Rookie Smarts (Hindi)


क्या आप अभी भी अपने दस साल पुराने एक्सपीरियंस का अचार डाल रहे हैं। मुबारक हो। आप अपनी ग्रोथ की अर्थी खुद उठा रहे हैं। जब दुनिया रॉकेट की रफ़्तार से बदल रही है तब आपका पुराना ज्ञान आपको सिर्फ जंग लगा हुआ कबाड़ बना रहा है। फियर ऑफ मिसिंग आउट को सीरियसली लीजिए।

इस किताब के लेसन्स आपको बताएंगे कि कैसे एक फ्रेशर का दिमाग आपके सड़े हुए एक्सपीरियंस को पछाड़ सकता है। चलिए जानते हैं कि कैसे आप ऑफिस के सबसे स्मार्ट खिलाडी बन सकते हैं और अपने करियर को एक नई उड़ान दे सकते हैं।


लेसन १ : द इनोसेंट डेंजर - अपनी मासूमियत को हथियार बनाओ

मान लीजिए आप एक ऐसी शादी में गए हैं जहाँ आपको कोई नहीं जानता। अब आपके पास दो रास्ते हैं। या तो आप कोने में खड़े होकर पनीर टिक्का का इंतज़ार करें या फिर बेधड़क होकर दूल्हे के फूफाजी से पूछ लें कि भाई साहब यह टेंट कहाँ से लगवाया है। ऑफिस की दुनिया में भी कुछ ऐसा ही होता है। हम अक्सर खुद को एक्सपर्ट समझने की गलती कर बैठते हैं और यही से हमारे पतन की शुरुआत होती है। लिज़ वाइसमैन कहती हैं कि जब आप किसी काम में नए होते हैं तो आपके पास खोने के लिए कुछ नहीं होता। इसे वो द इनोसेंट डेंजर कहती हैं।

सोचिए आपके ऑफिस में एक नया लड़का आया है जिसे एक्सेल शीट का ई भी नहीं पता। वो हर छोटी बात पर सवाल पूछता है। सर यह सेल लाल क्यों हो गया। सर यह फार्मूला उल्टा क्यों चल रहा है। और आप जो पिछले पांच साल से उसी कुर्सी पर चिपके हैं आप सवाल पूछने में कतराते हैं। क्यों। क्योंकि आपको लगता है कि अगर आपने सवाल पूछा तो लोग सोचेंगे कि भाई इतने साल से यहाँ क्या घास छील रहे थे। बस यही वो पल है जहाँ वो नया लड़का आपसे मीलों आगे निकल जाता है। उसका दिमाग एक खाली स्लेट की तरह है जिस पर नई जानकारियाँ बिजली की रफ़्तार से छप रही हैं और आपका दिमाग उस पुराने कबाड़खाने जैसा हो गया है जहाँ नई चीज़ रखने की जगह ही नहीं बची।

एक्सपर्ट होने का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि आप मान लेते हैं कि आपको सब पता है। आप अपनी पुरानी घिसी पिटी तरकीबों को ही रामबाण समझने लगते हैं। लेकिन एक रूकी यानी कि एक नया खिलाडी हमेशा डेंजर ज़ोन में रहता है। उसे पता है कि उसे कुछ नहीं आता इसलिए वो ज्यादा सतर्क रहता है। वो उन खतरों को भी देख लेता है जिन्हें एक एक्सपर्ट अपनी ओवर कॉन्फिडेंस वाली ऐनक की वजह से अनदेखा कर देता है। जैसे वो चचा जो तीस साल से गाड़ी चला रहे हैं और बिना इंडिकेटर दिए मोड़ देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि सड़क उनके बाप की है। वहीं एक नया ड्राइवर दोनों हाथ स्टीयरिंग पर जमाकर मिरर में दस बार देखता है। अब आप ही बताइए कि एक्सीडेंट के चांस किसके ज्यादा हैं।

