॉन बड़े प्यार से समझाते हैं कि ब्रांड बनाना कोई पेंटिंग करना नहीं है। यह एक ऐसा इंजन सेट करना है जो आपके सोते समय भी आपके लिए क्लाइंट्स को खींच कर लाए।
अथॉरिटी का मतलब यह नहीं कि आप सूट पहनकर फोटो खिंचवाएं और लिंक्डइन पर डाल दें। इसका असली मतलब है कि जब भी आपके सेक्टर की किसी समस्या की बात हो तो सबसे पहला नाम आपका आना चाहिए। आज के जमाने में लोग गूगल पर भरोसा करते हैं अपनी बुआ के लड़के पर नहीं। अगर आपकी सर्विस सर्च करने पर आप नहीं दिख रहे तो आप एक्सिस्ट ही नहीं करते। अब इसे एक रियल लाइफ उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक शर्मा जी हैं जो बहुत ही टैलेंटेड सीए हैं। उन्हें टैक्स बचाने के ऐसे तरीके पता हैं जो शायद इनकम टैक्स डिपार्टमेंट को भी नहीं पता। लेकिन शर्मा जी पुराने खयालात के हैं। वो सोचते हैं कि मार्केटिंग तो उन लोगों के लिए है जिनका काम खराब है। दूसरी तरफ एक वर्मा जी हैं जिन्होंने अभी प्रैक्टिस शुरू की है। वर्मा जी रोज एक छोटा वीडियो डालते हैं या ब्लॉग लिखते हैं कि कैसे स्टार्टअप्स अपना टैक्स बचा सकते हैं।
जब एक नया फाउंडर आता है तो वो शर्मा जी के पास नहीं जाता क्योंकि उसे पता ही नहीं कि शर्मा जी कौन हैं। वो सीधा वर्मा जी के पास जाता है क्योंकि वर्मा जी ने इंटरनेट पर अपनी अथॉरिटी बना ली है। शर्मा जी घर पर बैठकर चाय पी रहे हैं और वर्मा जी नई गाड़ियां खरीद रहे हैं। इसे कहते हैं ब्रांड अथॉरिटी की पावर। लेकिन रुकिए सिर्फ ब्रांड होने से घर नहीं चलता। आपके पास लीड जनरेशन का सिस्टम भी होना चाहिए। कई फर्म्स ऐसी होती हैं जिनके फॉलोअर्स तो लाखों में हैं लेकिन बैंक बैलेंस जीरो है। क्यों। क्योंकि वो सिर्फ ज्ञान बांट रहे हैं उसे बिजनेस में कन्वर्ट करना नहीं जानते।
प्रोफेशनल सर्विसेज मार्केटिंग का असली खेल इन दोनों के बीच का बैलेंस है। आपकी मार्केटिंग ऐसी होनी चाहिए जो न केवल लोगों को इम्प्रेस करे बल्कि उन्हें आपकी सर्विस खरीदने के लिए मजबूर भी कर दे। अगर आप सिर्फ कंटेंट डाल रहे हैं और वहां से कोई क्लाइंट नहीं आ रहा तो आप बिजनेस नहीं कर रहे बल्कि सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर बनने की नाकाम कोशिश कर रहे हैं। आपको अपनी धाक इस तरह जमानी है कि क्लाइंट खुद चलकर आए और आपसे पूछे कि सर क्या आप मेरे लिए काम करेंगे। जब क्लाइंट आपसे रिक्वेस्ट करता है तब आप रेट बढ़ाकर भी काम ले सकते हैं। लेकिन अगर आप क्लाइंट के पीछे भाग रहे हैं तो समझ लीजिए कि आपकी मार्केटिंग और ब्रांडिंग दोनों ही वेंटिलेटर पर हैं।
इसलिए इस लेसन का सीधा और कड़वा सच यही है कि अपनी एक्सपर्टाइज को घर की अलमारी में बंद मत रखिए। उसे मार्केट में लाइए और उसे एक लीड जनरेशन इंजन से जोड़ दीजिए। अगर आप आज भी पुराने तरीकों से क्लाइंट ढूंढ रहे हैं तो शायद आप उस डायनासोर की तरह हैं जिसे पता ही नहीं कि उल्कापिंड गिरने वाला है। जाग जाइए वरना आपके कॉम्पिटिटर आपकी मार्केट वैल्यू को चट कर जाएंगे और आप बस यह कहते रह जाएंगे कि मेरा काम तो बहुत अच्छा था।
लेसन २ : बिजनेस डेवलपमेंट का कल्चर बनाना
