अगर आपको लगता है कि सिर्फ एक बढ़िया आइडिया और कॉन्फिडेंस से इन्वेस्टर आपकी झोली में करोड़ों रुपये डाल देगा, तो मुबारक हो, आप बहुत बड़ी गलतफहमी में जी रहे हैं। बिना सैंड हिल रोड के सीक्रेट्स जाने पिचिंग करना मतलब शेर के पिंजरे में बिना हथियार के घुसना है। क्या आप सच में अपनी मेहनत को जीरो होते देखना चाहते हैं।
आज के इस आर्टिकल में हम वेंचर कैपिटल की दुनिया के उन काले सच और सुनहरे मौकों की बात करेंगे जो स्कॉट कूपर ने अपनी किताब में बताए हैं। चलिए देखते हैं वह ३ बड़े लेसन जो आपके स्टार्टअप की किस्मत बदल सकते हैं।
लेसन १ : फंड रेजिंग कोई जीत नहीं बल्कि एक जिम्मेदारी है
ज्यादातर स्टार्टअप फाउंडर्स को लगता है कि जिस दिन बैंक अकाउंट में इन्वेस्टर का पैसा आ गया, समझो लाइफ सेट है। लोग पार्टी करते हैं, शैम्पेन की बोतलें खोलते हैं और ऐसे बिहेव करते हैं जैसे उन्होंने ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीत लिया हो। लेकिन स्कॉट कूपर कहते हैं कि भाई, जरा ठहरो। यह जीत नहीं है, यह तो कर्ज की वह पहली किश्त है जिसे आपको सूद समेत वापस करना है।
सोचिए, आप एक दोस्त से पैसे उधार लेते हैं ताकि आप एक शानदार ढाबा खोल सकें। अब वह दोस्त हर संडे आपके ढाबे पर आकर बैठ जाता है। वह देखता है कि आप पनीर कितना डाल रहे हैं और नमक कितना कम है। वेंचर कैपिटलिस्ट (VC) भी वही दोस्त है, बस उसके पास चश्मा थोड़ा महंगा होता है और वह पनीर की जगह आपके 'बर्न रेट' पर नजर रखता है। जब आप किसी से पैसा लेते हैं, तो आप अपनी कंपनी का एक हिस्सा ही नहीं बेचते, बल्कि आप अपनी रातों की नींद भी उस इन्वेस्टर के नाम कर देते हैं।
मान लीजिए आपका एक दोस्त है 'पिंकू'। पिंकू ने अपना नया जिम खोला और एक बड़े इन्वेस्टर से भारी फंडिंग उठा ली। पिंकू को लगा अब तो वह राजा है। उसने अगले ही दिन ऑफिस में महंगें बीन-बैग्स भर दिए और हर एम्प्लॉई को आईफोन बांट दिया। लेकिन छह महीने बाद जब प्रॉफिट नहीं दिखा, तो वही इन्वेस्टर पिंकू के सिर पर डंडा लेकर खड़ा हो गया। इन्वेस्टर को आपके 'विज़न' से ज्यादा इस बात में इंटरेस्ट है कि उसका १ रुपया १० रुपया कब बनेगा।
सच्चाई यह है कि फंडिंग मिलना एक 'लायबिलिटी' है। यह उस फ्यूल की तरह है जो आपकी गाड़ी को तेज तो भगा सकता है, लेकिन अगर आपने स्टीयरिंग सही से नहीं पकड़ा, तो एक्सीडेंट भी सबसे पहले आपका ही होगा। लोग अक्सर पूछते हैं कि कितना पैसा उठाना सही है। जवाब सीधा है, उतना ही जितना आप पचा सकें। अगर आप जरूरत से ज्यादा पैसा उठा लेते हैं, तो आपकी वैल्युएशन इतनी बढ़ जाती है कि अगली बार फंड्स जुटाना नामुमकिन हो जाता है।
भारतीय मार्केट में हमने देखा है कि कई बड़े स्टार्टअप्स सिर्फ इसलिए डूब गए क्योंकि उन्होंने ग्रोथ के नाम पर पैसा पानी की तरह बहाया। उन्हें लगा कि पैसा है तो सब मुमकिन है। पर सैंड हिल रोड का पहला नियम यही है कि पैसा आपको आलसी बना सकता है। जब जेब भरी होती है, तो दिमाग कम चलता है। और जब दिमाग कम चलता है, तो बिजनेस नहीं, सिर्फ तमाशा होता है।
इसलिए, अगली बार जब आप अपनी पिच डेक तैयार करें, तो खुद से पूछें कि क्या आप वाकई उस दबाव के लिए तैयार हैं। क्या आप हर महीने बोर्ड मीटिंग में अपनी धज्जियां उड़वाने के लिए तैयार हैं। अगर जवाब 'हां' है, तभी उस चेक पर साइन करना। याद रखिए, इन्वेस्टर आपका पार्टनर बाद में है, पहले वह एक ऐसा मालिक है जिसने अपनी वापसी का टिकट पहले से बुक कर रखा है।
