अगर आप अभी भी वही पुराने घिसे-पिटी कमांड और कंट्रोल वाले तरीके से अपनी टीम चला रहे हैं, तो मुबारक हो, आप अपनी नाकामी का डेथ वारंट खुद साइन कर रहे हैं। दुनिया रॉकेट की स्पीड से बदल रही है और आप अभी भी बैलगाडी वाले रूल्स चिपकाए बैठे हैं। इस ईगो को साइड रखिए वरना बहुत पीछे छूट जाएंगे।
इस ब्लॉग में हम जनरल स्टैनली मैक्रिस्टल की बुक टीम ऑफ टीम्स से वह ३ पावरफुल लेसन्स सीखेंगे जो आपकी टीम को एक अडैप्टेबल मशीन बना देंगे। चलिए देखते हैं कि मॉडर्न लीडरशिप के असली रूल्स क्या हैं।
लेसन १ : अडैप्टेबिलिटी ओवर एफिशिएंसी - पुराने रूल्स को कचरे के डिब्बे में डालिए
आज की दुनिया इतनी तेजी से बदल रही है कि जितने में आप अपनी अगली मीटिंग का एजेंडा सेट करते हैं, उतने में मार्केट का ट्रेंड बदल चुका होता है। जनरल स्टैनली मैक्रिस्टल कहते हैं कि पुराने जमाने में एफिशिएंसी का मतलब था कि एक ही काम को बार-बार परफेक्ट तरीके से करना। जैसे कोई फैक्ट्री वर्कर हो जिसे बस एक नट घुमाना है। लेकिन भाई साहब, हम अब १९वीं सदी की फैक्ट्री में नहीं जी रहे हैं। अगर आपकी टीम सिर्फ ऑर्डर्स फॉलो करना जानती है और उसमें खुद को बदलने की काबिलियत नहीं है, तो समझ लीजिए कि आप एक ऐसी कार चला रहे हैं जिसका स्टेयरिंग लॉक हो चुका है।
सोचिए, आप एक रेस्टोरेंट के मालिक हैं। आपने अपनी टीम को एकदम एफिशिएंट बना दिया है कि पिज्जा ठीक १० मिनट में टेबल पर होना चाहिए। अब इमेजिन कीजिए कि अचानक आपके रेस्टोरेंट में कोई वीआईपी आ जाता है जिसे ग्लूटेन से एलर्जी है। आपकी एफिशिएंट टीम क्या करेगी? वो उसे वही पुराना पिज्जा खिला देगी क्योंकि उनके पास तो बस वही एक फिक्स रूल है। रिजल्ट क्या होगा? वो वीआईपी सीधा हॉस्पिटल जाएगा और आप सीधे कोर्ट। यही प्रॉब्लम है सिर्फ एफिशिएंसी के पीछे भागने की। इसमें दिमाग का इस्तेमाल कम और रोबोटिक मूवमेंट ज्यादा होता है। आज की दुनिया कॉम्प्लेक्स है, यहाँ रूल्स से ज्यादा अडैप्टेबिलिटी की जरूरत है।
मिलिट्री का एग्जांपल लीजिए। पहले के जंगों में आमने-सामने की लड़ाई होती थी, जहाँ बड़े-बड़े मैप्स और फिक्स प्लांस चलते थे। लेकिन जब स्टैनली मैक्रिस्टल इराक में थे, तो उनका सामना अल-कायदा से हुआ। वो कोई रेगुलर आर्मी नहीं थी। वो छोटे-छोटे ग्रुप्स में थे जो कहीं भी कभी भी गायब हो जाते थे। अमेरिकन आर्मी बहुत एफिशिएंट थी, उनके पास बेस्ट हथियार थे, लेकिन वो अडैप्टेबल नहीं थे। वो बड़े जहाज की तरह थे जिसे मोड़ने में घंटों लगते हैं, जबकि दुश्मन छोटी नावों की तरह था जो कहीं भी मुड़ जाता था।
