क्या आप भी उन लोगों में से हैं जो चाय की टपरी पर बैठकर करोड़ों का स्टार्टअप प्लान करते हैं और फिर घर जाकर सो जाते हैं? सच तो यह है कि बिना सही जानकारी के स्टार्टअप शुरू करना अपनी जमापूंजी में आग लगाने जैसा है। अगर आपको लगता है कि सिर्फ एक कूल आइडिया आपको अगला करोड़पति बना देगा तो आप बड़े धोखे में हैं।
आज हम जोएल कुर्ट्ज़मैन की किताब Startups That Work के जरिए उन १० बड़े फैक्टर्स को समझेंगे जो आपके बिजनेस को अर्श पर ले जा सकते हैं या फिर उसे पूरी तरह डूबा सकते हैं। चलिए इन ३ बड़े लेसन्स पर गौर करते हैं।
लेसन १ : टीम ही आपकी असली ताकत है
अक्सर लोग सोचते हैं कि एक धांसू आइडिया मिल जाए तो वे रातों रात दुनिया जीत लेंगे। लेकिन सच तो यह है कि आइडिया की कीमत एक कप चाय से ज्यादा नहीं है अगर उसे चलाने वाली टीम बेकार हो। जोएल कुर्ट्ज़मैन अपनी किताब में साफ कहते हैं कि स्टार्टअप की सफलता उसके फाउंडर्स और पहली टीम के आपसी तालमेल पर टिकी होती है। अगर आपकी टीम में सब एक ही जैसे लोग हैं जो सिर्फ 'जी हुजूर' करना जानते हैं तो समझ लीजिए कि आपकी नैया डूबने वाली है। एक स्टार्टअप में आपको ऐसे लोग चाहिए जो आपसे बहस कर सकें और आपके गलत फैसलों पर आपको टोक सकें।
सोचिए आपने एक बहुत बढ़िया रेस्टोरेंट खोला। आपने शेफ तो वर्ल्ड क्लास रख लिया लेकिन वेटर्स को तमीज नहीं है। अब आप किचन में बैठकर चाहे जितना मर्जी बढ़िया पनीर टिक्का बना लें अगर कस्टमर तक वह ठंडी और गुस्से वाली शक्ल के साथ पहुंचेगा तो वह दोबारा कभी नहीं आएगा। यही हाल स्टार्टअप का है। यहाँ हर इंसान एक पुर्जे की तरह है। अगर एक भी गियर ढीला हुआ तो पूरी मशीन चरमरा जाएगी। इंडिया में तो हम देखते ही हैं कि कैसे दो दोस्त जोश में आकर कंपनी शुरू करते हैं और छह महीने बाद एक दूसरे की शक्ल तक नहीं देखना चाहते क्योंकि उन्होंने पहले ही यह तय नहीं किया था कि किसका क्या काम है।
इस किताब का सबसे बड़ा सच यही है कि इन्वेस्टर आपके आइडिया पर नहीं बल्कि आपकी टीम पर पैसा लगाते हैं। उन्हें पता है कि आइडिया तो कल बदल भी सकता है जिसे हम 'पिवट' कहते हैं लेकिन अगर टीम में दम है तो वे कचरे से भी सोना निकाल लेंगे। कई बार फाउंडर्स को लगता है कि वे अकेले सब संभाल लेंगे। वे सुपरमैन बनने की कोशिश करते हैं और अंत में बर्नआउट का शिकार होकर बैठ जाते हैं। स्टार्टअप कोई वन मैन शो नहीं है बल्कि यह एक रॉक बैंड की तरह है जहाँ ड्रमर और गिटारिस्ट का तालमेल ही संगीत पैदा करता है। अगर आपकी टीम में इगो की लड़ाई चल रही है तो आपका स्टार्टअप मार्केट में लड़ने से पहले ही खुद से हार जाएगा।