लेसन २ : वैल्युएशन के चक्कर में कंट्रोल मत खो देना
दुनिया में दो तरह के स्टार्टअप फाउंडर होते हैं। पहले वो, जिन्हें अपनी कंपनी की 'वैल्युएशन' करोड़ों में सुनकर नींद अच्छी आती है। और दूसरे वो, जो चुपचाप अपनी कंपनी का कंट्रोल अपने हाथ में रखते हैं। स्कॉट कूपर कहते हैं कि अगर आप पहले वाले हैं, तो आप बहुत बड़े खतरे में हैं। अक्सर नए फाउंडर्स को लगता है कि अगर इन्वेस्टर उनकी कंपनी की वैल्यू १०० करोड़ लगा रहा है, तो वे राजा बन गए। लेकिन असली खेल तो उस कागज़ के टुकड़े में छिपा होता है जिसे हम 'टर्म शीट' कहते हैं।
सोचिए, आप अपनी पसंद की एक कार खरीदते हैं। आप सारा पैसा देते हैं, लेकिन कार की चाबी शोरूम वाला अपने पास रख लेता है। वह कहता है कि आप कार चला तो सकते हैं, लेकिन म्यूजिक क्या बजेगा और गाड़ी किस मोड पर मुड़ेगी, यह वह तय करेगा। क्या आप ऐसी कार चलाना चाहेंगे। बिल्कुल नहीं। लेकिन स्टार्टअप की दुनिया में फाउंडर्स खुशी-खुशी ऐसी ही डील साइन कर लेते हैं। वे वैल्युएशन के मोटे आंकड़े देखकर इतने अंधे हो जाते हैं कि वे 'बोर्ड कंट्रोल' और 'लिक्विडेशन प्रेफरेंस' जैसी शर्तों को पढ़ना ही भूल जाते हैं।
मान लीजिए हमारे एक भाई हैं 'चिंटू'। चिंटू ने एक जबरदस्त ऐप बनाया जो समोसे की डिलीवरी १० मिनट में करता है। एक बड़ा इन्वेस्टर आया और बोला, चिंटू भाई, आपकी कंपनी की वैल्यू ५०० करोड़ है, ये लो ५० करोड़ और मौज करो। चिंटू खुशी के मारे नाचने लगा। उसने गौर ही नहीं किया कि टर्म शीट में लिखा था कि इन्वेस्टर के पास 'वीटो पावर' है। मतलब अगर चिंटू को अपनी कंपनी के लिए एक नया लैपटॉप भी खरीदना है, तो उसे पहले उस इन्वेस्टर से पूछना होगा जो खुद ऑफिस में कभी पैर नहीं रखता।
स्कॉट कूपर समझाते हैं कि इन्वेस्टर का काम है अपना रिस्क कम करना। वे ऐसी शर्तें डालेंगे जिससे अगर कंपनी डूबे, तो सबसे पहले उनका पैसा वापस मिले। और अगर कंपनी बहुत बड़ी बन जाए, तो सबसे ज्यादा मलाई भी वही खाएं। इसे कहते हैं 'लिक्विडेशन प्रेफरेंस'। कई बार तो ऐसा होता है कि कंपनी ५०० करोड़ में बिकती है, लेकिन फाउंडर के हाथ में फूटी कौड़ी नहीं आती क्योंकि सारी शर्तें इन्वेस्टर के हक में होती हैं।
भारतीय स्टार्टअप्स में हमने देखा है कि फाउंडर्स को उनकी अपनी ही कंपनी से बाहर निकाल दिया जाता है। क्यों। क्योंकि उनके पास बोर्ड में बहुमत नहीं होता। आपने खून-पसीना एक करके कंपनी बनाई, रातें जागीं, और अंत में एक इन्वेस्टर आता है और कहता है, सॉरी बॉस, अब हमें आपकी जरूरत नहीं है। यह सुनकर कैसा लगेगा। जैसे अपनी ही औलाद आपको घर से निकाल दे।
इसलिए, वैल्युएशन के पीछे भागना बंद करें। यह सिर्फ एक नंबर है जो ईगो को संतुष्ट करता है। असली ताकत उन शर्तों में है जो यह तय करती हैं कि कंपनी का असली मालिक कौन है। अगर आपको कम वैल्युएशन पर ज्यादा कंट्रोल मिल रहा है, तो वह डील कहीं बेहतर है। हमेशा याद रखें, सैंड हिल रोड पर वही टिकता है जो सिर्फ अपनी जेब नहीं, बल्कि अपनी कुर्सी भी बचाना जानता है। चाणक्य ने कहा था कि सामर्थ्य अकेले नहीं आता, उसके साथ समझदारी भी चाहिए। यहाँ समझदारी का मतलब है अपनी टर्म शीट के हर एक फुल स्टॉप को ध्यान से पढ़ना।
लेसन ३ : इन्वेस्टर के साथ रिश्ता शादी जैसा होता है