करियर के इस नए खेल में अगर आप बचना चाहते हैं तो आपको अपनी उस मासूमियत को वापस लाना होगा। सवाल पूछना शुरू कीजिए भले ही वो कितने ही बेवकूफी भरे क्यों न लगें। जब आप सवाल पूछते हैं तो आप जानकारी नहीं बल्कि समाधान ढूंढ रहे होते हैं। एक्सपर्ट्स अक्सर समाधान ढूंढना बंद कर देते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि समाधान तो उनकी जेब में रखा है। लेकिन हकीकत में मार्केट बदल चुका होता है और आपकी जेब में सिर्फ पुराने फटे हुए नोट बचते हैं।

इस लेसन का सीधा सा मतलब यह है कि अपनी ईगो को डस्टबिन में डालिए। हर काम को ऐसे देखिए जैसे आप उसे पहली बार कर रहे हैं। जब आप अपनी इनोसेंस को ढाल बनाकर मैदान में उतरते हैं तो लोग भी आपकी मदद करने के लिए आगे आते हैं। एक घमंडी एक्सपर्ट को कोई रास्ता नहीं दिखाना चाहता लेकिन एक जिज्ञासु रूकी के लिए हर कोई रास्ता छोड़ देता है। तो क्या आप तैयार हैं अपने अंदर के उस बच्चे को बाहर निकालने के लिए जो हर चीज़ को हैरानी से देखता था या फिर आप वही पुराने बोरिंग एक्सपर्ट बनकर रिटायर होना चाहते हैं।


लेसन २ : द हंगर गेन - जब भूख ही आपकी ताकत बन जाए

क्या आपने कभी गौर किया है कि जो इंसान पहली बार जिम जाता है वो पहले दिन ही सारी मशीनें उखाड़ देने की कोशिश करता है। और दूसरी तरफ वो भाई साहब हैं जो पिछले दो साल से जिम आ रहे हैं लेकिन उनका ज्यादातर समय ट्रेडमिल पर खड़े होकर फोन चलाने में बीतता है। करियर की रेस में भी यही फर्क है। जो नया है उसके अंदर एक आग है एक भूख है। लिज़ वाइसमैन इसे द हंगर गेन कहती हैं। जब आपके पास खोने के लिए नाम और रुतबा नहीं होता तो आपके पास पाने के लिए पूरी दुनिया होती है।

अक्सर लोग कहते हैं कि भाई मुझे तो दस साल का एक्सपीरियंस है मुझे सब पता है। लेकिन सच तो यह है कि आपने दस साल काम नहीं किया बल्कि एक ही साल के काम को दस बार रिपीट किया है। यह एक्सपीरियंस नहीं बल्कि आलस का दूसरा नाम है। एक रूकी यानी नया खिलाडी इसलिए जीत जाता है क्योंकि उसे पता है कि अगर उसने आज हाथ पैर नहीं मारे तो कल उसे कोई पानी भी नहीं पूछेगा। वो उस भूखे शेर की तरह है जिसे पता है कि अगर शिकार नहीं किया तो रात को खाली पेट सोना पड़ेगा। और आप। आप उस पालतू बिल्ली की तरह बन गए हैं जिसे पता है कि शाम को मालिक दूध का कटोरा सामने रख ही देगा।

सोचिए आपके ऑफिस में कोई नया प्रोजेक्ट आया है। एक्सपर्ट्स की मीटिंग होती है और सब अपने अपने चश्मे उतारकर ज्ञान बांटने लगते हैं। यह नहीं हो सकता। इसमें बहुत रिस्क है। पिछली बार भी ऐसा ही हुआ था। उनकी बातों में सावधानी कम और काम से बचने के बहाने ज्यादा होते हैं। लेकिन वहीं एक रूकी खड़ा होता है जिसके दिमाग में अभी तक ये नहीं बैठा है कि क्या नामुमकिन है। वो कहता है कि सर कोशिश करके देखते हैं न। वो एक्स्ट्रा घंटे काम करता है नए सॉफ्टवेयर्स सीखता है और क्लाइंट को खुश करने के लिए पागलों की तरह मेहनत करता है। उसकी यह भूख ही उसे उस काम को पूरा करने की ताकत देती है जिसे एक्सपर्ट्स ने पहले ही मरा हुआ घोषित कर दिया था।

