The Sales Acceleration Formula (Hindi)


क्या आप भी अपनी सेल्स टीम को किस्मत के भरोसे छोड़कर अपनी कंपनी डुबाना चाहते हैं। अगर हाँ तो मुबारक हो आप बिल्कुल सही रास्ते पर हैं। बिना किसी सिस्टम के सेल्स बढ़ाने की कोशिश करना वैसा ही है जैसे बिना पेट्रोल के गाड़ी को धक्का मारना। आपकी इन्ही गलतियों की वजह से आपके कॉम्पिटिटर आपसे आगे निकल रहे हैं और आप बस हाथ मलते रह जाएंगे।

लेकिन रुकिए। अब रोना बंद कीजिये क्योंकि आज हम मार्क रोबर्ज की बुक द सेल्स एक्सीलरेशन फार्मूला से वो सीक्रेट्स सीखेंगे जिन्होंने जीरो से हंड्रेड मिलियन डॉलर का सफर तय किया। चलिए इन शानदार 3 लेसन को गहराई से समझते हैं।


लेसन १ : द सेल्स हायरिंग फार्मूला

ज्यादातर स्टार्टअप और बिज़नेस मालिक सेल्स टीम बनाने के नाम पर एक ही गलती करते हैं। वो सोचते हैं कि बस एक बढ़िया बात करने वाला बंदा मिल जाए जो गंजे को कंघी बेच सके और बस काम हो गया। अगर आप भी इसी पुराने ख्याल के साथ जी रहे हैं तो यकीन मानिए आप अपनी सेल्स टीम नहीं बल्कि एक कॉमेडी क्लब बना रहे हैं। सेल्स कोई जादू नहीं है जो कोई भी रैंडम इंसान आकर कर देगा। मार्क रोबर्ज कहते हैं कि सेल्स टीम का सक्सेस होना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि आपका सेल्समैन कितना मीठा बोलता है बल्कि इस पर करता है कि आपने उसे चुनने के लिए क्या फार्मूला अपनाया है।

लोग अक्सर सुपर स्टार सेल्समैन को ढूंढने के चक्कर में अपनी कंपनी का कीमती वक्त बर्बाद करते हैं। वो सोचते हैं कि किसी दूसरी बड़ी कंपनी का टॉप परफॉर्मर उनकी छोटी सी कंपनी में आकर भी वही कमाल दिखाएगा। यह वैसा ही है जैसे आप किसी वर्ल्ड क्लास स्विमर को पकड़कर लाएं और उससे उम्मीद करें कि वो रेगिस्तान में भी उतनी ही तेजी से तैरेगा। माहौल बदलता है तो स्किल्स की वैल्यू भी बदल जाती है। इसलिए आपको सुपर स्टार ढूंढने की बजाय एक ऐसा फार्मूला बनाना होगा जो आपकी कंपनी के लिए परफेक्ट फिट हो।

मार्क ने हबस्पॉट में जब अपनी टीम बनानी शुरू की तो उन्होंने डाटा का सहारा लिया। उन्होंने कुछ खास खूबियों की एक लिस्ट बनाई जैसे कोचबिलिटी यानी सीखने की क्षमता और क्यूरियोसिटी यानी जिज्ञासा। उन्होंने देखा कि जो लोग दूसरों की बात सुनने और सीखने के लिए तैयार रहते हैं वो उन लोगों से कहीं ज्यादा बेहतर परफॉर्म करते हैं जो खुद को सेल्स का भगवान समझते हैं। अगर आप किसी को हायर कर रहे हैं और वो इंटरव्यू में अपनी पिछली कंपनी के झंडे गाड़ने की कहानियां सुना रहा है लेकिन आपकी बात समझने को तैयार नहीं है तो समझ जाइये कि वो आपके पैसे डुबाने आया है।

असली मजा तब आता है जब आप अपनी हायरिंग को एक साइंटिफिक एक्सपेरिमेंट बना देते हैं। मार्क ने हर कैंडिडेट को अलग अलग पैमानों पर स्कोर दिया। उन्होंने देखा कि क्या वो इंसान हार मानने वाला है या फिर हर ना के पीछे एक हाँ ढूंढने का जुनून रखता है। अक्सर हमें लगता है कि जो बहुत ज्यादा बोलता है वो अच्छा सेल्समैन है। पर असलियत में जो सही सवाल पूछता है वही असली खिलाड़ी होता है। अगर आपका सेल्समैन क्लाइंट की प्रॉब्लम समझे बिना ही अपना प्रोडक्ट बेचना शुरू कर देता है तो वो सेल्समैन नहीं बल्कि एक चलता फिरता लाउडस्पीकर है जिसकी आवाज कोई नहीं सुनना चाहता।

