Strategy That Works (Hindi)


क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो दिन भर गधों की तरह मेहनत करते हैं पर महीने के आखिर में हाथ खाली रहता है। शायद आप अपनी घटिया स्ट्रैटेजी के साथ बस फेल होने का इंतजार कर रहे हैं। बिना सही एक्जीक्यूशन के आपका सारा ज्ञान और बिजनेस प्लान कचरे के डिब्बे में जाने वाला है। आपकी इसी नासमझी की वजह से आपके कॉम्पिटिटर आपसे कोसों आगे निकल चुके हैं और आप बस बैठकर तालियाँ बजा रहे हैं।

आज हम इस कड़वे सच का सामना करेंगे कि आखिर क्यों आपके बड़े बड़े प्लान फेल हो जाते हैं। पॉल लेइनवांड की बुक स्ट्रैटेजी दैट वर्क्स हमें सिखाती है कि सक्सेसफुल कंपनियाँ कैसे काम करती हैं। चलिए जानते हैं वो ३ कमाल के लेसन जो आपका बिजनेस और जिंदगी बदल देंगे।


लेसन १ : अपनी एक अलग पहचान बनाएँ और उसी पर टिके रहें (Commit to an Identity)

आजकल के बिजनेस और प्रोफेशनल वर्ल्ड में एक बहुत बड़ी बीमारी फैली है। इसे कहते हैं 'हर फन मौला' बनने की बीमारी। लोग सोचते हैं कि अगर वो सब कुछ बेचेंगे तो सब लोग उनसे खरीदेंगे। लेकिन असलियत में जो सब कुछ करने की कोशिश करता है वो कुछ भी ढंग से नहीं कर पाता। आप खुद सोचिए। अगर आपको अपने दिल का ऑपरेशन करवाना हो तो क्या आप उस डॉक्टर के पास जाएंगे जो जुकाम और बुखार भी ठीक करता है और साथ में चक्की भी चलाता है। बिल्कुल नहीं। आप उस स्पेशलिस्ट को ढूँढेंगे जिसकी पहचान ही दिल का इलाज करना है।

यही बात इस बुक के लेखक समझाते हैं। दुनिया की सबसे सफल कंपनियाँ जैसे आईकिया या एप्पल अपनी एक खास पहचान चुनती हैं। वो हर कस्टमर को खुश करने के पीछे नहीं भागतीं। वो जानती हैं कि उनकी ताकत क्या है। अगर आईकिया सस्ती और स्टाइलिश फर्नीचर की पहचान रखता है तो वो कल को जाकर लग्जरी मखमल के सोफे नहीं बेचने लगेगा। क्योंकि उसे पता है कि उसकी पहचान ही उसकी असली पावर है।

हमारे यहाँ इंडिया में अक्सर छोटे बिजनेसमैन ये गलती करते हैं। मान लीजिए किसी ने समोसे की दुकान खोली। दुकान अच्छी चलने लगी तो उसने सोचा कि चलो अब मोबाइल रिचार्ज भी रख लेते हैं और कोने में जूते भी बेच देते हैं। नतीजा क्या होता है। समोसे की क्वालिटी गिर जाती है और लोग उसे भूल जाते हैं। आपकी स्ट्रैटेजी की शुरुआत इस सवाल से होनी चाहिए कि हम किस चीज के लिए जाने जाना चाहते हैं। क्या आप अपनी क्वालिटी के लिए फेमस हैं या अपनी कम कीमत के लिए।

अगर आप अपनी एक अलग पहचान नहीं बना पा रहे हैं तो आप बस भीड़ का हिस्सा हैं। और भीड़ में खड़ा इंसान केवल धक्का खाता है पैसा नहीं कमाता। आपको अपनी उन खास काबिलियतों को पहचानना होगा जो आपके अलावा कोई और नहीं दे सकता। इसे 'कैपेबिलिटी फिट' कहते हैं। जब आपकी स्ट्रैटेजी आपकी पहचान के साथ मैच करती है तब आपको मार्केट में कोई नहीं हरा सकता।

