क्या आपको लगता है कि आप बहुत स्मार्ट हैं और बस किस्मत साथ नहीं दे रही। सच तो यह है कि आपका दिमाग शायद गलत तरीके से हार्डवायर्ड है। अपनी नाकामी का रोना रोना बंद कीजिये क्योंकि आप उन बेसिक स्किल्स को ही मिस कर रहे हैं जो एक पांच साल के बच्चे में भी आपसे बेहतर हो सकती हैं।
आज हम चक मार्टिन और पेग डॉसन की किताब स्मार्ट्स से वह राज खोलेंगे जो आपको यह समझने में मदद करेगा कि क्या आप वाकई सक्सेस के लिए बने हैं या बस भीड़ का हिस्सा हैं। आइये जानते हैं वह ३ बड़े लेसन जो आपकी लाइफ बदल सकते हैं।
लेसन १ : एग्जीक्यूटिव स्किल्स की पावर - सिर्फ डिग्री से काम नहीं चलेगा
हम में से ज्यादातर लोगों को लगता है कि अगर हमारे पास बढ़िया कॉलेज की डिग्री है या हमारा आईक्यू लेवल ऊपर है, तो हम लाइफ की रेस जीत चुके हैं। लेकिन चक मार्टिन और पेग डॉसन अपनी किताब स्मार्ट्स में हमारा यह गुब्बारा बड़े प्यार से फोड़ देते हैं। लेखक कहते हैं कि असली खेल आईक्यू का नहीं, बल्कि एग्जीक्यूटिव स्किल्स का है। अब आप सोचेंगे कि यह कौन सी नई बला है। सरल भाषा में कहूँ तो, यह आपके दिमाग का वह एयर ट्रैफिक कंट्रोल सिस्टम है जो तय करता है कि कौन सा काम पहले करना है और किस फालतू विचार को इग्नोर करना है।
मान लीजिये आपके पास दुनिया की सबसे महंगी फरारी कार है, लेकिन उसका ड्राइवर नशे में धुत है और उसे रास्ता भी नहीं पता। क्या वह कार आपको मंजिल तक पहुँचाएगी। बिल्कुल नहीं। यहाँ आपकी डिग्री वह फरारी है और आपकी एग्जीक्यूटिव स्किल्स वह ड्राइवर। अगर आपके अंदर वर्किंग मेमोरी, टास्क इनिशिएशन और इमोशनल कंट्रोल जैसी स्किल्स नहीं हैं, तो आपकी बुद्धिमानी सिर्फ ड्राइंग रूम की बातचीत तक सीमित रह जाएगी।
हमारे देश में अक्सर देखा जाता है कि शर्मा जी का लड़का पढ़ने में बहुत तेज था, हमेशा नब्बे परसेंट लाता था, लेकिन आज वह एक छोटी सी नौकरी में फंसा हुआ है क्योंकि उसे लोगों से बात करना या वक्त पर काम शुरू करना नहीं आता। दूसरी तरफ वही बैकबेंचर जो स्कूल में फेल होते होते बचा था, आज अपनी कंपनी चला रहा है। क्यों। क्योंकि उसके पास वह प्रैक्टिकल स्मार्ट्स हैं जो उसे मुश्किल वक्त में शांत रहने और सही फैसला लेने की ताकत देती हैं।
क्या आपको भी ऐसा लगता है कि आप दिन भर बहुत बिजी रहते हैं लेकिन शाम को रिजल्ट जीरो निकलता है। इसका मतलब है कि आपकी एग्जीक्यूटिव स्किल्स जंग खा चुकी हैं। आप हर उस नोटिफिकेशन पर कूद पड़ते हैं जो आपके फोन पर आता है, जैसे वह किसी प्रधानमंत्री का पर्सनल मैसेज हो। आप एक काम शुरू करते हैं और फिर अचानक आपको याद आता है कि दो साल पहले किसी ने आपको फेसबुक पर क्या रिप्लाई दिया था। बस, वहीं आपकी प्रोडक्टिविटी का कत्ल हो जाता है।
सफलता इस बात पर निर्भर नहीं करती कि आप कितने स्मार्ट हैं, बल्कि इस पर करती है कि आप अपने दिमाग का इस्तेमाल कितनी स्मार्टली करते हैं। अगर आप खुद को मैनेज नहीं कर पा रहे, तो यकीन मानिए आप दुनिया को मैनेज करने का सपना देखना छोड़ दीजिये। यह स्किल्स जन्मजात नहीं होतीं, इन्हें प्रैक्टिस से बेहतर बनाया जा सकता है। लेकिन उसके लिए पहले यह मानना होगा कि आपकी वर्किंग मेमोरी किसी पुराने कंप्यूटर की रैम जैसी है जो जरा सा लोड बढ़ते ही हैंग हो जाती है।
