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क्या आपकी कंपनी भी सरकारी दफ्तर की तरह चल रही है जहाँ फाइलें तो हिलती हैं पर काम रेंगता है। अगर आप अब भी वही पुराने घिसे पिटे मैनेजमेंट के तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं तो मुबारक हो आप अपनी टीम की परफॉरमेंस और अपना चैन दोनों ही खो रहे हैं। बिना इन सीक्रेट्स के आप सिर्फ ऑफिस के सबसे बिजी दिखने वाले नाकामयाब इंसान बने रहेंगे।

आज हम गैरी नीलसन की बुक रिजल्ट्स से सीखेंगे कि कैसे अपने काम और आर्गेनाइजेशन की कमियों को जड़ से खत्म करके ग्रेट परफॉरमेंस को अनलॉक करना है। चलिए इन ३ पावरफुल लेसन को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : डिसीजन राइट्स और जिम्मेदारी का असली खेल

अक्सर हमारे ऑफिसों में एक बहुत ही मजेदार ड्रामा चलता है जिसे हम कहते हैं डिसीजन मेकिंग। असल में यह कोई ड्रामा नहीं बल्कि एक ऐसी बीमारी है जो अच्छे खासे चलते हुए बिजनेस को भी आईसीयू में पहुंचा सकती है। लेखक गैरी नीलसन और ब्रूस पास्टरनैक कहते हैं कि किसी भी आर्गेनाइजेशन की परफॉरमेंस तभी चमकती है जब वहां के डिसीजन राइट्स बिल्कुल साफ हों। अब आप सोच रहे होंगे कि यह भारी भरकम शब्द क्या है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि किस इंसान के पास कौन सा फैसला लेने की पावर है।

हमारे यहाँ क्या होता है। एक छोटा सा काम करने के लिए भी फाइल पांच टेबल घूमती है। बॉस के पास जाओ तो वह कहता है कि मैनेजर से पूछो और मैनेजर कहता है कि यह तो ऊपर से तय होगा। यह लुका छिपी का खेल आपकी कंपनी की एफिशिएंसी को दीमक की तरह चाट रहा है। मान लीजिए आपकी एक छोटी सी दुकान है। वहां आपने एक लड़का रखा है जो सामान बेचता है। अब अगर कोई कस्टमर दस रुपये डिस्काउंट मांग ले और वह लड़का आपको फोन करने लगे तो समझ जाइये कि आपने उसे कोई डिसीजन राइट नहीं दिया है। आप खुद को बहुत बड़ा लीडर समझ रहे होंगे लेकिन असल में आप एक बोतल के ढक्कन की तरह काम कर रहे हैं जो प्रोग्रेस को रोक कर बैठा है।

बुक में बताया गया है कि जब लोगों को पता नहीं होता कि फैसला किसका है तो वे जिम्मेदारी से भागने लगते हैं। इसे कहते हैं पैसिव एग्रेसिव कल्चर। लोग मीटिंग में तो हां हां करेंगे लेकिन जैसे ही रूम से बाहर निकलेंगे वह काम वहीं का वहीं पड़ा रहेगा। क्यों। क्योंकि किसी के गले में घंटी बांधने की फुर्सत ही नहीं थी। अगर आप चाहते हैं कि आपके रिजल्ट्स बदलें तो सबसे पहले यह तय कीजिये कि कौन क्या तय करेगा। हर छोटे काम के लिए बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स की मीटिंग बुलाना बंद कीजिये।

सोचिये अगर विराट कोहली को हर शॉट मारने से पहले ड्रेसिंग रूम में फोन करके पूछना पड़ता कि भाई साहब क्या मैं अब छक्का मार दूँ। तो क्या इंडिया कभी मैच जीत पाती। बिल्कुल नहीं। मैदान पर खड़े खिलाड़ी को पता होना चाहिए कि कब रिस्क लेना है और कब नहीं। बिजनेस में भी यही नियम लागू होता है। अगर आपका एम्प्लॉई अपने काम से जुड़े फैसले नहीं ले पा रहा है तो आप टीम नहीं बल्कि एक भीड़ चला रहे हैं।