अपनी पहचान को लेकर इतने जिद्दी बन जाइए कि दुनिया को पता हो कि अगर ये काम करवाना है तो बस इसी के पास जाना है। लोग अक्सर अपनी पहचान इसलिए बदलते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि पड़ोसी की दुकान पर ज्यादा भीड़ है। लेकिन याद रखिए जो अपनी लाइन बार बार बदलता है वो कभी फिनिश लाइन तक नहीं पहुँच पाता। अपनी ताकत को पहचानिए और उसी पर अपना पूरा किला खड़ा कीजिए। जब आप अपनी पहचान पर अडिग रहते हैं तो मार्केट खुद चलकर आपके पास आता है।


लेसन २ : स्ट्रैटेजी को रोजमर्रा के काम में उतारें (Translate Strategy into Everyday)

अक्सर ऑफिसों में क्या होता है। बड़े बड़े एसी कमरों में बैठकर बॉस लोग भारी भरकम इंग्लिश शब्दों वाली एक फाइल बनाते हैं। उसे नाम देते हैं स्ट्रैटेजी। फिर उस फाइल को अलमारी में बंद कर दिया जाता है और बाहर कर्मचारी वही पुराने घिसे पिटे तरीके से काम करते रहते हैं। अगर आपकी स्ट्रैटेजी केवल कागज पर है और आपके ऑफिस के चपरासी से लेकर मैनेजर के काम में नहीं दिखती तो समझ लीजिए आप बस टाइम पास कर रहे हैं।

लेखक कहते हैं कि असली जीत तब होती है जब आपकी स्ट्रैटेजी एक जीता जागता अनुभव बन जाए। मान लीजिए आपने प्लान बनाया कि आपकी कंपनी 'कस्टमर सर्विस' में नंबर वन बनेगी। लेकिन जब कोई ग्राहक आपको फोन करता है तो आपका कर्मचारी उसे ऐसे जवाब देता है जैसे उसने कोई उधार माँग लिया हो। यहाँ आपकी स्ट्रैटेजी और काम के बीच एक बड़ा गड्ढा है। इस गड्ढे को भरना ही असली लीडरशिप है।

सफल कंपनियाँ अपनी स्ट्रैटेजी को छोटे छोटे टुकड़ों में तोड़ देती हैं। वो इसे एक 'ब्लूप्रिंट' की तरह हर कर्मचारी के हाथ में थमा देती हैं। इसका मतलब यह नहीं कि आप रोज सुबह मीटिंग में चिल्लाएँ। इसका मतलब है कि आप अपनी कंपनी के सिस्टम को ऐसा बनाएँ कि हर छोटा फैसला आपकी स्ट्रैटेजी के हिसाब से हो। अगर आपने तय किया है कि आप कम कीमत में सामान देंगे तो आपके ऑफिस में फालतू बिजली का जलना भी आपकी स्ट्रैटेजी के खिलाफ होना चाहिए।

भारत में हम जुगाड़ के भरोसे बहुत रहते हैं। जुगाड़ एक बार काम आता है लेकिन बार बार नहीं। स्ट्रैटेजी का मतलब है कि आप अपनी काबिलियत को एक सांचे में ढाल दें। ताकि हर बार रिजल्ट एक जैसा ही आए। जैसे मैकडोनाल्ड का बर्गर। आप दिल्ली में खाएँ या न्यूयॉर्क में उसका स्वाद एक जैसा ही रहता है। क्यों। क्योंकि उन्होंने अपनी स्ट्रैटेजी को डेली रूटीन के हर स्टेप में उतार दिया है। उनके लिए स्ट्रैटेजी कोई भाषण नहीं बल्कि आलू टिक्की बनाने का एक तरीका है।

अगर आप खुद के लिए कोई लक्ष्य सेट कर रहे हैं तो उसे अपनी आदतों में डालिए। अगर आपने सोचा है कि आप फिट बनेंगे तो ये आपकी स्ट्रैटेजी है। लेकिन अगर आप रोज सुबह उठकर समोसे खा रहे हैं तो आपकी स्ट्रैटेजी कचरा है। अपनी प्लानिंग को अपने पसीने के साथ जोड़िए। जब आपकी सोच और आपके हाथ एक ही दिशा में काम करेंगे तभी जाकर मार्केट में धमाका होगा। स्ट्रैटेजी कोई रॉकेट साइंस नहीं है बल्कि सही काम को सही तरीके से रोज करने का नाम है।


लेसन ३ : कल्चर का सही इस्तेमाल करें और उसे ताकत बनाएँ (Put Your Culture to Work)