अक्सर प्रोफेशनल फर्म्स में एक बहुत ही अजीब बीमारी होती है। वहां के लोग सोचते हैं कि सेल्स और मार्केटिंग का काम तो सिर्फ उस एक बंदे का है जिसके केबिन के बाहर मार्केटिंग लिखा है। बाकी सब तो अपनी अपनी फाइलों में दबे रहना चाहते हैं। माइक और जॉन कहते हैं कि अगर आप अपनी फर्म को सच में बढ़ाना चाहते हैं तो आपको हर एम्प्लॉई को एक बिजनेस डेवलपर बनाना होगा। इसका मतलब यह नहीं कि आप अपने इंजीनियर या डॉक्टर को झोला लेकर सड़कों पर सेल्स करने भेज दें। इसका मतलब है कि फर्म के हर इंसान के दिमाग में यह बात क्लियर होनी चाहिए कि क्लाइंट लाना और उसे खुश रखना सबकी जिम्मेदारी है।
सोचिए एक ऐसी फर्म के बारे में जहां रिसेप्शनिस्ट से लेकर सीनियर पार्टनर तक सबको पता है कि क्लाइंट से बात कैसे करनी है और नए मौके कैसे ढूंढने हैं। अब जरा अपनी असलियत देखिए। आपकी फर्म में शायद जूनियर स्टाफ को लगता है कि उनका काम बस एक्सेल शीट भरना है। उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि क्लाइंट रुक रहा है या जा रहा है। यह ऐसा ही है जैसे आप एक क्रिकेट टीम में हैं जहां सिर्फ बैट्समैन को जीतने की फिक्र है और फील्डर बाउंड्री पर खड़े होकर समोसे खा रहे हैं। ऐसी टीम कभी मैच नहीं जीतती। प्रोफेशनल सर्विसेज में हर कोई एक ब्रांड एम्बेसडर होता है।
एक बहुत बड़ी आर्किटेक्ट फर्म थी। वहां के एक जूनियर डिजाइनर को एक पार्टी में बुलाया गया। वहां उसे एक बड़ा बिल्डर मिला जिसने बातों बातों में कहा कि वह एक नया मॉल बनाने की सोच रहा है। अब अगर वह डिजाइनर अपनी धुन में रहने वाला टाइप होता तो वह कहता कि भाई यह मेरा काम नहीं है आप ऑफिस के लैंडलाइन पर कॉल करना। और वहीं वह डील खत्म हो जाती। लेकिन उस फर्म में बिजनेस डेवलपमेंट का कल्चर था। उस लड़के ने वहीं बिल्डर को अपनी फर्म के पुराने प्रोजेक्ट्स के बारे में बताया और अगले ही दिन मीटिंग फिक्स कर ली। इसे कहते हैं कल्चर।
ज्यादातर फर्म्स में लोग मार्केटिंग को एक बोझ समझते हैं। उन्हें लगता है कि यह तो झूठ बोलने का काम है। लेकिन असल में बिजनेस डेवलपमेंट सिर्फ रिश्ते बनाने का नाम है। अगर आपके लोग क्लाइंट्स की मदद करने का जज्बा रखते हैं तो सेल्स अपने आप हो जाती है। आपको बस अपने स्टाफ को यह सिखाना है कि वह क्लाइंट की प्रॉब्लम को सुनें और उसका हल अपनी सर्विस में ढूंढें। अगर आप अपने ऑफिस में ऐसा माहौल नहीं बना पा रहे हैं जहां हर कोई ग्रोथ के लिए एक्साइटेड हो तो आप अकेले थक जाएंगे। आप खुद को कितना भी रगड़ लें आप अकेले पूरी फर्म का बोझ नहीं उठा सकते।
प्रोफेशनल सर्विसेज मार्केटिंग की यह बुक साफ कहती है कि जब तक आपकी पूरी टीम सेल्स के प्रोसेस में शामिल नहीं होगी तब तक आप एक थकी हुई फर्म बने रहेंगे। मार्केटिंग कोई डिपार्टमेंट नहीं है यह एक माइंडसेट है। आपको अपने कल्चर से वह डर निकालना होगा जो सेल्स के नाम से लोगों के मन में बैठ गया है। जब हर कोई कंट्रीब्यूट करेगा तो आपकी लीड जनरेशन की मशीन कभी नहीं रुकेगी। वरना आप बस उस कप्तान की तरह रह जाएंगे जिसका जहाज डूब रहा है और क्रू मेंबर्स को लग रहा है कि पानी तो सिर्फ कप्तान के कमरे में भर रहा है।
लेसन ३ : हाई ग्रोथ फर्म की स्ट्रेटेजी
क्या आपने कभी सोचा है कि कुछ फर्म्स रातों रात रॉकेट की तरह ऊपर कैसे चली जाती हैं, जबकि बाकी सालों तक उसी छोटे से ऑफिस में बैठकर पुरानी फाइलों पर मक्खियां मारते रहते हैं। माइक और जॉन ने इसका बहुत ही सिंपल जवाब दिया है। हाई ग्रोथ वाली फर्म्स सिर्फ काम नहीं करतीं, वो वैल्यू बेचती हैं। आम फर्म्स का हाल यह होता है कि वो क्लाइंट से पूछती हैं, सर आपको क्या चाहिए। वहीं हाई ग्रोथ फर्म्स क्लाइंट को बताती हैं कि, सर आपको यह चाहिए वरना आपका बिजनेस डूब जाएगा। इसे कहते हैं डिमांड क्रिएट करना।