अक्सर लीडर्स को लगता है कि सारी पावर अपने हाथ में रखने से कंट्रोल बना रहता है। पर भाई साहब यह कंट्रोल नहीं बल्कि आपकी अपनी असुरक्षा है। जब आप लोगों को फैसले लेने की आजादी देते हैं तो वे उस काम को अपना समझने लगते हैं। और जब काम अपना होता है तो रिजल्ट्स अपने आप आने लगते हैं। वरना बिना क्लैरिटी के तो लोग सिर्फ अपनी कुर्सी बचाने में लगे रहते हैं। वे सोचते हैं कि अगर कुछ गलत हुआ तो हम कह देंगे कि हमने तो पूछा ही नहीं था। यह बचने का रास्ता ही परफॉरमेंस का सबसे बड़ा दुश्मन है।

डिसीजन राइट्स को क्लियर करने का मतलब यह नहीं है कि सबको खुली छूट दे दी जाए। इसका मतलब है एक ऐसा सिस्टम बनाना जहाँ हर किसी को अपनी बाउंड्री पता हो। जब सबको पता होगा कि गोल पोस्ट कहाँ है तभी तो कोई गोल मारेगा। वरना सब बस गेंद के पीछे भागते रहेंगे और शाम को थक कर घर चले जाएंगे। अगर आप आज भी हर छोटी चीज में अपनी टांग अड़ा रहे हैं तो समझ जाइये कि आप अपनी टीम को अपाहिज बना रहे हैं। तो क्या आप तैयार हैं अपनी टीम को असली पावर देने के लिए या अभी भी रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में लेकर बैठना चाहते हैं।


लेसन २ : इनफार्मेशन का सही फ्लो और डेटा की ताकत

अगर आपकी कंपनी एक शरीर है तो इनफार्मेशन उसका खून है। और अगर खून में कचरा भर जाए या वह नसों में रुक जाए तो हार्ट अटैक आना पक्का है। लेखक कहते हैं कि ज्यादातर कंपनियां इसलिए डूब जाती हैं क्योंकि उनके पास सही जानकारी सही समय पर पहुंचती ही नहीं है। यहाँ एक बहुत बड़ा मजाक चलता है जिसे हम कहते हैं 'मैनेजमेंट रिपोर्टिंग'। इसमें होता यह है कि नीचे वाले लोग अपनी गलतियों को छुपाकर सब कुछ हरा-हरा दिखाते हैं और ऊपर बैठा बॉस सोचता है कि हम तो चांद पर पहुंचने वाले हैं।

असल जिंदगी का उदाहरण देखिये। मान लीजिये आप एक नया प्रोडक्ट लॉन्च कर रहे हैं। मार्केटिंग वाले को पता है कि कस्टमर को यह पसंद नहीं आ रहा। सेल्स वाले को पता है कि कीमत बहुत ज्यादा है। लेकिन जब मीटिंग होती है तो सब एक दूसरे का मुंह देखते हैं। कोई भी सच बोलकर विलेन नहीं बनना चाहता। सब सोचते हैं कि अपनी गर्दन क्यों फंसाना। नतीजा यह होता है कि करोड़ों रुपये पानी में बह जाते हैं और बाद में सब कहते हैं कि मार्केट ही खराब था। भाई साहब मार्केट खराब नहीं था आपकी इनफार्मेशन का पाइप जाम था।

बुक में बहुत साफ बताया गया है कि डेटा और इनफार्मेशन को पारदर्शी बनाना क्यों जरूरी है। जब तक हर इंसान को यह नहीं पता होगा कि कंपनी असल में कहाँ खड़ी है वह सुधार कैसे करेगा। कई ऑफिसों में जानकारी को तिजोरी में बंद करके रखा जाता है जैसे कि वह कोई कोका कोला का सीक्रेट फॉर्मूला हो। मैनेजर को लगता है कि अगर उसने सब बता दिया तो उसकी वैल्यू कम हो जाएगी। यह सोच ही सबसे बड़ी बाधा है। जानकारी शेयर करने से पावर कम नहीं होती बल्कि पूरी टीम की ताकत बढ़ती है।

