Scrum (Hindi)


अगर आप अब भी सुबह से रात तक गधों की तरह मेहनत करके खुद को बिजी समझ रहे हैं तो मुबारक हो आप अपनी जिंदगी के सबसे कीमती साल बर्बाद कर रहे हैं। बिना स्क्रम के आपका करियर उस टायर जैसा है जिसमें हवा तो बहुत है पर गाड़ी एक इंच भी आगे नहीं बढ़ रही।

आज के इस आर्टिकल में हम जेफ सदरलैंड की किताब से वो राज खोलेंगे जो आपकी सुस्त जिंदगी को रॉकेट बना देंगे। तैयार हो जाइए उन ३ लेसन्स के लिए जो आपके काम करने के नजरिए को पूरी तरह बदल कर रख देंगे।


लेसन १ : मल्टीटास्किंग छोड़ो और फोकस का चश्मा पहनो

क्या आपको भी लगता है कि एक हाथ में फोन पकड़कर क्लाइंट से बात करना और दूसरे हाथ से एक्सेल शीट भरना आपको कोई सुपरहीरो बना रहा है। अगर हाँ तो आप खुद को दुनिया का सबसे बड़ा चूना लगा रहे हैं। जेफ सदरलैंड अपनी किताब स्क्रम में साफ कहते हैं कि मल्टीटास्किंग जैसा कोई शब्द असल में होता ही नहीं है। यह बस एक दिमागी वहम है जिसमें आप अपने कीमती दिमाग को एक काम से दूसरे काम पर स्विच करने के लिए मजबूर करते हैं। हर बार जब आप काम बदलते हैं तो आपका फोकस टूटता है और इसे दोबारा सेट करने में जो समय लगता है उसे टेक्निकल भाषा में कॉन्टेक्स्ट स्विचिंग लॉस कहते हैं।

मान लीजिए आप अपनी गर्लफ्रेंड से चैट कर रहे हैं और साथ में ऑफिस की फाइल भी देख रहे हैं। अब न तो आप प्यार भरी बातें ढंग से लिख पाएंगे और न ही ऑफिस के आंकड़े सही बैठेंगे। नतीजा यह होगा कि उधर से ब्रेकअप का मैसेज आएगा और इधर बॉस से पिंक स्लिप मिलेगी। हमारे देश में लोग दस काम एक साथ करने को बड़ी शान समझते हैं पर सच तो यह है कि जब आप अपना ध्यान बांटते हैं तो आपके काम की क्वालिटी नाले के पानी जैसी हो जाती है। स्क्रम का पहला नियम कहता है कि एक समय पर सिर्फ एक काम पकड़ो और उसे खत्म करके ही दम लो।

जब आप फोकस होकर काम करते हैं तो आपका दिमाग एक लेजर लाइट की तरह काम करता है जो मुश्किल से मुश्किल बाधा को भी काट देता है। लेकिन हमारे महान कॉर्पोरेट मजनू क्या करते हैं। वो एक टैब में ईमेल खोलते हैं और दूसरे में यूट्यूब पर रील्स देखते हैं। उन्हें लगता है कि वो बहुत स्मार्ट हैं पर असल में वो अपनी प्रोडक्टिविटी का गला घोंट रहे होते हैं। स्क्रम हमें सिखाता है कि अगर आपको आधे समय में दोगुना काम करना है तो आपको उन चीजों को लात मारनी होगी जो आपका ध्यान भटकाती हैं।

सोचिए अगर एक क्रिकेट का बैट्समैन बॉल खेलते समय यह सोचे कि रात को खाने में क्या बनेगा तो क्या होगा। जाहिर है कि अगली ही गेंद पर उसका स्टंप उड़ जाएगा। हमारी लाइफ और करियर में भी यही हो रहा है। हम हर तरफ हाथ पैर मार रहे हैं पर पहुँच कहीं नहीं रहे। स्क्रम आपको एक ऐसी लिस्ट बनाने को कहता है जिसे बैकलाग कहते हैं। इसमें अपने सारे फालतू के शौक और जरूरी कामों को डालिए और फिर सबसे जरूरी काम को उठाकर उस पर टूट पड़िए।

असली मजे की बात तो यह है कि जब आप एक काम को पूरा करते हैं तो आपका दिमाग डोपामिन रिलीज करता है जो आपको अगला काम करने की ताकत देता है। लेकिन जब आप आधे अधूरे दस काम छोड़ देते हैं तो वो आपके सिर पर बोझ बन जाते हैं और आप स्ट्रेस के मारे गोल गोल घूमने लगते हैं। तो भाई अब यह मल्टीटास्किंग का ढोंग बंद करो और असली काम पर ध्यान दो वरना आपकी लाइफ की गाड़ी बिना पहियों के ही खड़ी रह जाएगी।