कई स्टार्टअप्स की टीम वैसी ही होती है जैसे शादी में आए हुए फूफाजी। काम कुछ नहीं करना है लेकिन राय सबकी देनी है। अगर आपकी टीम में भी ऐसे लोग हैं जो सिर्फ मीटिंग्स में बिस्कुट खाने आते हैं तो उन्हें बाहर का रास्ता दिखाने में ही भलाई है। जोएल समझाते हैं कि शुरुआती १० लोग ही आपकी कंपनी का कल्चर तय करते हैं। अगर वे आलसी हैं तो पूरी कंपनी आलसी बन जाएगी। इसलिए हायरिंग करते समय सिर्फ डिग्री मत देखिए बल्कि यह देखिए कि क्या वह बंदा रात के २ बजे सर्वर डाउन होने पर आपके साथ खड़ा रहेगा या फोन बंद करके सो जाएगा।
एक मजबूत टीम वह है जहाँ सबको अपना रोल पता हो। अगर स्ट्राइकर को गोल करना है तो गोलकीपर को गेंद रोकनी ही होगी। अगर दोनों एक ही काम करने लगेंगे तो विरोधी टीम गोल दागकर चली जाएगी। इसी तरह स्टार्टअप में सेल्स वाले को सेल्स और टेक वाले को कोडिंग पर ध्यान देना चाहिए। जब तक आपकी टीम एक सुर में नहीं गाएगी तब तक आपकी कंपनी का शोर मार्केट में सुनाई नहीं देगा।
लेसन २ : मार्केट की जरूरत और कस्टमर का सच
आपने बहुत मेहनत करके एक ऐसा छाता बनाया जो म्यूजिक बजाता है और लाइट भी देता है। आपको लगता है कि यह क्रांतिकारी है। लेकिन जब आप इसे मार्केट में लेकर जाते हैं तो पता चलता है कि लोग सिर्फ सूखा रहना चाहते हैं, उन्हें नाचने वाला छाता नहीं चाहिए। यही सबसे बड़ी गलती है जो नए स्टार्टअप करते हैं। वे एक ऐसा सोल्यूशन ढूंढ लेते हैं जिसकी प्रॉब्लम असल में एक्जिस्ट ही नहीं करती। जोएल कुर्ट्ज़मैन कहते हैं कि स्टार्टअप की दुनिया में कस्टमर ही आपका भगवान है और अगर आप उसकी भाषा नहीं समझ रहे हैं तो आप सिर्फ अपने पैसों की होली जला रहे हैं।
आजकल के दौर में हर दूसरा लड़का एक ऐप बनाना चाहता है। उसे लगता है कि बस ऐप बन गई तो मार्क जुकरबर्ग उसके घर चाय पीने आएगा। लेकिन भाई साहब, क्या आपने किसी से पूछा कि उन्हें उस ऐप की जरूरत भी है? अक्सर फाउंडर्स अपने ही आइडिया के साथ प्यार में पड़ जाते हैं। उन्हें लगता है कि उनका प्रोडक्ट 'बेस्ट' है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी माँ को अपना बच्चा सबसे सुंदर लगता है चाहे वह कितना ही शैतान क्यों न हो। मार्केट बड़ा बेरहम है। उसे आपके इमोशन्स से कोई लेना देना नहीं है। अगर आपका प्रोडक्ट किसी की जिंदगी आसान नहीं बना रहा है या उनका पैसा नहीं बचा रहा है तो वह उसे एक सेकंड में रिजेक्ट कर देगा।
सोचिए आप रेगिस्तान में गरम कॉफी बेचने की दुकान खोल लें। आपकी कॉफी दुनिया की सबसे बेहतरीन बीन्स से बनी हो सकती है लेकिन वहां खड़े प्यासे इंसान को सिर्फ ठंडा पानी चाहिए। आप वहां खड़े होकर अपनी कॉफी के फायदे गिनाते रहेंगे और वह इंसान अगले नल की तरफ बढ़ जाएगा। यही स्टार्टअप्स के साथ होता है। वे अपनी टेक्नोलॉजी का ढिंढोरा पीटते रहते हैं जबकि कस्टमर सिर्फ यह जानना चाहता है कि 'इसमें मेरा क्या फायदा है?'। अगर आप कस्टमर की पेन पॉइंट यानी उसकी असली तकलीफ को नहीं पकड़ पा रहे हैं तो आपकी सेल्स पिच सिर्फ एक शोर बनकर रह जाएगी।