सोचिये आप एक टैक्सी में बैठे हैं और ड्राइवर की खिड़की पर काला कपड़ा बंधा है। आप पीछे से उसे रास्ता बता रहे हैं लेकिन उसे सड़क नहीं दिख रही। क्या आप कभी सही जगह पहुंच पाएंगे। बिल्कुल नहीं। बिजनेस में भी यही होता है जब लीडरशिप को जमीनी हकीकत नहीं पता होती। लोग डेटा को अपने हिसाब से तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं ताकि उनका बोनस न रुक जाए। यह एक ऐसा जाल है जिसमें पूरी आर्गेनाइजेशन फंस जाती है।

अक्सर लोग मीटिंग्स में घंटों बिताते हैं लेकिन काम की बात एक मिनट भी नहीं होती। क्यों। क्योंकि किसी के पास असली डेटा नहीं होता। सब अपनी भावनाओं और अंदाजों पर खेल रहे होते हैं। लेखक समझाते हैं कि अगर आप चाहते हैं कि आपकी टीम हाई परफॉरमेंस दे तो उन्हें सच देखने की आदत डालिये। अगर रिजल्ट्स खराब हैं तो उन्हें छाती ठोक कर स्वीकार कीजिये ताकि उन्हें सुधारा जा सके। छुपाने से घाव ठीक नहीं होता बल्कि उसमें इन्फेक्शन हो जाता है।

एक और मजेदार बात यह है कि जहाँ इनफार्मेशन का फ्लो नहीं होता वहां अफवाहों का बाजार गर्म रहता है। ऑफिस की कैंटीन में होने वाली गॉसिप अक्सर बोर्ड रूम के फैसलों से ज्यादा तेज फैलती है। जब आप लोगों को सच नहीं बताते तो वे अपने हिसाब से कहानियां बना लेते हैं। और यकीन मानिये वे कहानियां कभी भी पॉजिटिव नहीं होतीं। लोग डरने लगते हैं कि शायद छंटनी होने वाली है या कंपनी बंद होने वाली है। इस डर की वजह से लोग काम छोड़कर नई नौकरी ढूंढने लगते हैं।

इसलिए अगर आप एक महान आर्गेनाइजेशन बनाना चाहते हैं तो इनफार्मेशन के रास्ते से सारे पत्थर हटा दीजिये। अपनी टीम को सिर्फ टारगेट मत बताइये बल्कि यह भी बताइये कि हम वहां तक कैसे पहुंचेंगे और अभी हम कहाँ अटक रहे हैं। जब सबको पूरी तस्वीर दिखेगी तभी सब मिलकर सही दिशा में चप्पू चलाएंगे। वरना आप बस चिल्लाते रहेंगे और नाव गोल-गोल घूमती रहेगी।


लेसन ३ : स्ट्रक्चर का मोह और मोटिवेशन की असली चाबी

जब भी किसी कंपनी में रिजल्ट्स आने कम हो जाते हैं तो सबसे पहला काम क्या होता है। बॉस कहता है कि चलो री-आर्गेनाइजेशन करते हैं। रातों-रात कुर्सियां बदल दी जाती हैं। मैनेजरों के टाइटल बदल दिए जाते हैं। नया चार्ट बनाया जाता है और सबको लगता है कि अब तो क्रांति आ जाएगी। लेकिन सच तो यह है कि सिर्फ फर्नीचर बदलने से या लोगों के नाम के आगे 'सीनियर' लगाने से परफॉरमेंस नहीं बदलती। लेखक कहते हैं कि स्ट्रक्चर सिर्फ एक ढांचा है। अगर उसके अंदर रहने वाले लोगों का मोटिवेशन और कंपनी का कल्चर सड़ा हुआ है तो नया चार्ट भी कुछ नहीं उखाड़ पाएगा।

मान लीजिये आपके पास एक पुरानी खटारा कार है जिसका इंजन जवाब दे चुका है। अब आप उस पर नया पेंट करवा दें और उसमें आलीशान लेदर की सीटें लगवा दें। क्या वह तेज दौड़ने लगेगी। बिल्कुल नहीं। वह सिर्फ गैराज में खड़ी हुई सुंदर दिखेगी। बिजनेस में भी यही होता है। जब तक आप लोगों के काम करने के तरीके और उनके इंसेंटिव को नहीं बदलते तब तक केवल स्ट्रक्चर बदलना एक महंगा मजाक है। लोग वही पुराने काम वही पुरानी सुस्ती के साथ करेंगे बस अब उनके केबिन का नंबर बदल चुका होगा।

