क्या आप अभी भी वही घिसे-पिटे तरीके से लोगों को कन्विंस करने की कोशिश कर रहे हैं और फिर भी रिजेक्शन झेल रहे हैं। बधाई हो, आपकी बातें दीवार से सिर टकराने जैसी असरदार हैं। अगर आपको लगता है कि सिर्फ चिल्लाने या मीठी बातों से काम बन जाएगा, तो आप अपनी नाकामी का जश्न मनाने के लिए तैयार रहिये।
आज के इस आर्टिकल में हम रॉबर्ट मिलर और गैरी विलियम्स की किताब The 5 Paths to Persuasion के जरिए सीखेंगे कि कैसे अलग-अलग डिसीजन मेकर्स के दिमाग में अपनी बात फिट की जाती है। अपनी कम्युनिकेशन की पुरानी आदतों को छोड़िये और इन ३ पावरफुल लेसन को समझिये जो आपकी पर्सुएशन स्किल्स को नेक्स्ट लेवल पर ले जाएंगे।
लेसन १ : पांच तरह के लोग और उनके फैसले लेने का अनोखा स्टाइल
मान लीजिये आप अपने किसी दोस्त को एक नया स्मार्टफोन खरीदने के लिए मना रहे हैं। आप उसे फीचर्स की लिस्ट गिना रहे हैं लेकिन वो बस अपनी धुन में मगन है। जानते हैं क्यों। क्योंकि आप अंधेरे में तीर मार रहे हैं। रॉबर्ट मिलर और गैरी विलियम्स कहते हैं कि दुनिया में पांच तरह के डिसीजन मेकर्स होते हैं। अगर आप सामने वाले का स्टाइल नहीं जानते तो आप अपनी सेल्स पिच किसी दीवार को सुना रहे हैं। सबसे पहले आते हैं 'Charismatics' यानी वो लोग जो नए आइडियाज को देखकर एक्साइटेड तो जल्दी हो जाते हैं लेकिन फैसला लेने से पहले सारे रिस्क भी जानना चाहते हैं। अगर आप इनके सामने बहुत ज्यादा हवा-हवाई बातें करेंगे तो ये आपको इग्नोर कर देंगे। इनको डेटा और रिजल्ट्स दोनों चाहिए।
इसके बाद आते हैं 'Skeptics' जो हर बात पर शक करते हैं। ये वो लोग हैं जो भगवान से भी आईडी कार्ड मांग लें। इनको कन्विंस करना मतलब लोहे के चने चबाना है। इनके साथ आपको बहुत संभलकर चलना पड़ता है क्योंकि इनको लगता है कि हर कोई इन्हें चूना लगाने आया है। फिर आते हैं 'Thinkers' जो हर पहलू को बारीकी से तौलते हैं। इनको जल्दबाजी बिल्कुल पसंद नहीं है। अगर आप इन्हें कहेंगे कि भाई अभी ले लो ऑफर खत्म हो जाएगा तो ये वहीं से उल्टा भाग जाएंगे। इनको चाहिए टाइम और ढेर सारी इन्फॉर्मेशन ताकि ये खुद को स्मार्ट महसूस कर सकें।
चौथी कैटेगरी है 'Followers' की। ये वो लोग हैं जो खुद फैसला लेने से डरते हैं। इनको बस ये जानना है कि पिछले साल किसने ये किया था और उसका क्या नतीजा रहा। अगर आप इन्हें बड़े-बड़े ब्रांड्स या सक्सेसफुल लोगों के एग्जांपल देंगे तो ये तुरंत मान जाएंगे। और आखिर में आते हैं 'Controllers' जिन्हें सब कुछ अपने हाथ में चाहिए। ये खुद को दुनिया का सबसे बड़ा बॉस समझते हैं। इनसे बात करते समय आपको ऐसा दिखाना होगा कि आईडिया उन्हीं का है। जैसे ही उन्हें लगेगा कि वो हार रहे हैं या कोई उन पर हावी हो रहा है वो डील कैंसिल कर देंगे।