एक बार जब आप अपने खुद के क्राइटेरिया सेट कर लेते हैं तो फिर हायरिंग का प्रोसेस आसान हो जाता है। आपको बस उन लोगों को ढूंढना है जो आपके फार्मूले में फिट बैठते हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे अपनी क्रिकेट टीम के लिए खिलाडी चुनना। अगर आपको एक टेस्ट मैच जीतना है तो आप टी ट्वेंटी के अंधाधुंध हिटर्स को लेकर मैदान में नहीं उतर सकते। आपको धैर्य और तकनीक वाले लोग चाहिए होंगे। ठीक इसी तरह सेल्स में भी आपको वो लोग चाहिए जो प्रोसेस को समझें और डाटा के साथ चलें।

याद रखिये कि एक गलत हायरिंग आपकी कंपनी को लाखों का चूना लगा सकती है। उस इंसान की सैलरी तो जाएगी ही साथ ही वो उन पोटेंशियल कस्टमर्स को भी खराब कर देगा जो शायद आपसे जुड़ सकते थे। इसलिए अगली बार जब आप किसी को सेल्स के लिए हायर करें तो उसकी बातों के जाल में न फंसें। अपना खुद का एक स्कोरकार्ड बनाएं और देखें कि क्या वो वाकई आपकी कंपनी की ग्रोथ के लिए तैयार है या फिर बस अपनी जेब भरने आया है। जब आपकी हायरिंग प्रोसेस डाटा पर आधारित होगी तभी आपकी सेल्स टीम एक अपराजेय मशीन बन पाएगी।


लेसन २ : द सेल्स ट्रेनिंग फार्मूला

ज्यादातर कंपनियों में सेल्स ट्रेनिंग का मतलब होता है एक कमरे में सबको बंद कर देना और घंटों तक पीपीटी स्लाइड्स दिखाना। मैनेजर साहब स्टेज पर खड़े होकर चिल्लाते हैं कि हमारा प्रोडक्ट दुनिया में सबसे बेस्ट है और बस आपको यही जाकर क्लाइंट को बताना है। यह ट्रेनिंग नहीं है दोस्त यह तो दिमाग का दही करना है। अगर आप सोचते हैं कि एक हफ्ते की ऐसी रटंत विद्या से आपका सेल्समैन करोड़ों की डील क्लोज कर देगा तो आप शायद किसी काल्पनिक दुनिया में जी रहे हैं। मार्क रोबर्ज कहते हैं कि ट्रेनिंग कोई एक बार होने वाला इवेंट नहीं है बल्कि यह एक लगातार चलने वाला प्रोसेस है जो हर इंसान के लिए अलग होना चाहिए।

अक्सर कंपनियां गलती यह करती हैं कि वो अपने सबसे पुराने और सफल सेल्समैन को ट्रेनिंग की जिम्मेदारी दे देती हैं। अब वो पुराना खिलाड़ी आकर अपनी पुरानी कहानियां सुनाता है कि कैसे उसने उन्नीस सौ अस्सी में एक मुश्किल क्लाइंट को पटाया था। भाई साहब जमाना बदल चुका है। अब लोग आपकी कहानियां सुनने के लिए खाली नहीं बैठे हैं। आज के दौर में ट्रेनिंग का मतलब है कस्टमर की जर्नी को समझना। अगर आपका सेल्समैन यह नहीं जानता कि क्लाइंट गूगल पर क्या सर्च कर रहा है या वो किस प्रॉब्लम से परेशान है तो वो उसे कभी कुछ नहीं बेच पाएगा।

मार्क ने एक बहुत ही अनोखा तरीका अपनाया जिसे वो प्रेडिक्टेबल ट्रेनिंग कहते हैं। उन्होंने इसे कुछ हिस्सों में बांटा जैसे प्रोडक्ट का ज्ञान, कस्टमर की परेशानी और सेल्स का तरीका। उन्होंने देखा कि हर सेल्समैन की अपनी एक ताकत होती है। कोई फोन पर बात करने में उस्ताद होता है तो कोई मीटिंग में बैठकर डील पक्की करने में। अब अगर आप फोन वाले को जबरदस्ती मीटिंग में भेजेंगे और मीटिंग वाले को दिन भर कॉल करने को कहेंगे तो नतीजा सिर्फ जीरो ही निकलेगा। यह वैसा ही है जैसे आप विराट कोहली को कहें कि भाई आज तुम कीपिंग करो और धोनी को कहें कि तुम ओपनिंग बॉलिंग डालो। टैलेंट तो है पर गलत जगह इस्तेमाल हो रहा है।

