Shaping the Game (Hindi)


क्या आपको भी लगता है कि आपकी बातों में दम है? सॉरी दोस्त, लेकिन अगर आप टेबल पर बैठकर बस हां में हां मिला रहे हैं, तो आप लीडर नहीं, सिर्फ एक महंगे जोकर बन रहे हैं। बिना सही नेगोशिएशन स्किल्स के आप अपनी वैल्यू और रिस्पेक्ट दोनों धीरे-धीरे गँवा रहे हैं।

माइकल वाटकिंस की किताब शेपिंग द गेम हमें सिखाती है कि असली गेम टेबल पर नहीं, बल्कि टेबल सजने से पहले खेला जाता है। चलिए जानते हैं वो ३ लेसन्स जो आपकी नेगोशिएशन की पूरी समझ बदल देंगे।


लेसन १ : नेगोशिएशन का असली स्ट्रक्चर समझना (मैपिंग द गेम)

ज्यादातर लोग नेगोशिएशन का मतलब क्या समझते हैं? दो लोग आमने-सामने बैठे हैं, चाय पी रहे हैं और एक-दूसरे को चूना लगाने की कोशिश कर रहे हैं। अगर आप भी ऐसा ही सोचते हैं, तो मुबारक हो, आप गेम शुरू होने से पहले ही हार चुके हैं। माइकल वाटकिंस कहते हैं कि नेगोशिएशन कोई तुकबंदी नहीं है, बल्कि यह एक आर्किटेक्चर है। जैसे एक बिल्डर बिल्डिंग बनाने से पहले नक्शा देखता है, वैसे ही एक स्मार्ट लीडर बात शुरू करने से पहले पूरे गेम का नक्शा बनाता है।

सोचिए, आप अपने बॉस से सैलरी बढ़ाने की बात कर रहे हैं। आप अपनी परफॉरमेंस की पीपीटी लेकर तैयार हैं। लेकिन क्या आपने सोचा है कि आपके बॉस का बजट कौन कंट्रोल करता है? या फिर कंपनी के एचआर हेड का इस वक्त मूड कैसा है? अगर आप सिर्फ अपने बॉस को कन्विंस कर रहे हैं, तो आप दीवार से सिर फोड़ रहे हैं। असली खिलाड़ी वो है जो जानता है कि पर्दे के पीछे कौन बैठा है। इसे कहते हैं पार्टीज और इश्यूज की मैपिंग करना।

मान लीजिए राहुल एक नई टेक कंपनी में टीम लीडर बना है। उसे अपनी टीम के लिए एक नया सॉफ्टवेयर खरीदना है। अब राहुल सीधा वेंडर के पास जाकर मोलभाव करने लगता है। वेंडर उसे १० परसेंट डिस्काउंट देता है और राहुल खुश होकर वापस आ जाता है। लेकिन ऑफिस पहुँचते ही उसे पता चलता है कि फाइनेंस डिपार्टमेंट ने फंड ही रोक दिया क्योंकि राहुल ने उनसे बात ही नहीं की थी। यहाँ राहुल ने क्या गलती की? उसने सिर्फ टेबल पर बैठे इंसान को देखा, उस इंसान को नहीं जो चेक साइन करने वाला था।

नेगोशिएशन में अक्सर हम उन लोगों को भूल जाते हैं जो सीधे तौर पर बात नहीं कर रहे, लेकिन जिनके पास 'ना' कहने की ताकत है। इसे वाटकिंस इंटरनल नेगोशिएशन कहते हैं। अगर आप घर में नई गाड़ी लाना चाहते हैं, तो शोरूम वाले से बाद में लड़िये, पहले अपनी वाइफ और बच्चों को मनाइये। वरना शोरूम से गाड़ी तो आ जाएगी, लेकिन घर में शांति कभी नहीं आएगी।

लीडर्स को यह समझना होगा कि हर नेगोशिएशन एक बड़े गेम का हिस्सा होता है। आप आज क्या बोल रहे हैं, उसका असर आपके कल के रिश्तों पर पड़ेगा। अगर आपने आज किसी को डरा-धमका कर अपनी बात मनवा ली, तो समझ लीजिए कि आपने एक दुश्मन कमा लिया है। अगली बार जब आपको उसकी जरूरत होगी, वो आपको पानी भी नहीं पूछेगा। नेगोशिएशन का मतलब सिर्फ जीतना नहीं है, बल्कि इस तरह जीतना है कि सामने वाला अगली बार फिर आपके साथ बैठने के लिए तैयार रहे।

इसे एक रदमिक फ्लो में समझिये। पहले माहौल को पढ़िए। फिर खिलाड़ियों को पहचानिए। उसके बाद चाल चलिए। अगर आप बिना तैयारी के मैदान में उतरेंगे, तो लोग आपको फुटबॉल समझकर लात ही मारेंगे। इसलिए, बात करने से पहले रिसर्च कीजिये। देखिये कि सामने वाले का डर क्या है और उसकी मजबूरी क्या है। जब आप उनकी कमजोरी को अपनी ताकत बना लेते हैं, तब आप गेम को शेप करना शुरू करते हैं।