भारत में तो हम जुगाड़ के उस्ताद हैं लेकिन बिजनेस में सिर्फ जुगाड़ काम नहीं आता। यहाँ डेटा और फीडबैक की जरूरत होती है। कई बार स्टार्टअप्स मार्केट रिसर्च के नाम पर सिर्फ अपने चार दोस्तों से पूछ लेते हैं। अब दोस्त तो यही कहेंगे कि भाई तू तो अगला एलन मस्क है। असली परीक्षा तब होती है जब कोई अनजान आदमी आपकी सर्विस के लिए अपनी जेब से पैसे निकालने को तैयार हो। अगर लोग फ्री में तो आपकी सर्विस ले रहे हैं लेकिन पैसे देने के नाम पर गायब हो जाते हैं तो समझ लीजिए कि आपके प्रोडक्ट की कोई असली वैल्यू नहीं है। जोएल समझाते हैं कि आपको मार्केट के हिसाब से खुद को बदलना होगा न कि मार्केट से उम्मीद करनी होगी कि वह आपके हिसाब से बदल जाए।
स्टार्टअप्स अक्सर बहुत बड़े मार्केट को एक साथ कब्जा करना चाहते हैं। उन्हें लगता है कि वे पहले ही दिन से पूरे इंडिया को बदल देंगे। भाई पहले अपने मोहल्ले की प्रॉब्लम तो सॉल्व कर लो। अगर आप छोटे लेवल पर सफल नहीं हो पा रहे हैं तो स्केल करने का सपना देखना बेकार है। कस्टमर का फीडबैक लेना और उस पर काम करना ही एक स्मार्ट एंटरप्रेन्योर की पहचान है। अगर आप फीडबैक को इगो पर ले लेंगे तो आपका स्टार्टअप बहुत जल्द इतिहास की किताबों में दफन हो जाएगा। याद रखिए कि मार्केट फीडबैक एक कड़वी दवा की तरह है जो शुरू में बुरी लगती है लेकिन आपके बिजनेस को लंबी उम्र देती है।
लेसन ३ : कैश का मैनेजमेंट और हकीकत का सामना
अगर टीम स्टार्टअप का दिल है और मार्केट उसका दिमाग तो पैसा उसका खून है। बिना खून के शरीर चाहे जितना मर्जी सुंदर हो वह ज्यादा देर तक जिंदा नहीं रह सकता। जोएल कुर्ट्ज़मैन अपनी किताब में एक कड़वी सच्चाई बताते हैं कि ज्यादातर स्टार्टअप्स आइडिया की कमी से नहीं बल्कि कैश खत्म होने की वजह से दम तोड़ देते हैं। नए फाउंडर्स के हाथ में जब फंडिंग का पैसा आता है तो उन्हें लगता है कि वे दुनिया के राजा बन गए हैं। वे तुरंत एक आलीशान ऑफिस लेते हैं महंगी कॉफी मशीन मंगवाते हैं और बिन मतलब की मार्केटिंग पर करोड़ों फूंक देते हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी ने अभी तैरना सीखा नहीं और सीधा समंदर के बीच में छलांग लगा दी।