हम एक्सपीरियंस को एक मेडल की तरह अपनी छाती पर चिपका कर घूमते हैं जबकि असलियत में वो हमारे पैरों की बेड़ियाँ बन जाता है। हम अपनी ही बनाई हुई सीमाओं में कैद हो जाते हैं। हमें लगता है कि हमने पहाड़ चढ़ लिया है अब और ऊँचा क्या होगा। लेकिन रूकी को तो अभी पहाड़ की चोटी भी नहीं दिख रही होती वो बस चढ़ता जाता है। उसकी फुर्ती और सीखने का जज्बा ही उसे बाकियों से अलग करता है।

अगर आपको लगता है कि आप अपने करियर में रुक गए हैं तो अपनी उस पुरानी भूख को वापस जगाइए। याद कीजिए वो दिन जब आपकी पहली नौकरी लगी थी और आप हर फाइल को ऐसे पढ़ते थे जैसे उसमें कोई खजाना छुपा हो। आज आप उसी फाइल को बिना देखे साइन कर देते हैं क्योंकि आपको लगता है कि आप तो अंतर्यामी हैं। यही वो जगह है जहाँ आप मात खा रहे हैं।

इस खेल में बने रहने के लिए आपको खुद को बार बार रीसेट करना पड़ेगा। जैसे फोन का सॉफ्टवेयर अपडेट होता है वैसे ही अपनी स्किल्स को अपडेट करते रहिए। यह मत सोचिए कि आप बहुत बड़े तोप बन गए हैं। हमेशा याद रखिए कि दुनिया में आपसे ज्यादा भूखे और आपसे ज्यादा मेहनत करने वाले लोग हर रोज़ पैदा हो रहे हैं। अगर आप अपनी कुर्सी बचाना चाहते हैं तो आपको भी उसी भूख के साथ मैदान में उतरना होगा जो एक फ्रेशर के पास होती है। क्योंकि अंत में जीत उसकी नहीं होती जिसके पास सबसे ज्यादा ज्ञान है बल्कि उसकी होती है जो सबसे तेज सीखने के लिए तैयार है।


लेसन ३ : नेटवर्किंग लाइक ए प्रो - ईगो छोड़ो और हेल्प मांगो

क्या आपने कभी उन लोगों को देखा है जो रास्ता भटकने के बाद भी किसी से पता नहीं पूछते। वे अपनी बीवी के तानों और गाड़ी के पेट्रोल की बर्बादी सह लेंगे लेकिन अपनी ईगो की वजह से खिड़की नीचे करके किसी से रास्ता नहीं पूछेंगे। ऑफिस में भी हम यही करते हैं। हम सोचते हैं कि अगर हमने मदद मांग ली तो हमारी इज्जत का कचरा हो जाएगा। लेकिन लिज़ वाइसमैन कहती हैं कि असली खिलाड़ी वही है जो जानता है कि कब हाथ बढ़ाना है। इसे वो नेटवर्किंग का रूकी स्टाइल कहती हैं।

एक्सपर्ट्स अक्सर अपने ही बनाए हुए टापू पर रहते हैं। उन्हें लगता है कि वे इतने बड़े हो चुके हैं कि अब उन्हें किसी की जरूरत नहीं है। लेकिन एक रूकी को पता है कि वो अकेला कुछ नहीं कर सकता। वो बिना किसी शर्म के उस बंदे के पास भी चला जाता है जो उससे जूनियर हो या किसी और डिपार्टमेंट में हो। वो सीधे पूछता है कि भाई यह कैसे होता है। और मजे की बात यह है कि दुनिया हमेशा उन लोगों की मदद करने के लिए तैयार रहती है जो ईमानदारी से सीखना चाहते हैं। जब आप मदद मांगते हैं तो आप सामने वाले को सम्मान दे रहे होते हैं और लोग सम्मान के बदले अपनी जान तक हाजिर कर देते हैं।