अगर आप एक मैनेजर हैं और अपनी टीम को सिर्फ ये सिखा रहे हैं कि सुबह ९ बजे आकर शाम के ६ बजे तक फाइलें कैसे दबानी हैं, तो आप उन्हें फेल कर रहे हैं। आपको उन्हें एक ऐसा माहौल देना होगा जहाँ वो खुद सिचुएशन देखकर फैसला ले सकें। ये वैसा ही है जैसे आप अपने घर की पार्टी के लिए कोई केटरर हायर करते हैं। अगर लाइट चली जाए और केटरर कहे कि भाई मेरे कॉन्ट्रैक्ट में तो सिर्फ खाना बनाना लिखा था, पंखा झलना नहीं, तो आप उसे दोबारा कभी काम नहीं देंगे। आपको वो इंसान चाहिए जो सिचुएशन भांप ले और टॉर्च जलाकर खाना सर्व करना शुरू कर दे।
सक्सेसफुल होने का मतलब अब यह नहीं है कि आप कितने कम खर्च में कितना ज्यादा काम कर रहे हैं। असली सक्सेस इसमें है कि जब मार्केट गिरे या कोई नया कॉम्पिटिटर आए, तो आपकी टीम कितनी जल्दी अपना रास्ता बदल सकती है। जो टीम फ्लेक्सिबल नहीं होती, वो अक्सर टूट जाती है। जैसे वो पुराने जमाने के हेवी वेट बॉक्सर जो सिर्फ एक पंच मारना जानते थे, लेकिन आज के एमएमए फाइटर्स के सामने वो दो मिनट भी नहीं टिक सकते क्योंकि एमएमए वाला कभी भी किक मार देगा या नीचे गिरा देगा। अपनी टीम को भी एमएमए फाइटर बनाइए, न कि कोई पुराना जड़ पहलवान जो सिर्फ एक ही दांव जानता हो।
लेसन २ : शेयर्ड कॉन्शियसनेस - इंफॉर्मेशन की तिजोरी खोलिए
ज्यादातर कंपनियों में हाल यह होता है कि सेल्स टीम को नहीं पता कि मार्केटिंग क्या कर रही है और मार्केटिंग वालों को लगता है कि आईटी वाले बस ऑफिस में बैठकर मुफ्त की कॉफी पी रहे हैं। इसे कहते हैं 'साइलो में काम करना'। जनरल स्टैनली मैक्रिस्टल कहते हैं कि अगर आप अपनी टीम के बीच इंफॉर्मेशन की दीवारें खड़ी करते हैं, तो आप खुद अपने ही पैरों पर कुल्हाडी मार रहे हैं। शेयर्ड कॉन्शियसनेस का मतलब है कि हर मेबर को न सिर्फ अपना काम पता हो, बल्कि उसे यह भी पता हो कि पूरी टीम का बड़ा गोल क्या है। जब तक हर किसी को पूरी पिक्चर नहीं दिखेगी, तब तक वो सिर्फ अंधेरे में तीर चलाएंगे।
मान लीजिए आपकी शादी की तैयारी चल रही है। हलवाई को पता है कि उसे गुलाब जामुन बनाने हैं, लेकिन उसे ये नहीं पता कि मेहमान कब आने वाले हैं। पंडित जी को पता है कि फेरे करवाने हैं, लेकिन उन्हें ये नहीं बताया गया कि दूल्हा-दुल्हन अभी तक ब्यूटी पार्लर से ही नहीं लौटे। अब अगर शादी में देर होती है, तो हलवाई अपनी ठंडी चाशनी लेकर बैठा रहेगा और पंडित जी अपना मंत्र पढ़ते रहेंगे। रिजल्ट क्या होगा? महा-कलेक्टर लेवल का रायता फैल जाएगा। यही होता है जब टीम में शेयर्ड कॉन्शियसनेस नहीं होती। हर कोई अपना काम तो परफेक्ट कर रहा है, लेकिन सब एक-दूसरे से कटे हुए हैं।
स्टैनली मैक्रिस्टल ने अपनी टीम में इस प्रॉब्लम को सॉल्व करने के लिए 'डेली ब्रीफिंग' शुरू की। इसमें हर कोई, चाहे वो जमीन पर लड़ने वाला सिपाही हो या वॉशिंगटन में बैठा अफसर, सबको एक ही समय पर सारी इंफॉर्मेशन दी जाती थी। लोग अक्सर सोचते हैं कि अरे भाई, छोटी मछली को बड़ी बातें बताने की क्या जरूरत है? लेकिन यही सोच सबसे बड़ी बेवकूफी है। जब एक छोटे लेवल के एम्प्लॉई को भी बिजनेस की ओवरऑल सिचुएशन पता होती है, तो वो बेहतर फैसले ले पाता है। उसे ये नहीं लगता कि वो बस एक बड़ा सा नट-बोल्ट है, बल्कि उसे महसूस होता है कि वो पूरी मशीन का एक जरूरी हिस्सा है।