बिजनेस चलाना कोई शौक नहीं बल्कि एक गणित है। अगर आपका खर्चा आपकी कमाई से ज्यादा है तो आप एक बिजनेस नहीं बल्कि एक बहुत महंगा शौक पाल रहे हैं। इंडिया में अक्सर देखा जाता है कि लोग इन्वेस्टर के पैसे को अपनी जीत मान लेते हैं। भाई साहब पैसा मिलना तो सिर्फ शुरुआत है असली खेल तो उस पैसे से प्रॉफिट बनाना है। कई बार स्टार्टअप्स 'बर्न रेट' के चक्कर में यह भूल जाते हैं कि एक दिन यह कुआं खाली हो जाएगा। अगर आप हर महीने लाखों रुपये जला रहे हैं सिर्फ इसलिए कि आपको ज्यादा से ज्यादा यूजर्स चाहिए तो आप एक ऐसी रेस में दौड़ रहे हैं जिसका अंत सिर्फ और सिर्फ बर्बादी है।
सोचिए आपने एक बहुत बड़ी पार्टी रखी। आपने शहर के सबसे महंगे हलवाई को बुलाया और सबको फ्री में खाना खिलाया। भीड़ तो बहुत आएगी और लोग आपकी तारीफ भी करेंगे। लेकिन जैसे ही आप खाना बांटना बंद करेंगे वही भीड़ गायब हो जाएगी और आपके पास बचेगा सिर्फ एक बड़ा सा बिल। यही हाल उन स्टार्टअप्स का होता है जो सिर्फ डिस्काउंट और फ्री की चीजों पर टिके होते हैं। जोएल कहते हैं कि एक असली स्टार्टअप वह है जो कम से कम रिसोर्सेज में ज्यादा से ज्यादा वैल्यू पैदा करना जानता हो। अगर आप अपनी चादर देखकर पैर नहीं फैला रहे हैं तो आप बहुत जल्द नंगे होने वाले हैं।
कुछ स्टार्टअप फाउंडर्स का हाल वैसा ही होता है जैसे महीने की पहली तारीख को सैलरी आने पर हम खुद को रईस समझते हैं और दस तारीख तक पार्ले जी खाकर गुजारा करते हैं। स्टार्टअप में आपको हर एक पैसे का हिसाब रखना होता है। आपको पता होना चाहिए कि जो एक रुपया आप खर्च कर रहे हैं वह वापस कितना लेकर आएगा। अगर आपको लगता है कि हिसाब किताब रखना मुनीम जी का काम है और आप तो सिर्फ 'विज़न' पर काम करेंगे तो तैयार रहिए क्योंकि आपका विज़न बहुत जल्द धुंधला होने वाला है। एक सफल कंपनी वही बनती है जो मुश्किल समय के लिए अपना कैश बचाकर रखती है।
यह समझना जरूरी है कि स्टार्टअप एक मैराथन है न कि १०० मीटर की दौड़। आपको अपनी ताकत और अपने पैसे को अंत तक बचाकर रखना है। जो लोग शुरू में ही सारा दम लगा देते हैं वे फिनिश लाइन तक कभी नहीं पहुंच पाते। जोएल कुर्ट्ज़मैन की यह किताब हमें सिखाती है कि अगर आपकी टीम मजबूत है आप मार्केट की जरूरत को समझते हैं और अपने पैसों को समझदारी से खर्च करते हैं तो आपको सफल होने से कोई नहीं रोक सकता। अब फैसला आपके हाथ में है कि आप एक लम्बी रेस का घोड़ा बनना चाहते हैं या सिर्फ एक दिन का चमकता हुआ सितारा जो पल भर में गायब हो जाता है।
तो दोस्तों क्या आप तैयार हैं अपने स्टार्टअप को उन १० क्रिटिकल फैक्टर्स के साथ आसमान की ऊंचाइयों पर ले जाने के लिए? नीचे कमेंट्स में बताएं कि आपको इन ३ लेसन्स में से सबसे बेस्ट कौन सा लगा और क्या आप भी कोई नया बिजनेस शुरू करने का प्लान कर रहे हैं। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों के साथ शेयर करें जो हमेशा करोड़ों की बातें करते हैं पर काम कुछ नहीं करते।
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