असली ट्रेनिंग तब शुरू होती है जब आप अपने सेल्समैन को एक राहगीर की तरह नहीं बल्कि एक डॉक्टर की तरह सोचना सिखाते हैं। एक अच्छा डॉक्टर कभी भी मरीज के अंदर आते ही दवाई नहीं लिख देता। वो पहले सवाल पूछता है, टेस्ट करता है और फिर इलाज बताता है। ठीक वैसे ही ट्रेनिंग ऐसी होनी चाहिए जहाँ सेल्समैन क्लाइंट के पेन पॉइंट्स को पकड़ने में माहिर हो जाए। अगर आपका बंदा क्लाइंट से मिलते ही झोला खोलकर अपना सामान दिखाने लगता है तो समझ लीजिये कि आपकी ट्रेनिंग फेल हो गई है। उसे यह सिखाना जरूरी है कि कब चुप रहना है और कब सही सवाल दागना है।

हबस्पॉट में मार्क ने एक और कमाल की चीज की जिसे हम रोल प्ले कह सकते हैं। लेकिन यह वो बोरिंग वाले रोल प्ले नहीं थे जहाँ सब एक दूसरे की तारीफ करते हैं। यहाँ असल में मुश्किल क्लाइंट्स के किरदार निभाए जाते थे जो हर बात पर ना कहते थे। इससे सेल्समैन का डर खत्म हुआ और उसे रिजेक्शन झेलने की आदत पड़ गई। जब तक आपका सेल्समैन दस बार ना सुनने के बाद भी ग्यारहवीं बार मुस्कुराकर बात करने के लिए तैयार नहीं है तब तक वो मैदान के लिए कच्चा है।

अंत में याद रखिये कि ट्रेनिंग का मतलब सिर्फ जानकारी देना नहीं है बल्कि बिहेवियर को बदलना है। अगर ट्रेनिंग के बाद भी आपका सेल्समैन वही पुराने घिसे पिटे तरीके अपना रहा है तो आपकी मेहनत बेकार है। ट्रेनिंग ऐसी होनी चाहिए जो डाटा और फीडबैक पर टिकी हो। हर हफ्ते उनके कॉल्स को एनालाइज कीजिये और उन्हें बताइए कि कहाँ सुधार की जरूरत है। जब आप अपनी टीम को सही तरीके से तराशेंगे तभी वो हीरे की तरह चमकेंगे और आपके बिज़नेस को ऊंचाइयों पर ले जाएंगे। लेसन 01 में हमने सही लोग चुने और लेसन 02 में उन्हें तैयार किया। अब अगले पड़ाव पर हम देखेंगे कि इस पूरी मशीन को मैनेज कैसे करना है।


लेसन ३ : द सेल्स मैनेजमेंट फार्मूला

ज्यादातर सेल्स मैनेजर्स का हाल उस ताऊ जैसा होता है जो शादी में सबको बस काम बताते रहते हैं लेकिन खुद किसी को गाइड नहीं कर पाते। वो महीने के आखिर में आते हैं और सेल्स टीम पर चिल्लाते हैं कि टारगेट पूरा क्यों नहीं हुआ। भाई साहब, अगर आप सिर्फ आखिरी दिन रिजल्ट मांगेंगे तो आपको सिर्फ बहाने मिलेंगे, सेल्स नहीं। मार्क रोबर्ज कहते हैं कि एक असली सेल्स मैनेजर वो नहीं है जो डंडा लेकर पीछे पड़ा रहे, बल्कि वो है जो डाटा का चश्मा पहनकर अपनी टीम की कमजोरियों को दूर करे। सेल्स मैनेजमेंट कोई पुलिस की नौकरी नहीं है बल्कि यह एक साइंटिफिक कोचिंग है।

अक्सर मैनेजर्स यह सोचते हैं कि अगर कोई सेल्समैन टारगेट पूरा कर रहा है तो सब ठीक है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि वो टारगेट कैसे पूरा कर रहा है। क्या वो बस अपनी पुरानी जान पहचान का इस्तेमाल कर रहा है या फिर वाकई नए कस्टमर्स ला रहा है। मार्क ने हबस्पॉट में यह सिखाया कि आपको रिजल्ट के बजाय प्रोसेस को मैनेज करना चाहिए। अगर प्रोसेस सही है तो रिजल्ट अपने आप आएगा। यह वैसा ही है जैसे आप वजन कम करना चाहते हैं। अगर आप रोज सिर्फ वजन नापेंगे तो कुछ नहीं होगा, लेकिन अगर आप अपनी डाइट और एक्सरसाइज के घंटों को मैनेज करेंगे तो वजन अपने आप कम हो जाएगा।

