अगर आपको लगता है कि आपकी जॉब या बिजनेस सेफ है तो बधाई हो आप गहरी नींद में सो रहे हैं। दुनिया बदल रही है और आप पुराने घिसे पिटे आइडियाज से चिपके बैठे हैं। जब कल आपकी इंडस्ट्री बदल जाएगी तब रोने से अच्छा है कि आज अपनी ईगो को थोड़ा साइड में रखें और बदलाव को देखना सीखें वरना इतिहास के पन्नों में दबकर रह जाएंगे।
क्लेटन क्रिस्टेंसन की यह किताब हमें सिखाती है कि कैसे बड़े खिलाड़ियों के पतन से पहले ही आने वाले तूफान को पहचाना जा सकता है। चलिए इन ३ लेसन से समझते हैं कि कैसे आप भविष्य को प्रेडिक्ट कर सकते हैं।
लेसन १ : डिसरप्शन के सिग्नल्स को पहचानना और लो एंड मार्केट की पावर
मार्केट में जब भी कोई बड़ा बदलाव आता है तो वह ढोल नगाड़े बजाकर नहीं आता। वह दबे पाँव आता है और अक्सर उन रास्तों से आता है जिन्हें बड़े दिग्गज बेकार समझते हैं। क्लेटन क्रिस्टेंसन कहते हैं कि अगर आप भविष्य देखना चाहते हैं तो अपनी नजरें उन कस्टमर्स पर टिकाएं जिन्हें बड़ी कम्पनियाँ इग्नोर कर रही हैं। इसे कहते हैं लो एंड डिसरप्शन। अब इसे एक देसी एग्जांपल से समझते हैं। मान लीजिए मोहल्ले की वो बड़ी और आलीशान मिठाई की दुकान जहाँ काजू कतली के भाव आसमान छू रहे हैं। उस दुकान के मालिक को लगता है कि उसका राज कभी खत्म नहीं होगा क्योंकि उसके पास अमीर क्लाइंट्स हैं। लेकिन तभी कोने में एक लड़का अपनी छोटी सी रेहड़ी लगाता है जो शायद उतनी चमक धमक वाली नहीं है पर वह उन लोगों को समोसे और जलेबी खिला रहा है जिनके पास काजू कतली के पैसे नहीं हैं।
बड़े सेठ जी उस लड़के को देखकर हंसते हैं और सोचते हैं कि यह बेचारा गरीब लोगों को कचरा खिला रहा है इससे मेरा क्या मुकाबला। लेकिन धीरे धीरे वह लड़का अपने समोसे की क्वालिटी सुधारता है और वही अमीर कस्टमर्स भी चटकारे लेकर उसके पास आने लगते हैं। जब तक सेठ जी की नींद खुलती है तब तक वह लड़का आधी मार्केट खा चुका होता है। यही तो असली खेल है। बड़ी कम्पनियाँ अपने सबसे मुनाफे वाले कस्टमर्स को खुश रखने के चक्कर में उन नए लोगों को भूल जाती हैं जो मार्केट में एंट्री मार रहे हैं। वे सोचती हैं कि छोटा मार्जिन मतलब छोटा बिजनेस। पर भाई साहब यही वो छोटा मार्जिन है जो बाद में बड़े बड़े किलों को ढहा देता है।
अगर आप भी अपनी लाइफ या बिजनेस में सिर्फ ऊपर की मलाई देख रहे हैं तो संभल जाइए। अक्सर नया आईडिया बहुत ही बेसिक और कमजोर दिखता है। लोग उसका मजाक उड़ाते हैं और कहते हैं कि इसमें वो बात नहीं जो पुराने खिलाड़ी में है। लेकिन याद रखिए कि नोकिया भी कभी एप्पल को देखकर ऐसे ही मुस्कुराया होगा। असली प्रेडिक्शन पावर वहां है जहाँ आप यह देख सकें कि कौन सी चीज आज सस्ती और कामचलाऊ लग रही है पर कल वह सबकी जरूरत बन जाएगी। अगर आप उन लोगों की प्रॉब्लम सॉल्व कर रहे हैं जिन्हें दुनिया ने छोड़ दिया है तो आप सिर्फ एक दुकान नहीं बल्कि एक क्रांति शुरू कर रहे हैं।
दुनिया में कोई भी इंडस्ट्री हमेशा एक जैसी नहीं रहती। जो आज टॉप पर है वह कल गायब हो सकता है अगर उसने अपनी जड़ें नहीं संभाली। हम अक्सर बड़ी चीजों के पीछे भागते हैं और उन छोटे सिग्नल्स को मिस कर देते हैं जो चीख चीख कर कह रहे होते हैं कि भाई रास्ता बदलो वरना गड्डा आने वाला है। तो अगली बार जब आप किसी नए और छोटे कॉम्पिटिटर को देखें तो हंसने के बजाय यह सोचें कि क्या वह मार्केट के उस हिस्से को पकड़ रहा है जिसे आपने कचरा समझकर छोड़ दिया था। क्योंकि वही कचरा कल सोना बनने वाला है और आप बस हाथ मलते रह जाएंगे।