लेसन २ : नेगोशिएशन आर्किटेक्चर और गेम को नया शेप देना

ज्यादातर लोग नेगोशिएशन को एक कुश्ती की तरह देखते हैं। उनको लगता है कि जो ज्यादा जोर से बोलेगा या जो ज्यादा अड़ियल बनेगा, वही जीतेगा। लेकिन माइकल वाटकिंस कहते हैं कि असली लीडर कुश्ती नहीं लड़ता, वो तो पूरा मैदान ही बदल देता है। इसे कहते हैं नेगोशिएशन आर्किटेक्चर। इसका सीधा मतलब है कि अगर आपको गेम के रूल्स पसंद नहीं आ रहे, तो रूल्स मत बदलिए, सीधा गेम ही बदल दीजिये।

मान लीजिये आप एक फ्रीलांसर हैं और एक क्लाइंट के साथ प्रोजेक्ट की बात कर रहे हैं। क्लाइंट कहता है कि मेरा बजट बहुत कम है और मैं इससे ज्यादा एक रुपया नहीं दूंगा। अब एक आम आदमी क्या करेगा? वो रोना-धोना शुरू कर देगा या फिर काम छोड़ देगा। लेकिन एक स्मार्ट नेगोशिएटर यहाँ फ्रेमिंग का इस्तेमाल करेगा। वो पैसों की बात छोड़कर वैल्यू की बात करने लगेगा। वो कहेगा कि अगर आप मुझे कम पैसे देंगे, तो मैं काम तो कर दूंगा, लेकिन आपकी सेल्स में वो ग्रोथ नहीं आएगी जो आप चाहते हैं। अब आपने गेम को 'पैसे' से हटाकर 'प्रॉफिट' पर शिफ्ट कर दिया है।

मान लीजिये आप अपनी पुरानी कार बेचने निकले हैं। सामने वाला खरीदार आपसे कहता है कि भाई, टायर पुराने हैं, पेंट उतरा हुआ है, मैं तो बस एक लाख दूंगा। अब अगर आप उसके साथ टायर और पेंट पर बहस करने लगे, तो आप हार गए। यहाँ आपको आर्किटेक्चर बदलना होगा। आप कहिये कि भाई, कार के टायर तो बदल जाएंगे, लेकिन इस कार का इंजन और इसका माइलेज आपको पूरे शहर में कहीं नहीं मिलेगा। आपने उसकी नजर को छोटी छोटी कमियों से हटाकर एक बड़ी वैल्यू पर टिका दिया।

वाटकिंस का मानना है कि नेगोशिएशन में आपकी पोजीशन से ज्यादा आपकी क्रेडिबिलिटी मायने रखती है। अगर आप टेबल पर ये सोचकर बैठे हैं कि सामने वाला मेरा दुश्मन है, तो आपकी बॉडी लैंग्वेज और आपकी आवाज में वो कड़वाहट आ जाएगी। लेकिन अगर आप इसे एक प्रॉब्लम-सॉल्विंग एक्सरसाइज की तरह देखेंगे, तो आप नए रास्ते खोज पाएंगे। कभी-कभी नेगोशिएशन को जीतने का सबसे अच्छा तरीका यह होता है कि आप सामने वाले को यह महसूस कराएं कि जीत उसकी हुई है, जबकि सारा कंट्रोल आपके हाथ में हो।

इसे एक हार्टबीट की तरह महसूस कीजिये। पहले शांत रहिये। सामने वाले की बात सुनिए। उसकी प्रॉब्लम को समझिये। फिर धीरे से अपना जाल बुनिए। जब उसे लगे कि वो जीत रहा है, तभी उसे वो ऑफर दीजिये जो आप शुरू से देना चाहते थे। इसे कहते हैं विन-विन सिचुएशन बनाना, लेकिन अपनी शर्तों पर। अगर आप सिर्फ अपनी अड़ियल जिद पर अड़े रहेंगे, तो आप एक अच्छे लीडर नहीं बल्कि एक जिद्दी बच्चे कहलायेंगे। और याद रखिये, जिद्दी बच्चों को टॉफी तो मिल जाती है, लेकिन बड़ी डील्स नहीं मिलतीं।

लीडरशिप का मतलब यह नहीं कि आप सबको दबा दें। लीडरशिप का मतलब है कि आप सबको एक ऐसी दिशा में ले जाएं जहाँ सबको फायदा दिखे, लेकिन रास्ता आपका हो। अगर आप नेगोशिएशन का आर्किटेक्चर समझ गए, तो आप किसी भी बंद कमरे से अपनी मनचाही डील लेकर बाहर निकल सकते हैं।