लोग समझते हैं कि इन्वेस्टर ढूंढना मतलब टिंडर पर स्वाइप करने जैसा है। एक मैच हुआ, पैसे मिले और काम खत्म। लेकिन स्कॉट कूपर कहते हैं कि यह असल में एक शादी की तरह है, जिसमें तलाक लेना लगभग नामुमकिन और बहुत महंगा होता है। आप अपने जीवनसाथी को शायद एक बार के लिए नजरअंदाज कर दें, लेकिन अपने इन्वेस्टर को नहीं कर सकते। वह आपकी हर बैलेंस शीट, हर हायरिंग और हर बड़ी गलती का गवाह होता है।
सोचिए, आप एक लंबे सफर पर जा रहे हैं। गाड़ी आपकी है, रास्ता आपको पता है, लेकिन बगल वाली सीट पर एक ऐसा इंसान बैठा है जो हर पांच मिनट में मैप चेक करता है और आपको बताता है कि गियर कब बदलना है। अगर वह इंसान समझदार है, तो सफर मजेदार होगा। लेकिन अगर वह सिर्फ अपनी मंजिल पर पहुंचने के लिए बेताब है, तो वह आपकी ड्राइविंग खराब कर देगा। वेंचर कैपिटलिस्ट के साथ भी ऐसा ही है। वे सिर्फ पैसा नहीं लाते, वे अपना कल्चर और अपना नजरिया भी साथ लाते हैं।
मान लीजिए हमारे एक दोस्त हैं 'गप्पू'। गप्पू ने एक टेक कंपनी शुरू की। उसे दो इन्वेस्टर्स से ऑफर मिले। एक इन्वेस्टर उसे ज्यादा पैसे दे रहा था लेकिन उसे गप्पू के बिजनेस मॉडल पर भरोसा नहीं था, वह बस जल्दी से पैसे डबल करना चाहता था। दूसरा इन्वेस्टर थोड़ा कम पैसा दे रहा था लेकिन वह उसी इंडस्ट्री का पुराना खिलाड़ी था और गप्पू के विज़न को समझता था। गप्पू लालच में आ गया और पहले वाले के साथ 'शादी' कर ली। नतीजा। हर हफ्ते गप्पू को ऐसे कॉल आने लगे जैसे कोई नाराज बीवी करती है। पैसा कहां गया। ग्रोथ क्यों रुकी। मुझे अभी रिजल्ट चाहिए। गप्पू का सारा ध्यान काम से हटकर इन्वेस्टर को खुश करने में लग गया।
सैंड हिल रोड का एक बड़ा सीक्रेट यह है कि आपको इन्वेस्टर के पैसे से ज्यादा उसके 'नेटवर्क' और 'एक्सपर्टीज' की वैल्यू करनी चाहिए। जब बुरा वक्त आता है (और बिजनेस में वह जरूर आता है), तब सिर्फ बैंक बैलेंस काम नहीं आता। तब वह इन्वेस्टर काम आता है जो आपको सही सलाह दे सके या आपको सही क्लाइंट से मिलवा सके। बुरा इन्वेस्टर आपके डूबते जहाज से सबसे पहले कूद जाएगा, जबकि एक अच्छा पार्टनर पतवार पकड़ने में आपकी मदद करेगा।
भारतीय मार्केट में आज कल 'FOMO' (छूट जाने का डर) बहुत है। फाउंडर्स को लगता है कि अगर इस बड़े नाम वाले VC से पैसा नहीं लिया, तो इज्जत कम हो जाएगी। पर याद रखिए, उस नाम के पीछे के इंसान के साथ आपको अगले ७ से १० साल बिताने हैं। क्या आप उस इंसान के साथ १० साल तक हर महीने डिनर कर सकते हैं। क्या आप उस पर तब भरोसा कर सकते हैं जब आपकी कंपनी का रेवेन्यू जीरो हो जाए। अगर दिल से 'हां' नहीं निकलती, तो वह चेक फाड़ देना ही बेहतर है।
अंत में, याद रखें कि बिजनेस सिर्फ नंबर्स का खेल नहीं है, यह इंसानों और उनके रिश्तों का खेल है। पैसा तो कहीं से भी मिल जाएगा, लेकिन एक ऐसा पार्टनर जो आपके विज़न को समझे और मुश्किल वक्त में आपकी ढाल बने, वह किस्मत वालों को ही मिलता है। इसलिए, अपनी कंपनी का हिस्सा देने से पहले सामने वाले की नीयत और उसकी वैल्यूज को जरूर परखें।
दोस्तों, स्टार्टअप की दुनिया बाहर से जितनी रंगीन दिखती है, अंदर से उतनी ही पेचीदा है। अगर आप भी अपना सपना सच करना चाहते हैं, तो सिर्फ आइडिया पर नहीं, बल्कि डील की समझ पर भी काम करें। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अपना स्टार्टअप शुरू करने की सोच रहे हैं। क्या आप तैयार हैं अपनी कंपनी का असली मालिक बनने के लिए। नीचे कमेंट में बताएं कि आपको इन ३ लेसन्स में से कौन सा सबसे ज्यादा पसंद आया।
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