असल मोटिवेशन तब आता है जब लोगों को पता हो कि उनके अच्छे काम का उन्हें क्या फायदा मिलेगा। हमारे यहाँ रिवॉर्ड सिस्टम भी बड़ा अजीब होता है। जो ज्यादा चापलूसी करता है उसे प्रमोशन मिलता है और जो चुपचाप कोने में बैठकर काम करता है उसे और ज्यादा काम दे दिया जाता है। यह देखकर बाकी टीम भी समझ जाती है कि भाई साहब यहाँ काम करने से नहीं बल्कि जी-हजूर करने से दाल गलेगी। अगर आप चाहते हैं कि लोग अपना बेस्ट दें तो आपको परफॉरमेंस और रिवॉर्ड के बीच एक सीधा कनेक्शन बनाना होगा।

सोचिये अगर किसी क्रिकेट मैच में यह नियम हो कि रन कोई भी बनाए लेकिन मैन ऑफ द मैच उसे मिलेगा जिसकी शक्ल कप्तान को सबसे ज्यादा पसंद है। क्या कोई खिलाड़ी जान लगाएगा। कतई नहीं। लोग बस मैदान पर टहलने आएंगे। रिजल्ट्स बुक हमें सिखाती है कि मोटिवेशन का मतलब सिर्फ पैसा नहीं होता। इसका मतलब यह है कि एक एम्प्लॉई को महसूस होना चाहिए कि उसकी मेहनत को देखा जा रहा है और उसकी कद्र की जा रही है। जब लोगों को सही इंसेंटिव मिलते हैं तो वे खुद ब खुद अपनी एफिशिएंसी बढ़ाने के रास्ते ढूंढ लेते हैं।

अक्सर कंपनियां कल्चर के नाम पर ऑफिस में एक टेबल टेनिस की टेबल रख देती हैं या शुक्रवार को पिज्जा पार्टी दे देती हैं। उन्हें लगता है कि इससे लोग खुश रहेंगे। लेकिन भाई साहब भूखे शेर को घास खिलाकर आप शिकार की उम्मीद नहीं कर सकते। असली कल्चर वह होता है जहाँ गलतियों से सीखा जाए न कि उन्हें करने वाले को सूली पर चढ़ाया जाए। जब लोगों के मन में डर होता है तो वे नया करने की कोशिश ही छोड़ देते हैं। वे बस उतना ही करते हैं जिससे उनकी नौकरी बची रहे। यह 'सेफ' खेलने वाली आदत ही एक औसत कंपनी और एक महान कंपनी के बीच का अंतर है।

अंत में याद रखिये कि रिजल्ट्स रातों-रात नहीं आते। यह एक प्रोसेस है जो सही फैसलों सही जानकारी और सही मोटिवेशन से मिलकर बनता है। अगर आप आज भी वही गलतियां दोहरा रहे हैं जो कल की थीं तो आप आने वाले कल से कुछ अलग उम्मीद नहीं कर सकते। अपनी आर्गेनाइजेशन के इन तीनों पिलर्स को ठीक कीजिये और देखिये कैसे आपकी टीम फर्श से अर्श पर पहुंचती है। वरना याद रखिये कि दुनिया बहुत तेज भाग रही है और अगर आप सिर्फ स्ट्रक्चर बदलते रह गए तो बाकी लोग रिजल्ट्स ले जाएंगे।


तो दोस्तों, क्या आप भी अपनी टीम या बिजनेस में इन बदलावों को लाने के लिए तैयार हैं। याद रखिये कि एक लीडर वही है जो रास्ता जानता है और रास्ते पर चलता भी है। आज ही अपने काम करने के तरीके को गौर से देखिये और तय कीजिये कि आप क्या बदलने वाले हैं। अगर आपको यह लेसन काम के लगे तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो ऑफिस की पॉलिटिक्स में फंसे हुए हैं। कमेंट्स में बताइये कि आपके वर्कप्लेस की सबसे बड़ी समस्या क्या है। आइये मिलकर एक बेहतर वर्क कल्चर बनाते हैं।

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