लेसन २ : गलती करो पर जल्दी करो और उसे फौरन सुधारो

क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो किसी काम को तब तक शुरू नहीं करते जब तक कि ग्रह नक्षत्र बिल्कुल सही न हो जाएं। आप सोचते हैं कि जब सब कुछ परफेक्ट होगा तभी मैदान में उतरेंगे। जेफ सदरलैंड कहते हैं कि यह परफेक्शन का भूत असल में आलस का दूसरा नाम है। स्क्रम का सबसे बड़ा मंत्र है कि काम को छोटे टुकड़ों में बांटो और उसे मार्केट में उतार दो। अगर उसमें कोई कमी होगी तो आपको फौरन पता चल जाएगा और आप उसे ठीक कर पाएंगे। इसे स्क्रम की भाषा में इंस्पेक्ट और अडैप्ट कहते हैं।

मान लीजिए आपको अपनी शादी के लिए एक शेरवानी सिलवानी है। अब आप सीधे शादी वाले दिन टेलर के पास जाते हैं और पता चलता है कि शेरवानी इतनी टाइट है कि आप सांस भी नहीं ले पा रहे। अब क्या होगा। या तो आप मेहमानों के सामने फटे हुए कपड़ों में घूमेंगे या फिर शादी ही कैंसिल करेंगे। लेकिन अगर आप हर हफ्ते जाकर फिटिंग चेक करते तो क्या यह नौबत आती। बिल्कुल नहीं। स्क्रम यही सिखाता है कि फीडबैक के लिए अंत तक इंतजार मत करो। हमारे यहाँ लोग महीनों तक प्लानिंग करते हैं और जब वो प्लान फेल होता है तो मुँह लटकाकर बैठ जाते हैं।

आपकी लाइफ में भी यही होता है। आप सोचते हैं कि जब बहुत सारा पैसा होगा तब बिजनेस शुरू करेंगे या जब पूरी बॉडी बन जाएगी तब जिम की फोटो डालेंगे। भाई साहब परफेक्शन के चक्कर में दुनिया आगे निकल जाएगी और आप सिर्फ प्लानिंग की फाइलें दबाते रह जाएंगे। स्क्रम हमें स्प्रिंट्स में काम करना सिखाता है। एक हफ्ते या दो हफ्ते का छोटा सा गोल बनाओ और उसे पूरा करो। अगर फेल हुए तो कम से कम यह तो पता चलेगा कि यह रास्ता गलत है।

असली विनर वो नहीं होता जो कभी गिरता नहीं बल्कि वो होता है जो गिरते ही धूल झाड़कर खड़ा हो जाता है और अगली बार उसी पत्थर से बचकर निकलता है। अगर आप गलती करने से डरेंगे तो आप कभी कुछ नया नहीं सीख पाएंगे। स्क्रम आपको आजादी देता है कि आप फेल हों पर उस फेलियर को अपनी ढाल बना लें। जो लोग कहते हैं कि वो कभी गलती नहीं करते यकीन मानिए वो कुछ कर ही नहीं रहे होते हैं।

तो अगली बार जब आपको लगे कि कोई काम मुश्किल है तो उसे टालने के बजाय उसका एक छोटा हिस्सा आज ही खत्म करिए। फीडबैक लीजिए और देखिए कि लोग क्या कह रहे हैं। अगर आप अपनी गलतियों को जल्दी पकड़ना सीख गए तो आप उन लोगों से कोसों आगे निकल जाएंगे जो सिर्फ सही समय का इंतजार कर रहे हैं। याद रखिए सफलता का रास्ता सीधा नहीं होता बल्कि वो छोटी छोटी गलतियों और सुधारों से मिलकर बनता है।


लेसन ३ : फालतू के कचरे को बाहर निकालो और असली काम पर ध्यान दो

क्या आपको भी लगता है कि ऑफिस में तीन घंटे की लंबी मीटिंग में बैठकर समोसे खाना ही असली काम है। अगर आपका जवाब हाँ है तो यकीन मानिए आप उस ६० परसेंट वेस्ट का हिस्सा हैं जिसके बारे में जेफ सदरलैंड अपनी किताब में बार बार चेतावनी देते हैं। स्क्रम का तीसरा सबसे बड़ा लेसन यह है कि हम अपने दिन का आधे से ज्यादा समय उन कामों में लगा देते हैं जिनका हमारे असली गोल से कोई लेना देना नहीं होता। इसे कहते हैं फालतू का बोझ ढोना। जैसे पुराने जमाने के बैल गाड़ी खींचते थे वैसे ही आज का युवा बेकार की ईमेल और अंतहीन चर्चाओं का बोझ खींच रहा है।

