अगर आप अब भी गधों की तरह १६ घंटे घिस रहे हैं और फिर भी बैंक बैलेंस और तरक्की ठप पड़ी है तो बधाई हो। आप अपनी लाइफ के सबसे बड़े लूजर बनने की रेस में सबसे आगे हैं। बिना स्मार्टर फास्टर बेटर के सीक्रेट्स जाने आप बस अपनी एनर्जी कचरे में फेंक रहे हैं और दुनिया आपका मजाक उड़ा रही है।
चार्ल्स डुहिग की यह किताब आपको सिखाएगी कि असली प्रोडक्टिविटी पसीना बहाने में नहीं बल्कि दिमाग चलाने में है। आज हम उन ३ पावरफुल लेसन के बारे में बात करेंगे जो आपके काम करने के पुराने और थकाऊ तरीके को हमेशा के लिए बदल देंगे।
लेसन १ : मोटिवेशन का रिमोट कंट्रोल अपने हाथ में रखें
क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो सुबह अलार्म बजने पर उसे ऐसे देखते हैं जैसे वो कोई टाइम बम हो। आप बेड पर पड़े पड़े यह सोचते हैं कि काश आज ऑफिस या कॉलेज न जाना पड़े। बहुत से लोग समझते हैं कि मोटिवेशन किसी बाबा की जड़ी बूटी है जो एक दिन अचानक मिल जाएगी। लेकिन चार्ल्स डुहिग कहते हैं कि मोटिवेशन कोई कुदरती करिश्मा नहीं है। यह एक स्किल है जिसे सीखा जा सकता है। इसका सबसे बड़ा सीक्रेट है 'लोकस ऑफ कंट्रोल'। आसान भाषा में कहें तो जब आपको लगता है कि आपकी लाइफ की गाड़ी का स्टेयरिंग आपके हाथ में है तो आप खुद ही मोटिवेटेड महसूस करने लगते हैं। लेकिन जब आपको लगता है कि आपको बस धकेला जा रहा है तो आप एक थके हुए इंजन की तरह बन जाते हैं।
मान लीजिए आपका बॉस आपको एक प्रोजेक्ट देता है और कहता है कि इसे जैसे मैं बोल रहा हूँ वैसे ही करो। अब आपका मन उस काम को करने में रत्ती भर भी नहीं लगेगा। आपको लगेगा कि आप बस एक मशीन के पुर्जे हैं। वहीं अगर बॉस कहे कि यह प्रोजेक्ट है और तुम अपने हिसाब से बेस्ट तरीका चुनो तो अचानक आपके अंदर का सुपर हीरो जाग जाता है। क्यों। क्योंकि अब आपके पास 'चॉइस' है। हमारा दिमाग कंट्रोल से प्यार करता है। जब हम छोटे छोटे फैसले खुद लेते हैं तो हमारे दिमाग का वो हिस्सा एक्टिवेट हो जाता है जिसे 'स्ट्रिएटम' कहते हैं। यही वो जगह है जहाँ से मोटिवेशन की बिजली पैदा होती है।
अब जरा सोचिए आप जिम जाना चाहते हैं लेकिन आलस आ रहा है। आप खुद को यह मत बोलिए कि मुझे जिम जाना ही पड़ेगा। यह तो जेल जाने जैसी फीलिंग देता है। इसकी जगह खुद को एक छोटी सी चॉइस दीजिए। खुद से कहिए कि मैं जिम जाऊंगा लेकिन आज मैं तय करूँगा कि मैं ट्रेडमिल पर दौड़ूँगा या सिर्फ वेट लिफ्टिंग करूँगा। जैसे ही आपने खुद को यह चॉइस दी आपका दिमाग डोपामाइन रिलीज करने लगता है। उसे लगता है कि बॉस तो मैं ही हूँ।
भारतीय घरों में भी यही होता है। जब मम्मी कहती हैं कि टिंडे की सब्जी खानी पड़ेगी तो हम मुँह बना लेते हैं। लेकिन अगर मम्मी पूछे कि टिंडे खाओगे या लौकी तो हम बड़े गर्व से एक चुन लेते हैं। हालांकि दोनों ही बोरिंग हैं पर चॉइस मिलते ही हमारा ईगो सैटिस्फाई हो जाता है। लाइफ में भी यही फंडा अपनाइये। जब भी किसी काम में मन न लगे तो उसे एक 'चॉइस' में बदल दीजिए। छोटे छोटे फैसले लीजिए। खुद को यकीन दिलाइये कि आप अपनी किस्मत के ड्राइवर हैं न कि पीछे वाली सीट पर बैठे हुए कोई सवारी। जब आप कंट्रोल अपने हाथ में लेते हैं तो आलस अपने आप खिड़की से बाहर कूद जाता है। तो अगली बार जब कोई बड़ा काम सामने आए तो उसे एक मजबूरी की तरह नहीं बल्कि अपनी पसंद की तरह ट्रीट करें।