इन पांचों स्टाइल्स को समझना वैसा ही है जैसे किसी ताले की सही चाबी ढूंढना। अगर आप किसी 'Skeptic' को 'Follower' वाली कहानी सुनाएंगे तो वो आपको पागल समझेगा। असल जिंदगी में भी हम अक्सर यही गलती करते हैं। ऑफिस में बॉस को आईडिया पिच करना हो या घर पर पिकनिक का प्लान बनाना हो हम बस अपनी बात बोले जाते हैं। हम ये भूल जाते हैं कि सामने वाला किस चश्मे से दुनिया देख रहा है। पर्सुएशन कोई जादू नहीं है बल्कि सामने वाले के दिमाग के रेडियो स्टेशन को ट्यून करना है। जब तक आप उनके फ्रीक्वेंसी पर नहीं पहुंचेंगे आपकी आवाज सिर्फ शोर लगेगी।
लेसन २ : सामने वाले के चश्मे से दुनिया देखिये और अपनी बात मनवाइये
जब आपने एक बार यह पहचान लिया कि सामने वाला इंसान किस टाइप का डिसीजन मेकर है, तो अगला कदम है अपनी बात को उनके सांचे में फिट करना। इसे 'कस्टमाइज्ड डिलीवरी' कहते हैं। मान लीजिये आप अपने किसी 'Controller' बॉस को एक नया प्रोजेक्ट समझा रहे हैं। अगर आप वहां जाकर अपनी भावनाओं का रोना रोएंगे कि "सर, मुझे लगता है यह कंपनी के लिए अच्छा होगा," तो बॉस आपको बाहर का रास्ता दिखाने में एक सेकंड भी नहीं लगाएगा। कंट्रोलर टाइप के लोगों को आपकी भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता। उन्हें सिर्फ इस बात से मतलब है कि इस काम से उनका कंट्रोल कैसे बढ़ेगा या कंपनी को कितना ठोस फायदा होगा। उनको डेटा दीजिये, फैक्ट्स दीजिये और फिर चुपचाप पीछे हट जाइये ताकि उन्हें लगे कि फैसला उन्होंने ही लिया है।
वहीं अगर आप किसी 'Skeptic' यानी शक करने वाले इंसान से बात कर रहे हैं, तो सीधे मुद्दे पर आना आपके लिए जानलेवा हो सकता है। स्केप्टिक इंसान को लगता है कि आप उसे बेवकूफ बना रहे हैं। यहाँ आपको 'क्रेडिबिलिटी' का खेल खेलना होगा। आपको ऐसे लोगों का सहारा लेना होगा जिन पर वो भरोसा करता है। अगर आप उसे कहेंगे कि "फलां बड़े एक्सपर्ट ने भी यही कहा है," तो शायद उसकी आंखों से शक की पट्टी थोड़ी कम हो। ऐसे लोगों को मनाने के लिए आपको एक जासूस की तरह सबूत पेश करने होंगे। बिना सबूत के स्केप्टिक के सामने बोलना मतलब भैंस के आगे बीन बजाना है। और यकीन मानिये, वह भैंस आपसे ज्यादा समझदार व्यवहार करेगी अगर आपने उसे बिना लॉजिक के कुछ बेचने की कोशिश की।
अब बात करते हैं 'Charismatics' की। ये लोग चमक-धमक और बड़े विजन से बहुत जल्दी इम्प्रेस हो जाते हैं। इनको बोरिंग एक्सेल शीट्स दिखाकर आप अपनी मौत को दावत दे रहे हैं। इनको बड़ा सपना दिखाइये। इन्हें बताइये कि आपका आईडिया दुनिया कैसे बदल सकता है। लेकिन सावधान! जैसे ही ये एक्साइटेड हों, तुरंत इन्हें जमीनी हकीकत और रिस्क भी बता दीजिये। क्योंकि अगर आपने सिर्फ हवा-हवाई बातें कीं, तो बाद में जब इन्हें असलियत पता चलेगी, तो ये आपसे ऐसे दूर भागेंगे जैसे बिजली का झटका लगा हो। करिश्माई लोग जोश में फैसला तो लेते हैं लेकिन उन्हें सुरक्षित महसूस कराना आपकी जिम्मेदारी है।