लेसन २ : अपनी कमजोरियों को मैनेज करना - हर चीज में शक्तिमान बनने की कोशिश छोड़ दीजिये
दुनिया में एक बहुत बड़ा झूठ फैलाया गया है कि आपको हर चीज में परफेक्ट होना चाहिए। हमारे यहाँ तो बचपन से ही सिखाया जाता है कि अगर मैथ में कमजोर हो तो दिन रात मैथ पढ़ो, चाहे हिस्ट्री में तुम गोल्ड मेडलिस्ट ही क्यों न बन जाओ। चक मार्टिन और पेग डॉसन कहते हैं कि यह अपनी एनर्जी बर्बाद करने का सबसे तेज तरीका है। स्मार्ट्स का असली मतलब यह नहीं है कि आप अपनी हर कमजोरी को अपनी ताकत बना लें, बल्कि यह है कि आप अपनी कमजोरियों को पहचानें और उन्हें स्मार्टली मैनेज करें ताकि वो आपके रास्ते का पत्थर न बनें।
मान लीजिये आपको पता है कि आपका ऑर्गेनाइजेशन स्किल एकदम पैदल है। आपकी अलमारी ऐसी दिखती है जैसे वहाँ अभी-अभी कोई छोटा-मोटा तूफान आया हो। अब आप हर सुबह एक घंटा इस बात पर बर्बाद करते हैं कि आपकी दूसरी जुराब कहाँ गई। यहाँ समझदारी यह नहीं है कि आप रातों-रात दुनिया के सबसे बड़े सफाई एक्सपर्ट बन जाएँ। समझदारी इसमें है कि आप एक ऐसा सिस्टम बना लें जहाँ चीजें गुम न हों, या फिर किसी ऐसे इंसान की मदद लें जो इस काम में आपसे बेहतर हो।
सक्सेसफुल लोग सुपरमैन नहीं होते, वो बस यह जानते हैं कि उन्हें कहाँ अपनी ताकत लगानी है और कहाँ आउटसोर्स करना है। अगर आपको हिसाब-किताब समझ नहीं आता और आप जबरदस्ती अकाउंटेंट बनने की कोशिश कर रहे हैं, तो आप अपनी कंपनी डुबोने की पूरी तैयारी कर चुके हैं। महान लीडर्स वो नहीं होते जो सब कुछ खुद करते हैं, बल्कि वो होते हैं जो अपनी टीम में ऐसे लोग रखते हैं जो उनकी कमियों को पूरा कर सकें। अगर आप अपनी कमजोरी से लड़ते रहेंगे, तो अपनी ताकत को कभी निखार ही नहीं पाएंगे।
अक्सर हम सोशल मीडिया पर दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर खुद को कोसने लगते हैं। हमें लगता है कि फलाना बंदा जिम भी जा रहा है, ऑफिस में प्रमोशन भी ले रहा है और गिटार भी बजा रहा है। लेकिन पर्दे के पीछे की सच्चाई यह है कि उसने अपनी लाइफ को डेलीगेट करना सीख लिया है। वह हर चीज में हाथ नहीं डालता। वह जानता है कि अगर वह खाना बनाने में बुरा है, तो वह अपना समय कुकिंग सीखने में नहीं बल्कि अपने बिजनेस को बढ़ाने में लगाएगा ताकि वह एक अच्छा शेफ अफोर्ड कर सके।
अपनी कमजोरियों को स्वीकार करना कायरता नहीं, बल्कि एक बहुत बड़ी स्ट्रैटेजी है। जब आप यह मान लेते हैं कि आप इस पर्टिकुलर काम में बेकार हैं, तब आप उस बोझ से आजाद हो जाते हैं। फिर आपकी पूरी एनर्जी उस एक चीज पर लगती है जिसमें आप वाकई उस्ताद हैं। याद रखिये, एक मछली अगर अपनी पूरी जिंदगी पेड़ पर चढ़ने की कोशिश में बिता दे, तो वह खुद को हमेशा बेवकूफ ही समझेगी। आपको बस यह देखना है कि आप पानी में तैरने के लिए बने हैं या आसमान में उड़ने के लिए। अपनी खामियों के साथ लड़ना बंद कीजिये और उन्हें मैनेज करना सीखिए।
लेसन ३ : एनवायरनमेंट को अपने हिसाब से ढालना - खुद को नहीं, माहौल को बदलिए
अक्सर लोग कहते हैं कि अगर आपको जीतना है तो अपनी इच्छाशक्ति यानी विलपावर को लोहे जैसा मजबूत बनाइये। लेकिन स्मार्ट्स बुक के ऑथर्स एक कड़वा सच बताते हैं। आपकी इच्छाशक्ति आपके मोबाइल की बैटरी जैसी है, जो दिन खत्म होते होते लाल निशान पर आ जाती है। अगर आप हर छोटी चीज के लिए अपने दिमाग से लड़ते रहेंगे, तो आप थक हारकर घुटने टेक देंगे। असली स्मार्टनेस खुद को बदलने में नहीं, बल्कि अपने आसपास के माहौल को ऐसा बनाने में है कि सफलता आपके लिए मजबूरी बन जाए।