लेसन २ : रिसोर्सेस, प्रोसेसेस और वैल्युज का असली टेस्ट
अक्सर जब कोई नई टेक्नोलॉजी आती है तो हर कंपनी चिल्लाने लगती है कि हम भी यह कर लेंगे। लेकिन क्या सिर्फ पैसा और टैलेंट होने से जीत पक्की हो जाती है। क्लेटन भाई कहते हैं बिलकुल नहीं। किसी भी आर्गेनाइजेशन की असली ताकत और उसकी कमजोरी तीन चीजों में छिपी होती है और वह है रिसोर्सेस, प्रोसेसेस और वैल्युज। इसे जरा आसान भाषा में समझते हैं। मान लीजिए एक बहुत बड़ा नामी पहलवान है जिसके पास दुनिया भर के बादाम, घी और प्रोटीन शेक है यानी उसके पास बेहतरीन रिसोर्सेस हैं। लेकिन उस पहलवान की ट्रेनिंग का तरीका यानी उसका प्रोसेस सिर्फ पुराने जमाने की कुश्ती वाला है। अब अगर आप उसे उठाकर कराटे के रिंग में डाल देंगे तो क्या वह जीत पाएगा। शायद नहीं क्योंकि उसका शरीर और उसका दिमाग सिर्फ एक ही तरीके से काम करने के लिए बना है।
यही हाल बड़ी कम्पनियों का होता है। उनके पास पैसा बहुत है पर उनके काम करने का तरीका इतना जंग लगा हुआ होता है कि छोटी सी नई चीज करने में उन्हें दस मीटिंग्स और सौ अप्रूवल चाहिए होते हैं। और सबसे बड़ी बात है उनकी वैल्युज। वैल्युज का मतलब यह नहीं कि दीवार पर क्या लिखा है बल्कि यह कि कंपनी को किस चीज में सबसे ज्यादा फायदा दिखता है। अगर एक बड़ी कंपनी को एक करोड़ का प्रॉफिट कम लग रहा है तो वह उस छोटे से नए आईडिया पर काम ही नहीं करेगी। वहीं एक छोटा सा स्टार्टअप उसी एक करोड़ के लिए दिन रात एक कर देगा।
इसे एक मजेदार मिसाल से देखते हैं। आप अपने मोहल्ले की उस पुरानी साड़ी की दुकान को याद करिए जहाँ अंकल जी पिछले ३० साल से गद्दी पर बैठकर वही पुराना हिसाब रख रहे हैं। अब अगर कोई उनसे कहे कि अंकल जी आप ऑनलाइन रील बनाकर साड़ियां बेचिए तो वह शायद आपको पागल समझेंगे। उनके पास पैसा है यानी रिसोर्स है। पर उनका प्रोसेस क्या है कि ग्राहक दुकान पर आएगा तो ही बात बनेगी। उनकी वैल्यू यह है कि जब तक हाथ में नोट न आए तब तक धंधा नहीं हुआ। अब इसी बीच एक कॉलेज की लड़की इंस्टाग्राम पर लाइव आकर वही साड़ियां बेचकर लाखों कमा लेती है। अंकल जी बस यह सोचते रह जाते हैं कि इस कल की छोकरी ने मेरा मार्केट कैसे हिला दिया।
असल में अंकल जी बुरे इंसान नहीं हैं पर उनका सिस्टम नए जमाने के लिए बना ही नहीं है। अगर आप भी किसी कंपनी या खुद के फ्यूचर को प्रेडिक्ट करना चाहते हैं तो सिर्फ यह मत देखिये कि जेब में कितना पैसा है। यह देखिये कि आपके काम करने का तरीका कितना फ्लेक्सिबल है। क्या आप छोटी जीत को सेलिब्रेट कर सकते हैं या आपको सिर्फ बड़ा जैकपॉट चाहिए। अगर आपकी वैल्युज आपको छोटे और नए रिस्क लेने से रोक रही हैं तो समझ जाइये कि आप उस भारी भरकम पहलवान की तरह हैं जो रिंग में तो खड़ा है पर हिल नहीं पा रहा। और यकीन मानिए जब तक आप हिलने की सोचेंगे तब तक सामने वाला कराटे मार कर आपको चित कर चुका होगा।
लेसन ३ : इंडस्ट्री के इवोल्यूशन को समझने के लिए मोटिवेशन और एबिलिटी का सही आंकलन