ज्यादातर मैनेजमेंट गुरु आपको ज्ञान देंगे कि अगर बिजनेस बढ़ाना है तो अपना कल्चर बदल डालो। पुरानी आदतें छोड़ दो और रातों रात कुछ नया बन जाओ। लेखक कहते हैं कि यह सबसे बड़ी बेवकूफी है। अपनी कंपनी या अपनी टीम के कल्चर से लड़ना वैसा ही है जैसे बहती नदी के खिलाफ तैरना। आप थक जाएंगे पर कहीं पहुँचेंगे नहीं। समझदार इंसान वो है जो नदी के बहाव का इस्तेमाल अपनी नाव चलाने के लिए करे।

हर टीम की अपनी कुछ खूबियाँ होती हैं। हो सकता है आपकी टीम बहुत ज्यादा इमोशनल हो या फिर वो हर काम को बहुत बारीकी से करना पसंद करते हों। अब अगर आप एक ऐसा स्ट्रैटेजी प्लान लेकर आ जाएँ जिसमें केवल मशीनों की तरह काम करना हो तो आपकी टीम दो दिन में हाथ खड़े कर देगी। असली टैलेंट यह है कि आप अपने मौजूदा कल्चर की उन बातों को चुनें जो आपको आगे बढ़ने में मदद कर सकती हैं।

मान लीजिए आपकी टीम में गप्पें मारने की आदत है। अब आप चिल्लाकर इसे बंद नहीं करवा सकते। लेकिन अगर आप उसी बातचीत को आइडिया शेयर करने का जरिया बना दें तो वही गप्पें आपकी कंपनी का सबसे बड़ा स्ट्रैटेजी टूल बन जाएंगी। सक्सेसफुल कंपनियाँ कल्चर को बदलती नहीं हैं बल्कि उसे काम पर लगा देती हैं। वो अपनी स्ट्रैटेजी को कल्चर के सांचे में ऐसे फिट करती हैं कि लोगों को लगे ही नहीं कि वो कुछ अलग या बोझिल काम कर रहे हैं।

इंडिया में हम लोग रिश्तों को बहुत अहमियत देते हैं। यहाँ बिजनेस केवल कॉन्ट्रैक्ट पर नहीं बल्कि भरोसे पर चलता है। अगर आप एक इंडियन कंपनी चला रहे हैं और अपनी स्ट्रैटेजी में इस भरोसे और भाईचारे को जगह नहीं दे रहे हैं तो आप फेल होने के लिए तैयार रहिए। कल्चर को बदलने की कोशिश में अक्सर लोग अपनी जड़ें ही काट देते हैं। जबकि होना यह चाहिए कि आप अपनी उन्हीं जड़ों से खाद पानी लेकर अपनी स्ट्रैटेजी का पेड़ बड़ा करें।

स्ट्रैटेजी और कल्चर के बीच का तालमेल ही वो जादुई चाबी है जिससे सफलता के बंद दरवाजे खुलते हैं। जब लोग अपने काम में अपनी पहचान और अपने संस्कारों को देखते हैं तो वो सिर्फ तनख्वाह के लिए नहीं बल्कि दिल से काम करते हैं। याद रखिए आपकी स्ट्रैटेजी एक इंजन है लेकिन आपका कल्चर वो पेट्रोल है जिसके बिना गाड़ी एक इंच भी नहीं हिलेगी। इसलिए अपने कल्चर को दोष देना बंद कीजिए और उसे अपनी जीत का हिस्सा बनाइए।


तो दोस्तों, स्ट्रैटेजी दैट वर्क्स हमें सिखाती है कि कामयाबी कोई इत्तेफाक नहीं है। यह अपनी पहचान को समझने उसे हर दिन के काम में उतारने और अपने कल्चर को अपनी ढाल बनाने का नतीजा है। अगर आप आज भी पुरानी गलतियाँ दोहरा रहे हैं तो आप खुद अपनी बर्बादी की कहानी लिख रहे हैं।

आज ही रुकिए और सोचिए कि क्या आपका काम आपकी स्ट्रैटेजी से मेल खाता है। नीचे कमेंट में हमें जरूर बताइए कि इन ३ लेसन में से कौन सा आपकी लाइफ या बिजनेस में सबसे ज्यादा कमी पैदा कर रहा है। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो मेहनत तो बहुत कर रहे हैं पर सही दिशा में नहीं। चलिए साथ मिलकर एक ऐसी स्ट्रैटेजी बनाते हैं जो वाकई में काम करे।

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