'Thinkers' के साथ आपकी सबसे बड़ी परीक्षा होती है आपके सब्र की। थिंकर वो लोग हैं जो एक शर्ट खरीदने के लिए भी दस दुकानों के चक्कर काटते हैं और फिर भी वापस पहली दुकान पर आकर सोचते हैं कि कहीं कुछ छूट तो नहीं गया। इनके साथ जल्दबाजी करना मतलब अपनी डील खुद ही फाड़ देना है। इनको हर संभव विकल्प (options) दीजिये। इन्हें तुलना करके बताइये कि प्लान ए, प्लान बी से बेहतर क्यों है। जब आप इन्हें बहुत सारा डेटा और रिसर्च पेपर पकड़ा देते हैं, तो उन्हें लगता है कि उन्होंने बहुत गहरा अध्ययन किया है। असल में आप उन्हें वही दिखा रहे हैं जो आप चाहते हैं, लेकिन उन्हें लगता है कि वे खुद रिसर्च कर रहे हैं।
अंत में आते हैं 'Followers'। इनको इन्वेन्शन (invention) से नफरत होती है। इनको बस यह देखना है कि यह रास्ता पहले कोई और नाप चुका है या नहीं। अगर आप इनके पास जाकर कहेंगे कि "यह एकदम नया और अनोखा आईडिया है जिसे आज तक किसी ने ट्राई नहीं किया," तो उनके पसीने छूट जाएंगे। इसके बजाय उनसे कहिये कि "मार्केट के टॉप ५ लोग यही कर रहे हैं।" बस, इतना सुनते ही वे आपकी टीम में शामिल हो जाएंगे। असल में दुनिया को बदलना आसान है, लेकिन एक फॉलोअर को बिना किसी पुराने उदाहरण के मनाना नामुमकिन है। अपनी बात को इस तरह पेश करना कि वह सामने वाले के स्वभाव से मेल खाए, यही असली कला है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप किसी बच्चे को कड़वी दवाई चॉकलेट में लपेटकर खिला देते हैं। दवाई वही है, बस तरीका बदल गया है।
लेसन ३ : रिस्क को कम कीजिये और भरोसे की नींव रखिये
आप दुनिया के सबसे बड़े सेल्समैन हो सकते हैं, आपकी बातें शहद से भी मीठी हो सकती हैं, लेकिन अगर सामने वाले को आपकी बात में 'रिस्क' की गंध आ गई, तो समझिये आपकी मेहनत पानी में गई। रॉबर्ट मिलर और गैरी विलियम्स का तीसरा सबसे बड़ा लेसन यही है कि हर डिसीजन मेकर, चाहे वो कितना ही निडर क्यों न दिखे, अंदर से डरा हुआ होता है। उसे डर होता है अपनी साख खोने का, पैसा डूबने का या गलत साबित होने का। अगर आप इस डर को खत्म नहीं कर सकते, तो आप कभी किसी को हकीकत में पर्सुएड नहीं कर पाएंगे। लोग अक्सर अपनी पिच को इतना परफेक्ट दिखाते हैं कि वो फेक लगने लगती है। याद रखिये, अगर कोई चीज जरूरत से ज्यादा अच्छी लग रही है, तो सामने वाला उसे शक की नजर से ही देखेगा।
इंसानी दिमाग खतरे को पहचानने में उस्ताद होता है। आप अपने किसी 'Thinker' दोस्त को इन्वेस्ट करने के लिए कह रहे हैं और सिर्फ फायदे गिना रहे हैं, तो उसके दिमाग में अलार्म बजने लगेगा। उसे लगेगा कि आप कुछ छुपा रहे हैं। यहाँ समझदारी इसी में है कि आप खुद ही कमियों को सामने रख दें। जब आप अपनी बात में संभावित रिस्क को खुद स्वीकार करते हैं, तो आपकी विश्वसनीयता (credibility) एकदम से बढ़ जाती है। सामने वाले को लगता है कि यह बंदा सिर्फ अपना माल बेचने नहीं आया है, बल्कि इसे मेरी भी फिक्र है। यह वैसा ही है जैसे कोई दुकानदार खुद कह दे कि "भाई साहब, यह कपड़ा धोने के बाद थोड़ा सिकुड़ सकता है।" बस, इतना सुनते ही आपका उस पर भरोसा सातवें आसमान पर पहुँच जाता है।