ज्यादातर प्रोफेशनल सर्विसेज के लोग खुद को एक कमोडिटी बना लेते हैं। वो वही सर्विस बेच रहे हैं जो उनके पड़ोस वाली गली में बैठा बंदा बेच रहा है। जब आपकी सर्विस में कुछ अलग नहीं होगा, तो क्लाइंट हमेशा आपसे डिस्काउंट मांगेगा। आप उसे अपनी मेहनत गिनाते रहेंगे और वो कहेगा कि भाई उधर तो यह आधे रेट में मिल रहा है। यह बहुत ही बेइज्जती वाली सिचुएशन होती है। हाई ग्रोथ फर्म्स इस दलदल में नहीं फंसतीं। वो क्लाइंट की उन समस्याओं पर वार करती हैं जो क्लाइंट को खुद भी नहीं पता होतीं। वो खुद को एक वेंडर की तरह नहीं बल्कि एक पार्टनर की तरह पेश करती हैं।
एक डिजिटल मार्केटिंग एजेंसी थी जो बस फेसबुक एड्स चलाती थी। वो हर महीने क्लाइंट से 20 हजार रुपये मांगती और क्लाइंट हमेशा नखरे करता। फिर उसी शहर में एक दूसरी एजेंसी आई। उसने फेसबुक एड्स बेचने के बजाय बिजनेस ऑटोमेशन और रेवेन्यू ग्रोथ बेचना शुरू किया। उन्होंने क्लाइंट को डेटा दिखाया कि कैसे वो उनका टर्नओवर 2 गुना कर सकते हैं। अब वही क्लाइंट जो 20 हजार देने में रो रहा था, इस नई एजेंसी को 1 लाख रुपये खुशी खुशी देने को तैयार हो गया। क्यों। क्योंकि अब वो सिर्फ सर्विस नहीं खरीद रहा था, वो रिजल्ट खरीद रहा था।
अगर आप अपनी सर्विस के फीचर्स गिनाते रहेंगे तो आप कभी अमीर नहीं बनेंगे। आपको यह समझना होगा कि क्लाइंट को आपकी प्रोसेस में कोई इंटरेस्ट नहीं है। उसे बस इस बात से मतलब है कि उसका दर्द कैसे कम होगा। प्रोफेशनल सर्विसेज मार्केटिंग की यह बुक हमें सिखाती है कि आपको अपनी सर्विस को एक स्पेशलाइज्ड नीश में फिट करना होगा। हर किसी का काम करने की कोशिश मत कीजिए। जो फर्म्स कहती हैं कि हम सब कुछ करते हैं, असल में वो कुछ भी ढंग से नहीं करतीं। हाई ग्रोथ तभी आती है जब आप किसी एक बड़ी प्रॉब्लम के मास्टर बन जाते हैं।
जब आप एक बार इस लेवल पर पहुंच जाते हैं, तो फिर आपकी मार्केटिंग नहीं बोलती, आपके नतीजे बोलते हैं। आपकी फर्म का हर लेसन, हर प्रोजेक्ट एक कहानी बन जाता है जो और नए क्लाइंट्स को खींचता है। यह एक ऐसा साइकिल है जो एक बार शुरू हो गया तो फिर आपको पीछे मुड़कर देखने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तो क्या आप अभी भी वही घिसी पिटी सर्विस बेचना चाहते हैं या आप उस हाई ग्रोथ वाली लीग में शामिल होना चाहते हैं जहां आप अपनी कीमत खुद तय करते हैं। चॉइस आपकी है।
प्रोफेशनल बनने का मतलब सिर्फ डिग्री लेना नहीं, बल्कि अपने काम को एक ब्रांड बनाना है। अगर आप आज भी पुराने तरीकों से अटके हुए हैं, तो आप पीछे छूट रहे हैं। आज ही अपनी फर्म के कल्चर और मार्केटिंग को बदलें। इस आर्टिकल को अपने उन पार्टनर्स के साथ शेयर करें जो अभी भी सो रहे हैं, और नीचे कमेंट में बताएं कि आपकी फर्म की सबसे बड़ी चुनौती क्या है। चलिए मिलकर ग्रोथ का नया सफर शुरू करते हैं।
-----
आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now
#MarketingStrategy #ProfessionalServices #BusinessGrowth #BrandingIndia #SuccessMindset
_