लेसन २ : मेंटल मॉडल्स और फोकस का असली खेल
मोटिवेशन का रिमोट कंट्रोल हाथ में आने के बाद अगला बड़ा चैलेंज आता है कि उस एनर्जी को सही दिशा में कैसे लगाएं। हम में से ज्यादातर लोग दिन भर पागलों की तरह बिजी रहते हैं पर शाम को पता चलता है कि काम तो कुछ खास हुआ ही नहीं। इसे कहते हैं बिना सिर पैर की मेहनत। चार्ल्स डुहिग कहते हैं कि सबसे सफल लोग अपने दिमाग में एक 'मेंटल मॉडल' बना लेते हैं। इसका मतलब है कि वे अपने दिन की एक फिल्म पहले ही अपने दिमाग में चला लेते हैं। वे खुद को एक कहानी सुनाते हैं कि आज उनका दिन कैसा बीतने वाला है।
मान लीजिए आप एक बहुत इम्पोर्टेन्ट मीटिंग के लिए जा रहे हैं। एक आम इंसान बस फाइल उठाएगा और चला जाएगा। लेकिन एक स्मार्ट इंसान गाड़ी चलाते वक्त ही सोच लेगा कि मीटिंग रूम कैसा होगा। क्लाइंट क्या कड़वे सवाल पूछ सकता है। अगर लैपटॉप नहीं चला तो मैं क्या करूँगा। इसे कहते हैं अपने दिमाग को रिहर्सल कराना। जब आप अपनी लाइफ की स्क्रिप्ट खुद लिखते हैं तो आप हर आने वाली मुश्किल के लिए पहले से तैयार होते हैं। आपका दिमाग अचानक आने वाली बाधाओं को देखकर पैनिक नहीं करता क्योंकि आपने अपने मेंटल मॉडल में उसे पहले ही देख लिया था।
हमारे देश में शादी का फंक्शन याद कीजिए। घर का बड़ा बुजुर्ग जिसे सब 'चाचा जी' कहते हैं उनके पास हर चीज का मेंटल मॉडल होता है। उन्हें पता होता है कि अगर हलवाई ने चीनी कम डाली तो क्या करना है या अगर जनरेटर बंद हो गया तो लाइट कहाँ से आएगी। वे दिन भर सोफे पर बैठे रहते हैं पर सबसे ज्यादा प्रोडक्टिव वही होते हैं क्योंकि उनका दिमाग आने वाले हर झटके के लिए तैयार है। दूसरी तरफ वो बेचारे फूफा जी हैं जो बिना किसी प्लान के इधर उधर भाग रहे हैं और अंत में सब रायता फैला देते हैं।
फोकस का मतलब यह नहीं है कि आप दुनिया से कट जाएं। फोकस का मतलब है कि आपके दिमाग में एक साफ तस्वीर हो कि 'अगला कदम' क्या है। जो लोग हर वक्त डिस्ट्रैक्ट होते हैं उनके पास असल में कोई मेंटल मॉडल नहीं होता। उनका दिमाग खाली बैठा होता है और जैसे ही कोई इंस्टाग्राम नोटिफिकेशन आता है दिमाग कहता है कि चलो यही देख लेते हैं। लेकिन अगर आपके पास एक पक्की स्क्रिप्ट है कि अगले दो घंटे मुझे सिर्फ यह प्रेजेंटेशन खत्म करनी है और इस बीच फोन साइलेंट रहेगा तो आपका ध्यान भटकना मुश्किल है।
इसलिए सुबह उठते ही सिर्फ टू डू लिस्ट मत बनाइये। बल्कि ५ मिनट आँखें बंद करके सोचिए कि आपका दिन कैसा दिखेगा। आप कब काम शुरू करेंगे। लंच में क्या होगा और अगर कोई फालतू गप्पें मारने वाला दोस्त आ गया तो आप उसे कैसे भगाएंगे। जब आप अपने दिन के डायरेक्टर बन जाते हैं तो दुनिया की कोई भी चीज आपका फोकस नहीं हिला सकती। यह मेंटल मॉडल ही वह ढाल है जो आपको एवरेज लोगों की भीड़ से अलग खड़ा करती है। अब जब आपने फोकस करना सीख लिया है तो बात आती है कि दूसरों के साथ मिलकर कमाल कैसे किया जाए।
लेसन ३ : साइकोलॉजिकल सेफ्टी और टीम की असली ताकत