जरा सोचिए आप एक ऐसी रेस में दौड़ रहे हैं जहाँ आपने पीठ पर १० किलो का पत्थर बांध रखा है। अब आप चाहे जितने भी तेज धावक हों आप कभी जीत नहीं पाएंगे। स्क्रम आपको कहता है कि उस पत्थर को उतार कर फेंक दो। हमारे काम करने के तरीके में बहुत सी ऐसी चीजें होती हैं जो सिर्फ दिखावे के लिए होती हैं। लोग बिजी दिखने के चक्कर में खुद को इतना थका देते हैं कि जब असली काम की बारी आती है तो उनका इंजन ही बैठ जाता है। स्क्रम हमें सिखाता है कि सिर्फ उन्हीं चीजों पर मेहनत करो जो सच में वैल्यू जोड़ती हैं।

मान लीजिए आपको एक घर बनाना है। अब आप पहले दिन से ही इस बात पर लड़ रहे हैं कि ड्राइंग रूम के पर्दों का रंग क्या होगा जबकि अभी तक जमीन की खुदाई भी शुरू नहीं हुई है। यह सुनने में बेवकूफी लगती है पर असल जिंदगी में हम यही करते हैं। हम छोटी और गैर जरूरी चीजों में उलझकर बड़े प्रोजेक्ट्स का कबाड़ा कर देते हैं। स्क्रम में एक तरीका होता है जिसे कहते हैं डेली स्टैंड अप। इसमें टीम के लोग सिर्फ १५ मिनट के लिए मिलते हैं और तीन सवालों के जवाब देते हैं। कल क्या किया। आज क्या करेंगे। और रास्ते में क्या रुकावट है। बस। कोई फालतू की बकवास नहीं और कोई लंबी चौड़ी कहानी नहीं।

अगर आप अपनी लाइफ में भी यही तरीका अपनाएं तो आप हैरान रह जाएंगे कि आपके पास कितना खाली समय बचता है। हम अक्सर उन लोगों को बहुत मेहनती समझते हैं जो रात के १२ बजे तक ऑफिस में बैठे रहते हैं। लेकिन सच तो यह है कि वो मेहनती नहीं बल्कि स्लो हैं। उन्होंने अपने काम को सही तरीके से मैनेज नहीं किया। स्क्रम का मकसद आपको कोल्हू का बैल बनाना नहीं है बल्कि आपको एक स्मार्ट प्लेयर बनाना है जो कम समय में ज्यादा रिजल्ट दे सके ताकि आप बाकी का समय अपनी फैमिली और अपनी पसंद के कामों को दे सकें।

तो भाई, अब वक्त आ गया है कि आप अपनी टू डू लिस्ट को ध्यान से देखें और उन कामों पर कांटा मारें जो सिर्फ आपका समय खा रहे हैं। जब आप अपने सिस्टम से यह कचरा साफ कर देंगे तो आपकी स्पीड अपने आप डबल हो जाएगी। जिंदगी बहुत छोटी है और काम बहुत ज्यादा। इसलिए गधों की तरह सब कुछ करने की कोशिश मत करो बल्कि सिर्फ वो करो जो आपको आपकी मंजिल के करीब ले जाए।


स्क्रम कोई जादू की छड़ी नहीं है बल्कि एक अनुशासन है। यह आपको अपनी गलतियों को देखने और उन्हें सुधारने का साहस देता है। अगर आप आज भी वही पुराने ढर्रे पर चलते रहे तो आने वाले ५ साल में भी आप वहीं खड़े होंगे जहाँ आज हैं। क्या आप सच में अपनी प्रोडक्टिविटी को रॉकेट की तरह उड़ते हुए देखना चाहते हैं। अगर हाँ तो आज ही अपने सबसे जरूरी काम को चुनिए और उस पर अपना पूरा फोकस लगा दीजिए। कमेंट्स में हमें जरूर बताएं कि आपका वो कौन सा एक काम है जिसे आप कल नहीं बल्कि आज ही खत्म करने वाले हैं। इस आर्टिकल को अपने उस दोस्त के साथ शेयर करें जो हमेशा बिजी होने का नाटक करता है पर काम कुछ नहीं करता। चलिए साथ मिलकर काम करने के तरीके को बदलते हैं।

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