सोचिये, आप डाइट पर हैं और आपके सामने गरमा-गरम समोसे और जलेबी रखी है। अब आप अपनी इच्छाशक्ति का इस्तेमाल करके खुद को रोक रहे हैं। कितनी देर तक रुक पाएंगे। एक घंटा, दो घंटा। जैसे ही कोई ऑफिस की टेंशन आएगी, आप उन समोसों पर ऐसे टूट पड़ेंगे जैसे सदियों के भूखे हों। स्मार्ट बंदा वो है जो अपने घर में समोसे लाता ही नहीं। वह जानता है कि अगर सामने चीज दिखेगी नहीं, तो दिमाग उसे खाने की जिद भी नहीं करेगा। इसे कहते हैं एनवायरनमेंट इंजीनियरिंग।
हमारे यहाँ लोग सुबह उठने के लिए दस अलार्म लगाते हैं और हर बार स्नूज बटन दबाकर वापस सो जाते हैं। क्यों। क्योंकि उनका फोन उनके सिरहाने रखा होता है। अगर वही फोन आप दूसरे कमरे में रख दें, तो आपको उसे बंद करने के लिए बिस्तर छोड़ना ही पड़ेगा। एक बार आप बिस्तर से बाहर आ गए, तो नींद वैसे ही उड़ जाएगी। आपने यहाँ अपनी आदत नहीं बदली, बस अपने आसपास की सेटिंग बदल दी। लेखक कहते हैं कि अगर आपकी एग्जीक्यूटिव स्किल्स किसी एक एरिया में कमजोर हैं, तो वहाँ सहारा (Scaffolding) लगाइये।
यही लॉजिक आपके करियर और बिजनेस पर भी लागू होता है। अगर आपको पता है कि ऑफिस में गप्पें मारने वाले लोग आपका टाइम बर्बाद करते हैं, तो अपनी सीट ऐसी जगह चुनिए जहाँ शांति हो। अगर आपको पता है कि आप सोशल मीडिया के एडिक्ट हैं, तो काम के वक्त फोन को लॉकर में डाल दीजिये। हम अक्सर खुद को बहुत ज्यादा कंट्रोल करने की कोशिश करते हैं और फेल होने पर खुद को कोसते हैं। जबकि समाधान बहुत सिंपल है। अपनी कमजोरियों के रास्ते में कांटे बिछा दीजिये और अपनी ताकतों के रास्ते को हाईवे बना दीजिये।
सफलता कोई जादू नहीं है जो रातों-रात हो जाएगा। यह उन छोटे-छोटे बदलावों का नतीजा है जो आप अपने एनवायरनमेंट में करते हैं। जब आपका माहौल आपकी मदद करने लगता है, तो आपको सफल होने के लिए बहुत ज्यादा जोर नहीं लगाना पड़ता। आप ऑटो-पायलट मोड पर सक्सेस की तरफ बढ़ने लगते हैं। इसलिए आज से ही अपनी इच्छाशक्ति पर भरोसा करना कम कीजिये और अपने आसपास की चीजों को ऑर्गनाइज करना शुरू कीजिये। याद रखिये, शेर भी पिंजरे में अपनी फितरत भूल जाता है क्योंकि माहौल ही वैसा होता है। आप किस तरह के माहौल में रह रहे हैं।
तो दोस्तों, क्या आप अब भी वही पुराने घिसे-पिटे तरीकों से सफल होने की कोशिश करेंगे या अपने 'स्मार्ट्स' का सही इस्तेमाल करेंगे। याद रखिये, आपका दिमाग कैसे काम करता है यह जानना उतना ही जरूरी है जितना कि कड़ी मेहनत करना। अपनी उन एग्जीक्यूटिव स्किल्स को पहचानिए जिन्हें आपने अब तक इग्नोर किया था। आज ही अपनी लाइफ के उस एक हिस्से को चुनिए जहाँ आप अपने माहौल को बदलकर जीत हासिल कर सकते हैं। नीचे कमेंट्स में बताइये कि आपकी सबसे बड़ी दिमागी कमजोरी क्या है और आप उसे कैसे मैनेज करने वाले हैं। इस आर्टिकल को उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो बहुत मेहनत तो करते हैं पर उन्हें रिजल्ट नहीं मिल रहा।
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