जब आप खुद को मोटिवेट करना सीख जाते हैं और मेंटल मॉडल से फोकस भी पा लेते हैं तो बारी आती है दूसरों के साथ मिलकर पहाड़ हिलाने की। लेकिन अक्सर होता क्या है। हम चार टैलेंटेड लोगों को एक कमरे में बंद करते हैं और उम्मीद करते हैं कि कोई चमत्कार होगा। पर अंत में निकलता क्या है। सिर्फ एक दूसरे की टांग खिंचाई और ईगो की लड़ाई। चार्ल्स डुहिग कहते हैं कि किसी टीम की कामयाबी इस बात पर निर्भर नहीं करती कि उसमें कितने टॉपर बैठे हैं बल्कि इस पर निर्भर करती है कि उस टीम का माहौल कैसा है। इसे कहते हैं 'साइकोलॉजिकल सेफ्टी'।
आसान शब्दों में कहें तो क्या आपकी टीम के लोग अपनी बात रखने में डरते तो नहीं। क्या उन्हें यह डर सताता है कि अगर उन्होंने कोई बेवकूफी भरा सवाल पूछा तो सब उनका मजाक उड़ाएंगे। अगर ऐसा है तो आपकी टीम बस नाम की टीम है। असल में वो डरे हुए लोगों का एक ग्रुप है। गूगल ने बरसों तक इस पर रिसर्च की और पाया कि सबसे बेस्ट टीमें वो थीं जहाँ हर मेंबर को बराबर बोलने का मौका मिलता था। जहाँ लोग एक दूसरे की भावनाओं को समझते थे। इसे ही हम हिंग्लिश में 'वाइब' कहते हैं। अगर वाइब सही है तो गधे भी घोड़ों को हरा सकते हैं।
इसे अपने पड़ोस की क्रिकेट टीम से समझिये। एक टीम वो है जिसमें मोहल्ले के सबसे तगड़े प्लेयर हैं लेकिन हर कोई खुद को सचिन तेंदुलकर समझता है। जैसे ही कोई कैच छूटता है सब गालियाँ देने लगते हैं। ऐसी टीम मैच हारना डिजर्व करती है। दूसरी तरफ वो लड़के हैं जो शायद उतने अच्छे प्लेयर नहीं हैं लेकिन एक दूसरे को सपोर्ट करते हैं। अगर कोई जीरो पर आउट हो जाए तो उसे चिढ़ाने के बजाय कहते हैं कि कोई बात नहीं भाई अगले मैच में देखेंगे। यही वो बॉन्डिंग है जो जीत दिलाती है।
अक्सर ऑफिस में मीटिंग्स के दौरान सबसे ज्यादा टैलेंटेड लोग चुपचाप कोने में बैठे रहते हैं क्योंकि बॉस को बस अपनी बात सुनानी होती है। यहाँ कोई साइकोलॉजिकल सेफ्टी नहीं है। यहाँ सिर्फ डर है। और डर कभी भी क्रिएटिविटी को जन्म नहीं दे सकता। चार्ल्स डुहिग हमें सिखाते हैं कि अगर आप एक लीडर बनना चाहते हैं या अपनी टीम से बेस्ट काम निकलवाना चाहते हैं तो लोगों को बोलने की आजादी दीजिए। उन्हें यह यकीन दिलाइये कि कोई भी आईडिया बुरा नहीं होता। जब लोगों को लगता है कि उन्हें सुना जा रहा है और उनकी इज्जत की जा रही है तो वे अपना २०० परसेंट देने को तैयार हो जाते हैं।
तो अब सवाल यह है कि क्या आप अब भी पुराने घिसे पिटे तरीकों से ही जीना चाहते हैं। क्या आप अब भी बिना किसी प्लान के बस दिन काट रहे हैं। याद रखिये स्मार्टर फास्टर बेटर होना कोई चॉइस नहीं बल्कि आज की दुनिया में सर्वाइव करने की जरूरत है। अपनी मोटिवेशन का स्विच खुद दबाइये। अपने दिन का मेंटल मॉडल तैयार कीजिये और अपने आस पास ऐसा माहौल बनाइये जहाँ हर कोई खुलकर अपनी बात कह सके। लाइफ छोटी है और सपने बड़े। तो क्या आप तैयार हैं अपनी प्रोडक्टिविटी को नेक्स्ट लेवल पर ले जाने के लिए।
अब रुकिए और खुद से पूछिए कि क्या आप सच में अपनी लाइफ के डायरेक्टर हैं या बस दूसरों के इशारों पर नाच रहे हैं। अगर आज का यह आर्टिकल आपकी सोच को जरा भी बदल पाया है तो इसे उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो दिन भर 'मैं बिजी हूँ' का रोना रोते रहते हैं। नीचे कमेंट्स में लिखिए कि इन ३ लेसन में से कौन सा लेसन आपकी लाइफ आज ही बदल सकता है। उठिए और स्मार्ट तरीके से अपनी जीत की कहानी लिखना शुरू कीजिये।
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