आजकल के कॉर्पोरेट कल्चर में कुछ बॉस ऐसे होते हैं जो इंफॉर्मेशन को अपनी जागीर समझते हैं। उन्हें लगता है कि जितनी ज्यादा बातें वो छुपाकर रखेंगे, उनका रूतबा उतना ही बड़ा होगा। ये तो वही बात हुई कि आप अपनी टीम को क्रिकेट के मैदान में उतार दें लेकिन स्कोरबोर्ड ही न दिखाएं। बेचारे प्लेयर भाग तो रहे हैं, पर उन्हें पता ही नहीं कि जीत रहे हैं या हार रहे हैं। ऐसी टीम में जोश कम और कन्फ्यूजन ज्यादा होता है। जब इंफॉर्मेशन फ्रीली फ्लो होती है, तो टीम के बीच ट्रस्ट बढ़ता है। लोगों को समझ आता है कि अगर एक डिपार्टमेंट में आग लगी है, तो उसका धुआं दूसरे तक भी पहुंचेगा।
शेयर्ड कॉन्शियसनेस का सबसे बड़ा फायदा यह है कि आपको हर बात के लिए मीटिंग बुलाने की जरूरत नहीं पड़ती। जब सबको पता है कि कंपनी का विजन क्या है और दुश्मन (कॉम्पिटिटर) क्या कर रहा है, तो लोग खुद-ब-खुद तालमेल बिठा लेते हैं। ये वैसा ही है जैसे एक फुटबॉल मैच में मिडफील्डर को पता होता है कि स्ट्राइकर कहाँ खड़ा होगा। वो बिना देखे भी पास दे देता है क्योंकि उन दोनों के बीच एक शेयर्ड समझ होती है। अगर आपकी टीम भी इसी लेवल का सिंक चाहती है, तो इंफॉर्मेशन को लॉक करना बंद कीजिए और उसे सबको बांटना शुरू कीजिए। याद रखिए, ज्ञान बांटने से बढ़ता है और टीम को पावरफुल बनाता है।
लेसन ३ : एम्पावर्ड एग्जीक्यूशन - अब हुक्म देना बंद कीजिए
पुराने जमाने के बॉस को लगता था कि वो कोई जंगल के राजा हैं, जो दहाड़ेंगे और पूरी टीम डर के मारे काम पर लग जाएगी। लेकिन जनरल स्टैनली मैक्रिस्टल कहते हैं कि एक मॉडर्न लीडर को शेर नहीं, बल्कि एक 'माली' (Gardener) बनना चाहिए। अब आप सोचेंगे कि भला एक लीडर और माली का क्या कनेक्शन? देखिए, एक माली खुद बैठकर पौधों को उगने का ऑर्डर नहीं देता कि 'चलो जल्दी बढ़ो वरना सैलरी काट लूंगा'। माली का काम बस एक अच्छा एनवायरनमेंट तैयार करना है। वो मिट्टी उपजाऊ बनाता है, पानी देता है और खरपतवार साफ करता है। पौधे तो अपनी काबिलियत से खुद बढ़ते हैं। एम्पावर्ड एग्जीक्यूशन का मतलब यही है कि अपनी टीम को इतना पावरफुल और आजाद बना दो कि उन्हें हर छोटे काम के लिए आपकी परमिशन की भीख न मांगनी पड़े।
आजकल की कई कंपनियों में 'माइक्रो-मैनेजमेंट' की बीमारी फैली हुई है। बॉस को हर ईमेल सीसी में चाहिए और हर छोटी फाइल पर उनके साइन होने जरूरी हैं। भाई साहब, अगर आपको ही सब कुछ करना है, तो टीम क्यों पाल रखी है? ये तो वही बात हुई कि आपने एक बहुत महंगा कुत्ता खरीदा और अब आप खुद चोरों पर भौंक रहे हैं। जब आप अपनी टीम का हाथ पकड़कर उन्हें चलना सिखाते रहेंगे, तो वो कभी दौड़ना नहीं सीखेंगे। स्टैनली मैक्रिस्टल ने इराक में यही किया। उन्होंने अपने कमांडर्स को पूरी आजादी दे दी कि अगर सामने कोई मौका दिखे, तो हेडक्वार्टर से पूछने का इंतजार मत करो, सीधा एक्शन लो। क्योंकि जितने में परमिशन आएगी, उतने में तो चिड़िया खेत चुग जाएगी।