सोचिए एक तरफ आप हैं जो गूगल पर तीन घंटे से एक छोटी सी प्रॉब्लम का हल ढूंढ रहे हैं क्योंकि आप किसी से पूछने में शर्मिंदा महसूस कर रहे हैं। दूसरी तरफ वो नया इंटर्न है जो सीधे मैनेजर के केबिन में जाकर पूछता है कि सर इसमें अटक गया हूँ क्या आप हिंट दे सकते हैं। मैनेजर उसे पांच मिनट में वो ट्रिक बता देता है जो गूगल पर भी नहीं थी। अब बताइए किसने समय बचाया। किसने बेहतर नेटवर्क बनाया। आपका वो तीन घंटा आपकी ईगो की भेंट चढ़ गया और उस लड़के ने पांच मिनट में मैनेजर के साथ एक नया रिश्ता कायम कर लिया।

आजकल की प्रोफेशनल दुनिया में अकेले चलना मतलब धीरे चलना है। अगर आपको रॉकेट की रफ़्तार चाहिए तो आपको दूसरों के दिमाग और उनके एक्सपीरियंस का इस्तेमाल करना सीखना होगा। एक्सपर्ट्स अपनी जानकारी को तिजोरी में बंद करके रखते हैं जबकि रूकी जानकारी का आदान प्रदान करते हैं। वे जानते हैं कि ज्ञान बांटने से कम नहीं होता बल्कि कनेक्शंस बढ़ते हैं। और आज के दौर में आपकी नेटवर्थ आपकी नेटवर्क पर ही टिकी है।

हम नेटवर्किंग के नाम पर सिर्फ लिंक्डइन पर रिक्वेस्ट भेजते हैं और बर्थडे विश करते हैं। लेकिन असली नेटवर्किंग तब होती है जब आप किसी मुश्किल प्रोजेक्ट के बीच में किसी को फोन करके कहते हैं कि यार मुझे तुम्हारी सलाह चाहिए। यह एक सेंटेंस सामने वाले को आपका मुरीद बना देता है। लोगों को एक्सपर्ट कहलाने से ज्यादा मददगार कहलाना पसंद है। तो क्यों न उन्हें यह मौका दिया जाए।

इस लेसन का सार यह है कि अपने चारों तरफ एक ऐसी टीम बनाइए जो आपको सिखा सके। चाहे वो आपसे उम्र में छोटे हों या ओहदे में। अगर कोई आपसे बेहतर जानता है तो वो आपका गुरु है। ईगो को साइड में रखिए और पूछना शुरू कीजिए। जब आप दूसरों के अनुभवों की सीढ़ी इस्तेमाल करते हैं तो आप बहुत कम समय में बहुत ऊपर पहुँच जाते हैं। तो आज से ही अपनी उस अकड़ को छोड़िए और एक रूकी की तरह हाथ मिलाना और मदद मांगना शुरू कीजिए।


तो दोस्तों, क्या आप भी अपने एक्सपीरियंस के बोझ तले दब रहे हैं। याद रखिए कि करियर का यह नया खेल पुराने खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि तेज़ सीखने वालों के लिए है। आज ही अपने अंदर के उस रूकी को जगाइए जो सवाल पूछने से नहीं डरता जिसके अंदर सीखने की भूख है और जो दूसरों के साथ मिलकर चलना जानता है। अगर आप वही करते रहेंगे जो हमेशा से करते आए हैं तो आपको उतना ही मिलेगा जो हमेशा से मिलता आया है। बदलाव की शुरुआत आज से कीजिए।

कमेंट्स में बताइए कि क्या आप भी ऑफिस में सवाल पूछने से डरते हैं। अपनी वो एक कहानी शेयर कीजिए जब आपने किसी से मदद मांगी और आपका काम आसान हो गया। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ जरूर शेयर करें जिसे लगता है कि उसे सब पता है। चलिए साथ मिलकर सीखते हैं और साथ बढ़ते हैं।

-----

आपकी छोटी सी Help हमें और ऐसे Game-Changing Summaries लाने में मदद करेगी। DY Books को Donate करके हमें Support करें🙏 - Donate Now




#CareerGrowth #RookieSmarts #SuccessTips #Learning #DIYBooks


_

Post a Comment

Previous Post Next Post