लेसन ३ : इंटरनल नेगोशिएशन और तालमेल की कला

दुनिया का सबसे मुश्किल काम किसी अनजान से डील करना नहीं है, बल्कि अपने ही घर के लोगों या अपनी ही टीम को एक बात पर राजी करना है। माइकल वाटकिंस कहते हैं कि अगर आप बाहर जाकर जंग जीतना चाहते हैं, तो पहले आपको अपने किले के अंदर शांति बनानी होगी। इसे इंटरनल नेगोशिएशन कहते हैं। कई लीडर्स बाहर तो बहुत बड़े सुरमा बनते हैं, लेकिन जब ऑफिस लौटते हैं तो पता चलता है कि उनकी अपनी टीम ही उनके आइडिया के खिलाफ खड़ी है।

सोचिए, आप एक बहुत बड़ी डील क्लोज करके आए हैं। आपने कंपनी के लिए करोड़ों का बिजनेस लाया है। आप खुश हैं, आप पार्टी की सोच रहे हैं। लेकिन जैसे ही आप ऑपरेशंस टीम के पास जाते हैं, वो हाथ खड़े कर देते हैं। वो कहते हैं कि हमारे पास तो इतना स्टाफ ही नहीं है कि हम ये काम कर सकें। अब आपकी वो 'बड़ी जीत' गले की हड्डी बन गई है। यहाँ आपकी गलती क्या थी? आपने बाहर तो नेगोशिएट कर लिया, लेकिन अपनी इंटरनल टीम के साथ नेगोशिएट करना भूल गए। आपने उनको भरोसे में ही नहीं लिया।

मान लीजिए आपको अपने दोस्तों के साथ गोवा जाने का प्लान बनाना है। आप टिकट बुक कर लेते हैं, होटल देख लेते हैं। लेकिन आपने अपनी मम्मी से परमिशन नहीं ली। अब आप एयरपोर्ट जाने के लिए तैयार हैं और मम्मी ने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया है। अब आप बाहर की दुनिया से चाहे जितना बड़ा नेगोशिएटर बन जाएं, घर के अंदर आपकी दाल नहीं गलने वाली। लीडरशिप में भी यही होता है। अगर आपके स्टेकहोल्डर्स आपके साथ नहीं हैं, तो आपकी हर डील अधूरी है।

असली नेगोशिएशन का मतलब सिर्फ हाथ मिलाना नहीं है, बल्कि दिलों को जोड़ना है। वाटकिंस सिखाते हैं कि आपको कोअलिशन बिल्डिंग यानी गठबंधन बनाना सीखना होगा। आपको पता होना चाहिए कि आपकी टीम में वो कौन सा इंसान है जिसकी बात सब मानते हैं। पहले उसे अपने पाले में लाइए। जब एक प्रभावशाली इंसान आपकी बात मान लेता है, तो बाकी लोग अपने आप लाइन में लग जाते हैं। इसे चालाकी नहीं, इसे समझदारी कहते हैं।

नेगोशिएशन एक फिल्म की तरह है। अगर हीरो और विलेन की लड़ाई चल रही है, तो पीछे का म्यूजिक और कैमरा एंगल भी सही होना चाहिए। अगर बैकग्राउंड स्कोर खराब है, तो सीन फ्लॉप हो जाएगा। आपकी टीम वही बैकग्राउंड स्कोर है। अगर वो आपके साथ नहीं है, तो आपकी परफॉरमेंस कितनी भी अच्छी हो, रिजल्ट जीरो ही मिलेगा। इसलिए, टेबल पर बैठने से पहले अपनों से बात कीजिये। उनकी शंकाओं को दूर कीजिये। उन्हें यह महसूस कराइए कि यह जीत सिर्फ आपकी नहीं, बल्कि उनकी भी है।

जब आप सबको एक साथ लेकर चलते हैं, तो आपकी आवाज में एक अलग ही कॉन्फिडेंस होता है। सामने वाले को पता चल जाता है कि यह इंसान अकेला नहीं खड़ा है, इसके पीछे एक पूरी फौज खड़ी है। और यकीन मानिए, फौज के सामने अच्छे-अच्छे नेगोशिएटर्स घुटने टेक देते हैं। तो अगली बार जब आप किसी बड़ी डील के लिए निकलें, तो पहले पीछे मुड़कर देखिये कि क्या आपकी टीम आपके लिए तालियां बजा रही है या आपकी पीठ पीछे बुराई कर रही है।


नेगोशिएशन कोई रॉकेट साइंस नहीं है, यह बस लोगों के दिमाग और उनके डर को समझने का एक तरीका है। माइकल वाटकिंस की यह किताब हमें याद दिलाती है कि एक लीडर वही है जो न सिर्फ गेम खेलता है, बल्कि गेम के नियम भी खुद बनाता है।

तो क्या आप अब भी वही पुराने घिसे-पिटे तरीके से मोलभाव करेंगे, या आज से अपने नेगोशिएशन गेम को नया शेप देंगे? नीचे कमेंट में बताइये कि आपकी लाइफ का सबसे मुश्किल नेगोशिएशन कौन सा था। इस आर्टिकल को उस दोस्त के साथ शेयर कीजिये जो हमेशा अपनी बात मनवाने में फेल हो जाता है।

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