मान लीजिए आप एक फिल्म डायरेक्टर हैं और आप हर एक्टर को ये बता रहे हैं कि उसे अपनी पलकें कितनी बार झपकानी हैं और सांस कितनी जोर से लेनी है। नतीजा क्या होगा? फिल्म इतनी बोरिंग और नकली बनेगी कि लोग थिएटर में ही सो जाएंगे। लेकिन अगर आप उन्हें बस सीन का इमोशन समझा दें और उन्हें अपनी मर्जी से परफॉर्म करने दें, तो शायद आपको ऑस्कर मिल जाए। लीडरशिप भी ऐसी ही है। जब आप लोगों पर भरोसा करते हैं, तो वो अपनी उम्मीद से ज्यादा अच्छा परफॉर्म करके दिखाते हैं। एम्पावर्ड एग्जीक्यूशन का मतलब ये नहीं है कि आप काम छोड़कर घर बैठ जाएं, इसका मतलब ये है कि आप अपनी टीम को जिम्मेदारी और अथॉरिटी दोनों दे रहे हैं।
जरा सोचिए, अगर किसी कंपनी के कस्टमर केयर वाले को एक छोटा सा रिफंड देने के लिए भी अपने मैनेजर, फिर जोनल मैनेजर और फिर सीईओ की परमिशन लेनी पड़े, तो वो कस्टमर अगली बार उस कंपनी का नाम भी नहीं लेगा। वो कस्टमर तब खुश होता है जब सामने खड़ा एम्प्लॉई वहीं खड़े-खड़े उसकी प्रॉब्लम सॉल्व कर दे। यही वो असली पावर है जो एक टीम को 'टीम ऑफ टीम्स' बनाती है। जब लोग खुद को ओनर समझने लगते हैं, तो वो काम को बोझ नहीं बल्कि अपना मिशन मानते हैं।
अंत में, यह बात याद रखिए कि एक महान लीडर वो नहीं होता जो सबसे ज्यादा काम करता है, बल्कि वो होता है जो एक ऐसा सिस्टम बनाता है जहाँ उसके बिना भी काम सुपरफास्ट तरीके से चले। अपनी टीम के हाथ मत बांधिए, बल्कि उनके पंख खोलिए। जब आप उन्हें फैसला लेने की ताकत देते हैं, तो वो सिर्फ आपके एम्प्लॉई नहीं रहते, वो आपके पार्टनर बन जाते हैं। और यकीन मानिए, जब पार्टनर्स मिलकर काम करते हैं, तो दुनिया की कोई भी ताकत उन्हें कामयाब होने से नहीं रोक सकती।
टीम ऑफ टीम्स हमें सिखाती है कि आज की उलझी हुई दुनिया में अकेले जीतना नामुमकिन है। आपको अपनी टीम को आजादी देनी होगी, उनके साथ सारी जानकारी शेयर करनी होगी और सबसे जरूरी बात, अपनी ईगो को दरवाजे के बाहर छोड़ना होगा। अगर आप भी अपनी टीम को एक साधारण ग्रुप से बदलकर एक अडैप्टेबल मशीन बनाना चाहते हैं, तो आज से ही इन लेसन्स को लागू करना शुरू करें।
क्या आप अपनी टीम को सच में एम्पावर करने के लिए तैयार हैं? हमें कमेंट में बताएं कि इन ३ लेसन्स में से कौन सा लेसन आपको सबसे ज्यादा जरूरी लगा। इस आर्टिकल को अपने उन दोस्तों और कलीग्स के साथ शेयर करें जो अभी भी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। चलिए मिलकर एक बेहतर और स्मार्ट वर्क कल्चर बनाते हैं।
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