असली जादू तब शुरू होता है जब आप टेक्नोलॉजी और डैशबोर्ड का इस्तेमाल करते हैं। आपको यह पता होना चाहिए कि आपकी टीम का हर बंदा सेल्स फनल के किस हिस्से में अटक रहा है। मान लीजिये आपके पास दो सेल्समैन हैं। एक बंदा सौ लोगों को कॉल करता है और अस्सी लोगों से बात कर लेता है, लेकिन मीटिंग सिर्फ एक फिक्स कर पाता है। वहीं दूसरा बंदा सिर्फ दस लोगों को कॉल करता है और पांच मीटिंग फिक्स कर लेता है। अब पहले वाले को और ज्यादा कॉल करने की ट्रेनिंग देना बेवकूफी होगी। उसे यह सिखाने की जरूरत है कि फोन पर बात कैसे शुरू करें। इसे कहते हैं प्रिसिजन कोचिंग। यानी जहाँ जख्म है वहीं मरहम लगाना।

मार्क रोबर्ज एक और बहुत ही काम की बात बताते हैं जिसे वो सेल्स और मार्केटिंग का तालमेल कहते हैं। अक्सर सेल्स वाले मार्केटिंग वालों को गाली देते हैं कि तुम कचरा लीड्स भेज रहे हो, और मार्केटिंग वाले कहते हैं कि सेल्स वाले कामचोर हैं जो हमारी भेजी हुई लीड्स पर मेहनत नहीं करते। यह झगड़ा हर कंपनी की कहानी है। मार्क ने इस झगड़े को खत्म करने के लिए एक एग्रीमेंट बनाया जिसे एसएलए (SLA) कहते हैं। मार्केटिंग को यह पता होना चाहिए कि उन्हें किस क्वालिटी की लीड देनी है और सेल्स को यह पता होना चाहिए कि उन्हें उस पर कितनी देर में रिस्पॉन्स करना है। जब दोनों टीमें मिलकर एक ही लक्ष्य के लिए काम करती हैं, तभी कंपनी रॉकेट की तरह उड़ती है।

मैनेजमेंट का एक और बड़ा हिस्सा है इंसेंटिव यानी कमीशन का लालच। लोग अक्सर ऐसा कमीशन स्ट्रक्चर बनाते हैं जो बहुत उलझा हुआ होता है। मार्क कहते हैं कि अपना कमीशन प्लान इतना सिंपल रखो कि एक पांच साल का बच्चा भी उसे समझ सके। अगर आप चाहते हैं कि टीम नए कस्टमर लाए तो उन्हें उसके लिए ज्यादा पैसे दीजिये। अगर आप चाहते हैं कि वो पुराने कस्टमर को रोके रखें तो उसके लिए अलग बोनस रखिये। जो चीज आप रिवॉर्ड करेंगे वही चीज टीम आपको करके देगी।

अंत में, एक अच्छा मैनेजर वही है जो अपनी टीम के लिए ढाल बनकर खड़ा रहे। सेल्स का काम बहुत स्ट्रेस वाला होता है। रोज ना सुनना और रिजेक्शन झेलना आसान नहीं है। ऐसे में अगर मैनेजर भी सर पर आकर नाचने लगे तो बंदा नौकरी छोड़ देगा। आपको एक ऐसा कल्चर बनाना होगा जहाँ डाटा तो सख्त हो लेकिन बर्ताव नरम हो। जब आप अपनी टीम को सही टूल्स, सही डाटा और सही मोटिवेशन देंगे, तो हंड्रेड मिलियन डॉलर का आंकड़ा भी छोटा लगने लगेगा। सेल्स कोई किस्मत का खेल नहीं बल्कि एक कैलकुलेटेड फार्मूला है।


सेल्स कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे आप बस रट कर सीख सकें। यह एक सिस्टम है जिसे आपको रोज बनाना पड़ता है। क्या आप आज भी पुराने तरीकों से सेल्स कर रहे हैं या फिर मार्क रोबर्ज के इस फार्मूले को अपनाने के लिए तैयार हैं। अपनी टीम के साथ इस आर्टिकल को शेयर कीजिये और आज ही अपना खुद का सेल्स स्कोरकार्ड बनाइये। याद रखिये, जो मेजर (Measure) नहीं होता वो कभी इम्प्रूव नहीं होता। चलिए, अब सेल्स की दुनिया में आग लगाते हैं।

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