इसके अलावा, पर्सुएशन का मतलब यह नहीं है कि आप सिर्फ एक बार अपनी बात मनवा लें। असली खेल तो तब शुरू होता है जब सामने वाला आपके फैसले पर अमल करता है। अगर आपने किसी 'Follower' को डरा-धमका कर या प्रेशर डाल कर कोई काम करवा लिया, तो अगली बार वो आपके फोन का जवाब भी नहीं देगा। आपको अपनी डिलीवरी में 'सेफ्टी नेट्स' यानी सुरक्षा कवच देने होंगे। उदाहरण के लिए, अगर आप ऑफिस में कोई नया सॉफ्टवेयर लागू करवाना चाहते हैं, तो कहिये कि "हम इसे पहले सिर्फ एक हफ्ते के लिए छोटे लेवल पर ट्राई करेंगे।" यह सुनकर 'Controller' को भी सुकून मिलेगा कि स्थिति उसके हाथ से बाहर नहीं जा रही है। छोटे कदम हमेशा बड़े बदलावों का रास्ता खोलते हैं।
पर्सुएशन की इस पूरी प्रक्रिया में एक और बात बहुत जरूरी है और वो है 'फीडबैक लूप'। अपनी बात कहने के बाद चुप होना सीखिये। हम में से ज्यादातर लोग इतने उतावले होते हैं कि सामने वाले को सोचने का मौका ही नहीं देते। याद रखिये, सन्नाटा (silence) भी पर्सुएशन का एक बहुत बड़ा हथियार है। जब आप अपनी बात कह कर रुक जाते हैं, तो सामने वाला मजबूर हो जाता है उस पर रियेक्ट करने के लिए। उस सन्नाटे में ही आपको असली जवाब मिलते हैं। अगर आप लगातार बोलते रहेंगे, तो आप सिर्फ अपनी घबराहट दिखा रहे हैं। एक मंझा हुआ खिलाड़ी वही है जो पासा फेंक कर शांति से सामने वाले की चाल का इन्तजार करता है।
यह समझ लीजिये कि पर्सुएशन कोई चालाकी या धोखाधड़ी नहीं है। यह दूसरों की जरूरतों और उनके सोचने के तरीके का सम्मान करना है। जब आप 'The 5 Paths to Persuasion' के इन ५ स्टाइल्स को मास्टर कर लेते हैं, तो आप सिर्फ एक बेहतर कम्युनिकेटर नहीं बनते, बल्कि आप एक बेहतर लीडर और इंसान भी बनते हैं। अब वक्त आ गया है कि आप अपनी वही पुरानी घिसी-पिटी टेप रिकॉर्डर वाली पिच को रिटायर करें और सामने वाले की फ्रीक्वेंसी पर अपना रेडियो सेट करें। क्या आप तैयार हैं दुनिया को अपने नजरिये से देखने के लिए मजबूर करने के लिए। याद रखिये, जीत उसी की होती है जो दूसरों के दिमाग का नक्शा पढ़ना जानता है।
आज ही अपनी अगली मीटिंग या बातचीत में इन ५ स्टाइल्स में से किसी एक को पहचानने की कोशिश कीजिये। देखिये कि आपके सामने खड़ा इंसान 'Skeptic' है या 'Charismatic'। फिर देखिये कैसे आपकी बातों का असर जादू की तरह काम करता है। अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया और आप अपनी लाइफ को बेहतर बनाना चाहते हैं, तो इसे अपने उन दोस्तों के साथ शेयर कीजिये जो आज भी गलत तरीके से लोगों को कन्विंस करने की कोशिश कर रहे हैं। कमेंट्स में बताइये कि आप किस तरह के डिसीजन मेकर हैं। चलिए, मिलकर अपनी बातचीत के अंदाज को बदलते हैं।
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