भविष्य को प्रेडिक्ट करना कोई जादू नहीं है बल्कि यह समझना है कि कौन क्या करने के लिए मोटिवेटेड है। क्लेटन क्रिस्टेंसन कहते हैं कि हर कंपनी की एक अपनी एबिलिटी यानी काबिलियत होती है और उसके पीछे एक मोटिवेशन होता है। अक्सर बड़ी कम्पनियाँ उस काम को करने के लिए बिलकुल भी मोटिवेटेड नहीं होतीं जो उनके मौजूदा बिजनेस को छोटा दिखाए। इसे एक बहुत ही मजेदार और कड़वे उदाहरण से समझते हैं। मान लीजिए एक बहुत बड़ा केबल टीवी ऑपरेटर है जो पूरे शहर में राज करता है। उसके पास हज़ारों कर्मचारी हैं और लाखों का सेटअप है। अब मार्केट में एक नई स्ट्रीमिंग सर्विस आती है जो कहती है कि हम बहुत कम पैसों में बिना किसी तार के सब कुछ दिखाएंगे।
अब उस केबल वाले के पास एबिलिटी तो है कि वह भी अपनी ऐप बना ले पर उसका मोटिवेशन उसे रोकता है। वह सोचता है कि अगर मैंने ऐप बना ली तो मेरे बिछाए हुए तारों का क्या होगा। मेरे वो लोग जो घर घर जाकर कनेक्शन जोड़ते हैं उनका क्या होगा। वह अपने पुराने मुनाफे को बचाने में इतना बिजी हो जाता है कि वह नई टेक्नोलॉजी को इग्नोर करने लगता है। उसे लगता है कि लोग तो अभी भी केबल ही देखेंगे क्योंकि उसमें मजा अलग है। लेकिन असल में वह खुद को धोखा दे रहा होता है। वह उस नई चीज को अपनाने के लिए मोटिवेटेड ही नहीं है क्योंकि उसे डर है कि उसका पुराना साम्राज्य ढह जाएगा।
यही हाल हमारे और आपके साथ भी होता है। हम अक्सर अपनी लाइफ में उन बदलावों को नहीं अपनाते क्योंकि हमें लगता है कि हमने पिछले दस सालों में जो मेहनत की है वह बेकार चली जाएगी। हम उस पुराने ढर्रे पर चलने के लिए इतने ज्यादा मोटिवेटेड होते हैं कि हमें सामने खड़ी नई अपॉर्चुनिटी दिखाई ही नहीं देती। हम उस बस ड्राइवर की तरह हैं जो रास्ता बंद होने के बाद भी उसी गड्ढे वाली सड़क पर बस चला रहा है क्योंकि उसे नया रास्ता सीखने में आलस आ रहा है। और फिर जब सवारियां उतर कर दूसरी बस में चढ़ जाती हैं तब हम बैठकर किस्मत को कोसते हैं।
अगर आप वाकई यह जानना चाहते हैं कि कल क्या होने वाला है तो यह देखिये कि आज के बड़े खिलाड़ी किस चीज से डर रहे हैं और वे किस चीज को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। जिस दिन कोई कंपनी अपने पुराने गौरव को बचाने में लग जाए समझ लीजिये उसका अंत शुरू हो चुका है। असली विनर वह है जो खुद को ही खत्म करने की हिम्मत रखता है ताकि वह कुछ नया और बेहतर बना सके। अगर आप अपने आज को कुर्बान करने के लिए तैयार नहीं हैं तो यकीन मानिए आपका कल किसी और के हाथ में होगा। भविष्य उन्हीं का है जो अपनी काबिलियत को समय के साथ बदलने का जिगरा रखते हैं और जिनमें पुराने को छोड़कर नए को गले लगाने का मोटिवेशन होता है।
दोस्तों, दुनिया बहुत तेजी से बदल रही है और सीइंग व्हाट्स नेक्स्ट हमें यही सिखाती है कि आँखें बंद कर लेने से खतरा टल नहीं जाता। अगर आप भी उन लोगों में से हैं जो कल की तैयारी आज करना चाहते हैं तो इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ख्यालों में खोए हुए हैं। नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपकी नजर में वो कौन सा अगला बड़ा बदलाव है जो पूरी दुनिया हिलाने वाला है। चलिए मिलकर कल की तैयारी करते हैं।
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